Nous Podcast· 31 Mar 2026· 2:29:03

The shared intellectual history of Shia and Sunni movements: The case of Iran | Syed Akif Zaidi

"When a world order is collapsing or changing, the final moments are very aggressive."

Full Transcript

व्हेन अ वर्ल्ड ऑर्डर इज कोलैप्सिंग और चेंजिंग जो उसके फाइनल [संगीत] मोमेंट्स होते हैं वो बहुत ज्यादा अग्रेसिव होते हैं। जो एडवर्ड सईद ने ओरिएंटलिज्म बोला था कि अभी भी हम उन्हीं के पर्सपेक्टिव से उन्हीं के फेलियर को इवैलुएट करने की कोशिश कर रहे हैं। लगता है कि जैसे दो मुलिक के बीच की ये जंग है। लगता है जैसे दो नेटवर्थ के बीच की जंग है जो कि है लेकिन उससे कहीं ज्यादा है। ये दर हकीकत दो नजरिए के बीच का मुकाबला है। फिर लेट 1800 में जो मुस्लिम वर्ल्ड का एक ऑर्डर था वह जब कोलैप्स हो रहा था तो इसी तरह के सवालात लोगों के सामने आए थे। आपके हिसाब से वह क्या चीजें हैं कि जिसने दुनिया में इतनी तबाही ना सिर्फ आज। पिछले कई 100 साल से कोई दुनिया में स्टेबिलिटी नहीं रही। स सिवाय उनके अपने स्टेट्स के विदिन एंथ्रोपोसेंट्रिज्म यानी इंसान मेहरी जिसको हम कह सकते हैं। उसके तहत [संगीत] इंसान मेयार बन जाता है सही और गलत हक और बाततिल का। तो अगर आप मेजॉरिटी के बिना पर आप कोई फास्टिस्ट निजाम बनाना चाहें [संगीत] जैसे कि पूरे पब्लिक सपोर्ट के साथ नासी जर्मनी रह चुका है। पब्लिक सपोर्ट के साथ इंपीरियल जापान रह इविल टेंडेंसीज हैं। जब भी हमेशा से जिसको आपने एस्टाइन एस्टीन गैंग बोला कि जहां पे सेक्स ट्रैफिकिंग है। ये जो स्पेस थी मुस्लिम सिविलाइजेशनल [संगीत] स्पेस गरचे दुनिया की उस जमाने की सबसे एडवांस स्पेस थी। लेकिन ऐसी नहीं थी कि ये फ्लोलेस थी कि नेपोलियन ने अपनी शोहरत पहले जो कायम की वो मिस्र में और फिलिस्तीन में जेनोसाइड करके उसने हासिल की। कॉलोनियलिज्म इज नॉट अ इज नॉट अ मसल अ साइड इफेक्ट ऑफ मॉडर्निटी बल्कि [संगीत] कॉलोनियज इज मॉडर्निटी कि वो जगह थी कि जहां पे आज की डेट में डिस्कशन होता है कि वेल्थ पे टैक्स होना चाहिए। तो मुसलमानों के यहां पे वेल्थ पे टैक्स है। मुगल इंडिया में 24% पूरे ग्लोबल जीडीपी का पार्ट था और 12% सिर्फ बंगाल से आता था और इसकी टेक्सटाइल इंडस्ट्री से। और ये जो औकाफ की हड़पने की जो जो अफसोसनाक हिंदुस्तान में कहानी है इसकी जड़े 250 साल पुरानी यानी इकबाल की जो आरजुएं और तमन्नाएं थी वो जमूरी इस्लामी में मुतजस्सिम हुई है। [संगीत] ईरान यहां से बनता है जिसको हम कह सकते हैं अपनी ताबीरों में उम्मुल कुरा यानी सेंटर ऑफ द इस्लामिक बेदारी [संगीत] वर्ल्ड जो रियल लाइफ में जो आईआरए इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस का जो नेटवर्क है उसने एज अ रेजिस्टेंस फोर्स कैसे किया? हम उसको अभी फिक्र के पर्सपेक्टिव में नहीं देख रहे हैं। हम उसको अभी तसवुफ के पर्सेक्टिव में नहीं देख रहे हैं। कहां आपको यह मुल्क मिलेगा कि जो [संगीत] एटम बम बना सकता है सालों से और एटम बम रखने वाले चंद मुल्क मुसलसल धमकी कर रहे हैं कि हम आपको नाबूद कर देंगे। फिर भी वो मुल्क आके फैसला लेता है कि हम एटम बम नहीं बनाएंगे। के हर जंग में प्रोग्रेसिवली गज्जा ज्यादा मजबूत और ताकतवर होता हुआ हमको नजर आ रहा है। एज अ माइनॉरिटी हम फिक के साथ एंगेज कर रहे हैं और उसको ट्रेस कर रहे हैं प्रोफेटिक लाइफ में। तो इसका मतलब हमारे यहां पोटेंशियल है जो दूसरे ट्रेडिशंस की तरह के एक सिंगल पॉइंट ऑफ पॉलिटिकल थॉट नहीं। इस किताब का नाम है इसका तर्जुमा है कि इंडिया के इंडिपेंडेंस मूवमेंट में मुसलमानों का किरदार। क्या आप बता सकते हैं इसके राइटर कौन? इसके राइटर हैं सैयद अली खामिन। आज हमारे साथ हैं सैयद आकिफ ज़दी मुंबई में पले बढ़े और पिछले 20 साल से ईरान के शहर कुंभ में रह रहे हैं। कुमशिया इस्लाम की स्कॉलरशिप का सबसे बड़ा मरकज है। वही शहर जहां से इस्लामिक रेिवोल्यूशन की फिक्री बुनियाद तैयार हुई। वो हौजा इल्मिया में इस्लामी कानून की सबसे ऊंची पढ़ाई दरसे खारिज कर रहे हैं और खुद वहां फिक उसूल फिक और तारीख पढ़ाते भी हैं। पूरे हिंदुस्तान में मजालिस और लेक्चर्स के जरिए लोगों तक दीन की बात पहुंचाते हैं। एक [संगीत] हिंदुस्तानी मुसलमान जो उस दुनिया को अंदर से जानते हैं जिसके बारे में हम आज बात करने वाले हैं। आज की गुफ्तगू का मौजू है इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस यानी ईरान, हजबुल्ला, हमास, हुतीज [संगीत] और उनके साथी। 7 अक्टूबर के बाद से इस पूरे नेटवर्क के बारे [संगीत] में दुनिया भर में बहुत बातें हो रही हैं। लेकिन ज्यादातर बातें या तो वेस्टर्न मीडिया के नजरिए से हैं या सिर्फ जिओपॉलिटिक्स तक महदूद है। हम आज यह समझने की कोशिश करेंगे कि यह एक्सेस असल में है क्या? इसकी हिस्ट्री क्या है? इसकी आईडियोलॉजी क्या है? और एक हिंदुस्तानी मुसलमान के लिए इसे समझना क्यों जरूरी है? और एक जरूरी बात यह एक्सेस सिर्फ शिया मसला नहीं है। इसमें सुन्नी तहरीकें भी शामिल हैं। और इसके पीछे जो आइडियाज हैं वो पूरी उम्मत से बात करते हैं। इसीलिए आज की यह गुफ्तगू हर मुसलमान के लिए है। हाउस के पडकास्ट में आपका खैरमकदम है। मेरे साथ हैं सैयद आकिब ज़दी साहब। आकिब ज़दी साहब कुम ईरान में एक स्कॉलर हैं। रिलीजियस स्कॉलर भी हैं। लेकिन उसके अलावा एक एकेडमिक भी हैं। मेरी आपसे मुलाकात एक डेढ़ दो साल पहले यहां पर हुई। तो मुझे अंदाजा हुआ कि जो डेप्थ ऑफ फिलोसफी और जो डेप्थ ऑफ वर्ल्ड व्यू स्कॉलरशिप में है या ईरान के पर्सपेक्टिव से आज लोग जिसका जिक्र कर रहे हैं मुझे ये समझने को मिला और ये हम लोगों को एहसास हुआ कि अभी तक जो ज्यादातर बातें हो रही हैं स्पेशली वर्ल्ड स्टेज पे या ज्यादातर जो कन्वर्सेशंस हैं वो नेचर है प्योरली मटेरियल जिओपॉलिटिक्स के पर्सपेक्टिव से वो वर्ल्ड ऑर्डर ऑर्डर के पर्सपेक्टिव में यह तो डिस्कशन हो रहा है कि एक मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर आ रहा है। उसके अलग रूल्स होंगे। वो अलग तरीके से चीजों को डिफाइन कर रहा है। बट वो डेफिनेशंस क्या हैं? दुनिया को इस वक्त की जो मौजूदा नई फोर्सेस हैं वो किस तरह से देख रही हैं? क्या वो वर्ल्ड ऑर्डर जो अभी जिस जो जाने की कगार में है जिसने इनकलिटी को जिसने ऊंचनीच को जिसने ऑपरेशन को जिसने वायलेंस को जिसने ना सिर्फ जिसे कहते हैं कि इंस्टीट्यूशनलाइज करा बट नॉर्मलाइज किया। एक एक ग्रैंड स्केल में हमने गजा के कॉन्टेक्स्ट में देखा कि लाइव जेनोसाइड बोला गया उसको कि खुलेआम लोगों की नजरों के सामने जो चीजें छुप के होती थी जो चीजें मीडिया में नहीं आती थी उस तरह से बातें तो आती थी लेकिन क्योंकि विजुअल एविडेंस नहीं होता था तो लोग बिलीव बिलीवेबिलिटी का जो फैक्टर था वो लो था लेकिन जो हमने पिछले दो साल में जेनोसाइड देखा उससे यह भी साबित हुआ कि इवन दो अगर उसकी विजिबिलिटी हाई भी हो जाती है तो भी जिस तरह का इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म दुनिया में इस वक्त काबिज है उससे जो एक्सप्रेशन ऑफ रेजिस्टेंस या एक्स एक्सप्रेशन ऑफ काउंटर हैजिमनी वो कितना रिस्ट्रिक्टेड है उसकी वजह यूएन जिस तरह से स्ट्रक्चरर्ड है आईएमएफ जिस तरह से स्ट्रक्चरर्ड है वर्ल्ड बैंक जिस तरह से स्ट्रक्चरर्ड है नेटो जिस तरह से स्ट्रक्चरर्ड है वर्ल्ड इकॉनमीस जिस तरह से टाइड अप है और उसमें जो सेंशंस के रिजीम है स्पेशली उन इकॉनमीज़ पे और उन नेशंस पे जो इस वेस्टर्न हैजमोनिक वर्ल्ड ऑर्डर को या तो चैलेंज कर रही है या फिर उनकी हेजमिनी को नेगेट करने की बात करती है। तो यह हमें पिछले दो साल में यह वाज़ हुआ कि इवन व्हेन अ वर्ल्ड ऑर्डर इज कोलैप्सिंग और चेंजिंग जो उसके फाइनल मोमेंट्स होते हैं वो बहुत ज्यादा अग्रेसिव होते हैं। क्योंकि आप जब ताकत में होते हैं, जब आपके हाथ में स्टेबिलिटी होती है और आपके हाथ में कंट्रोल होता है तो आपको अपनी माइंड को वायलेंस के थ्रू बिल्कुल विजिबलाइज करने की जरूरत नहीं होती। आप उसको नैरेटिव के थ्रू करते हैं। आप उसको कंट्रोल ऑफ वर्ल्ड व्यू के थ्रू करते हैं। लेकिन जब आपके हाथ से ताकत इतनी जा रही होती है कि आपके पास कोई और तरह का यू नो अल्टरनेटिव नहीं बचता है। जब इस इस तरह जिस तरह यूएस और इजराइल ऑपरेट कर रहा है कि वेनेजुएला के सिंग प्रेसिडेंट को उठा लेना। ईरान के ग्रैंड सुप्रीम लीडर जो एक रिलीजियस अथॉरिटी भी है। नॉट जस्ट फॉर द पीपल इन ईरान बट शियाज़ अक्रॉस द वर्ल्ड। उनका खुलेआम अससिनेशन हो जाना। यह वो चीजें हैं जो हम तारीख में 100 200 300 साल पहले सुनते हैं और उस पर हम बोलते हैं कि दुनिया किस तरह से रिशेप हुई। इन पर्टिकुलर इवेंट्स की वजह से किस तरह जो ऑर्डर था उस वक्त चीजों का वो कैसे चेंज होता है। तो मुझे लगता है कि मुझे क्या ज्यादातर लोग इसको बोल रहे हैं कि हम उस मोमेंट में हैं और उस मोमेंट में मटेरियल रिऑर्डरिंग के बिय्ड आज की डेट में मेटाफिजिकल रिऑर्डरिंग जिसमें गुड और बैड सही और गलत और इंस्टीटशंस किस तरह से फ्रेम होने की जरूरत है। किस तरह से आपको वेल्थ जनरेशन हो सकती है। किस तरह का बैंकिंग का निजाम होना चाहिए। किस तरह के रिलेशंस होने चाहिए डिफरेंट कम्युनिटीज में। इन सब चीजों पे उतनी खुल के बात नहीं हो रही। अभी भी बात यह हो रही है कि एक पर्टिकुलर अंडरस्टैंडिंग है वेस्ट की ह्यूमन राइट्स को लेके। उस पर्सपेक्टिव से हम फिर से इवैल्यूएट कर रहे हैं वेस्ट को। तो जो एडवर्ड सईद ने ओरिएंटलिज्म बोला था कि अभी भी हम उन्हीं के पर्सपेक्टिव से उन्हीं के फेलियर को इवैलुएट करने की कोशिश कर रहे हैं। तो आकिफ भाई आपसे जो गुफ्तगू हुई और जो बहुत दिनों से हम लोगों की कोशिश हो रही थी कि हम ये पडकास्ट कर पाए लेकिन नेटवर्क इशू की वजह से हम नहीं कर पा रहे थे और उसका मकसद यही था कि हम ये समझने की कोशिश करें हैं कि जो ईरान इम इतना ज्यादा इस वक्त वर्ल्ड की स्टेज पे हालांकि वो एक जमाने से एज रेजिस्टेंस फोर्स सामने है। स्पेशली गजा के पर्सेक्टिव से तो बहुत वाज़ हुआ ये जो पूरा रेजिस्टेंस का जो नेटवर्क डेवलप हुआ और उसका उसकी वजह से मिडिल ईस्ट या वेस्ट एशिया या सेंट्रल एशिया अलग-अलग पर्सपेक्टिव से उसे बहुत कुछ कहा जा सकता है उस रीजन को वो कैसे रीस्ट्रक्चर और रीशेप हो रहा है और वहां पे किन-किन लोगों की इंटरेस्ट्स हैं वो या तो सर्व हो रहे हैं या वायलेट हो रहे हैं। इस तरह की डिस्कशन को मेरे लिए हमेशा 7 अक्टूबर सामने आता है और हमास का वह इंसिडेंट सामने आता है जिसको मीडिया के सामने रखा गया कि 40 चिल्ड्रन वर बीहेडेड एंड दैट यू नो मीडिया में एक ग्रूसम इमेज उसकी क्रिएट की गई और उससे जस्टिफिकेशन क्रिएट किया गया कि व्हाई द वर्ल्ड शुड बी मोबिलाइज्ड एंड व्हाई इट्स मशीनरी शुड बी मोबिलाइज्ड अगेंस्ट द गज़ा स्ट्रिप। और उसी के बनिस्बत हमें कुछ जमाने में पता लगता है कुछ वक्त में फ्यू वीक्स में ही कि वो किस तरह से फेक न्यूज़ थी। लेकिन उससे एक पूरी ग्लोबल मशीनरी ऑपरेट हो जाती है। उसी को अगर हम सामने रखते हैं और ईरान का केस लेते हैं और वहां पे जो 160 बच्चियों का ड्रोन स्ट्राइक में शहादत होती है। उनका कत्ल होता है। उनका एक तरीके से नरसंहार होता है। उसको वही वेस्टर्न मीडिया एक बिल्कुल डिफरेंट पर्सपेक्टिव से एंगेज करती है। तो यहां पर जब हम वेस्ट के रूल्स बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर जो क्लेम करता है हाई मोरालिटी, इंडिविजुअल फ्रीडम, इक्वलिटी, इक्वलिटी ऑफ़ अपोरर्चुनिटी ये सारी चीजें वो जो एक वोकैबलरी क्रिएट की गई उस वोकैबलरी को वेपनाइज किया जाता है ईरान और दूसरी जगहों पे रिजीम चेंज के नाम पे। क्योंकि वहां पे ये कहा जाता है कि ह्यूमन राइट्स वायलेशन होता है। इस पूरे वर्ल्ड दुनिया के सामने यह जो पूरी अनमास्किंग हुई है एक मोरल फोर्स की आई एम नॉट टॉकिंग अबाउट अभी कि जो उसका मिलिट्री आस्पेक्ट है जो उसका इकोनमिक आस्पेक्ट है। यह जो मोरल आस्पेक्ट है मैं इस पर आपसे समझना चाहूंगा कि वो क्या था कि जो लोगों को अट्रैक्ट करता था वेस्ट के बारे में वो क्या था जो वो कभी ना कर पाए ना उनके इंटेंशन में था और वो जो था भी उसमें भी कितने लूप होल्स थे अगर आप उससे हम अगर इस डिस्कशन को शुरू करें तो फिर हम आगे फिर और चीजों पर भी बात करेंगे जो पूरा रेजिस्टेंस का एक्सिस है उसकी जीनोलॉजी उसकी आईडियोलॉजी और वो कैसे वजूद में आता है और मुस्लिम वर्ल्ड और लार्जर वर्ल्ड से उसका क्या इंटरेक्शन है? मैं आपकी खिदमत में और तमाम नाजरीन की खिदमत में सलाम अर्ज करता हूं और जो अभी ईद उलफित के ये मुबारक अयाम गुजरे हैं उसकी मुनासबत से मुबारकबाद भी पेश करता हूं। यहां पर भी जहां मैं हूं कुम में ईरान में यहां पर भी ईद मनाई गई और क्योंकि आपने अपने इंट्रोडक्शन में जो बहुत दिलचस्प था मैं बहुत गौर से सुन रहा था उसको उसमें आपने मोरल फोर्स और मोरालिटी की बात की तो मैं यहां पर ये अर्ज कर दूं काफी दिलचस्प होगा शायद आपके नाजरीन के लिए कि यहां पर इस साल ईद दूसरे पहले सालों से कहीं ज्यादा जज्बे के साथ मनाई गई। शायद लोगों को तसवुर हो कि जंगी हालात में लोगों की ईद का मजा किरकिरा हो गया होगा। लेकिन नहीं बरखिलाफ इसके यहां ईद में और ज्यादा मिठास थी दूसरे सालों के मुकाबले में। क्यों? क्योंकि ईद आप जानते हैं कि हम लोग बुनियादी तौर पर मुसलमान ईद इसलिए मनाते हैं क्योंकि हम शुक्र अदा करना चाहते हैं कि एक महीने हम खुदा के मेहमान रहे और हमें वो इबादतें करने का मौका मिला कि जो साल के दूसरे 11 महीनों में नहीं मिलता है जो माहे मुबारक रमजान में मिलता है। वो सब इबादतें तो इस साल हर साल मिलती है। लेकिन इस साल ईरान और ईरान के साथियों को एक मौका मिला जो दूसरे सालों में माहे रमजान में नहीं मिलता है। और वो है के इंसानियत के सबसे बुरे और सबसे दरिंदे जो दुश्मन है उनके साथ बराहेरा जंग करने का मौका मिला और उन्हें खदेड़ने का पीछे ढकेलने का मौका मिला है और ये सिलसिला ईद के बाद भी अलबत्ता जारी है अभी भी तो उसकी वजह से जो रूहानियत की कैफियत थी जो इत्मीनान की कैफियत थी इस बार ईद में गरचे ईद काले कपड़े पहन कर मनाई गई लेकिन जो स्पिरिचुअलिटी और रूहानियत इस बार की ईद में थी वो एक मुख्तलिफ चीज थी और मुझे लग रहा है कि हम लोग ऐसे मौकों पर जहां जहांहां पर उम्मत के किसी गोशे में ऐसा मौका होता है ऐसे हालात पैदा होते हैं तो हम लोग वो हुजूर के जमाने में जो जिस इखलास और खुलूस और सादगी के साथ इस्लाम पर अमल किया जाता था उसकी हम झलक कहीं ना कहीं हम ऐसे मौकों पर उम्मत के उन हिस्सों में और गोशों में देखते हैं जैसे कि ईरान में भी हुआ जैसे गज्जा में चल रहा है। जैसे लुबनान में चल रहा है। जहांजहां पर हम देखते हैं कि इस्लाम वो किताबों से निकल कर और वाज़ और नसीहत और खुदबों से निकल कर लोगों की जिंदगी में अमली तौर पर पूरी तरह से जलवागर हो रहा है। तो हम ये देख रहे हैं इस वक्त उम्मत के मुख्तलिफ हिस्सों में अब हम ये देख रहे हैं। पहले महदूद था चंद हिस्सों में लेकिन 7 अक्टूबर के बाद से यह कैफियत बढ़ रही है और ईरान उसकी अब लेटेस्ट एग्जांपल है कि यहां पर एक तरह से एक माना में अपने एक नए किस्म के पीक और औज पर ये होती नजर आ रही है अलबत्ता गम भी है गम है सोग है शहादतें हो रही है नुकसान हो रहा है खासतौर पर वो अजीम कुर्बानी जो रहबर शहीद ने दी उसका गम सबके दिल में है लेकिन वो गम वो गम है जो कर्बला का गम है। आपके नाजरीन अच्छी तरह जानते हैं कि कर्बला का गम एक खास किस्म का गम होता है। आम तौर पर जब हमारे घर वाला भी कोई मर जाता है, इस दुनिया से चला जाता है, हम गमगीन होते हैं। लेकिन उस गम के साथ आमतौर पर सुस्ती, डिप्रेशन आता है। कुछ करने को दिल नहीं चाहता, खाना खाने को दिल नहीं चाहता, किसी से मिलने को दिल नहीं चाहता। लेकिन ये जो मुकद्दस किस्म के गम होते हैं जो शहादत से कनेक्टेड है खासतौर पर कर्बला की शहादतों से और भी दूसरी जो शहादतों से ये जो गम होते हैं ये एनर्जी लाते हैं। ये ये डायरेक्शन लाते हैं। ये पपस लाते हैं। ये जज्बा लाते हैं और इरादों को मजबूत करते हैं। तो एक तो ये बात है कि 1923 में या 1920 में और उससे पहले क्योंकि 1800 लेट 1800 में जो मुस्लिम वर्ल्ड का एक ऑर्डर था वो जब कोलैप्स हो रहा था तो इसी तरह के सवालात लोगों के सामने आए जिसको हम बाद में ट्रेस करेंगे अपनी डिस्कशन में के जो इस्लामिक वे ऑफ लाइफ है या जो दीन का तसवुर है वो होलिस्टिक है उसमें इकोनॉमिक्स यानी मशत या फिर सियासत या फिर स्पिरिचुअलिटी या फिर इवन घर सोशल वर्क फैमिली ये सारी चीजें एक इंटीग्रेटेड अंडरस्टैंडिंग है और दूसरे स्पिरिचुअल ट्रेडिशंस में भी यह पाया जाता है। हालांकि डिफरेंस हो जाता है कि आप जो सोशियोलॉजी है या जो डिनिटी है उसको इंटरप्रेट कैसे करते हैं कि कहीं पे आपकी ऊंचनीच उसके हिस्सा है कहीं पे नहीं है। लेकिन मटेरियलिज्म के बनिस्बत के जहां पे आप जो खुदा का वजूद है उसको कंप्लीटली इंकार कर देने से एक रिडक्शन ऑफ वर्ल्ड व्यू होता है पॉसिबल कि आप दुनिया में एक कई हजार साल की रिटन जो हिस्ट्री है उसमें द आईडिया ऑफ गॉड द आईडिया ऑफ अ रियलिटी बिय्ड मटेरियल रियलिटी कि आपकी इकोनमी से आपकी कि दूसरी जो मटेरियल जरूरत है उससे आगे की भी आपकी स्पिरिचुअल नीड्स हैं। वह कहीं ना कहीं आपके नॉलेज पैराडाइम का एक हिस्सा था। वेस्ट में यह जो सोवनिटी गॉड की आईडिया या गॉड का तसवुर अल्लाह का भगवान का व्हाटएवर यू नो ऑन ए ट्रांसेंडेंटल लेवल अगर हम शुरू करें इस बात को वो तसवुर बहुत इरादतन और बहुत मैकेनिज्म और मेथड के थ्रू उसको हटाया गया और उसके सामने एक तरह की मोरालिटी को सामने रखा गया जो कंप्लीटली इंडिविजुअलिस्टिक थी। हालांकि इकबाल ने जब इसको देखा और हम उसको डिस्कस करेंगे खुद ही को इंडिविजुअल को भी उन्होंने होलिस्टिक के पर्सेक्टिव से डिफाइन कर दिया तो वो जो ए्जायटी वेस्ट ने अपनी मटेरियलिटी में फेस करी कि एज एन इंडिविजुअल मैं कौन हूं और उसके बावजूद एक कलेक्टिव का तसवुर दिया इंडिविजुअलिटी के नाम पे व्हिच बिकम मोर अप्रेसिव आपके हिसाब से ये जो पिछले 150 200 साल का एट लीस्ट इन द फॉर्म ऑफ अमेरिकन हेजमनी क्योंकि के उस जमाने में यूरोपियन रेजिमनी फॉल हो रही थी। हालांकि यूरोप का एक्सटेंशन है अमेरिका और अमेरिका की कम से कम 600 साल का जेनोसाइड का हिस्ट्री जो जिस तरह से उन्होंने अमेरिका को खुद बनाया वहां की लोकल अबजन पॉपुलेशन को बिल्कुल इरेज करके और उसके बाद यह वही पॉपुलेशन है जिसने जूस को यहूदियों को अपने इलाकों में जेनोसाइड किया मारा एथेनिक क्लज़िंग करी और उनको एज अ फ्रंटियर स्टेट उनके एक लॉबी से अलाइन करके इस्टैब्लिश भी किया। तो ये किस तरह की मोरल वर्ल्ड ऑर्डर है जिसको वेस्टर्न वर्ल्ड ऑर्डर ने दुनिया के सामने रखा। आपके हिसाब से वो क्या चीजें हैं कि जिसने दुनिया में इतनी तबाही ना सिर्फ आज। पिछले कई 100 साल से कोई दुनिया में स्टेबिलिटी नहीं रही। सिवाय उनके अपने स्टेट्स के विदिन एनफोर्स्ड जिसे कहते हैं मटेरियल स्टेबिलिटी। लेकिन सारी दुनिया में तबाही उसको आप किस तरह देखते हैं? ये कौन सा ऑर्डर था जो इनके लिए खतरे में है और उससे दुनिया ने क्या खोया और अब ओपोरर्चुनिटी क्या है? फिर हम उस पे बढ़ेंगे। जी हां मैं आपके सवाल के जाहिर सी बात है कई पहलू हैं उसके। मैं शुरू में यह जो मुकाबला है दो नजरिए का मोरल नजरिए का आप कहे या हत्ता वजूद शनासी या ऑनटोलॉजिकल नजरिए जो है उसको लेकर जो दो मुकाबला है मैं उस पर थोड़ा सा कुछ अर्ज करता हूं। फिर हम लोग गुफ्तगू का अभी मौजूदा हालात जो 7 अक्टूबर के बाद है उस पर मैं थोड़ी सी गुफ्तगू करना चाहूंगा। फिर देन लेट्स गो इनू एक हिस्टोरिकल एक पूरा एक रिव्यू हम करने की कोशिश करते हैं तकरीबन दो 200 250 साल की हिस्ट्री का। तो सबसे पहले जो आपने इशारा किया कि इस वक्त जो चीज हमारे लिए और भी पहले से ज्यादा आया और वाज़ होती जा रही है कि ये जो टक्कर चल रही है ये ईरान की और अमेरिका की नजर आती है। ये ये सब डिस्क्रिप्शन इस मुकाबले के जो 7 अक्टूबर के बाद से अपने शबाब पर पहुंच रहा है ये मुकाबला यह सही है डिस्क्रिप्शन लेकिन इनके पीछे जो नजरियाती जो मुकाबला है उस पर पर्दा पड़ जाता है। लगता है कि जैसे दो मुालिक के बीच की ये जंग है। लगता है जैसे दो नेटवर्क के बीच की जंग है जो कि है लेकिन उससे कहीं ज्यादा है। ये दर हकीकत दो नजरिए के बीच का मुकाबला है। एक नजरिया वही है जिसका आपने जिक्र किया। वह नजरिया है जिसकी मगरब का नजरिया वेस्ट का नजरिया जिस पर वेस्टर्न सिविलाइजेशन टिका हुआ है और ये भी दिलचस्प बात है कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन के अंदर के जो मुख्तलिफ जो नेहले हैं जो अलग-अलग ब्रांचेस है आईडियोलॉजिकल वो इतने भी डिफरेंट नहीं है क्योंकि कहीं ना कहीं जाके हत्ता कम्युनिज्म और कैपिटलिज्म भी कहीं ना कहीं जाके मिल जाते हैं। सबको एक साथ लेकर जी हां बिल्कुल हम उसको अगर सब लेकर चल तो हम ये कह सकते हैं कि वेस्ट में मुख्तलिफ वजूहात के बिना पर पिछले चंद सदियों में इंसान मेहवरी का तसवुर गालिब होने लगा। यानी एंथ्रोपो सेंट्रिज्म का नजरिया गालिब होने लगा कि जिसके अंदर इंसान को पूरे कायनात का पूरे आलम वजूद का मरकज समझा गया और खुदा का या तो इंकार हुआ या इंकार नहीं भी हुआ तो खुदा की मरकजियत का इंकार हुआ। खुदा के वजूद का अगर नहीं भी इंकार हुआ तो खुदा के मरकजियत का इंकार हुआ। एंथ्रोपोसेंट्रिज्म यानी इंसान मेहवरी जिसको हम कह सकते हैं उसके तहत इंसान मेहयार बन जाता है सही और गलत हक और बाततिल का इंसान जो सोचे वो सही है ना ये कि कोई ऑब्जेक्टिव रियलिटी है। इंसान जो मयार तय करे अच्छे और बुरे का अगर इंसान अगर जोरदार इंसान तय करवा जाए या एक ये भी कहा जाए कि अक्सर इंसान मिलकर किसी चीज को तय कर ले अलग-अलग इस पे नजरिए कुछ इस पे जो है वो एक टाइप का डेमोक्रेसी टाइप का नजरिया रखते हैं। कुछ कहते हैं नहीं जोर जबरदस्ती के बेस पर एक इंसान भी अगर मनवा ले जाए तो काफी है। लेकिन इंसान जो है वो हक और बाततिल के मेरारात को सही और गलत के मेरारात को तय करेगा। यह प्रोसीजर शुरू होता है। यह चंद सदियों में रेनसांस के बाद से आहिस्तेआहिस्ते बढ़ता है। यूरोपियन [गला साफ़ करने की आवाज़] एनलाइटनमेंट में यह वाकन जाके ये अपने एक तरह से शबाब पर पहुंचता है। और इसीलिए हम देखते हैं यूरोपियन एनलाइटनमेंट के बाद यानी 18वीं सदी के आखिर से जब 19वीं सदी में हम दाखिल होते हैं तो इसके भी मुख्तल शाखे पैदा होना शुरू होती है। लेफ्ट की तरफ अलग, राइट की तरफ अलग। लेकिन सबका मेवर यह है कि इंसान जो है वह तय करेगा कि क्या सही है क्या गलत है और उसके नताज हमारे सामने यहां आ रहे क्योंकि जब इंसान ये तय करेगा कि क्या सही है क्या गलत है तो वो ये भी तय करता है कि कौन सा इंसान सुपीरियर है कौन सा इंसान इनफीरियर है वो ये भी तय करता है कि किस इंसान को हुकूमत करने का हक है किसी किसको महकूम बनना पड़ेगा किन कौमों को किन नस्लों को हमेशा गुलामी में रहना पड़ेगा किनको नहीं रहना पड़ेगा भाई यही जो लिबरल मैं बस एक मिसाल दे दूं। लिबरलिज्म की जो बड़ी-बड़ी शख्सियात रही है 18वीं और 19वीं सदी में वेस्टर्न लिबरलिज्म के जो बड़े-बड़े फिगर्स है बेंथम है मिल है वगैरह बहुत सारे उनके फलासफा जाकर आप उनकी राइटिंग्स में देखें। उनकी जाती जिंदगी में देखें। खुद वो किस कितनी बड़ी गुलामों की तजारत करते थे। स्लेव ट्रेड के फेवर में वो लिखते थे। कॉलोनियलिज्म के फेवर में वो रहते थे। क्यों? क्योंकि मेरार जब बन गया इंसानियत तो आप जब लिबरल भी है तो आपके लिए आपके हाथ में है सब कुछ आप कर सकते हैं और ये करते करते दुनिया को उन्हीं ने इस मंजिल पर पहुंचा दिया कि जो आज हम देख रहे हैं उसके मुकाबले में दूसरा नजरिया दूसरा नजरिया खुदा मेहरी का नजरिया कि जिसके अंदर वजूद का मरकज खुदा है मेरार मोरालिटी का सही और गलत का हक और बाततिल का वो खुदा है इंसान की मेवरियत और मरकजियत मरकज़ वजूद के होने की हैसियत से नहीं है बल्कि खिलकत के मरकजियत वो इंसान के पास है अशरफुल मखलूकात है ना अशरफुल मौजूदात है ये बहुत जमीन आसमान का फर्क पड़ जाता है इससे इंसान का तमाम शरफ इसमें पाया जाता है कि वो खुदा का बंदा है उस तरह से बंदा है कि और कोई मखलूक और और कोई भी मौजूद उस तरह से बंदगी नहीं कर सकती और यहां यहां से फिर सारी कोशिश ये हो जाती है कि खुदा को समझा जाए। खुदा से राबता बरकरार किया जाए। खुदा से हिदायत हासिल की जाए कि क्या सही है, क्या गलत है। खुदा की खुशनूदी को हासिल किया जाए। और यह होते आज ये हमारे सामने आज की उम्मत है और खास तौर पर जो आज की उम्मत का जो वैन गार्ड है ये कम्युनिज्म के टर्मिनोलॉजीस में से एक मैं यहां पर बोरो कर रहा हूं कि आज की उम्मत का जो वैनगार्ड है इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस वो कम से कम मौजूदा दौर में इस नजरिए को उम्मत के दूसरे हिस्सों से बेहतर अमली जामा पहना पा रहा है। तो दो नजरियात का ये तकाबुल है। यह दो नजरियात फिर हर चीज में हर चीज में जारी और सारी है। इकोनॉमिक्स में इकोनॉमिक सिस्टम्स अलग-अलग दोनों के बनेंगे। एक जो इंसान महवर है वह अपने इकोनॉमिक सिस्टम्स बनाएगा जो कि उसने बनाए हैं और आज भी दुनिया उनकी उनहीं इकोनमिक सिस्टम्स की गिरफ्त में हत्ता फाइनशियल सिस्टम्स इसी एतबार से पॉलिटिकल सिस्टम्स इसी एतबार से है जब पिटिकल लेजिटसी मिसाल के तौर पर सोडली इस पर हो जाती है यानी जो बेहतरीन नजरिया है इंसान मेवरी में वो है सोशल कॉन्ट्रैक्ट का वो है डेमोक्रेसी का मेजॉरिटी ओपिनियन का जब पॉलिटिकल लेजिटसी वो इसी बुनियाद पर हो जाती तो अगर आप मेजोरिटी के बिना पर आप कोई फास्टिस्ट निजाम बनाना चाहे जैसे के पूरे पब्लिक सपोर्ट के साथ ना जर्मनी रह चुका है। पब्लिक सपोर्ट के साथ इम्पीरियल जापान रह चुका है। पब्लिक सपोर्ट के साथ और भी बहुत सारे जालिमाना निजाम हो जाते हैं। उसका मुकाबला फिर उसको रोकना उसका मुकाबला करना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन दूसरी तरफ पॉलिटिक्स में जब खुदा मेहबरी का निजाम आता है तो फिर आपके सामने दूसरे निजामात आते हैं। इसका एक्सप्रेशन आजकल ईरान में विलायत फकी का मॉडल है कि अगर वक्त हुआ तो कभी हम ईरान के कॉन्स्टिट्यूशन उसके पिटिकल स्ट्रक्चर पर भी बात कर सकते हैं। ये वो एक्सटेंशन है वो तौहीदी खुदा महबरी नजर का नजरिए का जो वेस्ट के सामने करार पाता है। तो मेरे ख्याल में फिलहाल मैं यहीं पर इस बात को रोक देता हूं कि बुनियादी तौर पर दो कामिलन मुतजाद 180 दर्जा मुखालिफ नजरिए हैं। एक जो आज अपने शबाब और उरूज पर पहुंचा है वेस्टर्न सिविलाइजेशन की शक्ल में और वह भी मैं कह दूं वेस्टर्न सिविलाइजेशन का जो एस्टीन गैंग वाला हिस्सा है वो शायद इसकी इस वक्त बेहतरीन और सबसे एडवांस्ड उसका फॉर्म और यहां पर जो तौहीदी नजरिया है जो खुदा मेहरी का नजरिया है उसका वैनगार्ड और सबसे एडवांस्ड फॉर्म [गला साफ़ करने की आवाज़] इस वक्त है इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस ये दोनों के अगर आपको दोनों के जो एपिटमीस अगर भी देखना है तो वो भी आप इन दो की शक्ल में इस वक्त देख सकते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं आपकी बात को अगर हल्का सा अपनी अंडरस्टैंडिंग में जो आपने बोला उसको समराइज करने की कोशिश करूं तो क्योंकि इंडिविजुअलिटी जो है वो वो पर्सपेक्टिव और सब्जेक्टिविटी को इंस्टीट्यूशनलाइज कर देती है। तो वहां पे हो सकता है कि एज एन इंडिविजुअल बहुत सारे लोग अच्छे होंगे। लेकिन पावर और इकोनमी और स्ट्रक्चर और यू नो हेजिमनी वो जिस तरह से अलाइन करती है जो ईवल टेंडेंसीज हैं जब भी हमेशा से जिसको आपने एस्टाइन एस्टीन गैंग बोला कि जहां पे सेक्स ट्रैफिकिंग है जहां पे चाइल्ड अब्यूज है जहां चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज है जहां पे लोगों को मरवाया जाता है जहां पे लोगों को यू नो दुनिया भर की जो गंदी बदतरीन चीजें हैं जिसको बोला जा सकता है वो एक तरीके का मॉडल इमर्ज होकर आता है कि जहां पे मुतहिद होने के लिए मल्टीपल इवल एक्टर्स को एक दूसरे की कमजोरियां उनका यू नो कॉन्ट्रैक्ट बनती है कि भ मैं ट्रंप के बारे में ये जानता हूं उन्होंने ये किया है तो इसलिए ट्रंप मेरे खिलाफ नहीं जा सकते। ड्रम मेरे में बारे में ये जानते हैं। तो वो जो यूनिफाइंग फैक्टर है वो अल्टीमेटली जो ह्यूमन नेचर का जो वर्स्ट पोटेंशियल है वो पावर को ऑक्यूुपाई करता है और वो सिस्टम को रन करता है क्योंकि देयर इज नो बाउंड्रीज उसके बनिस्बत के अगर यू नो गॉड बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर होता है। उसमें भी फिर मुख्तलिफ यू नो इंटरप्रिटेशंस हैं। हिंदूइज़्म अलग तरीके से देखता है। इस्लाम अलग तरीके से देखता है। क्रिश्चियनिटी अलग तरीके से देखती है। जुडिज़्म अब अपने आप में अलग तरीके से देखता है क्योंकि यह डिबेट जो लिबरल्स ने करी, उन्होंने इनको क्रिटिक करते हुए किया कि जो हमारे यहां पर अह गॉड बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर में जो करप्शन आ गया से फॉर एग्जांपल उसको मरकज बनाते हुए छोटे लेवल पे उससे उन्होंने एब्स्ट्रैक्ट आउट किया कि हमें ये क्यों नहीं चाहिए। लेकिन उसके बावजूद जो लिमिट्स हैं कि फॉर एग्जांपल आप शराब आपके ऊपर आप नहीं पी सकते। आप इंटरेस्ट सूद नहीं ले सकते। आप डे बेस्ड इकॉनमी को यह सारे वो चीजें हैं दुनिया की जो दुनिया को डिस्टेबलाइज अनकल और ऑप्रेसिव बनाती हैं। यह गॉड बेस्ड ऑर्डर में जब आपकी हुदूद बन जाए तो आप करप्ट होने के बावजूद भी आपकी लिमिटेशन मतलब इंसानी जो आपका नेचर है अगर वो आपको गलत की तरफ लेकर भी जा रहा है क्योंकि ये हुदूद तय है। क्योंकि यह आपकी बाउंड्रीज फिक्स्ड हैं और ऑफ कोर्स उन बाउंड्रीज को इवैलुएट करना चाहिए। उन बाउंड्रीज के ऊपर डिस्कशंस होना चाहिए क्योंकि अल्टीमेटली एक्सप्रेशनंस ऑफ गॉड हुड भी मल्टीपल हैं और उसमें भी आइडिया ऑफ गुड एंड बैड डिफरेंटली यू नो पोट्रे होता है। इसको हम ये नहीं बोल रहे हैं कि आप कंप्लीटली इसको यू नो विदाउट एंगेज करें। तो यहां तक अगर देखा जाए तो वहां पे लिमिट्स का कोई कांसेप्ट नहीं रहता। ऑलदो आपका जो अजमशन है जो आप इसको मार्केट कर रहे हैं वो आप इक्वलिटी का कर रहे हैं। लेकिन जो आप मैनिफेस्ट कर रहे हैं वो उसका कंप्लीट डिफरेंट प्रोडक्ट है। जी मैं मैं आपकी बात से पूरी तरह मैं मुत्तफिक हूं। लेकिन मैं कहना चाह रहा हूं कि इससे भी बढ़कर बात है और आपका आप आपके नाजरीन आगाह हैं। बात इससे बढ़कर है। सिर्फ लिमिट्स का होना ना होना नहीं। दैट इज वेरीेंट एस वेल। जब तौहीदी वर्ल्ड व्यू में इंसान बन जाता है खलीफतुल्लाह। इंसान बन जाता है खुदा का खलीफा और नुमाइंदा। यानी जो इलाही कमालात और सिफात है उसका आईना बन जाता है। तो इंसानी कमालात को इस फ्रेमवर्क में देखा जाता है कि किस हद तक वो खुदा के कमालात की अकासी कर पा रहा है। इंडिविजुअल लेवल पर भी और सोसाइटल ले सोसाइटी लेवल पर भी। यानी वो ओरिएंटेशन वो ऊपर की जानिब हो जाता है। ट्रांसेंडेंटल ओरिएंटेशन हो जाता है। हत्ता पॉलिटिक्स में, इकोनॉमिक्स में, लॉ में, कल्चर में, हर चीज में ओरिएंटेशन ट्रांसेंडेंटल हो जाता है। लेकिन उस वर्ल्ड व्यू में जो इंसान मेहरी का वर्ल्ड व्यू है जिसके अंदर खुदा की मरकजियत नहीं है। हो सकता है कि उसमें खुदा हर उसमें हर हर कोई एथियस्ट ना हो। अगर एथिस्ट भी है, नॉन एथिस्ट भी है। लेकिन जो बिलीवर्स भी है वो अपनी पर्सनल लाइफ में बिलीवर्स हैं। वो पूरे दुनिया के ओरिएंटेशन को ट्रांसेंडेंटल करने के लिए सुबह से रात तक मेहनत नहीं कर रहे। तो नतीजे में बेहतरीन चीज जो उनके पास ऑफर होती है वो कहते हैं कि इंसान मतलब जो वहां पर डोमिनेंट जो हॉब्स वगैरह के नजरिए नीचे वगैरह के नजरिए जो फिर गालिब हुए चाहे वेदर दे एडमिटेड और नॉट फ्रॉइड की शक्ल में मुख्तलिफ शक्लों में कि अल्टीमेटली जो है वो इंसान जो एक हैवान है हम लोग सोशल कॉन्ट्रैक्ट के जरिए इंटेलेक्चुअलिज्म के जरिए उसको मैनेज कर पाते हैं और उसको कंट्रोल में कर पाते हैं। इन द बेस्ट सिचुएशन मैन इज अ सोशल एनिमल बट एट द एंड ऑफ़ द डे स्टिल एन एनिमल। तो वो जो पूरा जो वो आपने आउटलुक ही आपने विजन ही सेट कर दिया उस तरह से कि वो एनिमल को मैनेज करना है। एनिमल के सक्सेसेस है। एनिमल के जो है लज्जत और प्लेजर्स है। एनिमल के पनिशमेंट्स हैं। लेकिन यहां पर आपने इंसान का जो जो रूहानी पहलू है जो कि बुनियादी तौर पर जो है खुदा के उन कमालात की अकासी है नफी रूही वो जो तसवुर है उसको आपने मेवर बनाया और आपने सारे लॉस सिस्टम्स कल्चर सब कुछ को अब आप इसमें लगे हुए हैं कि इस ट्रांसेंडेंटल बीइंग जो खुदा के कमालात का यही आईना है इसके लिए क्या लॉ होना चाहिए? इसके लिए क्या सिलेबस होना चाहिए? इसके लिए क्या पॉलिटिकल स्ट्रक्चर होना चाहिए? आपका ओरिएंटेशन ही पूरी तरह बदल जाता है। और जाहिर सी बात है कि रिजल्ट्स भी उसी एतबार से मुख्तलिफ होंगे। एंड अभी जो रिजल्ट्स आना शुरू हो रहे हैं एक 200 300 साल के डिक्लाइन के बाद मुस्लिम वर्ल्ड में ये जो रिवाइवल अभी रिसेंटली शुरू हुआ है। आई थिंक दिस इस ओनली द स्टार्ट। अभी आगे दुनिया देखेगी और हम लोग भी इंशा्लाह देखेंगे अगर जिंदगी मिली कि क्या क्या इससे हो सकता है। तो एनीवे इस पार्ट से हम आए थोड़ा सा अभी मौजूदा सुरते हाल पर एक नजर डालते हुए हिस्ट्री की तरफ जरा थोड़ा डिटेल में जाएंगे इंशा्लाह इफ यू अग्री नहीं मैं यही चाह रहा हूं मैं मैं चाह रहा हूं कि ये जो दो वर्ल्ड व्यूज है अब इनको हम अगर कॉन्टेक्स्चुअलाइज कर सकें कि किस तरह से एक पपुलेशन को या यू नो डिफरेंट रीजंस को ये जो वेस्टर्न वर्ल्ड व्यू है वो किस तरह से इंपीरियल फोर्स की तरह टेक ओवर करता है और वो ये जो एक 100 साल का एटलीस्ट जो वििबल सिलसिला है और 150 साल का जो उससे बाहर निकलने की जो कोशिशें रही और उसमें जो ईरानियन रेवोल्यूशन का रूल है अगर हम उसको [गला साफ़ करने की आवाज़] थोड़ा सा विजिट कर पाए तो ये जो लार्जर कंसेप्चुअल कैटेगरीज हैं उसको हम मैनिफेस्ट वे में इंपीरियल मैनेजमेंट में वर्ल्ड ऑर्डर में पेट्रो डॉलर सिस्टम में ये सारी चीजें जो उसको मटेरियल में मैनिफेस्ट होता हुआ दिखता है जिसका और उसका रेजिस्टेंस कब कहां कैसे क्यों हुआ उसकी अभी भी आइडियोलॉजिकल जीनियोलॉजी पे नहीं जाएंगे। उसकी जिसे कहते हैं ऑपरेशनलाइजेशन पे थोड़ा सा देखें और ईरानियन रेवोल्यूशन को उसमें आप लोकेट करें। जी ठीक है। तो मेरे ख्याल में अगर हमको समझना है जिसको ईरानी इरेनियन रेवोल्यूशन जिसको कहा जाता है इस्लामिक रेवोल्यूशन ऑफ ईरान कहा जाता है वगैरह। तो हमें थोड़ा सा हमें थोड़ा तकरीबन हमें मेरे ख्याल में 200 250 साल पीछे जाना पड़ेगा। हमें पहले 250 साल के आसपास हमको पीछे जाना पड़ेगा के जब 18वीं सदी में मुस्लिम वर्ल्ड को हमें जरा देखना पड़ेगा और फिर मुस्लिम वर्ल्ड का जो एनकाउंटर होता है मॉडर्निटी के साथ मॉडर्निटी के साथ होता है कि उस पर थोड़ी सी नजर डालते हुए फिर लेट्स कम अप टू 1979 जहां पर इस्लामिक रेवोल्यूशन होता है। देखिए जब 18वीं सदी में हम मुस्लिम वर्ल्ड पर नजर डालते हैं तो यह तकलीफ है बट इट्स ट्रू के मुस्लिम वर्ल्ड और मैं यहां पर कह दूं कि उस जमाने तक हिंदुस्तान को भी मेरे हिसाब से हमें मुस्लिम वर्ल्ड का ही हिस्सा मानना चाहिए। गरचे हिंदुस्तान में आबादी की अक्सरियत उस जमाने में भी वो मुसलमान नहीं हुआ करती थी। आज भी साउथ एशिया की मेजॉरिटी मुस्लिम नहीं है। लेकिन बुनियादी तौर पर जो सिस्टम्स थे मुस्लिम वर्ल्ड के हिंदुस्तान उसका एक बहुत अहम हिस्सा था। बल्कि एक पोल था कि कभी और इस पर भी बात होगी कि किस तरह से हिंदुस्तान इस्लामिक वर्ल्ड का एक पोल रहा सदियों तक। यहां तक के ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म ने आकर उसको इस इस हैसियत को उसकी खत्म किया। तो एक बड़ा सा हिस्सा था कि दुनिया का जो मुस्लिम वर्ल्ड कहलाया जाता था। मुख्तलिफ उसमें हुकूमतें थी। की बादशाहतें थी वगैरह वगैरह लेकिन एक एक सिंगल शेयर्ड एक सिविलाइजेशनल स्पेस और अरीना था गचे चाहे ज़बाने अलग होमतें अलग हो मसलक अलग हो वगैरह वगैरह लेकिन एक एक ही स्पेस थी और ये दुनिया की उस जमाने की कल्चरली सिविलाइजेशनली सबसे एडवांस स्पेस थी। मैं इसको ज्यादा तफसील से नहीं बयान करूंगा क्योंकि मैं अस्यूम कर रहा हूं कि यह एक इस्टैब्लिश चीज है और क्योंकि इससे ज्यादा अहम दूसरी बातें इसकी बाद की मुझे बयान करनी है। लेकिन फिर मॉडर्निटी से इसका एनकाउंटर होता है और मॉडर्निटी से इसका मुकाबला शुरू होता है। ये जो स्पेस थी मुस्लिम सिविलाइजेशन स्पेस गरचे दुनिया की उस जमाने की सबसे एडवांस स्पेस थी। लेकिन ऐसी नहीं थी कि ये फ्लोलेस थी। इसके अंदर कमजोरियां भी थी। इसके अंदर कोताहियां भी होती थी। कोई परफेक्ट यूटोपिया नहीं था। यह यह भी क्लियर हो जाए। और यह सुपीरियर लेकिन इमपरफेक्ट वर्ल्ड का एनकाउंटर होता है मॉडर्निटी के साथ। और शुरू में एनकाउंटर तो खैर वो क्लियर नहीं होता है कि क्या चल रहा है। लेकिन पहली जो बड़ी जीत मिलती है मॉडर्निटी को वो दिलचस्प है एस इंडियंस कि आई थिंक आई बिलीव के 1757 में जो प्लासी बैटल ऑफ प्लासी में नवाब सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद के नवाबीन को शिकस्त मिलती है। मेरे ख्याल में दैट इज़ द फर्स्ट मेजर अह डिफीट ऑफ़ द मुस्लिम वर्ल्ड एट द हैंड्स ऑफ़ मॉडर्निटी। कि उसके नतीजे में बंगाल में जो चेंजेस लाना शुरू करते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] आप कुछ कहना चाह रहे हैं? दो चीजें आप बताइए। एक तो क्योंकि हम व्यूअर्स को सामने रखते हुए मॉडर्निटी को आप हल्का सा डिफाइन कर दीजिए और फिर हम लोग वी विल कंटिन्यू कि भ जो बैटल ऑफ प्लासी है वो किस तरह से मॉडर्निटी का एक एक्सपेरिमेंटल मरकज बनता है दूसरी मुख्तलिफ पपुलेशंस को की नेचर ऑफ अंडरस्टैंडिंग को चेंज करने के लिए। मॉडर्निटी अगर आई हम इसको एक मुतरादिव या सिनोनिम समझ सकते हैं वेस्टर्न सिविलाइजेशन के लिए। लेकिन मैं मॉडर्निटी को प्रेफर करूंगा टर्म को क्योंकि वेस्टर्न सिविलाइजेशन में थोड़ा सा एक ये कन्फ्यूजन रहता है कि बहुत सारे जो मॉडर्निटी के अहम मराकिज है वो जोग्राफिकली वेस्ट में नहीं है और मॉडर्निटी का जो असर है वो वेस्ट में महदूद नहीं है। मिसाल के तौर पर मेरे हिसाब से जापान भी जो एक अहम मरकज है मॉडर्निटी का लेकिन वो वेस्ट में नहीं है ना वो तो एक ईस्टर्न कंट्री मानी जाती है। तो इसीलिए मॉडर्निटी को अगर हम अगर बहुत ही सिंपली डिफाइन करें बहुत ही आसान आम फहम अंदाज में तो हम कहेंगे तमद्दुन और सिविलाइजेशन का वो पूरा जाल और मैट्रिक्स के जो इंसान मेहवर है यानी एंथ्रोपोसेंट्रिक है और जिसके हिस्टोरिकल रूट्स जो है तारीकी जड़े वो यूरोपियन रेसंस और एनलाइटनमेंट में पाई जाती है। ये पूरा तमद्दुनी मैट्रिक्स के जिसके अंदर जाहिर सी बात है इसके अंदर इकोनॉमिक्स है, इसके अंदर एकेडमिक्स है, नॉलेज है, इसके अंदर गवर्नमेंट्स है, गवर्नेंस है, इसके अंदर टेक्नोलॉजी है, इसके अंदर सिस्टम्स है। इसकी अपनी प्रेफर्ड लैंग्वेज है वगैरह। पूरा सिविलाइजेशन का जो मैट्रिक्स है जो वहां हिस्टोरिकली रूटेड है वो रेनसांस उसके बाद एन इनलाइटनमेंट में लेकिन वहां रहता नहीं है कॉलोनियलिज्म की शक्ल में और हत्ता पोस्ट कॉलोनियलिज्म की शक्ल में पूरी दुनिया को अपनी कहीं-क को तो पूरी तरह अपनी गिरफ्त में लेता है और हर जगह को बड़े पैमाने पर कम से कम मुतासिर भी करता है। हत्ता जहां मैं हूं इस वक्त ईरान वो भी इससे काफी मुतासिर होता है और आज भी एक हद तक मुतासिर है। तो इसको मैं मॉडर्निटी से मुराद ये है मेरा तो मैंने मैं अर्ज कर रहा था कि मॉडर्निटी की पहली जो बड़ी कामयाबी होती है वो बैटल ऑफ प्लासी है कि जिसके नतीजे में मुस्लिम वर्ल्ड का एक बहुत अहम हिस्सा उस जमाने में बंगाल का प्रोविंस जो कि एक बहुत बड़ा और बहुत ही अमीर प्रोविंस था मुस्लिम वर्ल्ड का वो इनके इख्तियार में आता है और चंद साल ही गुजरते यानी पांच साल के अंदर हम देखते हैं कि बंगाल के अंदर ऐसे ऐसे कहती और फेमिनस आते कि जो वहां हिंदुस्तान की तारीख में तब तक देखे नहीं गए थे। यानी स्टार्ट ही वहां से फेमिन और डिस्ट्रक्शन के साथ होता है कि जिसमें ब्रिटिश पॉलिसीज का बरास किरदार होता है। मॉडर्निटी का बरास किरदार होता है। यहां से ये सिलसिला जारी रहता है। मॉडर्निटी और मुस्लिम वर्ल्ड के क्लैश का। कहीं-कहीं पर मुस्लिम साइड को कुछ कामयाबियां भी मिलती है। जैसे मिसाल के तौर पे मिस्र से इजेक्ट कर दिया जाता है। नेपोलियन जो है वो मिस्र पर हमला करता है। दिलचस्प है आजकल के हालात में के नेपोलियन ने अपनी शोहरत पहले जो कायम की वो मिस्र में और फिलिस्तीन में जेनोसाइड करके उसने हासिल की। हत्ता गज्जा की ये बाज आबादियां जिनका आज जिक्र हो रहा है जैसे खान यूनुस है जैसे देरबला है ये उस जमाने की तारीख में इनका जिक्र मिलता है कि नेपोलियन एक आर्मी ने यहां पर क्या-क्या अट्रोसिटीज और मैसिकर्स कंडक्ट किए थे उस जमाने में तो लेकिन बाद में मिस्री इनको रिजेक्ट करने में एक हद तक कामयाब हो जाते हैं या हिंदुस्तान में उसी जमाने में तकरीबन टीपू सुल्तान शहीद टीपू सुल्तान की वो जो कामयाबियां तारीख में दर्ज है तो कुछ हद तक मुसलमानों को कामयाबी मिलती है। रेजिस्टेंस रेगुलरली बाकी रहता है। जारी रहता है। लेकिन अगर आप लार्जर फ्रेमवर्क में देखें तो जो लार्जर पिक्चर दिखा रही है वो ये कि मॉडर्निटी का गलबा बढ़ता जाता है। एंड बाय द टाइम वी कम टू द मिडिल ऑफ द 19 सेंचुरी तो सेकंड हाफ ऑफ द 19 सेंचुरी मिडिल ऑफ द 19 सेंचुरी भी आप कह दे तो मुस्लिम वर्ल्ड मुस्लिम वर्ल्ड हार चुकी होती है। शिकस्त खोदा होती है। उसके ऊपर लगाम लग चुकी होती है। नकेल लग चुकी होती है मॉडर्निटी की और मुस्लिम वर्ल्ड में के चाहे वो ह्यूमन रिसोर्सेज हो, चाहे वो मटेरियल रिसोर्सेज हो वो बेसिकली वेस्टर्न कॉलोनियलिज्म इंपीरलिज्म यानी मॉडर्निटी का ये एक और नाम है। और यहां पर मैं ये भी कहना चाहूंगा कि ये जो आजकल के जो डी कॉलोनियल स्कॉलर्स ने ये कहना शुरू किया है। खास तौर पर लैटिन अमेरिका के डी कॉलोनियल डी कॉलोनियल एक्सपर्ट्स ने के कॉलोनियलिज्म इज नॉट अ इज नॉट अ मसल साइड इफेक्ट ऑफ मॉडर्निटी बल्कि कॉलोनियलिज्म इज मॉडर्निटी इज मॉडर्निटी तो मैं मैं मुझे लगता है कि इस बात में काफी सच्चाई पाई जाती है। अगर कोई भी इसको ऑब्जेक्टिवली स्टडी करेगा तो वो देखेगा कि हां इस दावे में काफी हद तक हकीकत है। बहरहाल तो इस कॉलोनियल सिस्टम्स में हम हमारे हमारे मटेरियल रिसोर्सेज चाहे हो हमारे जराय हो चाहे हारे इंसानी जराय यानी ह्यूमन रिसोर्सेज आप जानते हैं ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने दुनिया भर में ब्रिटिश एंपायर के लिए जंगे लड़ी है। इसके अंदर हमारे लोग हुआ करते थे मुस्लिम गैर मुस्लिम और ह्यूमन रिसोर्सेज भी काम आ रहे थे किसी और जालिमाना निजाम को और मजीद तक करने के लिए तो ये तकरीबन बाय द मिडिल ऑफ द 19 सेंचुरी ये सिचुएशन कायम हो जाती है। अब यहां से एक टर्निंग पॉइंट शुरू होती है कि जहां सेकंड हाफ ऑफ द 19 सेंचुरी में मुसलमानों के दरमियान मुसलमान रेजिस्ट करते आए थे। ऐसा नहीं कि रेजिस्टेंस की कोई कमी थी और कुछ कुछ कामयाबियां भी इस रेजिस्टेंस में मिली थी। लेकिन ओवरऑल पिक्चर वो डिफीट और डिक्लाइन की ही थी और मॉडर्निटी की जीत की। यहां पर सेकंड हाफ 19वीं सदी के सेकंड हाफ में एक नई किस्म की बेदारी एक नया किस्म का शूर वो मुसलमानों में पैदा होना शुरू होता है और जिसके बिफोर बिफोर मूविंग टू दिस एक अगर मिसिंग गैप आप फिल कर दें के बैटल ऑफ प्लासी और इस तरह के बाद जब ये ऑर्डर चेंज हो रहा है ये मुस्लिम पिटिकल सोवनिटी है तो उसके इदारे हैं उसके इंस्टीटश हैं वफ है, जकात है, दूसरी तरह के मुख्तलिफ निजामात हैं। और उससे एक वर्ल्ड ऑर्डर चल रहा था कि वो जगह थी कि जहां पे आज की डेट में डिस्कशन होता है कि वेल्थ पे टैक्स होना चाहिए। तो मुसलमानों के यहां पे वेल्थ पे टैक्स है कि आपकी जो एक्यूमुलेटेड वेल्थ है रादर देन आपकी फ्लोइंग इनकम जो एक्चुअली जहां पे अमीर और इलिट्स पैसा इकट्ठा करते हैं और आपके यहां पे जो स्पिरिचुअल मोटलिटीज हैं कि आपको अपनी वेल्थ को डोनेट करना है और उससे आपको यू नो ऐसे स्ट्रक्चर्स बनाने हैं जिसमें आपकी स्पिरिचुअलिटी का पार्ट है कि आप गरीबों को अपलिफ्ट करें। आप सोसाइटी में तफरीक को खत्म करें। आप लोगों को इंस्टीट्यूशनलाइज्ड नॉलेज और एजुकेशन दें। इसके बनिस्बत जो आपने बोला कि बंगाल में जो फेमिन आता है क्योंकि एक्सट्रैक्टिव कॉलोनियल पॉलिसी आती है कि इसको लूटो यहां से जो सरप्लस है उसको एक्सट्रैक्ट करो रीइन्वेस्ट मत करो और वहां से ये जो पूरा का पूरा जो निजाम है क्योंकि आपकी पॉलिटिकल पावर मिलिट्री पावर डिक्लाइन होती है तो ये सुरते हाल जिसे कह सकते हैं कि मॉडर्निटी का जो क्लैश हो रहा है इस्लाम के साथ और दूसरे इवन जगहों पे वहां पे जो कंडीशनलिटीज ऑफ स्पेस है कि वो स्पेस उसकी सोशियोलॉजी, उसकी इंटरेक्शंस जो वजूद में आती है वही कंप्लीटली अपरूट और अपटर्न हो जाती हैं। तो यहां से फिर आप हम लोग फिर से कनेक्ट करते हैं कि ये जो पूरी जो आप बता रहे हैं कि लोग फिर जो राइज हो रहे हैं उस मॉडर्निटी को इस पर्सेक्टिव से देख रहे हैं। तो व्हाट आर दे थिंकिंग? जी आपका अच्छा आपने इंटरवेंशन किया। जी बिल्कुल ऐसा ही है। वो जो मॉडर्निटी के काबिज हो जाने से पहले जो सोशल स्ट्रक्चर थे और सिस्टम्स थे वगैरह गचे इमपरफेक्ट थे लेकिन बहुत ही बेहतर थे उससे कि जो बाद में आपने बंगाल बंगाल का क्योंकि हम जिक्र कर रहे हैं। बंगाल में बाज जो मैं एक जमाने में अभी कुछ ही अरसा पहले औकाफ के सिलसिले में कुछ स्टडी कर रहा था इंडिया में औकाफ की हिस्ट्री को लेकर तो मैंने बंगाल के ही ताल्लुक से देखा कि बाज उस जमाने के ब्रिटिश जो एडमिनिस्ट्रेटर्स बैठाए गए उनका ये कहना था कि जो कल्टीवेटेड लैंड था बंगाल का उसका एक चौथाई हिस्सा वो वफ की हैसियत रखता था और उसकी वजह से पूरा एक तालीम का निजाम गरीबों की इमदाद का निजाम बहुत सारे पब्लिक वक्स यानी बंगाल में जाहिर सी बात है इतना एग्रीकल्चर था कि इरीगेशन भी उसी एतबार से लाजमी होता था। उस इरीगेशन का निजाम उससे चलता था वगैरह वगैरह। ये कैसे चल रहा था? ये एक इस्लामी तहजीब और तमद्दुन का एक बहुत ही जो एक अहम लेकिन एक बहुत ही मामूली और हमारे लिए बहुत ही बेनिल और ऑर्डिनरी चीज व उससे चलता था। हम तो ये सारी चीज और उन लोगों ने जब मॉडर्निटी आई तो उसने जिस तरह से एक तो इसके अलावा के टैक्सेस को बढ़ाया इन औकाफ की जमीनों को खासतौर पर टारगेट करके इनको हड़पा ये सोच कर कि औकाफ की जमीन प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है तो शायद हमें उस तरह से रेजिस्टेंस का सामना नहीं करना पड़ेगा कि जब हम इनको पब्लिक प्रॉपर्टी को हम हम इनको हड़पेंगे और इन्ह बड़े पैमाने पर हड़पा और बहुत इससे उनको फायदा हुआ और ये जो औका हड़पने की जो जो अफसोसनाक हिंदुस्तान में कहानी है इसकी जड़े 250 साल पुरानी है। आज तक ये कहानी जारी है लेकिन ये 250 साल पहले ये शुरू होती है। इसी तरह से जो जो उसका लीगल सिस्टम यानी जो अदिया का निजाम था जो जस्टिस सिस्टम था वो एक जस्टिस सिस्टम ऐसा मौजूद था कि जिसके अंदर मुख्तलिफ एक नेटवर्क था कोर्ट्स का कि जिसके अंदर इस्लामी शरीयत पर बेस्ड कवानीन बुनियाद बनते थे कमर्शियल ट्रांजैक्शंस के लिए और क्रिमिनल मैटर्स के लिए लेकिन पर्सनल मैटर्स के लिए इंटर कम्युनिटी मैटर्स के लिए वो दूसरे कवानीन अपनीप कम्युनिटीज इस्तेमाल करती थी। तो एक हाईली डेवलप फ्लेक्सिबल काफी मुतव और वैरायटी रखने वाला एक लीगल निजाम था कि जिसको उनहीं ने आके फ्लैटन किया और अपने हिसाब से पोर्ट विलियम में बैठकर कुछ उनहीं ने कुछ किताबें लिखी और फोर्स किया कि वो कोड्स को फॉलो किया जाए कि जिसके नतीजे में अलग किस्म से बर्बादी हुई। तो एक-एक करके हम सिस्टम्स को देखते जाएंगे तो हम देखेंगे कि ये बर्बादी जो है वो फैलती गई। फेम जिसका नतीजा फेमिन डी इंडस्ट्रियलाइजेशन डीपुलेशन बड़े-बड़े रिफ्यूजी पापुलेशंस का पैदा होना और ये सब जो है फिर मैं दोबारा कहूंगा ये साइड इफेक्ट नहीं थे ये मिस्टेक्स नहीं थी दिस इस ऑल पार्ट ऑफ द प्लान क्योंकि इन हर बर्बादी से उन ने फिर उसको अपने फायदे में यहां अगर डी इंडस्ट्रियलाइज किया तो उसी जमाने में इंग्लैंड में उन ने इंडस्ट्रियलाइजेशन को शुरू किया तो ये जी मैं मतलब जस्ट एडिशन के कुछ स्टडीज कहती हैं कि मुगल इंडिया में 24% पूरे ग्लोबल जीडीपी का पार्ट था और 12% सिर्फ बंगाल से आता था और इसकी टेक्सटाइल इंडस्ट्री से बंगाल इस लेवल पे इंडस्ट्रियलाइज्ड और इंटीग्रेटेड था और वहां पे जो आपने बोला कि 5 साल में फेमिन आ जाता है। ये बड़ी इंपॉसिबल सी बात है। अगर चाहे आपकी पॉलिसी का पार्ट ना हो कि उस पूरे जो सिस्टम को और उस पूरी पपुलेशन को आपको इरेज करना आपका मकसद है। उसकी हायरार्की को उसकी यू नो सिस्टम को। जी जी बिल्कुल बिल्कुल ऐसा ही है। बिल्कुल ऐसा ही है। तो ये जो बातें जो वेस्ट के डिफेंस में कहा जाता है कि भाई आप वेस्ट को इतना बुरा भरा कह रहे हैं। आप मॉडर्निटी को इतना बुरा भरा कह रहे हैं। आखिर हवाई जहाज भी तो इन्हीं ने इन्वेंट किया। टेलीग्राफ भी तो इनहीं ने इन्वेंट किया। स्टीम इंजन इनहीं ने इन्वेंट किया। फला कैंसर का ट्रीटमेंट इन्हीं ने इन्वेंट किया वगैरह। तो जाहिर सी बात है कि जब हमें किसी सिविलाइजेशन को इवैलुएट करना है, मॉडर्निटी को, वेस्ट को इवैलुएट करना है तो हमें उसको टोटिटी में देखना पड़ेगा और जो उसके पॉजिटिव पहलू के उनवान से पेश किए जा रहे हैं उनको नेगेटिव पहलुओं के किनारे रखना पड़ेगा और फिर हमको इवैल्यूएट करना पड़ेगा। और जो पॉजिटिव पहलू के तौर पर पेश भी किए जा रहे हैं उन्हें भी देखना पड़ेगा कि वो हकीकत में किस हद तक पॉजिटिव पहलू थे और किस हद तक कुछ और मकासिद के तहत उनको किया गया। तो बहरहाल लेट्स कम बैक टू आवर हिस्टोरिकल नैरेटिव। तो हमारी कहानी जब आती है यहां पर 19 सेंचुरी के हम अगर बीच में आते हैं तो मुस्लिम वर्ल्ड जो है वो वो ब्रोकन है यानी सबजुगेटेड है और उस पर सवार है मॉडर्निटी और उसमें हर तरफ एक एक मायूसी सी है। उसमें हर तरफ कमजोरी का एहसास है। कई इलाके डायरेक्ट कॉलोनियलिज्म में आ गए हैं। जैसे कि बहुत अहम उसमें हिंदुस्तान है। उसमें इजिप्ट है वगैरह कई जो है वह इनडायरेक्ट कॉलोनियलिज्म का शिकार है। उस्मानी सल्तनत तब तक जो है वह डिक्लाइन में आ चुकी थी। ईरान पे इनडायरेक्ट कॉलोनियलिज्म का पूरी तरह से मुसल्लत था। यहां का दरबार गुलाम बन चुका था वेस्टर्न पावर्स का। तो ये कैफियत सारी थी और ये भी देखा जा रहा था कि मायूसी के अंदर एक जो बहुत खतरनाक पहलू ये हो रहा था कि देखा जा रहा था कि रेजिस्टेंस कोई फायदा नहीं लाता। 1857 58 का जो बहुत अहम वाकया है हिंदुस्तान का तो वो भी एक बड़ा शौक था क्योंकि वो डिफीट हुआ ना वो उसकी उसको भी शिकस्त का सामना से दोचार होना पड़ा। तो ये सारे पहलू बहुत ही तारीख कैफियत पाई जाती थी दुनिया में। यहां से फिर जो मैं अर्ज कर रहा था कि एक नया शूर एक नई बेदारी मुस्लिम वर्ल्ड में शुरू होती है। मुख्तलिफ लोगों का इसमें किरदार रहा। लेकिन जो सबसे अहम शख्सियत है और जो एक तरह से टर्निंग पॉइंट की शख्सियत है वो है मरहूम सैयद जमालुद्दीन। सैयद जमालुद्दीन जिनको अफगानी भी कहा जाता है, असदाबादी भी कहा जाता है, मोहम्मददी भी कहा जाता है, इस्लामी भी कहा जाता है। मुख्तलिफ नामों से इन्हें याद किया जाता है। और ये खुद बहुत दिलचस्प है कि कैसे इनके इतने सारे अलकाब है। एंड हर कोई कहता है ये हमारे हैं। अफगानी कहते हैं हमारे हैं। ईरानी कहते हैं हमारे हैं। शिया कहते हैं हमारे हैं। सुन्नी कहते हैं हमारे हैं। ये बहुत दिलचस्प एक शख्सियत है। तो ये शख्सियत इनके कंट्रीब्यूशन और इनका जो दौर है इनकी कारवाई का बहुत मेहनत की इनहीं ने ये कई जो डेकेड्स थे आप कह सकते हैं तकरीबन 1860 से लेकर ये उनका इंतकाल तकरीबन 1898 के या 99 में होता है। एक्सक्ट डेट मेरे ज़हन में नहीं है। तकरीबन एक 40 साल का दौर है कि सैयद जमालुद्दीन दुनिया आलम इस्लाम के आलम इस्लाम के बाहर भी मुख्तलिफ हिस्सों में नजर आते हैं। कुछ अरसा वो हिंदुस्तान में भी दो साल रहे। हिंदुस्तान में भी दो साल रहे हैं। जी जी हिंदुस्तान में बल्कि जो मेरी अब तक समझ है कि तीन सफर उनके हिंदुस्तान हुए हैं। के और कुछ का दावा है कि चार लेकिन बहाल तीन को लेकर मैं मुमईन हूं कि तीन उनके हिंदुस्तान में सफर हुए जिसमें से एक सफर वो चंद साल रहे। मुंबई में एक अरसा रहे ज्यादा हैदराबाद में रहे और कोलकाता में भी कुछ अरसा रहे। बल्कि दिल्ली में भी शाह साहब के शाह वलीला दहलवी खानवादे के साथ भी उनका इंटरेक्शन रहा। तो अच्छा अच्छा अच्छा तो सैयद जमालुद्दीन तुर्की में रहे और काबुल में रहे मिस्र में एक लंबा अरसा उन ने गुजारा फिर बाद में हालात कुछ ऐसे बने के वो हत्ता लंदन में रहे पेरिस में रहे और इस पर जो इलाफ है कि अमेरिका का उनका सफर हुआ या नहीं हुआ इसके बारे में इलाफ है राय पाए जाती है तो ऐसी एक शख्सियत बहाल ये सफर उनका करना अहम नहीं है अहम बात जो उन्होंने मुस्लिम वर्ल्ड में उनहीं ने इस आईडिया को पेश किया। चंद बातें उन्हीं ने पेश की मुसलमानों के दरमियान पहली बार मुसजिम और मुअसिर अंदाज में। एक तो उनहीं ने बात को पेश की के हमारा असली मुकाबला हमारा असली मुकाबला वो मगरिब के साथ है। वो वेस्ट के साथ है। वो लफज़ जाहिर सी बात है आज जिसको हम लोग मॉडर्निटी कह रहे हैं। हमारा मुकाबला इनके साथ है। हमारा मुकाबला आपस में ये जो इस्तांबुल का दरबार वो तेहरान के दरबार से समझता है कि ये हमारे दुश्मन है। ना ये सब गलतफहमी है। असल मुकाबला जो है सबका एक मुश्तक एक दुश्मन है जो सबके ऊपर सवार है कहीं डायरेक्टली कहीं इनडायरेक्टली और वो है वेस्ट। दूसरी बात वेस्ट के बारे में उनहीं ने ये दिखाया कि वेस्ट के जो ये टेक्नोलॉजिकल कामयाबियों से चकाचौंध हो रहे हैं। उस जमाने में स्टीम इंजन आ गया था। टेलीग्राफ आ गया था और ये सारी चीजें आना शुरू हो गई थी। उनका जो पॉलिटिकल पावर था, उनका जो मिलिट्री पावर था, उनका जो एक किस्म का एक नज्म और सिस्टमैटिक अंदाज से काम करना नजर आता था। कहते ये जो जो हमें पॉजिटिव चीजें और स्ट्रेंथ नजर आ रही है। ये सिर्फ ऊपर का एक वर्क है। अंदर एक घिनौनी तारीकी पाई जाती है इस तहजीब और तमद्दुन में जो पूरी दुनिया को नाबूद कर रही है। खुद इन्हें भी नाबूद कर रही है। चाहे ये समझे या ना समझे। यह चीज सैयद जमालुद्दीन ने पहली बार मुंतजिम अंदाज से उस इस्लामी नुक्त निगाह से वो इस्लामी फलसफी इरफानी नुक्त निगाह जिसमें वो डूबे हुए थे उसके जरिए उस बात को वो बयान करने में कामयाब हुए साथ में उनहीं ने कहा जो हमारा मुकाबला है इस मॉडर्निटी और वेस्ट के साथ ये बुनियादी तौर पर असलहे का अफवाज का सियासत का मुकाबला नहीं है। बुनियादी तौर पर ये एक इंटेलेक्चुअल मुकाबला है। एक फिक्र और नजरिए का मुकाबला है और हम जब तक फिक्र और नजरिए में मजबूत नहीं होंगे हम जितनी फौजे खड़ी कर दे हम जो चाहे कर ले हम चाहे जितने अलायसेस बना ले मिलिट्री अलायसेस बना ले हम फिर भी हारेंगे क्योंकि हमने फिक्र और नजरिए की दुनिया में अपने आप को उस उस तरह अपडेट नहीं किया है कि हम इनको सही से पहचान सके और इनका मुकाबला कर सके और आखरी बात जो उन्हें बताई जो मैं यहां जिक्र करना चाहता हूं। उनकी बातें तो बहुत ज्यादा है। मैं यहां पर बदनीस यहां पर बैठा हूं आपके सामने। तो ये उनके जो किताबों में से एक मैंने यहां पर देख रहा था। अभी ये उनके जो मशहूर उनका मैगजीन हुआ करता था। एक रिसाला निकालते थे। उर्वत उसका उसके ये कलेक्टेड ये सारे उर्वत उसका के इश है। इस किताब में जमा किए गए हैं। दुनिया भर में ये नश्र होता था। हिंदुस्तान में भी कई जगह लोग सब्सक्राइब करते थे और जब आता था यह मैगजीनशिप के जरिए तो ब्रिटिश कस्टम्स में एक पूरा डिपार्टमेंट ये होता था या ओदेदार होते थे सिर्फ इसको ट्रैक करने के लिए के उर्वत वस्का कौन पढ़ रहा है इसको इसका हिसाब रखा जाता था तो यहां पर उन्हीं ने ये चीजों को बयान किया के जो लास्ट पॉइंट मैं यहां जिक्र करना चाहता था कि जो मुकाबला है वह एक तो इंटेलेक्चुअल है बुनियादी तौर पर मुकाबला है मुकाबले का तरीका वो हरगिज़ इसमें नहीं है कि हम इनसे हम किसी किस्म का किसी किस्म की गोशा नशीनी इख्तियार करें और कहे के ये तहजीब और तमद्दुन ये तो बहुत बुरा है। ये तो एक नजिस किस्म का एक तमद्दुन है। हम इससे टच नहीं करना चाहते। हम रिट्रीट करना चाहते हैं और एक सन्यास की कैफियत में अपनी पोरिटी को मेंटेन करना चाहते हैं। उनहीं ने इसकी सफ मुखालिफत की क्योंकि कुछ मुस्लिम वर्ल्ड में कुछ आवाजें उस जमाने में इस नयत की थी। इसके अलावा के कुछ आवाजें ऐसी थी कि इनके साथ समझौता कर लिया जाए। उनका भी मुकाबला किया। कभी उस पर तफसील से बात होगी। खासतौर पर हिंदुस्तान में उनहीं ने इस पहलू का काफी मुकाबला किया। उन आवाजों का मुस्लिम आवाजें जो कहती थी कि इनके साथ समझौता करना बेहतर है और साथ में उन आवाजों का भी मुकाबला किया जो कहती थी कि इनसे दूरी इख्तियार करना बेहतर है। ऐसा हम कुछ करें कि हमारा और इनके साथ कोई कांटेक्ट ही ना हो। इन दोनों का उन्होंने मुकाबला किया और कहा कि नहीं ये दोनों जो है नाबूदी के नुस्खे हैं। बल्कि हमें इन्हें समझना होगा। इनके इन्हें समझना होगा। अपनी फ़िक्र को, अपने आपको चाहे वह नज़रिया हो, फलसफी, आईडियोलॉजिकल हत्ता साइंसेस और टेक्नोलॉजी में हमको अपने आप को उस मंजिल तक पहुंचाना होगा कि हम अपने नजरिए और आईडियोलॉजी के तहत इनका मुकाबला कर सके। तो यहां पर इस्लामी इत्तहाद पर उन्हीं ने बहुत जोर दिया क्योंकि वो उसको एक कैंसर के तौर पर देखते थे कि अगर मसलकी या किसी भी किस्म का कौमी इख्तलाफ मुसलमानों के दरमियान रहा तो ये मुकाबला हम नहीं कर सकते। तो ये चंद बातें सैयद जमालुद्दीन ने जिस अंदाज से पेश की। फिर मैं कहना चाहूंगा ऐसा नहीं कि ये एक ही इंसान था जिसको ये समझ में आ रहा था। कुछ हद तक दूसरे लोगों को भी ये बातें समझ में आ रही थी और अपनेप तौर पर कोशिशें कर रहे थे। लेकिन जिस गहराई से वो समझे जितना उनहीं ने इस सिलसिले में कई दहाइयों तक जिहाद किया है मुसलमानों के दरमियान जितना उनहीं ने लिखा सफर किया जगह जगह असर अंदाज हुए और जो असर उनहीं ने डाला है उसका कोई मुकाबला नहीं है। इंशा्लाह कभी वक्त होगा तो उनके बारे में एक तफसीली गुफ्तगू होना चाहिए। यानी एक मोजाती किस्म की एक शख्सियत है ये सैयद जमालुद्दीन की अपने दौर में क्या क्या कर गए और उनके बाद उनके बाद आप देखेंगे तो अल्लामा इकबाल उनकी तारीफें कर रहे हैं। मौलाना आजाद उनकी तारीफें कर रहे हैं। आप देखेंगे इमाम खुैनी उनकी तारीफें कर रहे हैं। यानी आपको कोई नहीं मिलेगा इस पूरे पूरे बेदा बेदारी की इस कहानी में के बाद अभी आगे हम और भी कुछ लोगों पर गुफ्तगू करेंगे जो कहीं ना कहीं डायरेक्टली या इनडायरेक्टली सैयद जमालुद्दीन की से मुतासिर नहीं है। एक अजीब अजूबा जैसी ये शख्सियत है और कभी आप मैं मशवरा दूंगा कि आप किसी एक्सपर्ट को बुलाए सिर्फ इनके बारे में बात करने के लिए। वाकईन अजीब हैरतंगेज शख्सियत अगर मैं इसको अ थोड़ा सा इसको इस तरह समझने की कोशिश करूं कि ये वो दौर था मुस्लिम वर्ल्ड में के ऑलरेडी जो मुस्लिम यूनिटी है वो फ्रैक्चरर्ड हो चुकी थी वो मौलाना मौदूदी लिखते हैं खिलाफत मुलकियत में कि वो जो सिलसिला है खिलाफत से मिल्कियत का मुलकियत का उसमें वो जो आपका ब्रेक होना यू नो स्मॉलर यूनिट्स में और आपकी जो इंडिविजुअल पर्सपेक्टिव्स हैं वो फिर उसके बाद वो एक करप्शन भी था जो इलीट में था कि हमारी जो उलेमा क्लास थी उसके पास उतनी पावर नहीं थी और साथ में मॉडर्नाइजेशन और साथ में फ्रैक्चराइजेशन और उसमें वो जो दुनिया में जिस तरह का पॉलिटिकल और जियोपॉलिटिकल वर्ल्ड ऑर्डर है वहां पे कोई किसी से अलाइड है जो आज की डेट में जिसका एक जिसे कहते कहते हैं कि एक्सट्रीम शक्ल हम देखते हैं नेशन स्टेट्स के माइक्रो यूनिट्स में टूटने की वजह से के यूएई किसी के साथ है यू नो सऊदी अरब का उससे है टर्की का इससे ईरान उससे है आप समझ रहे हैं तो वो एक अ थोड़ा सा लेस कॉम्प्लिकेटेड फॉर्म में ऑलरेडी दुनिया पे था मुस्लिम वर्ल्ड में एजुकेशन और दूसरी तरह की जो चीजों की जरूरत थी मुस्लिम पर्सपेक्टिव से इस्लामिक पर्सेक्टिव से ही होने की वो खुद भी हल्का सा जवाल में थी और वहां पे जो सबसे बड़ा चैलेंज आ रहा था इस फ्रैक्चरर्ड वर्ल्ड में ऐसा इंसान आके एक ऐसा फलसफा दे कि जिसमें इन डिफरेंसेस के बावजूद यूनिटी लाने की कोई पोटेंशियल हो उसकी वोकैबलरी क्रिएट हो तो क्योंकि इंडोनेशिया में मोहम्मददिया है वो अपने आपको वो एक बहुत बड़ी ऑर्गेनाइजेशन है वो जमालुद्दीन अफगानी के शागिर्द यहां से गए वहां पे इस्टैब्लिश करी जमात इस्लामी के लोग अपने आप को जमालुद्दीन अफगानी के ट्रेडिशन से जोड़ते हैं। मौलाना आजाद सद ने यू नो अबू के साथ जो काम किया वो मतलब एक पूरा सिलसिला है के जो एक तरह की जिसे कहते हैं कि काइंड ऑफ पिटिकल थिंकिंग एंड सिविलाइजेशनल थिंकिंग वो वहां पे एक्सपेंड होता है। शायद सैयद जमालुद्दीन अफगानी के कॉन्टेक्स्ट में ये बात कही जा सकती है कि एक एंजायटी से गुजर रहा था मुस्लिम वर्ल्ड उस टाइम पे और पहली बार एक एक्सप्रेशन ऐसा हुआ कि जिसमें एक विज़ ऑफ पोटेंशियल टू कम टुगेदर एज शियाज़ एज सुन्नीज़ एज बरेलवीज़ एज देवबंदीज एज इंडिविजुअल मुस्लिम्स कि उसका टेंपलेट क्या हो सकता है? हो सकता है वह बहुत कॉम्प्रहेंसिव विज़ उस तरह नहीं किया जा सकता कि आपके पास एक-एक डिटेल हो। लेकिन आपका एक ब्लूप्रिंट शायद उन्होंने सामने रखा। बिल्कुल ऐसा ही है। बिल्कुल ऐसा ही। उन्हीं ने जो जो एक ब्लूप्रिंट आप कहें या बेसिक स्ट्रक्चर कहें वो उन्हीं ने अपने दौर में पेश किया और इसीलिए उसको इस किस्म की पजीराई और एक्सेप्टेंस मिली। जगह-जगह आपने बाज जगहों का जिक्र किया। मैं भी उसमें इजाफा कर दूं। बाज जगहों का या बाज तहरीकों तंजीमों शख्सियात का जो उनसे मुतासिर हुए और उनकी फिक्र को लेकर आगे बढ़े उसको और डेवप किया। आपने मिस्र में नाम लिया जी बिल्कुल मोहम्मद अब्दो साहब जो है वो उनके खास शागिर्द थे। कई साल उनके साथ वहीं पर मिस्र में अलकाहरा में जो है वो उनकी शागिर्दी की और वहां मिस्र में सैयद जमालुद्दीन का दौर काफी मुअसिर दौर था। अल अजहर जो उस जमाने में एक जुमूद और एक सुस्ती का शिकार हो गया था। उसमें आकर उनहीं ने फलसफे को जिंदा किया। इरफान को जिंदा किया। वहां दरस उन्हीं ने दिए फलसफे के जो तकरीबन वहां पर वो सिलसिला काफी कम रंग या कुछ लोग कहते हैं खत्म हो चुका था और वहां पर एक नई हयात और तहुक इसके नतीजे में वहां पैदा हुई। उसके अलावा मिस्र की अगर हम बात करें तो यह सिलसिला आगे बढ़ता है और हम देखते हैं आगे हसन अल बनन्ना इसी सिलसिले के आगे एक और कड़ी है कि वो मुस्लिमीन की बुनियाद डालते हैं कि जिसके वो असरात रहे जो अब तक हम देख रहे हैं। मिस्र में ये सिलसिला और भी रहता है। बहुत शख्सियत है। मिस्र जाहिर सी बात है कि आलम इस्लाम के जैसे हिंदुस्तान एक जमाने में आलम इस्लाम का एक पोल हुआ करता था। एक कुतब हुआ करता था। मिस्र भी एक जमाने में आलम इस्लाम का बहुत अहम कुतब हुआ करता था। तो आगे अगर मिस्र में जाए तो मुख्तलिफ शख्सियात में बस एक मिसाल दे रहा हूं क्योंकि बात हो रही है किस तरह से सबको जमा करने की कुत का ब्लूप्रिंट एक तरह से सैयद जमालुद्दीन के अफकार में मिलता है। हम देखते हैं 1959 में शेख उल अजहर जो शेख मोहम्मद शलतूत रहमतुल्लाह अल उन वो आकर पहले तो 1950 में दारु तकरीब बैन मजाहिब कायम करते हैं। यानी बाकायदा एक इंस्टिट्यूशन कायम करते हैं। इसका मकसद ही ये है कि मुख्तलिफ इस्लामी मज़ाहिब के दरमियान तकरीब हो। दोनों को जो है प्रोक्सिमिटी और क्लोजनेस इनके दरमियान इजाद हो। फिर 1959 में अपने इंतकाल से कुछ साल पहले वो एक वो मशहूर फतवा देते हैं कि जिसके अंदर वो कहते हैं के अहले सुन्नत के लिए जिस तरह से जायज है के मज़ाहिबे अरबा में से चार जो मशहूर मजहब फकी मज़ाहिब है अहले सुन्नत में उनमें से किसी को भी फॉलो कर सकते हैं। इस तरह अहले सुन्नत के लिए जायज है कि अगर वो चाहे तो फिककी मसाइल में मजहब जाफरी यानी शिया मजहब को भी फॉलो कर सकते हैं। 1959 में शेख अजहर की तरफ से जी शेख महमूद सलतूत की तरफ से ये आता है। ये ये सब वो ये वही वो वो किरणें हैं जो सैयद जमालुद्दीन से शुरू हो रही है 19वीं सदी में और अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ रही है और डेवप होती जा रही है। डेवलप होती जा रही है। तो ये तो मिस्र की बात हुई। अगर मैं हम लोग नजर डालें मैंने यहां पर सोचा मैं अगर जिक्र करें तो इराक में देख लें। इराक में 1900 फर्स्ट वर्ल्ड वॉर जो है वो इराक में लड़ी जाती है। बहुत ही बुरी तरह से वो उस्मानी रियासत एक हुआ करती थी। लेकिन फिर ब्रिटिश उसको टेकओवर करते हैं। उसको सेपरेट करते हैं वगैरह। यहां पर मैं यह भी अफसोस का इजहार कर दूं कि इराक को ब्रिटिश कॉलोनी बनाने में खुद ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा बहुत तकलीफ दे पहू है कि किस-किस तरह से हमारे मुल्क के फौजियों को ले जाया गया जगहजगह दूसरी मजलूम कौमों को मुसलमान मजलूम कौमों को या गैर मुस्लिम मजलूम कौमों को कई जगह तो मुस्लिम कौमों को उनको सबजुगेट करने के लिए उनको गुलाम बनाने के लिए यहां के गुलाम को ले जाया गया वहां के आजाद लोगों को गुलाम बनाने का बहुत तकलीफ दे पहलू होता है। बहरहाल ब्रिटिश इंडियन आर्मी के जरिए इराक पर कब्जा किया जाता है। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के एंड तक फिर वो तकसीम किया जाता है। ये मुख्तलिफ मुालिक बनाए जाते हैं और वहां पर 1920 में एक कयाम होता है और ये नजफ के जो शिया उलमा है उसको लीड करते हैं। मकसद होता है इराक की आजादी यानी वो पूरा इलाका जो है वो ब्रिटिश कंट्रोल से बाहर निकले। यह लोग भी अफराद भी वाज़ तौर पर मुतासिर है। यही सैयद जमालुद्दीन के अफकार से उनका असर है। और उसकी पूरी एक तफसीली कहानी है। या बाद में इराक में हम आते हैं। मुख्तलिफ और शख्सियात आते हैं। मैं बस एक का नाम ले लेता हूं के जिनकी शहादत 1980 में हुई के आयतुल्लाह शहीद बाकर सदर के जिनका एक बहुत अहम किरदार था। हब दावा की तासीस में जो हिज ये हजब बास के मुकाबिल में उसने इस्लामी बुनियादों पर बहुत जद्दोजहद की मेहनत की और इनहीं ने अपनी शहादत से पहले हत्ता इनहीं ने फतवा दे दिया था कि हिज्ब बास का रुक्न होना मेंबर होना शरन हराम है और बल्कि उसके खिलाफ जिहाद करना ये वाजिब किफाई है तो ये भी वही अफकार हम देखते आ रहे हैं कि इराक में इस शक्ल में आगे बढ़े लेबनान में मुख्तलिफ शख्सियात है कि जिसमें मैं सैयद शरफुद्दीन मुसवी का जिक्र करना चाहूंगा के जिन्होंने अपने दौर में किस तरह से लेबनान के एक हिस्से में कि जिसमें जाहिर सी बात है उस जमाने में लेबनान में फ्रेंच डोमिनेशन क्रिश्चियन डोमिनेशन ये बहुत बढ़ गया था उसमें उनहीं ने अनऑफिशियल तौर पर लेबनान के एक हिस्से में पैरेलल सिस्टम्स को कायम किया जो आज हम देखते हैं कि हिजबुल्लाह एजुकेशन में या मुख्तलिफ और फील्ड्स में हत्ता इकोनमी में लेबनान के अंदर एक पैरेलल पूरा निजाम रखती है कि जिसका फायदा तमाम लुबनानियों को होता है। जब लेबनान को फ्यूल की शॉर्टेज हुई जब लेबनान को जो है वो मुहासरा किया गया यानी उसको सीज किया गया इसराइल के जरिए तो ये हिजबुल्लाह के लिंक्स थे जिसने इस इकोनमिक सीज को भी तोड़ा। इसकी बेस कहां पड़ती है? सैयद शफुद्दीन मूसवी उनकी खिदमतों में या ये शेख जवाद मुगनिया ने वो मशहूर किताब उस जमाने में लेबनान में लिखी कि जिसका नाम है अल मजाहिब खमसा यानी उन्हीं ने आकर एक ऐसी किताब लिखी कि जिसमें हर फकी मसले पर जो चार अहले सुन्नत के मजहब है मसलक है उसके साथ जाफरी मजहब इनको पांचों को एक किताब ने लाए कि जो उससे पहले तारीख में कभी इस किस्म की किताब नहीं लिखी गई और वो तस्वीर पेश की कि यह सब एक ही तहजीब और तमद्दुल और एक ही एक मूवमेंट का हिस्सा है। चाहे वो शिया हो जिन्होंने ये किताब लिखी वो शिया हजरात थे या सुन्नी हजरात थे। कैसे फॉर द पर्सेपेक्टिव ऑफ मैं समझना चाह रहा हूं कि ये जिनलॉजी कैसे ऑपरेट हो रही है? क्योंकि आज की डेट में लोग इस तरह से इंटरप्रेट करते हैं कि शिया सुन्नी जो यू नो हिस्ट्री है वो कंप्लीटली सेक्टेरियन डिवइड चल रही है। लेकिन जैसा हम देख रहे हैं कि एक्सट्रीम लेवल ऑफ इंटरकनेक्टिविटी है। आइडियाज के लेवल पे इंटरेक्शन के लेवल पे वो जो वर्ल्ड व्यू हमें 20 30 40 साल से सेल किया गया कि कंप्लीटली जीरो और वन रिलेशन ऐसा नहीं है। बहुत ही इंटरटइंड और बहुत ही सेलिब्रेटेड हिस्ट्री है। तो इससे थोड़ा सा जैसे आपने अलजर में बताया कि वहां पर वो जनरली स्पीकिंग इट्स अ सुन्नी हब ऑफ थियोलॉजी हिस्टोरिकली और वहां से ये फतवा आता है कि भाई श हजरात या फिर जो मजाहिब है इमाम जाफर सादिक का और ये भी हमें पता होना चाहिए कि जो इमाम अबू हनीफा है वो उनके शागिर्द भी रहे हैं। तो वो इंटरेक्शन वो ये नहीं है कि वो सिर्फ 19 सेंचुरी में लेट 19 अर्ली अर्ली 20थ सेंचुरी में हो रहा है। ये इंटरेक्शन बहुत वजूद में है। लेकिन उसके बावजूद डिफरेंसेस भी हैं। उसको हमें कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए उसको आइडेंटिफाई करने में और हाईलाइट करने में। तो ये मतलब ये एक बड़ा इंपॉर्टेंट मैसेज है जो जो आप बातें कर रहे हैं उसमें ये जो उभर के आ रहा है कि इट्स कॉमन जीनियोलॉजी है आइडियाज में। जी बिल्कुल ऐसा ही है। आप देखिए यही क्योंकि एक तो खैर हम इसमें एक जो कंसिस्टेंट पैटर्न देख रहे हैं वो सैयद जमालुद्दीन का होना कि सैयद जमालुद्दीन को जो आम तौर पर मुस्लिम वर्ल्ड में जो है वो एक एक सुन्नी शख्सियत के उनवान से देखा जाता है और उनका असर आप देख रहे हैं कि चाहे सुन्नी हो चाहे वो शिया हो हर जगह उनकी बातों का असर यहां पर नजर आ रहा है। उसके अलावा जो मैं लुबनान की जिन शख्सियत का जिक्र कर रहा हूं। एक दो नाम अभी मैंने लिए ये दो शिया नाम है। लेकिन इनका जो शेख महमूद शलतूत के साथ और अल अहर के साथ इनका गहरा रिश्ता है। इल्मी तौर पर खतबत के पूरे बाकायदा वॉल्यूम्स पब्लिश हुए हैं कि इनके दरमियान खतताबत क्या हुआ करती थी? और अगर 1959 में वहां पर वो फतवा आ रहा है अल अजहर में कि जो कह रहा है कि फ जाफरी के ऊपर अमल कर सकते हैं सुन्नत यानी शिया फिक पर अहले सुन्नत अमल कर सकते हैं तो वो वही कन्वर्सेशन जो दोनों तरफ चल रहे है उसका एक रुख है और यहां पर लेबनान में किताब लिखी जा रही है शिया आलिम से कह रहा है कि इस्लामिक फिक में पांच स्कूल्स पाए जाते हैं आप देख रहे हैं ये एक ही चीज के मिरर इमेज है दोनों दोनों एक ही चीज अलग-अलग जाविय से पेश कर रहे है नला एक शिया आलिम कहे कि इस्लामिक स्कूल और फिक पांच होते हैं। वो तो नहीं कहेगा ना। वो तो कहेगा इस्लामिक स्कूल ऑफ़ फिक तो वही होता है जो शिया स्कूल ऑफ़ फिक है। लेकिन वो इस किताब ऐसी किताब एक शिया आलिम यहां लिख रहा है। वहां पर एक सुन्नी आलिम और वो भी एक पाए का सुन्नी आलिम फतवा दे रहा है कि आप शिया फिक पर भी अमल कर सकते। तो ये इंटरकनेक्टेडनेस हर दौर में ये रहा है और आपने अच्छी मिसाल आपने इशारा किया कि खुद जो फिक जाफरी है उसका बेस है इमाम जाफर सादिक अल सलाम के जिनके शागिर्दों में इमाम अबू हनीफा भी है इमाम मालिक भी इनडायरेक्ट उनके शागिर्दों में शुमार किए जाते हैं। ये जो इंटरकनेक्टिवनेस की अभी हम बात कर रहे हैं। इसकी जड़े बहुत पुरानी है। जो मैंने शुरू में भी गुफ्तगू में कहा कि जो यहां मैंने ईद के तनाजुर में कहा कि वो जो सदरे इस्लाम में हुजूर के दौर में जो रूहानी कैफियत जो इस्लाम पर अमल पैदा होने की कैफियत थी उसकी कुछ झलक हम देख रहे हैं आजकल दुनिया के कुछ हिस्सों में आलम इस्लाम के कुछ हिस्सों में ये भी जो इंटरकनेक्टिविटी है ये नई इजाद नहीं है। यह एक तरह से कोशिश है रिकवर करने की वह चीज जो हमारी तारीख जड़ों में पाई जाती है। लेकिन मुख्तलिफ वजूहात की बिना पर कुछ हमारी कोताइयां गफलतें और गलतियां और कुछ दुश्मन की साजिशें और दुश्मन के जो मंसूबे हैं उनके असरात वो ऐसे हो गए कि आज जब हम बात करते हैं तो लगता है कि अरे ये तो एक तरफ नई बात हो रही है। शिया और सुन्नी मिलकर कुछ इल्मी काम करें। कोई प्रोजेक्ट मिलकर चलाएं। यह तो हो नहीं सकता। वो तो ऐसे हैं, वो तो वैसे हैं। ये रिकवरी करने की कोशिश हो रही है। एक एक सिफ से कोई नई चीज इजाद करने की कोशिश है। तो अगर हम लौटे फिर उसी जमाने में मैं एक कुछ जिक्र तेजी से कर लूं। यहां पे बात हमारी हो रही है कि किस तरह के 20वीं सदी में जब हम आते हैं तो आलम इस्लाम के जितने अहम कुतब है अभी तक मैंने जिक्र किया मिस्र का मैंने जिक्र किया इराक का लुबनान का भी जिक्र हो गया मैं जिक्र कर दूं यहां पे ईरान भी एक अहम खुतब है। फिर हिंदुस्तान का भी जिक्र मैं करूंगा। ईरान में भी ईरान में भी बहुत उस जमाने में 20वीं सदी के जो पूरा पीरियड है इससे पहले के इमाम खुमैनी का जिक्र है। इमाम खुनी का मैं अलग जिक्र करूंगा। उससे पहले से बहुत यहां पर तगोदौ नजर आती है। बहुत असरात है। 19 5 से 191 का एक पीरियड ईरान के अंदर है कि जिसको कहा जाता है कॉन्स्टिट्यूशनल रिफॉर्म का एक पीरियड है कि उसकी तारीख बहुत पेचीदा है। लेकिन उसके अंदर एक अहम ड्राइविंग फोर्स यही है कि सैयद जमालुद्दीन की नयत के अफकार रखने वाले ईरानी उलमा जो बड़ी दिलचस्प बात है। बाज ईरान में थे और बाज इराक में रहते थे। लेकिन ईरानी उलमा थे। लेकिन इराक में रहते हुए वो इतने असर अंदाज हो पा रहे थे। यह खुद एक हमारे लिए दिलचस्प ट्लेट है के नेशनल और नेशन स्टेट बॉर्डर्स वो रुकावट नहीं बनते हैं के इस्लामिक वर्ल्ड के दरमियान ये इंटरेक्शन हो सके। जो सबसे इनफ्लुएंशियल फिगर्स थे उस जमाने के ईरान के डेवलपमेंट्स में वो ऐसे फिगर्स थे जो इराक में रहा करते थे। तो ये कॉन्सिट्यूशन रेवोल्यूशन का एक पीरियड है। उसके बाद मुख्तलिफ और डेवलपमेंट्स है। हम देखते हैं कि आगे जाते हैं तो आयतुल्ला काशानी का एक दौर है जिसमें वो 50 और 60 में अहम किरदार अदा कर रहे हैं। शहीद मुतहरी आते हैं 60 और 70 में उसी जमाने में अली शयती साहब का भी एक अहम किरदार है कि उनके कलम का वो जादू उनके बयान में जो वो खुदा ने खास एक तासीर और कुत करार दी थी कि जिसके नतीजे में एक बड़ा तबका ऐसा कि जो आमतौर पर उलमा उनमें असर अंदाज नहीं हो पाते थे क्योंकि वो वोकबरी नहीं होना वो अंदाज नहीं होना उसमें आके वो आते हैं और वो बेदारी का पैगाम वो सेल्फ कॉन्फिडेंस का पैगाम वो इत्तहाद का पैगाम वो अली शरीयती साहब के राइटिंग्स में वो मिलता है हमको जो ईरान में और फिर उसके बाद ईरान के बाहर भी उनकी राइटिंग्स का काफी असर रहता है। तो ईरान के अंदर भी यह सिलसिला अपने तौर पर एक अलग तरीके से चलता हुआ हमको नजर आ रहा है। और यहां पर फिर मैं हिंदुस्तान का जिक्र करना चाहूंगा। तो हिंदुस्तान में भी यह बेदारी की रिवायत ये बेदारी का सिलसिला यह कोई छोटी मोटी कहानी नहीं है। एक बड़ा बड़ी फसल है कि जिसके अंदर जाहिर सी बात है एक बहुत बड़ा नाम जो है वो अल्लामा इकबाल का है। अल्लामा इकबाल का कि अल्लामा इकबाल जो है वो उनको शायर जब कहा जाता है तो शायद एक तरह से उनका उनकी उनका हक अदा नहीं हो रहा है। वो एक मुफकिर थे। वो एक इस्लामी मुफकिर थे जिन्होंने पाया कि शायरी जो है वो उनके लिए बेहतरीन वसीला है इन बातों को बयान करने का और ये भी दिलचस्प है जो इंटरकनेक्टिविटी की बात हो रही है। अल्लामा इकबाल ने जितने शायरी जितने अशार उनके उर्दू में है उससे ज्यादा उनके अशार फारसी में है। ये जो जो सरहद बन गई है कि भाई ये हमारी जुबान है वो उनकी जुबान है। आप अल्लामा इकबाल को आप देखें। अलावा इकबाल जो है वो सैयद जमालुद्दीन से इतना मुतासिर यूरोप में वो एक हद तक तालीम हासिल भी करते हैं और उसके बाद आकर अपने जो इस्लामी मजामीन है वो शायरी में बयान करते हैं फारसी में ज्यादा और उर्दू में कम और जिन्होंने मुवाजना किया है दोनों शायरी का वो लोग एक जो दोनों जबानों पर मुसल्लत है उबूर रखते हैं उनका कहना है कि वो गहराई जो उनके फारसी के अशार में है उन्हीं के आईडियोलॉजी को पेश करने की वो ज्यादा है बनिस्बत उन अशार की जो उर्दू में अशार कहे हैं। उसकी शायद एक वजह ये भी हो सकती है कि उनका जो एमफिल पीएचडी है वो पर्शियन मेटाफिजिक्स में है और जो वहां पे जो वोकैबरी जो वर्ल्ड व्यू जो नंस क्योंकि वो फिलॉसफी का फिक का इरफानियत का जो कंटिन्यूएशन जो वहां रहा वो शायद हमारी तरफ वो कम हो गया। तो उसमें वो कॉम्प्रहेंसिवनेस और शायद यही वजह है कि 79 का जो रेवोल्यूशन है उसमें जो स्टेबिलिटी है वो बनिस्बत जो सुन्नी साइड में जो मूवमेंट्स हुए हैं जिनकी डेरिवेटिव फिलॉसफी सिमिलर वहीं से आ रही है। अलग-अलग जगहों पे जो हम बता रहे हैं कि इंटरेक्शन है। बावजूद उसके कहीं ना कहीं एक क्राइसिस है। तो मेरे हिसाब से तो उसकी कुछ वजूहात आपकी अलग होंगी। मुझे ऐसा लगता है क्योंकि जो ईरान है वो एक तरीके से कंसोलिडेटेड शिया मेजॉरिटी मुल्क होने के वजह से वहां पे बहुत सारा इंस्टीट्यूशनलाइजेशन ऑफ आइडियाज ज्यादा पॉसिबल रहा। सुन्नी वर्ल्ड ज्यादा फ्रेगमेंटेड है। वो ज्यादा जिसे कहते हैं कि एक आप समझ रहे हैं कि वो कॉम्पिटिटिव नेचर ऑफ लोकल कस्टम्स लोकल वो ज्यादा मुतासिर है। लेकिन उसके अलावा भी जो मुझे ऐसा लगता है कि जो सिलसिला फिक का तसव्वफ का और जो सिलसिला होलिस्टिक फ्रेमवर्क का उसकी जो यूनिफाइड फिलॉसफी जो इमर्ज हो पाई वहां पे वो शायद सुन्नी वर्ल्ड में अभी डेवलपमेंट के फेज में है। उसका इशारतन वो चीजें हुई लेकिन अब जैसे जमाते इस्लामी में आप देखेंगे बहुत सारी चीजें हैं। लेकिन वहां पे फिक अंडर डेवलप्ड है। आप देवबंद में बहुत सारी चीजें देखेंगे। लेकिन वहां पे होलिज्म ऑफ लाइफ इन यू नो हर शोबे में वो शायद अंडर डेवलप्ड है। आपको कहीं पे सूफिज्म डेवलप्ड दिखेगा तो दूसरी चीजें अंडर डेवलप्ड दिखेंगी। बनिस्बत इसके जब हम इसको देखते हैं ईरान को एस एन एग्जांपल मैं देखता हूं मेरे अपने वर्ल्ड व्यू में वो वहां पे जो उनकी ऑनटोलॉजी है उनकी एपिस्टमोलॉजी है उनकी मेटाफिजिक्स है उनकी स्पिरिचुअलिटी है वो जो स्ट्रक्चर है और वो जो स्टेट का तसवुर है और जो सिविलाइजेशन का एनालिसिस है वो ज्यादा सिंथेसाइज्ड है। जी मैं शायद आपकी बात से शायद मैं इत्तेफाक रखता हूं और उसकी मैं बस एक मिसाल के तौर पर ये कहना चाहता हूं कि अभी इधर जो शिया वर्ल्ड में जो बड़े-बड़े उलमा गुजरे हैं वो मैं आगे अगर आगे इन पर बात और भी होगी इमाम कुमैनी पर लेकिन मैं मिसाल के तौर पर अगर बस कह दूं के वही शख्सियत फिक में भी अथॉरिटी है जो फलसफे में अथॉरिटी है वही शख्सियत इरफान तसवुफ में भी अथॉरिटी है। वही शख्सियत पिटिकल थरी में भी अथॉरिटी है। और ऐसी एक शख्सियत नहीं इस टाइप की जाम अतराफ या कॉम्प्रहेंसिव शख्सियत शायद एक काबिल तवज्जो तादाद में शिया एकेडमिक रिवायत में उलमा की रिवायत में शायद ज्यादा हमें मिले और शायद ये एक वजह है के इस वक्त जो हम देख रहे हैं कि शिया पार्ट उम्मत का वो गैर मामूली किरदार अदा कर सकता है। मुमकिन है कि उसकी एक वजह इसमें पाई जाती हो। मैं इकबाल की तरफ में क्योंकि जिक्र आया मैं यहां पर एक जुमला पढ़ना चाहूंगा जो मेरे हाथ में एक छोटी सी किताब है। ये जरा बड़ी दिलचस्प बात है वही इंटरकनेक्टिविटी को दिखाने के लिए। ये किताब क्या है? ये एक तकरीर है छोटी सी। तेहरान में इकबाल शनासी के उनवान से इकबालियात के ताल्लुक से एक अहम का्फ्रेंस का इनेकाद होता है और वो प्रेसिडेंट होने के बावजूद इस का्फ्रेंस में शिरकत करते हैं और इसमें तकरीर करते हैं। मैं बस एक दो जुमले उसके मैं पढ़ना चाहूंगा के इससे अंदाजा हो कि वो क्या उन पर असर था इमाम खामनाई पर शहीद इमाम खामनाई पर अल्लामा इकबाल का। पहला जुमला उनका यह है बिस्मिल्लाह के बाद वो कहते हैं मैं फारसी छोटा है फारसी पढ़ता हूं तर्जुमा कर लूंगा इमूज के इन जलसेरा मुशाहद में कुम ये पुर हया जान व खातिर अंगी तरीन रू जिंदगी मनखा कह रहे आज जो मैं इस जलसे में शिरकत कर रहा हूं ये कॉन्फ्रेंस में तकरीर कर रहे हैं तहरान 1980 की है ये जो मैं शिरकत कर रहा हूं आज का ये दिन मेरी पूरी जिंदगी का सबसे बेहतरीन यादों वाला दिन और सबसे ज्यादा एक्साइटमेंट का दिन होने जा रहा है। ये पहला जुमला है उनकी तकरीर का। यानी ये एक शख्स है अल्फाज़ चुने हैं इनके। मैंने कभी भी इनके अल्फाज़ ऐसे नहीं होते थे कि कुछ जज्बात में बोल गए। और आगे जाके एक जगह कहते हैं कहते हैं मैं डायरेक्ट तर्जुमा ही कर लूं। टाइम बचाने के लिए कहते हैं के कहते हैं कि आज जम्हूरिया इस्लामी इस्लामी जम्हूरिया इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ये तजस्सुम आरमाने इकबाल है। यानी इकबाल की जो आरजूएं और तमन्नाएं थी वो जमूरी इस्लामी में मुतजस्सिम हुई है। यानी एंबॉडी हुई है। यानी क्रिस्टलाइज और मैनिफेस्ट हुई है। यहां पर ये जुमला इस्लामिक है। जी बिल्कुल यानी वो कह रहे हैं कि इंकलाब इस्लामी जो ईरानी इंकलाब कहलाया जाता है इनकी निगाह में वो इकबाल की तमन्नाओं का अमली की ताबीरर है। उनके ख्वाब की ताबीरर है ये और अमली इसका जामा है और तजस्सुम है। और आगे कहते हैं के इकबाल की अजमतों के बारे में मुख्तलिफ चीजें कहते हैं। एक बात वो ये इसमें इसी तकरीर में कहते हैं। कहते हैं कि इकबाल गरचे हिंदुस्तान में थे और हिंदुस्तान के फ्रेमवर्क में उनकी बातें थी लेकिन उनके अफकार वो किसी एक मुल्क में महदूद नहीं रह सकते। कहते हैं कि उनकी अजमत के लिए यही काफी है कि उनका जो उनका जो ज़हनी मशला था, उनका जो मशला था, जिससे वो जूझ रहे थे, वो इंसानियत की का ताली और इंसान का ट्रांसेंडेंटल सफर था। उससे कम के उनकी नहीं थी अगर ठीक है उनकी बातें इंडिया के पॉलिटिक्स के तनाजुलर में नेचुरली वो जो जिस जर्फ में इंसान होता है जबान और मकान के ऐतबार से उसकी बातें उसी में आके एक तरह से लगता है कि महदूद है लेकिन वो एक्स उस तरह के इस्तेमाल होते हैं तो वो इंसान वो जब तक एब्स्ट्रक्शन ना करे तब तक वो उसकी यूनिवर्सल्स को नहीं समझ पाता। बिल्कुल ऐसा ही है। बिल्कुल ऐसा ही है। तो इस तकरीर में कई लोगों का जिक्र आता है। इस तकरीर में मैं इशारा बस कर दूं कि इसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद के बारे में शहीद रहबर जिक्र करते हैं। मौलाना मोहम्मद अली जौहर मौलाना शौकत अली मौलाना हत्ता इस तकरीर में और दूसरी जगह पर महमूद उल हसन शेख उल हिंद यानी जो देवबंद के बड़े आलिम है उनका जिक्र आता है। मुख्तलिफ हिंदुस्तान की बड़ी इल्मी शख्सियात का इस तकरीर में और दीगर कई सारी उनकी तकारीर में जिक्र मिलता है के उनका फिर मुआजना करते हैं और जो इकबाल की अल्लामा इकबाल की जो बरतरी पाई जाती है सिलसिले में या उनकी जो खास उनकी जो कुतें पाई जाती है उस पर आके इस तकरीब में मजीद और ये सब सुन्नी ट्रेडिशन सुन्नी उलमा मतलब हालांकि उसको उस तरह नहीं देखना चाहिए लेकिन हम इसलिए बताना चाह रहे हैं कि लोगों को समझना चाहिए एक ये हम सुप्रीम लीडर की बात कर रहे हैं ईरान के और वो अपने वर्ल्ड व्यू पे रहते हुए अपनी अंडरस्टैंडिंग करते हुए वो सेलिब्रेट कर पा रहे हैं या फिर इंटरेक्ट कर पा रहे हैं और मुझे इसी हवाले से शाह वली उल्लाह दहलवी की याद आती है कि एक जमाने में जैसे मुल्ला सदरा का जब हम बात कर रहे थे ना कि ऐसे सिंथेसाइज्ड थिंकर जो फकी भी हैं जो जो फिलॉसफर भी हैं जो सूफी भी हैं जो स्ट्रेटजिस्ट भी हैं जो मिलिट्री स्ट्रेटजिस्ट भी हैं जो इकोनॉमिस्ट भी है जो सोशलिस्टिस्ट भी है जो पॉलीमथ जिसे कह सकते हैं और जिनका मकसद ये था कि वो किस तरह से इवन जो मजाहिब है अगर फलसफा यूनिफाई हो पाए तो जो मज़ाहिब की भी जड़े हैं वो भी यूनिफाई हो सकती हैं। तो उस तरह के लोग शिया ट्रेडिशन में भी मुल्ला सदरा और दीगर और सारे आप बेहतर जानते होंगे। मेरी तो नजर चंद ही लोगों पे जो जिस तरह से मेरी पढ़ने की जरूरत होती है उसी तरह के लोग सामने आते हैं और इधर जैसे शाह साहब भी हैं तो बहुत गहरी जीनियोलॉजी है आइडियाज की और बहुत इंटरेक्टिव है और जब भी मैं इन लोगों को मैं कोशिश करता हूं मैं शाह साहब की कि भाई उनका शियाओं पे क्या व्यू था तो बहुत रिस्पेक्टेबल व्यूज हैं एक दूसरे के ऊपर या उनके इस पे क्या व्यूज थे तो वो ट्रेडिशन बहुत सॉलिड है इंटरेक्टिव ट्रेडिशन बहुत सॉलिड है। बिल्कुल मैं पूरी तरह आपसे मुत्तफिक हूं के ये जो इख्तलाफ और ये जो तसवुर के इख्तलाफ पाया जाता है। ऐसी दरारें हैं जिनको पाटा नहीं जा सकता। ऐसी दीवारें हैं जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता। ये आपको जो पाए की जो शख्सियत हैं उनमें नहीं मिलेंगे। ये तसवुर ये आपको आम लोगों में मिलेंगे या बाज ऐसे इल्मी चेहरा रखने वाली शख्सियात के जो इल्मी ऐतबार से उस मकाम पर नहीं है कि जो हमारे इस्लामी तहजीब तमदुन की जो पहले अव्वल दर्जे की शख्सियात थी उनमें आपको ये चीजें नहीं मिलेगी। तो ये अल्लामा इकबाल का जिक्र कहां से आया? हां हिंदुस्तान में बात हो रही थी कि किस तरह से सैयद जमालुद्दीन की जो जो किरणें थी जो जो ने जो चश्मा वहां से फूटा किस तरह से वो हिंदुस्तान में भी वो जारी हुआ जहां पर अल्लामा इकबाल का जिक्र आया मौलाना अबुल कलाम आजाद का जिक्र यहां बहुत अहम है मौलाना अबुल कलाम आजाद कि आप जो मैं उनके बाज सवालात उठते हैं उनके सियासी मौकिफ को लेकर खासतौर पर उनके जिंदगी के आखिरी 10 20 साल को लेकर मैं फिलहाल उस पर कोई त्सरा नहीं करना चाहता था। लेकिन जहां तक इस्लामी मुफकिर होने के [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐतबार से अगर आप उनके चाहे आप उनकी तफसीर देखें, चाहे उनकी आप तारीर देखें वगैरह एक एक हैरतंगेज इस्तेकाहकाम पाया जाता है। एक अजीब कुत पाई जाती है उस फिक्र में उस नजरिए में उस बयान में हत्ता और वो भी यहां इसी सिलसिले का की कड़ी है अल्लामा मौदूदी। अल्लामा मौदूदी हिंदुस्तान की इतनी अहम इतने अहम मुफकिर इतनी अहम शख्सियत कि जिनका आज तक जो है उनके काम का असर है ये भी मुतासिर है ये सैयद जमालुद्दीन के अफकार से मुतासिर है और उनका जो हुकूमत इलाही और खुदा के का हुक्म होना चाहिए सोसाइटी में बुनियादी तौर पर इस्लामी निजामात होने चाहिए और जब तक निजाम और स्ट्रक्चर यानी वो उनका एक बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन ये देखा जाता है कि जब तक निजाम वो स्ट्रक्चर सही नहीं होगा। आपकी सारी इंडिविजुअल कोशिशें जो है वो बहुत ही लिमिटेड असर लाएंगी। और ये बहुत उनका बड़ा कंट्रीब्यूशन है। अब आकर आप देखें अल्लामा मौदूदी का इंतकाल होता है 1979 में। हम 1979 में उनका इंतकाल होता है फरवरी में 76 में शायद। जी 70 किस में? सिक्स में शायद 76 में शायद। नहीं नहीं 79 में मैं वाकिफ हूं मैं। 1979 में उनका इंतकाल होता है इस्लामी इंकलाब की कामयाबी के चंद महीने बाद और अच्छा बीमार थे वो और इलाज उनका चल रहा था तो जाहिर सी बात है उनकी जी हां हम अमेरिका में थे और उनके उनकी एक्टिविटीज जो थी जाहिर सी बात है कम हो गई थी वो बीमारी और उस सब की वजह से लेकिन उस दौर में आप उनका उनके आखरी पैगाम देखिए जो ईरान में इस्लामी इंकलाब की कामयाबी के बाद उनका पैगाम है कि जिसमें वो किस तरह से कहते हैं कि यह मेरी आरजूओं और तमन्नाओं का एक तरह से यह यह नतीजा यानी मैं देख रहा हूं कि कहीं और मैंने उनकी मेहनत तो बरसगीर में रही थी लेकिन ये वहां पर इस्लामी हुकूमत का कायम होना किस तरह से किन अल्फाज से उसका इस्तकबाल करते या उस जमाने में जो उनके खास साथी हुआ करते थे बाद में पाकिस्तान की जमात इस्लामी के वो हेड भी रहे मियां तफैल मोहम्मद तफेल के वो पहरान का सफर करते हैं। उसी इंकलाब के चंद ही हफ्तों के बाद तेहरान जाते हैं एक वफ के साथ और एक लंबा अरसा यहां पर ईरान में रहते हैं। वही नई ताजा इंकलाबी फजा में और उसके बाद आते हैं और उसके बारे में बयान देते हैं। तर्जुमान बनते हैं। वो बताते हैं क्या उनहीं ने देखा नजदीक से वगैरह। तो ये इंटरेक्शन जो हम देख रहे हैं दोबारा हम बार-बार देख रहे हैं। बार-बार देख रहे हैं कि क्रॉस फर्टिलाइजेशन आप उसको कहे इंटरेक्शन कहे म्यूचुअल सपोर्ट कहे और यहां पर क्योंकि इंकलाब और इमाम हुैनी की बात आ गई। तो यहां पर जो इमाम हुैनी आते हैं इसी सिलसिले में की एक और कड़ी है वो एक निगाह से अगर देखा जाए लेकिन उनका एक इम्तियाज है जो दूसरी शख्सियात से उनको जुदा करता है। मुख्तलिफ करता है। और वो क्या है ये वो हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग के लिए बहुत जरूरी है। देखिए जब से सैयद जमालुद्दीन ने अपने अपने काम को शुरू किया था और उन्हीं ने बहुत जद्दोजहद की और बेदारी पैदा की। उनके बाद उनके शागिर्द चाहे वो बरास्त हो या इनडायरेक्ट शागिर्द हो उन्होंने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। बेदारी को मजीद फैलाया आलम इस्लाम में। लेकिन लेकिन अगर कोई आलम इस्लाम का तायराना जायजा लेता 20वीं सदी में एक बर्ड्स आई व्यू से निगाह करता और कई डेकेड्स को देखता तो वो यही नतीजा लेता के इस्लामी बेदारी आईडियोलॉजिकल बेदारी आलम इस्लाम के एक माइनॉरिटी में माइनॉरिटी यानी एक छोटी तादाद में चाहे वो जो भी आप कह दे एक फीसद दो फीसद 5 फीसद एक खास इंटेलेक्चुअल रिवायत से जुड़े हुए अफराद जो मिस्र में भी है इराक में भी है ईरान में भी है हिंदुस्तान में भी है आप आपके जरिए मुझे इल्म हुआ कि इंडोनेशिया में मोहम्मददिया की जो जड़े हैं वो वहां पर है। मुझे इसका इल्म नहीं था। वहां भी और भी मुख्तलिफ जगहों पर ये आपको मिल रहे हैं। ये ये आपको ग्रुप्स मिल रहे हैं। ये अफराद मिल रहे हैं। इनके अपने टीचिंग है, अपने तरबियत का निजाम है, ट्रेनिंग है। लेकिन ये सोसाइटी के एक छोटे हिस्से पर ही असर अंदाज हो रहे हैं। वहां पर बेदारी हो रही है। जो कि अपने आप में बहुत अहम है। जी। लेकिन अगर लार्जर पिक्चर को देखा जाए तो हां अगर लार्जर पिक्चर को देखा जाए तो इसी 20वीं सदी में कि जहां बेदारी जगह-जगह फैल रही है कोई भी अगर तायराना निगाह रखेगा आलम इस्लाम पर तो वो कहेगा कि इसी दौरान आलम इस्लाम पहले से ज्यादा फ्रैक्चरर्ड और टूटा हुआ हो। इसी दौरान में तो ये सारे मुालिक बनाए गए हैं जो साइकिल इको एग्रीमेंट का जो है उसका उसका नतीजा वो तो इसी जमाने में हुआ है। इसी दौरान भी यही कर रहा था कि जो सुन्नी वर्ल्ड ज्यादा फ्रैक्चर होने की वजह से वो जो 79 का रेवोल्यूशन हो पाया वो यहां पे पॉसिबल ही नहीं हो पाया क्योंकि वो सिस्टमेटाइजेशन का पोटेंशियल ही खत्म हो गया। जी मुमकिन है। तो मैं अर्ज ये कर रहा था कि गरचे बेदारी फैल रही थी लेकिन गुलामी भी फैल रही थी। जी ज्यादा फ्रैक्चरर्ड ज्यादा एक्सप्लइटेड ज्यादा तफका ज्यादा फक्र ज्यादा फेमिन ज्यादा आपसी जंगे सब कुछ बढ़ रहा है इस दौर में तो एक अजीब कंट्राडिक्शन सा नजर आ रहा है के गरचे एक माइनॉरिटी की शक्ल में बेदारी फैलती जा रही है लेकिन जो जनरल सिचुएशन है उम्मत की वो बद से बदतर होती जा रही थी यहां पर आकर हम इमाम हुैनी रहमतुल्लाह का जो यूनिक कंट्रीब्यूशन है या कहे कि खुदा ने उनको इस यूनिक काम के लिए वसीला करार दिया के उन्होंने उनके जरिए पहली बार उम्मत के एक सोसाइटी में एक माशरे में यानी एक जनरल मासेस के एक बड़े ब्लॉक में यानी ईरान ईरान की पूरी सोसाइटी को मोबिलाइज किया जा सका और उस मोबिलाइजेशन के नतीजे में एक हिस्से को एक जजीरे को ही आप सोच ले क्योंकि पूरी दुनिया के हिसाब से देखा जाए तो दुनिया के लैंड मास का 1% है ईरान इस छोटे से हिस्से में दुनिया के अल्लाह अपने आप में एक बड़ा मुल्क है। इस हिस्से में मॉडर्निटी के जो पंजे गढ़े हुए थे उस हाथ को ही काट दिया गया जिसके पंजे गढ़े हुए थे और फिर उसको फेंक दिया गया। इमाम खुैनी मुफकिर होने के एतबार से वो उसी सिलसिले का हिस्सा है कि जो सैयद जमालुद्दीन उसके बाद से शुरू होता है। मुख्तल मुालिक में हमने एक चंद मिसालों को देखा लेकिन उनका यूनिक कंट्रीब्यूशन है के इस फिक्र और इस बेदारी को खास हलकों से निकालकर पूरे पूरे माशरे में आम कर देना और मोबिलाइज कर देना उसके उसकी बुनियाद पर एक पूरे माशरे को और एक बड़ी सियासी और बल्कि तमद्दुनी कामयाबी को यहां पर हासिल करना और यहां से बन जाता है ईरान बेस इस्लाम बेदारी का क्योंकि एक मोबिलाइजेशन की वजह से वो बेस बन जाता है और यहां पर है 1979 की वो बड़ी कामयाबी कि यहां पर फौरन थ्योराइज हो जाता है। पहले से थ्योराइज था यानी उसको प्रैक्टिकल किया जाता है। एक कॉन्स्टिट्यूशन लिखा जाता है। कॉन्स्टिट्यूशन का ऊपर रेफरेंडम होता है। कॉन्सिट्यूशन की जो जो सेंट्रल पिलर है उसका जो उसका जो सुतून है मरकजी सुतून वो शिया इमामत के नजरिए का एक डेरिवेटिव है जिसको विलायत फकी कहा जाता है और इस पर पूरा एक कॉन्स्टिट्यूशन निजाम यहां पर कायम होता है और वो आज तक वो ईरान में जारी है और यहां से जैसे मैंने अर्ज किया के ईरान यहां से बनता है जिसको हम कह सकते हैं अपनी ताबीरों में उुल कुरा यानी सेंटर ऑफ द इस्लाम इस्लामिक बेदारी वर्ल्ड जो है ईरान इस वजह से बनने में कामयाब होता है और ये जब सेंटर बनता है तो यहां से फिर इसके एक्सटेंशन जो है वो रेडिएट करते हैं और यहां से मुख्तलिफ मुतासिर होकर लोग आते हैं और यहां से सबक लेकर मोरल सपोर्ट लेकर मटेरियल सपोर्ट हासिल करके अलग-अलग तरीके के सपोर्ट एकेडमिक और इल्मी सपोर्ट हासिल करके डिप्लोमेटिक सपोर्ट हासिल करके आलम इस्लाम के कुछ हिस्सों में ऐसी बेदारी जो ईरान में बेदारी इमाम हुैनी के जरिए पैदा हुई और ऑपरेशनलाइज हुई, मोबिलाइज हुई वो वहां पर ऑपरेशनलाइज होना शुरू होती है। कि जिसकी जाहिर सी बात है पहली मिसाल हमको [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेबनान का ही जिक्र करना पड़ेगा कि बहुत दिलचस्प है कि लेबनान के में जो हिजबुल्लाह के जब फाउंडिंग ग्रुप आता है कि जिनमें से अब कोई जिंदा नहीं है। सबको शहीद कर दिया गया। जब वो आते हैं इमाम कुमैनी से मिलने ये वो दौर है कि लेबनान में इसराइल काबिज है। लेबनान में बैरूत तक जो है वो इसराइल के कब्जे में ये उस दौर में यहां पर आते हैं। नया नया इंकलाब हुआ है और कहते हैं कि हम चाहते हैं कि अपने मुल्क को आजाद करें। हम चाहते हैं कि एक कुछ जवान शिया तालबेइल्म थे। वो आते हैं मुलाकात करते हैं इमाम खुनी से उस सिलसिले में। तो इमाम खुैनी जो उनसे कहते हैं वो यह कहते हैं के लेबनान वापस जाओ और सिफ्र से काम शुरू करो और खुदा के अलावा किसी से इमदाद की तवकको ना रखो। हत्ता मुझसे भी किसी भी मदद की उम्मीद ना रखो। इस पैगाम के साथ जो है वापस भेजा जाता है शहीद सैयद अब्बास मूसवी और जो दूसरे जो जवान तालब थे उस जमाने में वो आए थे और वहां से बुनियाद पड़ती है हिजबुल्लाह की और हिजबुल्लाह इस वक्त वो कारनामे दिखा रहा है कि दुनिया देख रही है दुनिया हैरान है और इंशा्लाह इसी जंग में हम देखेंगे कि मेरा मेरा तो ये पर्सनली अंदाजा ये है कि पहली वो उम्मत का वो हिस्सा जो फिलिस्तीन को आजाद करने के लिए ऑक्यूपाइड फिलिस्तीन में फौजे भेजने में कामयाब होगा और वो शायद अभी चंद दिन में ही हमें नजर आएगा। वो यही हजबुल्लाह का गुरु है तो हिजबुल्लाह है लेकिन इट्स नॉट लिमिटेड टू हिजबुल्लाह तो आकि भाई ये जो कन्वर्सेशन जो हम लोग अब ले जा रहे हैं वो अब इस पर आ रही है कि एक जो फिक्र थी वो एक पर्टिकुलर ट्रेडिशन में मैनिफेस्ट होती है ईरान के एग्जांपल में और कॉन्टेक्स्ट ये है कि ईरान वो जगह है कि जहां पर अमेरिका ब्रिटिश काबिज है उनके जो रिसोर्सेज हैं उनको कब्जा है वहां पर पपेट गवर्नमेंट पपेट शाह है। वहां पे जब एक कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नेंस आती भी है तो उसको सीआईए किस तरह से हटा देती है। और उस बीच में जो यू नो ग्राउंड लेवल पर मूवमेंट्स हैं उलमा हैं या एकेडमिशियंस हैं या मुफकिरीन हैं। एक तरीके की बेदारी चल रही है ईरान में और वह 79 में आते-आते पहली बार ऐसे होता है जो आपने बोला के इंपीरियल फर्सेस को कंप्लीटली बाहर निकाल के एक अल्टरनेटिव वर्ल्ड एक अल्टरनेटिव सिस्टम ऑफ रनिंग अ नेशन जिसके अपने इंस्टीटश अपनी सोशल यू नो हायरार्की अपना जो एक पूरा एक निजाम अल्टरनेटिव है। अ हालांकि वेस्ट की आपस में भी जंगे रही हैं। जैसे रशिया के साथ है या दूसरी जगह के साथ या चाइना के साथ है। लेकिन यह सब वेस्टर्न मॉडर्निटी का ही प्रोडक्ट है कि मॉडर्निटी इज फाइटिंग अमोंग्स देमसेल्व्स। तो वो एक बार को वो कैपिटलिज्म वर्सेस कम्युनिज्म की तो लड़ाई हो सकती है कि भाई डिस्ट्रीब्यूशन कैसे हो रहा है? कौन सा इलीट है जो पावर को कब्जा कर रहा है? लेकिन पहली बार ऐसा दुनिया के नक्शे पे एक ऐसा देश वजूद में आता है जो अपनी सिविलाइजेशनल इथोस अपनी मोरालिटी को और वो मोरालिटी है कि जिसमें रिीस्ट्रीब्यूशन जिसमें इक्वलिटी जिसमें उसके बावजूद आपकी प्रोग्रेस ये सब स्पिरिचुअल ढांचे के विदिन हो रहा है कि मटेरियल सक्सेस भी है। इसी वजह से हम देखते हैं कि उस ख्ते से आज की डेट में लार्जेस्ट एकेडमिक्स भी मुस्लिम वर्ल्ड में निकल रहे हैं। वह अपनी मिलिटराइजेशन भी कर पा रहे हैं। वो अपनी टेक्नोलॉजी को भी अपलिफ्ट कर पा रहे हैं। यहां तक कि वो जो ट्रैक्टर की जो यहां पे प्रोडक्शन है वो एक्सपोर्ट भी होती है। एक जमाने में जो मैं अभी कुछ दिन पहले देख रहा था कि ईरान से बहुत ज्यादा एक्सपोर्ट चाइना में भी होता है। तो एक इकोनॉमिक सिस्टम जिसको रेजिस्टेंस इकोनॉमिक्स कहा गया वो एक पूरा फ्रेमवर्क ढांचा सामने आया जो रियल क्राइसिस है वेस्टर्न हैजमनी के लिए क्योंकि ये कंप्लीटली न्यू सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग है। ये मॉडर्निटी का एक डिफरेंट जिसे कहते हैं विद इन दी डोमेन ऑफ मॉडर्निटी डिफरेंट ग्रुप्स का एक्सप्रेशन नहीं है। यह पोस्ट मटेरियल या ट्रांसेंडेंटल फिलॉसफी से आने वाले वजूद में एक इक्वलिटी को एस्टैब्लिश करने के लिए एक अच्छाई को इस्टैब्लिश करने के लिए एक बुराई का खात्मा और अच्छाई का वो लाने के लिए एक पहली बार आप जैसे बोल सकते हैं पूरी फोर्स इमर्ज होती है। और यहां से अब यह जो पूरा का पूरा उस इलाके में जो डिफरेंस आता है कि जो आपने बोला कि भ वो एक सेंटर बनता है और वहां फिर से अब हम इस पे आएंगे कि 7 अक्टूबर कि हमास जो है वो एक सुन्नी फोर्स है। अगेन मतलब वी आई आई जस्ट वांट कि कन्वर्सेशन इंटरेक्शन पे वापस मैं इसलिए लाना चाह रहा हूं कि ये मैं चाहता हूं कि व्यूअर्स को ये समझ आए कि कहीं पर अगर रेवोल्यूशन आ भी रहा है। आप उसको सेक्टेरियन लाइंस में देख के आप उससे जुदा हो जा रहे हैं। फॉर एग्जांपल हालांकि ऐसा नहीं है आज की डेट में लेकिन ये एक नैरेटिव पुश किया जाता है। लेकिन उसके बावजूद कि उसके जो रियल मैनिफेस्टेशंस है वो बिय्ड अंडरस्टैंडिंग ऑफ सेक्टेरियन है। वो जो पॉलिटिक्स को भी चेंज कर रहा है। वो पावर रिलेशंस को भी चेंज कर रहा है। वो ऑर्डर को भी चेंज कर रहा है। तो वहां पे यह कैसे होता है और उसमें किस तरह से 79 के बाद जो आप अभी बता ही रहे थे लेकिन मैं इसको जस्ट कॉन्टेक्स्चुअलाइज कर रहा था कि किस तरह से ये जो न्यू फर्सेस इमर्ज होती हैं वो फिर से एक एक्सपेरिमेंट है या एक कोशिश है कि जिसमें वही जो जमालुद्दीन अफगानी की एक बेसिक आईडिया है इत्तेहाद का उसका एक ऐसा मैं उसको यह नहीं बोलूंगा मैं आयतुल्लाह खुमैनी को और जमालुद्दीन अफगानी को जैसा आपने बोला कि वो यूनिक भी है। वो इस तरह यूनिक है जमालुद्दीन अफगानी एक पर्टिकुलर यूनिफाइंग प्रिंसिपल को रख रहे हैं। लेकिन उसके अलावा भी इस्लाम में बहुत कुछ है। मतलब वो यूनिफिकेशन कैसे होगा? उसका आर्डर क्या होगा? समझ रहे हैं कि वो या इकबाल एक तरीके से वो कर रहे हैं। लेकिन आयतुल्लाह खुमेनी तक आतेआते विदिन अ पर्टिकुलर ट्रेडिशन उसका मैनिफेस्टेशन इतना हाई रेजोल्यूशन में और अपनी यूनिकनेस के साथ हो पाना अब उसको एब्स्ट्रैक्ट रियल लाइफ में जो आईआरए इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस का जो नेटवर्क है उसने एज अ रेजिस्टेंस फोर्स कैसे किया? हम उसको अभी फिक के पर्सेक्टिव में नहीं देख रहे हैं। हम उसको अभी तसवुफ के पर्सेक्टिव में नहीं देख रहे हैं। हम अभी उसको देख रहे हैं कि उस इलाके के जो पावर रिलेशंस हैं उसमें आप कैसे इकट्ठे हो रहे हैं और आप अपने ऊपर जो इंपीरियल इंपीरियल फर्सेस हैं जिसका एक यू नो प्रोडक्ट इजराइल इटसेल्फ है कि इट्स एन एक्सटेंशन ऑफ वेस्ट उसको आप आज की डेट में ये नहीं बोल सकते कि भ वो वेस्ट के आउटसाइड एक प्रोडक्ट है। इट्स अ पार्ट ऑफ वेस्टर्न मॉडर्निटी। तो इसको आप अब थोड़ा एक्सप्लेन कीजिए कि ये जो इमरजेंस पोस्ट 79 होता है ये पूरे ऑर्डर को कैसे चेंज करता है। सही आपने जो लेकिन जो इंटरवीन किया और इसको जो हुआ 1979 में और उसके बाद से वो और एक्सपैंड ही कर रहा है। स्ट्रेंथन ही हो रहा है। आपने जो इसको मॉडर्निटी के कंट्रास्ट में पेश किया यह बहुत ही अहम पॉइंट था और मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने इसको एम्फसाइज किया क्योंकि ये मेरी बात में रह गया था एंड इट्सेंट के ये कोई कम्युनिज्म और कैपिटलिज्म का क्लैश नहीं था। ये दो नेशनलिस्ट आईडियोलॉजीस का मुकाबला नहीं था। क्योंकि वो सारे मुकाबले जितने भी अपने सारे वैरायटी के साथ वो सब अल्टीमेटली लार्जर मॉडर्निटी के फ्रेमवर्क के अंदर ही के सारे झगड़े हैं। ये पहली बार एक ऐसा एक ऐसा मूवमेंट जो है वो आता है और वो भी जो उसके उसकी जो कामयाबी और जो उसका इम्तियाज है वो ये कि ये 100 200 लोगों में महदूद नहीं रहता। यह पूरे के पूरे एक मुल्क को इंगेज करता है, मोबिलाइज करता है और कामयाबी तक ले जाता है और वो कामयाबी जो आज 47 साल बाद भी वो कामयाबी कायम और बाकी है [गला साफ़ करने की आवाज़] बल्कि वो फल रही है, फूल रही है और ग्रो कर रही है। यानी कि कामिलन डिफरेंट कि वो जो तौहीदी व्यू पॉइंट है जो इंसान को खलीफतुल्लाह की निगाह से देखता है। इंसान को ट्रांसेंट ट्रांसडेंटल बीइंग के तौर पर देखता है। एक मुताली मौजूद के निगाह से देखता है। उसके बिना पर सियासत को तंजीम करने की कोशिश की गई। उसके बिना पर तालीम को उसके बिना पर मशत इसाद और इकोनॉमिक्स को उसके बिना पर जंग को आप देखिए कहां आपको ये मुल्क मिलेगा कि जो एटम बम बना सकता है सालों से और एटम बम रखने वाले चंद मुल्क मुसलसल धमकी कर रहे हैं कि हम आपको नाबूद कर देंगे। फिर भी वो मुल्क आके फैसला लेता है कि हम एटम बम नहीं बनाएंगे। नहीं बनाएंगे। हम आप लेट्स टेक अ मिनट टू जस्ट थिंक अबाउट दिस। ये कैसे हो सकता है? ये कैसे हो सकता है? क्योंकि जो रूट और मबना है जिसके ऊपर ये बेस्ड है वो ट्रांसेंडेंटल है। वो तौहीदी है। वो ये कह रहा है कि जीत और हार तो खुदा के हाथ में है। हम अगर खुदा की बंदगी करेंगे और इसलिए एटम बम नहीं बनाएंगे तो बंदगी करने की वजह से हमको जीत मिलेगी। ये एटम बम होने या ना होने से थोड़ी कुछ होता है। जी ये ये चीजें किसी वाज में किसी मस्जिद में तकरीर में कह देना और लोगों लोग वाहवाह कर ले एक अलग बात है। और बाकायदा मैदान मुकाबले में अमल पैरा होना इस पर और इसके बावजूद फिर जीतना भी जो अभी देख रहे दुनिया देख रही है किस तरह जीत की जानिब बढ़ा जा रहा है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ये वाकन ये दुनिया के को समझना चाहिए और समझ रहे हैं लोग कि ये कामिलन एक अलग चीज है और उसके कंट्रास्ट में आप वेस्ट को देखें कि जो क्लेम कर रहा है कि हमें ह्यूमैनिटी को डिफेंड करना है। ह्यूमन राइट्स को डिफेंड करना है। और वो लार्ज स्केल जेनोसाइड भी करते हैं और वो बच्चों को भी मारते हैं। बल्कि कल मेरे सामने एक वीडियो आई अ यहां की फिलस्तीन की कि वो एक छोटा सा बच्चा है। उसके वालिद को कुछ चीज कुबूल करवाने के लिए उसके जुर्म को उस बच्चे को टॉर्चर किया जा रहा है। उसके जो 18 महीने का बच्चा आकिफ भाई उसके पैरों में जो जिसे कहते हैं गर्म चिमटे से जख्मी करके आप इस सिविलाइजेशन को क्या कहेंगे? ये जहालत का ये ऑपरेशन के हक दर्जा है और वो हर वक्त दुनिया को यह सिखा रही है कि हम मोरालिटी हम प्रिजर्व करना चाहते हैं और उसके सामने एक ऐसा स्टेट है जो जिसको बोला जा रहा है ये कि ईवल है उसके बावजूद वो अटैक भी कर रहा है तो वो पॉइंटेड टारगेटेड ऑन वेस्ट की जो मिलिट्री की फैसिलिटीज है या जो उनका बैंकिंग का वो निजाम है जो लोगों को लूट रहा है और उसके सामने वो यह बोल इसके बावजूद के उसके पास न्यूक्लियर फैसिलिटीज और न्यूक्लियर वो हैं। उसका सुप्रीम लीडर फतवा दे रहा है। तो ये कंट्रास्ट है। ये सिविलाइजेशनल कंट्रास्ट है इस्लाम और वेस्ट के बीच में कि ताकत होने के बावजूद रेस्टोरेंट है। और वहां पे रेस्टोरेंट का हर वक्त नैरेटिव देने के बावजूद सिर्फ और सिर्फ कत्लोगारत है। छोटे-छोटे बच्चों से। हां बिल्कुल आप सही कह रहे हैं। यही इस जंग के दौरान दुनिया ने देख लिया। इस जंग का आगाज होता है कि ईरान में बच्चियों के स्कूल पर वो हमला होता है। उसका आगाज ही इसी से है और ईरान इतने दिनों में अभी तकरीबन एक महीना होने को आ जाएगा। ईरान ने हजारों की तादाद में मिसाइलें, ड्रोन वगैरह ल्च किए हैं। कहीं से खबर नहीं आई है कि एक स्कूल पे भी लगा हो। एक बच्चा मरा हो, कोई एक स्कूल पे। तो ये जो जो चीज जो फिक्र जो आकर क्रिस्टलाइज हुए 1979 में ईरान में ये वाकयन अपने आप में एक अलग चीज है और ये वही चीज है जिसकी दुनिया को जरूरत है और ये वही चीज है कि दुनिया इसको आज नहीं तो कल इसको अपनी जरूरत के तौर पर पहचानेगी और इसके जानिब बढ़ेगी। जैसे कि अब तक बढ़े हैं और यहां पर हम आ जाते हैं वापस वही के कैसे ये दुनिया में इसका असर फैला 1979 के बाद और आपने अच्छा इंटरवीन किया कि इसकी जो यूनिकनेस है इसकी जो इसके जो इसका जो नेचर और कैरेक्टर इसका यूनिक है इस पर हमें वाक तवरकुस करना चाहिए और गौर करना चाहिए तो उसके बाद मैंने हजबुल्लाह की मिसाल दी लेकिन फिर और जगह भी दूसरी जगह हुआ हम आते हैं जैसे आपने भी कहा कि हम हमा पर बात करते हैं तो बेहतर होगा कि किस तरह से फिलिस्तीनी देखिए फिलिस्तीनी स्ट्रगल कर रहे हैं। अपने फितरत के तकाजों के मुताबिक अपने तहजीब और अपने कल्चर के मुताबिक ये 100 साल हो गए हैं कि ये स्ट्रगल कर रहे हैं। और उस स्ट्रगल में कई कई बहादुरियों का और कुर्बानियों का भी उन्हीं ने मुजाहरा किया है। मैं फिर ये कहना चाहूंगा कि खासतौर पर जो 1930 में जो चंद साल उनकी जो मुजाहिदत रही कि जिसमें शहीद अल कस्साम का जो अहम किरदार रहा जो आलिम दीन थे फिलिस्तनी आलिम दीन थे और आज उनके नाम पर हमास का जो फौजी जो धड़ा है उसका नाम इसी कब इज्जत अल कसाम के उन्हीं के नाम पर है उनका किरदार दूसरे जो फिलिस्तीनी गैर फिलिस्तीनी उलमा का किरदार रहा है सब जो है आप तारीख में दर्ज है फिलिस्तीनी जिहाद चलता रहता है चलता रहता है यहां तक के हम देखते हैं कि एट एट द टर्न ऑफ द 21 सेंचुरी हम देखते हैं कि एक तब्दीली आना शुरू होती है उसमें वो ये है के गजा के मुजाहदीन कि जिसमें शहीद शेख शेख अहमद यासीन का मैं खास तौर पे जिक्र करना चाहूंगा यहां पे के उनके जरिए और बाज दूसरे मुजाहदीन के जरिए राबता बरकरार होता है ईरान के साथ और ईरान का शेख यासीन का सफर होता है। तो शेख यासीन का सफर होता है। ईरान का सफर होता है। उसके वीडियोस 7 अक्टूबर के बाद उसके वीडियोस जो है वो सामने आए हैं। जो उनकी तफसीली मुलाकात रहती है शहीद इमाम खामनाई के साथ और आपसे उनकी गुफ्तगू रहती है। सब रिकॉर्डेड था लेकिन वो जाहिर सी बात है वो राज के तौर पर रखा गया था। लेकिन उन ये 7 अक्टूबर के कुछ अरसे के बाद ये वीडियोस रिलीज हुए हैं और वहां पर यह जो फिलिस्तीनी जो रेजिस्टेंस था खासतौर पर गज्जा का जो यूनिट है सिर्फ हमास नहीं बल्कि और दूसरी भी तंजीम है जो गज्जा में वो अपना कनेक्शन एस्टैब्लिश करते हैं ईरान के साथ इस आलमी इस्लामी मुजाहिमती महाज के साथ इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस के साथ और उससे इंटीग्रेट अपने आप को करते हैं और जिसके नतीजे में जो असरात सामने आते हैं वो आपके असरात सामने हैं के 2000 7 अक्टूबर से पहले 2023 तक 7 अक्टूबर के बाद की हिस्ट्री इतनी ज्यादा ड्रामेटिक है और इतनी ज्यादा अहम है के उससे पहले वाली तारीख पर कुछ पर्दा पड़ गया है। थोड़ा उस पर साया पड़ जाता है। लेकिन अगर आप 2000 67 से लेकर 7 अक्टूबर 2023 से पहले की आप हिस्ट्री देखें तो कई जंगे हैं गज्जा और इसराइल के दरमियान के हर जंग में प्रोग्रेसिवली गज्जा ज्यादा मजबूत और ताकतवर होता हुआ हमको नजर आ रहा है। यहां तक कि 7 अक्टूबर से पहले की जो जंग है जो शायद 2021 या 22 की थी मैं भूल रहा हूं। उस जंग में सीस फायर के टर्म्स हमास डिक्टेट करता है। हमास डिक्टेट करता है। तो इस एतबार से एक बड़ी तब्दीली इस पूरी मुद्दत में आती है। जब यह गज़ा का कनेक्शन बन जाता है इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सिस से। खुलकर कहकर ईरान असलहा देता है। कैसे पहुंचाता है खुदा जानता है। उससे ज्यादा अहम असलहा बनाने की टेक्नोलॉजी और तालीम देता है और इसीलिए उनको खुद मुख्तार कर देता है कि बेसिक हद तक ही सही वो अपने असलहे खुद गज्जा में बनाते हैं और आज तक बना रहे। इस सिलसिले में शहीद कासिम सुलेमानी के सिलसिले में जो गजा के हमास के जो शहीद कायद रहे हैं चाहे वो या सवार रहे हो या दूसरी शख्सियात रहे हो अबू उबैदा रहे हैं। मुख्तलिफ उनके बयानात तफसील के साथ मौजूद है कि किस तरह कासिम सुलेमानी ने और दूसरे ईरान के जो फर्सेस थी उन्होंने किस तरह से किरदार अदा किया गज्जा को सपोर्ट करने में और बेस प्रोवाइड किया और मदद की के उस वक्त फिलिस्तीनी आकर खुद गजा गजावी जो है वो आकर 7 अक्टूबर 2023 का वो अजीम कारनामा अंजाम देते हैं। अजीम कारनामा अंजाम देते हैं। कारनामा फिलिस्तीनियों का है। मैं नहीं चाह रहा उनसे कोई क्रेडिट लिया जाए। लेकिन उस कारनामे की कुत तक उस नुक्त तक पहुंचाने के में इस इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस का जो अहम किरदार रहा है ईरान का हिजबुल्ला का या फिर मैं जिक्र कर दूं यमन का क्योंकि यमन भी शायद कुछ लोगों को गलतफहमी होगी गोया वो शिया कोई हिस्सा है। लेकिन नहीं ऐसा नहीं है। यमन के जो यमन में शिया आज भी शायद चंद पूरे मुल्क में चंद हजार की तादाद में होंगे। यानी पांच 5 6 हजार की तादाद में ये मेरा अंदाजा है पूरे मुल्क में ना होने के बराबर है उस मुल्क में वहां पर उनकी अपनी रिवायत है उनका अपना एक एक पूरे रिवायत है जो उनका ज़दी एक रिवायत है या उसके अलावा जो दूसरे बाज जो है ह वहां पर जो है शाफी वहां पर जो ग्रुप्स पाए जाते हैं वगैरह सब इस पूरे मूवमेंट में शरीक है। लेकिन उनका भी लिंक इस इंटरनेशनल इस रेजिस्टेंस एक्सेस मूवमेंट से कायम होता है। तो इस तरह से 1979 की जो बड़ी कामयाबी है जो ईरान के अंदर हासिल होती है वो फिर इन एलई की शक्ल में जो मुख्तलिफ मुालिक में कि जहां मुख्तलिफ ग्रुप्स बन रहे हैं सुन्नी ग्रुप भी है शिया ग्रुप भी है ये आते हैं और इसको एक एक बैनुल अकवामी और ट्रांसशनल नेटवर्क में तब्दील कर देते हैं। देखिए वैरायटी आप देखिए इनके दरमियान बाद एक वैरायटी का पहलू तो शिया सुन्नी वैरायटी हमास जो है जिहाद इस्लामी है ये सुन्नी है अंसारुल्लाह ये शिया नहीं है सुन्नी ही वर्ल्ड का एक हिस्सा इनको समझा जाएगा बुनियादी तौर पर लेकिन अगर नहीं भी किसी को उसप इलाफ है तो कम से कम शिया शिया तो नहीं है अपने आप में एक तीसरी कैटेगरी को शायद इनको माना जाए तो ये भी वैरायटी है उसके अलावा ये तो शिया सुन्नी वाली वैरायटी हो गई हिजबुल्ला तो जाहिर सी बात है एक शिया ग्रुप है दूसरी बात आप देखिए के हुकूमती ऐतबार से असर और रुसू के ऐतबार से देखिए ईरान में हुकूमत और रेजिस्टेंस मूवमेंट पूरी तरह से कोस्पोंड करते हैं। यानी 100 फीसद ततावुक पाया जाता है। कंप्लीट कोस्पोंडेंस पाया जाता है। लेकिन आप चले जाएं यमन में चले जाए। यमन में एक लेवल आप नीचे आना पड़ेगा आपको। जो रेजिस्टेंस मूवमेंट है वो सना और और नॉर्थ यमन में और बड़े हिस्से में तो हुकूमत उसके इख्तियार में है। लेकिन यमन का बाकी हिस्सा उसके इख्तियार में नहीं है। और जो की हुकूमत है उसको इंटरनेशनल रेग्निशन हासिल नहीं है। आप उसके बाद हिजबुल्ला आ जाए, लेबनान आ जाए तो हिजबुल्ला तो लेबनान में बस दो चार मिनिस्टर की हद तक ही हुकूमत में असर और रुसूख रखते हैं। और हुकूमत तो अब जब से ये जंग शुरू हुई है अभी एक महीने में हुकूमत तो खुलकर हिजबुल्ला के मुखालिफा हो गई है। पूरी तरह उसने ऐलान कर दिया है। यानी बस यही कहना बाकी रह गया है वहां के जो प्राइम मिनिस्टर और दूसरे जिम्मेदार हैं। बस यही कहना बाकी रह गया है कि वो कहे कि भाई हम तो पूरी तरह से अमेरिका और इसराइल के गुलाम और एजेंट है। इस ये कहने के अलावा और जो कुछ वो कह सकते थे वो कर सकते थे। उन कर लिया है पिछले तीन चार हफ्ते में। तो हिजबुल्लाह वहां पर एक पार्ट है सोसाइटी का और हुकूमत के अंदर उसका लिमिटेड इनफ्लुएंस है। काफी कम इनफ्लुएंस है। लेकिन वो अपने तौर पर काम कर रही है। आप यही आ जाए इराक में आ जाए। इराक में जो हश्त शाबी है इराक में हश्त शाबी में भी हुकूमत के साथ जो है वो अप एंड डाउन रिलेशनशिप रहता है। अभी जो हुकूमत अभी जा रही है क्योंकि उसका टर्म खत्म हो गया है। उसके साथ मुश्किल रिलेशंस रहे। लेकिन कभी कभी हुकूमतों के साथ अच्छे भी रिलेशंस रहे तो एक वैरायटी आप देख रहे हैं चाहे शिया सुन्नी के ऐतबार से देख तो आपको वैरायटी नजर आ रही है। अच्छा ये भी मैं बकाय दूं इराक के हश्तो शाबी कोई एक एक फोर्स नहीं है। मुख्तलिफ इसके अंदर टुकड़ियां हैं। जिनमें बहुत सारी शिया बेस टुकड़ियां है। लेकिन इसमें अहले सुन्नत टुकड़ियां भी इराक के अंदर है। हत्ता क्रिश्चियन यूनिट्स भी हैं। हज शाबी के अंदर इराकी क्रिश्चियंस के यूनिट्स भी उसके अंदर पाए जाते हैं। तो वो वैरायटी चाहे वो मसलकी ऐतबार से हो मजहबी एतबार से हो चाहे हुकूमत में कितना असर और रुसूक है उसके ऐतबार से भी मुख्तलिफ कॉन्टेक्स्चुअल सिचुएशनंस में इस मूवमेंट का असर अंदाज हो पाना हम देख रहे हैं कि हमको ये पिछले 30-40 साल की तारीख में मिलता है इस पूरे ख्ते और इलाके में ये जो मूवमेंट है या जिसके रूट्स हैं फिलोसोफिकल वह एक जमाने में एक सर्टेन कॉन्टेक्स्ट में लेट लेट 19थ सेंचुरी में वजूद में इस वजह से आते हैं क्योंकि मुस्लिम वर्ल्ड उस जमाने में एक तरह का फ्रेगमेंटेशन एक तरह का फ्रैक्चर फेस कर रहा है और वो जो कॉलोनियल वेस्टर्न फर्सेस हैं इंपीरियल फोर्सेस हैं वो वहीं से आ रही हैं और उसको एक अर्ली फॉर्म में क्योंकि मॉडर्निटी अपने आप में एज अ फिलॉसफी भी कंप्लीटली मैनिफेस्ट नहीं हुई थी। उसके बाद भी अब तक वो खुलती आई शक्ल वो पोस्ट मॉडर्निटी में दूसरे मुख्तलिफ जो उसके स्ट्रैंड्स हैं वो एक होता है कि एक फलसफे का एक पूरा एक्सप्रेशन जब तक मटेरियलाइज नहीं होता तो बहुत सारी चीजें जैसे हमारे ज्यादातर जो हम जिन लोगों के नाम ले रहे हैं इंडियन कॉन्टेक्स्ट में मौलाना आजाद अल्लामा इकबाल मौलाना मौद ये सब लोग या हुसैन अहमद मदनी नेशन स्टेट को नहीं नेशनलिज्म को क्रिटिक कर रहे थे। लेकिन नेशन स्टेट नेशनलिज्म को किस तरह से मटेरियलाइज करता है अलग-अलग कॉन्टेक्स्ट में वो एक नई रियलिटी होती है प्रोड्यूस तो वो कहीं ना कहीं वो जो रेजोल्यूशन है वो वो भी कंटिन्यू हो रहा है डेवलप होते हुए और हमने वेस्ट के जितने भी पोटेंशियल मैनिफेस्टेशंस हो सकते हैं वो हमने 7 अक्टूबर और अब ईरान की जंग आते-आते उनका एक तरीके से एक पूरा प्ले आउट होते हुए देखा। तो उस कॉन्टेक्स्ट में यह भी बात हुई कि 79 के बाद यह जो पूरा एक बार इंस्टिट्यूशनलाइजेशन जब स्टेट के लेवल पर एक पर्टिकुलर स्टैंड ऑफ फिलॉसफी और उसका पर्टिकुलराइजेशन हो गया है एक पर्टिकुलर ट्रेडिशन में तो वहां से फिर उसका प्रोलिफरेशन हो रहा है और उस प्रो प्रोलिफरेशन में कोई ऐसा नहीं है कि वो एक उसी ट्रेडिशन के कॉन्टेक्स्ट में प्रोलिफरेशन हो रहा है। वह एब्स्ट्रैक्ट किया जा रहा है प्रिंसिपल को। वह उसको एज अ रेवोल्यूशनरी आईडियोलॉजी नॉट जस्ट फॉर आवरसेल्व्स बट फॉर एनीबडी हु वांट्स टू लिव अ डिग्निफाइड लाइफ। हु वांट्स टू लिव एन इंडिपेंडेंट फ्री लाइफ फॉर द पर्पस ऑफ द मासेस। जहां पे जो मासेस हैं वो एक बेहतरीन जिंदगी जिए। जुल्म कम हो, अच्छाई ज्यादा हो। इसके बेसिक टेंप्लेट को सामने रखते हुए। तो इसी को जब मैं अल्लाह के रसूलम की जिंदगी में ट्रेस करने की सीरत नबी में देखने की कोशिश करता हूं तो मक्के से हिजरत करके वो मदीने में आते हैं। वहां मिसाके मदीना होता है और मीसाक मदीना में जो ट्रीटी के होल्डर्स होते हैं वो मुसलमानों के साथ-साथ वो जस भी होते हैं, क्रिश्चियंस भी हो और उसमें स्पेशली जो डिफेंड करने की एक दूसरे को और जो एक दूसरे के जिसे कहते हैं सोवनिटी को डिफेंड करने का जो पूरा का पूरा कॉन्ट्रैक्ट होता है। तो इस्लाम के यहां बावजूद इसके जो हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि डिफरेंस को मेंटेन रखा जाता है कि एक हायरार्की ऑफ मोरालिटी को और उसके क्लेम को मेंटेन रखा जाता है। उसके बावजूद किसी की अच्छाई को जीरो डाउन नहीं किया जाता। आपको बे मिसाल आपको मिसाले मिलेंग कुरान में वो यहूदियों को भी बहुत अच्छी चीजें उनके बारे में बुरी भी कही जाएंगी तो अच्छी भी कही जाएंगी। ईसाइयों के बारे में भी की जाएंगी। औरों के बारे में भी की जाएंगी। सिविलाइजेशनल हिस्ट्री को भी देखा जाएगा। बाकी सारी चीजों को। तो जब हम उसको कॉन्टेक्स्चुअलाइज करते हैं और हम ये देखते हैं कि 20th सेंचुरी में जो डिबेट्स हुई बरे सगीर में हिंदुस्तान में स्पेशली क्योंकि मुझे यहां की डिबेट ज्यादा पता है। हम यहां पे माइनॉरिटी में है और एज अ माइनॉरिटी हम फिक के साथ एंगेज कर रहे हैं और उसको ट्रेस कर रहे हैं प्रोफेटिक लाइफ में। तो इसका मतलब हमारे यहां पोटेंशियल है जो दूसरे ट्रेडिशन की तरह के एक सिंगल पॉइंट ऑफ पॉलिटिकल थॉट नहीं। आप जिस कॉन्टेक्स्ट जिस डेमोग्राफी जिस उसमें उसमें आप बेहतर कैसे बना सकते हैं अपने मुआशरे को आप एबिससीनिया में आपके लोग हिजरत करते हैं तो वहां पे आपको टेरिटोरियल सोवनिटी आपका मकसद नहीं था उसके बाद आप वापस भी आते हैं वहां से तो ये जो पूरा कॉन्टेक्स्ट है कि एब्स्ट्रैक्शन ऑफ रेवोल्यूशन इनू नॉट जस्ट वन काइंड ऑफ डेमोग्राफिक कंपोनेंट के जहां मुसलमान मेजॉरिटी में है जहां और उसमें जहां पे माइनॉरिटी में वहां की जो लोकल रेवोलशंस हैं यहां के जो लोकल यू नो मैस ओरिएंटेड मूवमेंट्स हैं उनके साथ इस तरह के जो इस्लामिक मूवमेंट्स हैं उनका क्या इंटरेक्शन होना चाहिए? हम हर जगह पे द टास्क इज नॉट टू एस्टैब्लिश इन इस्लामिक स्टेट। फॉर एग्जांपल द टास्क इज टू एस्टैब्लिश गुडनेस। द टास्क इज टू एस्टैब्लिश अ बेटर वे ऑफ़ लाइफ। एंड इट कैन हैपन। वो उस वक्त की जो कंडीशनलिटीज है उसको सामने रखते हुए आप बेहतर दौर कैसे लाते हैं? तो वहां पर मैं थोड़ा समझना चाहूंगा डिस्पाइट द फैक्ट दैट लिबरल्स एंड कम्युनिस्ट्स दे कम विद इन द लार्जर पैराडाइम ऑफ़ मॉडर्निटी डिस्पाइट द फैक्ट के हिंदू और मुसलमानों में डिफरेंस होगा खुदा के तस्सवुर को लेके कि एक तरफ तौहीद है तो दूसरी तरफ एक डिफरेंट कंसेप्शन ऑफ गॉड है या बुद्धिज्म में या जैनिज्म में। उसके बावजूद आप यह जानते हुए कि वेस्ट और वेस्ट के इंडिपेंडेंट इंडिविजुअल्स जो एक बेहतर एक मोरल ओरिएंटेड चीज करना चाहते हैं। मतलब ऐसा नहीं है ना कि हम पूरी तरीके से ब्लैंकेट ये बोल सकते हैं कि भ वेस्ट में एवरीबडी इज बैड। देयर इज़ अ बिग पपुलेशन जो इस वॉर के अगेंस्ट है। देयर इज़ अ बिग पपुलेशन जो अगेंस्ट है कि जो इंपीरियल फोर्स या इंपीरियल जो कैरेक्टर है वेस्ट का उसके अगेंस्ट है। हालांकि हां वो उस दर्जे तक नहीं ले जा पा रहे हैं कि मोरल अंडरस्टैंडिंग को। तो कहां पे आके ईरान इस पूरे फ्रेमवर्क में अपने पूरे जो फिक को सामने रखते हुए या उसका एब्स्ट्रक्शन इस्लामिक रेवोल्यूशन में हाउ डस इट मूव बिय्ड नॉट जस्ट मुस्लिम्स अबाउट द इंटरेक्शन बिटवीन मुस्लिम्स एंड द वर्ल्ड अबाउट मुस्लिम्स ऑफरिंग ए पोटेंशियल ऑफ इमेजिनेशन ऑफ अ बेटर वर्ल्ड आप इसको कहां देख रहे हैं और क्या आपको लगता है कि ये मिसाल कायम हो रही है क्या आपको लगता है कि दुनिया इस मिसाल को देख के अपनी तरफ झुक के देख रही है कि कैन वी डू समथिंग लाइक दिस जी आगे के विज़ और आफाक की का मौजू जो आप छेड़ रहे हैं बहुत अहम है और इस जंग की वजह से जो अभी जारी है और जिसमें उम्मत की बड़ी जीत होने वाली है इसकी वजह से सवाल की अहमियत भी बहुत बढ़ जाती है क्योंकि ये जंग जब खत्म होगी और जो जो नया जो वर्ल्ड ऑर्डर इससे उभरेगा इस जंग के खात्मे के बाद से वो इस टाइप के मसाइल को फिर एक एब्स्ट्रैक्ट एक एक महज एक इल्मी और एकेडमिक एक्सरसाइज से एक बहुत ही लाइव मसले में तब्दील करने जा रहा है। अभी जो जंग चल रही है तो इसलिए इस पर गुफ्तगू जो है लाजमी [नाक से की जाने वाली आवाज़] है। देखिए क्योंकि अगर सवाल यह है के जो इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस है जो इस्लामी मुजाहिती महाज है जो ईरान और विलायते फकी के नजरिए के इर्दगिर्द जो मुख्त ये कास्टलेशन है मुख्तलिफ ग्रुप्स का और मैं ये भी ये रह गया मैं इसका जिक्र नहीं हो सका कि सिर्फ ग्रुप्स अभी जिक्र हुआ हब्ुला और अंसारुल्लाह और फलाना फलाना का हमास का याद रहे के इस्लामी मुजामती महाजिस्ट एक्सेस में सिर्फ ये ग्रुप्स नहीं है बल्कि आम लोग भी है। ऑर्डिनरी पपुलेशंस भी है। देखिए ईरान के अंदर गवर्नमेंट है। गवर्नमेंट के साथ-साथ पपुलेशन का बहुत बड़ा हिस्सा। ओवरवेल्मिंग मेजॉरिटी वो इस रेजिस्टेंस एक्सेस का हिस्सा है। हां एक माइनॉरिटी है जो उस तरह से हिस्सा नहीं है। दूसरी जगह भी जब हम जा रहे हैं हिजबुल्लाह को भी जब हम बात करें तो हिजबुल्ला सिर्फ नहीं है। हमास सिर्फ नहीं है। वो पपुलेशंस और वो आबादियां जो इनको सपोर्ट कर रही है। अभी इस जो वो आबादियां गजा की वो आबादी के जिस जो हुआ है गजा में कोई पोशीदा नहीं है। वह आबादी जिसने आज तक यही कहा है कि जो 7 अक्टूबर को हमास ने किया वही सही था और यही जीत का रास्ता है। वो आबादी इस इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सिस का वो आम वो औरतें वो बच्चे हिस्सा है। इसुल्ला में इस वक्त वहां पर लेबलान में इस वक्त जंग चल रही है। आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेघर है। इंटरनली डिस्प्लेस्ड है। 10 दिन पहले की एस्टीमेट था कि उस मुल्क की 20% आबादी इंटरनली डिस्प्लेस हो चुकी है इसी जंग में और अब शायद वो फिगर बढ़ के पता नहीं 30 40 हो चुका होगा। ये आबादी पूरी तरह सपोर्ट कर रही है रेजिस्टेंस को। ये इस रेजिस्टेंस एक्सिस का हिस्सा है। तो ये ग्रुप्स हो या वो आबादी है उम्मत के वो हिस्से जो एक्टिवली सपोर्ट कर रहे हैं। इसके अलावा उम्मत तकरीबन बाकी पूरी उम्मत सिंपथाइजर की हैसियत तो रखती है लेकिन वो हिस्सा जो कीमत अदा करके सपोर्ट कर रहा है वो इस एक्सिस का हिस्सा है ना सिर्फ सपोर्टर है। तो इस क्लेरिफिकेशन के साथ आपका सवाल यह है कि कैसे हम इसको ऐसे कॉन्टेक्स्ट में इसमें इसको असर अंदाज हो सकता है ये ये एक्सेस जहां पर मुख्तलिफ मसालिक के लोग हो मुख्तलिफ मज़ाहिब के लोग हो मुसलमान माइनॉरिटी में हो नॉन मुस्लिम्स वहां बड़ी तादाद में हो चाहे मेजॉरिटी या माइनॉरिटी कैसे उस कॉन्टेक्स्ट में हो सकता है तो बहुत शॉर्ट में तो इसका जवाब ये होगा कि इस्लाम क्योंकि बुनियादी तौर पर पूरी पूरी इंसानियत को निजात देने के लिए है। इस्लाम की अगर आजकल की मैं लैंग्वेज यूज़ करूं तो इस्लाम की सॉफ्टवेयर में वो सारी वो चीजें मौजूद है जो मुख्तलिफ अलग-अलग कॉन्टेक्स्ट में कामयाब होने के लिए लाजमी और जरूरी है। चाहे वो एक मसलक हो, चंद मसलों को हो, मुस्लिम माइनॉरिटी हो, मुस्लिम मेजॉरिटी हो। कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से डिटरमिन हुआ। आपने भी अपने बयान में कुछ मिसाले दी के जब हबशा गए थे तो वहां पर क्या कॉन्टेक्स्ट इस्तेमाल किया गया? मक्के में जब कमजोरी का दौर था तो क्या किया गया? मदीने में क्या किया गया? फतेह मक्का के से पहले क्या हुआ? फतेह मक्का के बाद क्या हुआ? कॉन्टेक्स्ट बदलते गए। हर एतबार से वही रेजिस्टेंस का मूवमेंट आगे बढ़ता गया और अपने आप को अपग्रेड करता गया, अडप्ट करता गया कॉन्टेक्स्ट में। अब ये एब्स्ट्रैक्ट बातों से आके मैं कुछ प्रैक्टिकल बातों का जिक्र करूं। ऑलरेडी जो इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्सेस है जो 1979 से एंकर हुआ है ईरान में उसने अमली तौर पर दिखाया है कि किस तरह उसके अंदर यह कैपेसिटी मौजूद है। अगर हम बात करें तो हिजबुल्ला की पहले एक मिसाल ले लें। हिजबुल्ला एक ऐसी कंट्री में ऑपरेट करता है कि जहां पर ऑफिशियल डाटा के हिसाब से शिया वहां माइनॉरिटी में है और वहां पर एक बड़ी तादाद में अहले सुन्नत और क्रिश्चियंस पाए जाते हैं। लेकिन उस कॉन्टेक्स्ट के अंदर तमाम ओपिनियन पोल्स दिखा रहे हैं कि आम सुन्नी और आम क्रिश्चियंस हिजबुल्लाह के बारे में बहुत पॉजिटिव व्यू रखते हैं। कहते हैं हमारे मुल्क के लिए, हमारे लिए, हमारे दफा के लिए यह सबसे अहम अफराद है। तो दिस इस समथिंग जो वहां अचीव किया गया है। वहां पर इतना पावर होने के बावजूद हजबुल्ला ने पॉलिटिक्स में अपने लिए एक छोटा किरदार रखा है डेलीबेटली। जबकि उनका अगर जोर जबरदस्ती पर आए तो उससे ज्यादा वो हासिल कर सकते। क्यों? क्योंकि वो जो हायर विजन है जो बेदारी होनी है तो तमाम इंसानों के दरमियान उसके लिए मोजिर है कि इस तरह से जोर जबरदस्ती के तहत कोई पिटिकल पावर हासिल किया जाए तो इसलिए उन्होंने लिमिट किया है। कुर्बानी वो दे रहे हैं। मैं कह रहा हूं मुल्क का जो है 20 फीसद आबादी जो है 28 फरवरी के बाद 20 फीसद आबादी लेबनान की डिस्प्लेस हो गई है। लेकिन अगर आप लेबनान के शियों को देखें तो उनकी 40 से 50 फीसद आबादी डिस्प्लेस हुई है। क्योंकि ये जो 20% फिगर है ये हाइड करता है इस बात को कि किस रीजन में डिस्प्लेसमेंट हुआ है। शिया पपुलेटेड रीजंस में डिस्प्लेसमेंट हो लेकिन वो इसको इशू नहीं बनाते हैं। तो वो फ्लेक्सिबिलिटी वो सदर वो इस मूवमेंट के अंदर क्योंकि वहां मैं फिर इंसिस्ट कर रहा हूं कि हिजबुल्ला को जो सपोर्ट करने वाले लेबनीज़ है शिया और गैर शिया वो इस रेजिस्टेंस एक्सेस का हिस्सा है। दे आर नॉट सिंपली सिंपथाइज अस तो वो ऑलरेडी डेमोंस्ट्रेट कर रहे हैं कि वो किस तरह मुख्तलिफ कॉन्टेक्स्ट में ऑपरेट कर सकते हैं। आउटलुक और विज़ इसके लीडरशिप का हमेशा आलमी रहा है। क्यों? क्योंकि इस्लाम का विज़ आलमियत में कुरान कहता है कुम खैर उम्मत उज्नास ठीक तामरुना बिल मारूफ त मुनकर अम्र बिल मारूफ न मुनकर पूरे पूरी ह्यूमैनिटी केियास में और फ्रेमवर्क में अंजाम देने का विज़ देता है इस्लाम मुसलमानों को खैरे उम्मतन के ऐतबार से तो वो विज़ जो है वो इस लीडरशिप में क्योंकि मैं गुफ्तगू आखिर के नजदीक आ रही मैं बस ये बता दूं कि 19 68 में ये किताब ईरान में पब्लिश हुई। मैं बस दिखाना चाह रहा हूं ये विज़ किस तरह से यूनिवर्सल है। ये किताब है जो तेहरान में पब्लिश हुई 1968 में। उसकी ये कॉपी मेरे हाथ में यहां पर है। इस किताब का नाम है इसका तर्जुमा है के इंडिया के इंडिपेंडेंस मूवमेंट में मुसलमानों का किरदार। क्या आप बता सकते हैं इसके राइटर कौन है? इसके राइटर है सैयद अली खामिनाई। शहीद इमाम खामिनाई 10 इयर्स बिफोर द विक्ट्री ऑफ इस्लामिक रेवोल्यूशन इन ईरान ये किताब उनहीं ने लिखी है कि जिसके अंदर वो गहरा एक अपना तजिया पेश करते हैं कि हिंदुस्तान में जो ब्रिटिश एंटी ब्रिटिश जो मूवमेंट था उसमें मुसलमानों का क्या किरदार था उसका एक जायजा लेते और भी दिलचस्प इतना ज्यादा खुद अपना नहीं मुझे वो याद आ गया जो आप पहले बता रहे थे कॉन्फ्रेंस के हवाले से वो तो इसी वजह से शायद उनका गहरा मुताला था कि भाई अलग-अलग जो लोग हैं डिफरेंट मुख्तलिफ उनके क्या पॉइंट्स ऑफ व्यूज थे। तो उन्होंने एक्चुअली उसको पूरा स्टडी किया है। जी बिल्कुल। यानी दिस इज ये इंकलाब से 10 साल पहले ये पब्लिश की गई है किताब ये लिखा हुआ है। यहां पे उनका नाम इस पर लिखा हुआ है। तो ये तो अपने आप में खुद ही दिलचस्प बात है ना कि किस तरह से एक ईरानी एक मुफकिर एक आलिम दीन वो हिंदुस्तान के बारे में गहरी स्टडी रख रहा है। अच्छा और भी इसमें दिलचस्प ये किताब स्टार्ट कैसे होती है? यह अल अजहर के एक आलिम जो हिंदुस्तान में आकर दारुल उलूम में कुछ वक्त गुजारते हैं। दारुल उलूम देवबंद में कुछ वक्त गुजारते हैं। जिनका नाम था शेख अनमर। वो एक किताब लिखते हैं इसी टॉपिक पर। शहीद रहबर इमाम खामनाई इस किताब को जब अरबी में पढ़ते हैं तो कहते हैं ये तो बड़ी काम की किताब है। कहते हैं मैं इसको तर्जुमा करना चाहता हूं ताकि ईरानियों को पता चले। जब तर्जुमा करने बैठते हैं तो उसमें वो इतना अपने तौर पर इतना इसमें इजाफा करते हैं कि वो किताब का साइज डबल हो जाता है। इसीलिए यह जब पब्लिश होती है यहां पर तो लिखा है तर्जुमे व ताली यानी ट्रांसलेशन एंड ऑथरशिप दोनों सैयद अली खामिनाई यहां पर किताब पे लिखा है 1969 की किताब वो इंटरकनेक्टिविटी आप देखें अल अजहर के साथ देवबंद और उसमें इमाम खामनाई एक तीसरा कोना बन जाता है इस पूरी चीज का कितना इंटरेस्टिंग है और ये भी मैं इसमें ऐड कर लूं के शहीद इमाम खामनाई ने सैयद कुतब रहमतुल्लाह अलह की दो किताबों को फारसी में तर्जुमा किया सैयद कुत और बड़े मुतासिर थे उनके अफकार से बहुत पसंद करते थे उनका खास तौर पर जो जाहिलियत के ताल्लुक से जो उन्हीं ने बातें कही है आप उनकी अकासी इमाम खामनाई की बाज बातों में आप देखेंगे उस अकासी को इसको आके वो कहते हैं जिस तरह से मैंने उस दूसरी तकरीर में कहा कहते हैं कि जम्हूरिया इस्लामी वो इकबाल के ख्वाब की ताबीरर है। एक जगह और कहते हैं कि सैयद कुतब की जो तमन्ना और आरजू थी जमूरिया इस्लामी ईरान दर हकीकत उसको जो है मुकक कर रही है और उसको मैनिफेस्ट कर रही है। मैं आपके कनेक्शन अपने पर्सेक्टिव से बताता हूं। आपने बोला कि एक अलहजर देवबंद आयतुल्लाह खाम नहीं। दूसरी तरफ ये वाला जो अल्लामा इकबाल तीसरी तरफ सैयद कुतुब सैयद कुतुब को जब फांसी की सजा दी गई तो इजिप्शन कोर्ट बोलता है क्या तुम मौलाना मौदूदी के खुदबात पढ़ते हो? वो उनकी राइटिंग्स पढ़ते हो और वह खुद सैयद कुतुब जो है वो मुस्लिम ब्रदरहुड हसन अल बन्ना और यहां पे जमाल ये जो पूरा इंक्लूडिंग देव इंक्लूडिंग मतलब जो आपस में भी डिफरेंट लग रहे हैं जो आपस में भी वो भी कंप्लीटली इंटरइंड नेटवर्क ऑफ आइडियाज और इंगेजमेंट्स हैं कि वो सैयद कुतुब यू नो मौदूदियन थॉट को इंट्रोड्यूस कर रहे हैं इन अ स्ट्रक्चरर्ड फॉर्म इन यू नो द ब्रदरहुड मूवमेंट और तो मतलब वेरी इंटरेस्टिंग आई एम जस्ट ट्राइंग टू आप जो बोल रहे हैं जो मुझे अंदाजा है उसको मैं आई एम जस्ट ट्राइंग टू कनेक्ट जी बिल्कुल तो इस इस ताल्लुक से क्योंकि इस मूवमेंट का विज़न वही विज़न है जो इस्लाम का विज़न है यानी ये ये मूवमेंट ये मैनिफेस्टेशन है क्रिस्टलाइजेशन है इस्लाम का हमारे दौर में एक खास टाइम और स्पेस के फ्रेमवर्क में जमानो मकान जमानो मकान के खास उसमें यह इस वक्त जो है जलवागर है, मुतबविर है, क्रिस्टलाइज हुई है। तो इसलिए हम क्योंकि इस्लाम के अंदर बुनियादी तौर पर वो कैपेसिटी पाई जाती है कि वो मुख्तलिफ कॉन्टेक्स्ट में वो आगे बढ़े। इसलिए पूरे इत्मीनान और कॉन्फिडेंस के साथ कहा जा सकता है कि यह मूवमेंट में भी वही कुत पाई जाती है। और याद रखिए इस मूवमेंट की लीडरशिप बुनियादी तौर पर एक इस्लामिक एक्सपर्ट के हाथ में है। यहां [गला साफ़ करने की आवाज़] पर मैं वही विलायत फकी के की बात को भी मैं वाजे कर दूं। यह पूरा मूवमेंट रेजिस्टेंस एक्सेस इसमें सरपरस्ती और रहबरी जो है वो एक इस्लामिक जुरिस प्रूडेंट के हाथ में है। एक जमाने में वो इमाम कुमैनी थे। फिर उसके बाद शहीद इमाम खामना ही हुए। और अब जो है वो इमाम मुजबा खामिनाई यानी हाईली क्वालिफाइड इस्लामिक जरिस प्रूडेंट के इख्तियार में ये बात है। तो क्योंकि ये तमा अभी बहुत दिलचस्प बात है। पता नहीं उस वक्त मौका मिला कि नहीं बल्कि दो अब तक जो रिटन स्टेटमेंट्स आ चुके हैं मुस्तफा खामना आयतुल्ला मुस्तफा खामनाई के उसमें उनहीं ने जिस अंदाज से दूसरे मुालिक में जो पाए जाने वाले ग्रुप्स की गुफ्तगू की है वो एक स्टेप फॉरवर्ड है। दूसरे मुालिक में ग्रुप्स और सोसाइटीज की बात की है। वो एक स्टेप फॉरवर्ड है उनके शहीद वालिद से के उनके शहीद वालिद के बयान में आपको मिलेगा कि ईरान के बारे में बात हो रही है। फिर थोड़ा सा चेंज होके लैंग्वेज स्लाइटली चेंज होके तारीफ हो रही है। दूसरे जो रेजिस्टेंस सोसाइटीज और ग्रुप्स हैं। लेकिन आयतुल्ला मुजबा खामनाई के दो बयान में मैंने नोटिस किया कि एक स्टेप फॉरवर्ड हुई ये बात कि एक ही जुमले में मिलकर साथ में दोनों को डील किया जा रहा है। यानी वो इंटीग्रेशन बढ़ा भी है 7 अक्टूबर के बाद से और इस जंग के बाद से और वो कॉन्फिडेंस के जो ऑलरेडी हाई लेवल ऑफ इंटीग्रेशन मौजूद था जो ट्रांसेंड करता है मसलकी दीवारों को नेशनलिस्ट बॉर्डर्स को उसको बयान करने का कॉन्फिडेंस भी बढ़ गया है। ये एहसास हो रहा है कि दुनिया एक नए फ में अब आ रही है और वो हकायक जो पहले थोड़ा सा संभाल के लिहाज करके बयान करने होते थे उनको अब उतना लिहाज करने की जरूरत नहीं है और वो यूनिवर्सलिस्ट वो उम्मती जो हकायक है ऑलरेडी जिस हद तक हासिल हुए अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हुए लेकिन जिस हद तक हासिल हुए हैं अवलन तो वो पहले के मुकाबले में ज्यादा दिन-ब दिन और हासिल हो रहे हैं और जितना हासिल हुए हैं उनको और जाहिर भी किया जा रहा है यह बयान में यह फर्क मैं महसूस कर रहा हूं। तो वो पोटेंशियल पाया जाता है। हत्ता हमारे हिंदुस्तान के अंदर भी वो पोटेंशियल वो पाया जाता है के किस तरह दूसरों के साथ क्योंकि जाहिर सी बात है इस्लाम की जो है वो आम इंसानों से कोई दुश्मनी नहीं है। बल्कि आम इंसानों को लेकर शदीद हमदर्दी है। मोहब्बत है। शुरू से ये रहा है। उनके बनिस्बत हमदर्दी है। उनके बनिस्बत जो है दिलसूजी है। और हर जगह के माहौल के हिसाब से उनके साथ कोऑपरेट करने की सलाहियत पाई जाती है। लेकिन ये वाज़ है जो जो फिक्री और आईडियोलॉजिकल लीडरशिप वो इस्लाम के पास है जो सरमाया असासा एसेट्स इस्लाम के पास है लीड करने के लिए हमें ये भी हमारे लिए ये भी वाज़ होना चाहिए वो रिप्लेसेबल नहीं है कि हम कहे कि चलो ठीक है फला जगह जो है वो कम्युनिस्ट हमें लीड कर लेंगे हम उनको फॉलो कर ले फला जगह जो है वो बुद्धिस्ट हमको लीड कर लेंगे फॉलो फॉलो कर ले नहीं ये नहीं हो सकता ये प्रैक्टिकल नहीं है एक्चुअल लीडरशिप और यहां पर मेरे मुराद जो है वो वो ऑफिशियल लीडरशिप नहीं है कि हर चीज का प्रेसिडेंट जो है वो मुसलमान ही होना चाहिए हर जगह का जनरल सेक्रेटरी मुसलमान होना चाहिए नहीं ये बात नहीं एक्चुअल जो फिक्री लीडरशिप होती है चाहे पोस्ट पर दूसरे अफराद जी जी चाहे मुख्तलिफ पोस्टों पर ओदों पर मुख्तलिफ अफराद हो वहां के हालात के हिसाब से लेकिन जो एक्चुअल जो जहद देही है, जो रोल मॉडलिंग है, जो डायरेक्शन प्रोवाइड करने की जो कुवत है, वो बुनियादी तौर पर उसी के पास हो सकती है जिसके पास सबसे ज्यादा कुत [गला साफ़ करने की आवाज़] और ताकत है फिक्री एतबार से, आईडियोलॉजिकल ऐतबार से और जाहिर सी बात है कि तौहीद के मानने वालों के अलावा जिनका आज वैनगार्ड है इस्लामिक रेजिस्टेंस मूवमेंट इनके इनकी जितनी ताकत तो दूरदूर तक और किसी के पास ना है ना हो सकती है क्योंकि क्योंकि हमारा ये मानना है ऑब्जेक्टिव बुनियादों पर के ऑब्जेक्टिव इवैल्यूएशन के एतबार से हक जो है वो इसी तौहीदी इस्लामी ही जरियान में और मकतब में पाया जाता है। जी मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] ये हमारे वालिद साहब जो इसको बोलते हैं वो अप्लाइड इस्लामिक्स बोलते हैं कि इस्लाम के जो बुनियादी मकासिद हैं वो डिस्पाइट ऑफ मतलब जो लेयरिंग्स है उसमें जरूरी नहीं है कि जैसे फॉर एग्जांपल जकात की बात है तो उन्होंने बोलना शुरू करा कि भ आप एक डिफरेंट काइंड ऑफ पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशन में या इकोनमिक ऑर्गेनाइजेशन में उसको वेल्थ टैक्स भी कह सकते हैं और उसकी जो प्रिंसिपल्ड नेचर है कि किस पे हो रहा है क्या हिसाब है। आप उसको प्रोपगेट कीजिए। आप उसको ये मत यू नो लोगों को कन्विंस करने की कोशिश कीजिए कि आप जब मुसलमान हो जाएंगे जभी आप इन चीजों की अच्छाइयों को या उसको समझ सकते हैं तो वो जो नेचर है कि भ बाय आपकी जो आईडियोलॉजी है या जो आपकी जो फिक्र है वो अगर अल्लाह के रसूल ससल्लम अगर मदीने में जाके मार्केट बना रहे हैं तो वहां पे दूसरे लोगों को भी उससे फायदा हो रहा है। जो उसके रिलेशंस जो उसकी स्ट्रक्चर से जो जिस तरह की वजूद में आती है प्रोग्रेस तो वहां पे ये जरूरी है कि आपकी आइडियोलॉजिकल एंपावरमेंट इतनी स्ट्रांग हो कि आप ये बता सके कि आइडियल क्या होगा और वो सिर्फ आइडियल नहीं है। वो जमीन पे शक्ल कैसे लेगा? उसकी पॉलिसी क्या होगी? बावजूद इसके कि आपके पास जरूरी नहीं है कि आपके पास पॉलिटिकल पावर हो। आपके पास दूसरी पावर हो। लेकिन लोग जैसे कंसलटेंसी भी कर सकते हैं कि भ देखिए इनके पास इतना जबरदस्त मॉडल है और ये मॉडल से ये देखिए ये चीज अचीव होती है और ये चीज अचीव होने वाली है और फिर लोग उसको अगर पसंद करते हैं किसी चीज को तो फिर लोग उसको उसकी तरफ ज्यादा तवज्जो भी होता है उसके साथ उसकी तरफ उसकी निस्बत भी बढ़ती है और वो कबूल भी करते हैं। तो आकि भाई बहुत शुक्रिया मैं एक जमाने से चाह रहा था कि इस तरह की गुफ्तगू हो। यह स्पेशली समझने की कोशिश हो के यह तो हम लोग समझते हैं कि इस तरह की चीजें इस वक्त दुनिया में हो रही हैं। ईरान ये कर रहा है। हिजबुल्ला ये कर रहा है। लेबनान में ये है। यू नो हमास गजा पट्टी में ये हो रहा है। वेस्ट बैंक में हिंदुस्तान में ये था। लेकिन वो जो एक दो 250 साल 300 साल और जो फिक्र और उसके अंदर इंटरकनेक्शन और वो एज अ यूनिट एक कंपोजिट यूनिट जो हमारा लाइफ है जो अभी भी है जो पहले भी था और जो आगे भी होगा उसको उस जो हर तरह का सेक्टेरियनिज्म है ये मैं मजाहिब और मसलकी सेक्टेरिनिज्म से हटके पॉलिटिकल जियोपॉलिटिकल हर तरीके से वो लेयरिंग को जब आप बॉक्सिंग लोगों के लगाने लगते हैं तो जो वाज़ चीजें भी होती है जिससे वो इमोशनली कनेक्ट हो रहे होते वो उसको आईडियोलॉजिकली और वो उसको रैशनली कंसीव नहीं कर पाते तो कॉग्निटिव डिसोनेंस होता है तो दूरी इख्तियार करते हैं। हालांकि बहुत समझ आने वाली बात होती है। तो ये मैं अक्सर देखता हूं तो उस उस वजह से मुझे लगता है कि इस तरह की डायलॉग्स विद इन मुस्लिम वर्ल्ड भी होने चाहिए। हमारे डायलॉग्स बिय्ड मुस्लिम वर्ल्ड भी होने चाहिए कि इन चीजों पे हम लोगों के साथ अब मान लीजिए फॉर एग्जांपल लेफ्ट के लोग हैं तो वो कहीं ना कहीं इनकलिटी के बारे में बात करते हैं तो हम उनको इनफॉर्म कर सकते हैं कि भाई इनकलिटी जिस तरह से आप पेश कर रहे हैं उसका एक बेहतर अल्टरनेटिव ये भी है और उसका स्यूशन आप आप समझे कि जो आप अचीव करना चाहते हैं वो देखिए ये हम आपको स्यूशन दे रहे हैं। अगर आप चॉइससेस बढ़ाने की जो लेजिटमेट चॉइस है जो इंसान को दुनिया को बर्बाद ना करें उसको अगर बढ़ाने की बात है तो सबसे ज्यादा लिबरल हो सकता इस्लाम है जो बेस्ट पॉसिबल चॉइससेस दुनिया को फराहम करता है। अगर आप कॉन्स्टिट्यूशनलिटी की बात करें तो जो सबसे प्रिस्टीन कॉन्स्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर है वो आपको यहां पे मिलता है। तो वो वोकैबलरी हम ज कर सकते हैं जब इस तरह के इंगेजमेंट होंगे। जब इस तरह के डायलॉग्स होंगे जब हम डिफरेंस को समझने के से ज्यादा हम कॉमनैलिटीज को समझे और फिर डिफरेंस को वहां से करें। जब एक बार आप किसी को कॉमनलिटी के बेस पर इंट्रोड्यूस कर देते हैं तो आपके लिए उसका दिल नरम हो जाता है। जब खामई साहब इकबाल को कोट कर देते हैं जो जितने इकबाल को पसंद करने वाले सुन्नी हजरात हैं उनका दिल नरम हो जाता है कि कौन सी शख्सियत है जो इतने बड़े मुल्क का सरबरा था जिसने पूरा सुप्रीम लीडर था जो शियत को रिप्रेजेंट करता है उसके बावजूद वो इनकी बात कर सकता है आप समझ रहे हैं कि वो इसका मतलब ये नहीं है कि हर चीज में आपको हर डिफरेंस को कोलैप्स करना है लेकिन वहीं से एक म्यूचुअल डिस्कशन एक प्रोग्रेस हो सकती है जो कम्युनिटी को जरूरत है तो बहुत शुक्रिया आपने वक्त वक्त निकाला आपने। हमने बहुत कोशिश करी बीच-बीच में नेटवर्क के इश्यूज थे और उसके बावजूद यह कोशिश हुई कि यह डिस्कशन हो और मुझे लगता है हमें और करने चाहिए। बहुत सारी ऐसी चीजें हैं क्योंकि एक दो ढाई घंटे में तो मोटा-मोटा बहुत सारी चीजों पर बात हो सकती है। लेकिन इसको हम एक सिलसिले में बदलें। महीने दो महीने तीन महीने में कुछ टॉपिक को उठा के उस पर गुफ्तगू की जाए। लोगों को सामने चीजें रखी जाए बेहतर अंदाज। बहुत शुक्रिया।

Companion article

Two Worldviews, One Older Argument

Most conversations about Iran, Hezbollah, Hamas and the network they anchor treat the subject as pure geopolitics: alliances, missiles, sanctions, proxies. Syed Akif Zaidi, an Indian-born scholar who has lived and taught in the seminary city of Qom for two decades, argues that this misses the deeper current running beneath the politics. Zaidi, who was born and raised in Mumbai and now teaches fiqh, legal theory and history at Qom's Hawza, frames the present moment as a contest between two worldviews — one that makes the human being the measure of right and wrong, and one that keeps God at the centre of that judgment. That framing sets up the conversation's real subject: a single current of ideas, incubated across two and a half centuries, that runs through Sunni and Shia thinkers alike and eventually crystallised as the Islamic Republic of Iran.

What makes this genealogy worth tracing on its own terms is that it refuses to sit inside the sectarian boxes it is usually read through. The thinkers, books and institutions Zaidi walks through move constantly between Cairo, Beirut, Najaf, Delhi and Tehran, and between Sunni and Shia scholarship, long before anyone speaks of an "axis of resistance." Recovering that thread is the purpose of this piece.

The Man Everyone Claims: Jamaluddin al-Afghani

Zaidi's account begins in the second half of the nineteenth century, after the Muslim world's political and military defeat before European colonialism was more or less complete — a defeat he dates symbolically to the British East India Company's 1757 victory at Plassey over the Nawab of Bengal, and consolidated by the time of 1857. Out of that despair emerged, in Zaidi's telling, the pivotal figure of the entire modern awakening: Sayyid Jamaluddin, known variously as al-Afghani, al-Asadabadi and by several other nisbas. Every community wants to own him, Zaidi notes — Afghans call him theirs, Iranians call him theirs, Shias and Sunnis each claim him as their own.

Over roughly four decades of ceaseless travel — Istanbul, Kabul, Cairo, London, Paris, and by his own account three separate visits to India, where he spent time in Mumbai, Hyderabad and Calcutta and interacted in Delhi with the household of Shah Waliullah Dehlavi — Afghani pressed three arguments that Zaidi treats as the seeds of everything that follows. First, that the real adversary was not one Muslim court against another but the encroaching civilisational force of Western modernity itself. Second, that the contest was fundamentally intellectual before it was military: no alliance or army would matter, Zaidi paraphrases him, if Muslims had not first renewed themselves in the world of ideas. Third, that sectarian and communal division among Muslims was, in his own word, a cancer — and that unity across schools of law was the precondition for meeting the challenge at all. Afghani rejected equally the option of retreating into pious isolation and the option of accommodation with colonial power; both, he argued, were paths to erasure. His journal, al-Urwat al-Wuthqa, circulated widely enough that British customs authorities maintained a dedicated unit just to track its readership in India.

Cairo's Response: Abduh, the Brotherhood, and Al-Azhar's Opening

In Egypt, Afghani's most direct disciple was Muhammad Abduh, who studied under him for years in Cairo and, in Zaidi's account, revived the teaching of philosophy and irfan (mystical/rational theology) at al-Azhar after that tradition had fallen into stagnation there. The line continues through Hassan al-Banna, who founded the Muslim Brotherhood on the same soil a generation later — one more link, Zaidi says, in a chain that keeps tracing back to Afghani's original template.

The clearest institutional expression of that template's ecumenical ambition came from al-Azhar itself. In 1950, Sheikh Mahmoud Shaltut, later Sheikh al-Azhar, established Dar al-Taqrib bayn al-Madhahib — an institution whose explicit purpose was bringing the Islamic schools of law closer together. In 1959, shortly before his death, Shaltut issued a fatwa declaring that just as Sunni Muslims may follow any of their own four schools of jurisprudence, they may equally follow the Ja'fari school — Shia law — in matters of fiqh. For Zaidi, this fatwa, arriving from the historic hub of Sunni theology, is direct evidence that the current running through Afghani had, within a century, reshaped the highest institutions on both sides of the sectarian line.

Beirut's Book: The Five Schools Under One Cover

Lebanon supplies Zaidi's favourite illustration of how thoroughly intertwined this history is. Sayyid Sharafuddin al-Musawi, working at a time when French and Christian dominance over Lebanon was at its height, built unofficial parallel institutions — in education, welfare and eventually economics — inside the Shia areas of the country. Zaidi traces today's Hezbollah-run school and economic networks, including the informal channels that broke an Israeli-imposed fuel blockade on Lebanon, directly back to that foundation.

Alongside al-Musawi, Sheikh Muhammad Jawad Mughniyya wrote a book, al-Fiqh ala al-Madhahib al-Khamsa ("Jurisprudence According to the Five Schools"), which set out every major legal question across all four Sunni schools and the Ja'fari school together — something, Zaidi says, no one had done in this form before. He calls Shaltut's 1959 fatwa and Mughniyya's book "mirror images" of one another: a Sunni authority in Cairo affirming the validity of Ja'fari law, and a Shia scholar in Beirut placing that same law inside a shared five-school framework, at almost the same historical moment, without any coordination between them.

Zaidi pushes the genealogy back further still, past the nineteenth century entirely: Imam Ja'far al-Sadiq, the sixth Shia Imam and the eponym of Ja'fari fiqh, is also recorded as a teacher of Imam Abu Hanifa, founder of the largest Sunni school of law, with Imam Malik counted among his indirect students. "It's not new interconnectedness — its roots are very old," is how he frames it. The image of Shia and Sunni scholarship as two sealed, mutually hostile streams, he argues, does not survive contact with this history.

India's Branch of the Same Tree

Afghani's Indian travels seeded a distinct, prolific branch of this same awakening. Allama Iqbal, whom Zaidi insists on calling a thinker rather than merely a poet, produced more verse in Persian than in Urdu — notable, Zaidi says, because Iqbal's own graduate research was in Persian metaphysics, and the philosophical vocabulary he absorbed there gave his Persian poetry a depth some readers find missing from his Urdu work. Maulana Abul Kalam Azad, whatever one makes of his later political positions, shows in his Quranic commentary and other writing what Zaidi calls a startling intellectual solidity within the same current.

Maulana Maududi, founder of Jamaat-e-Islami, sits in the same lineage: his central argument that individual moral effort achieves little without just political structures shaped decades of subsequent Islamist thought. Maududi died in 1979, only months after the Iranian revolution's success, and his final message on the subject described the revolution as a fulfilment of his own life's aspirations; his close associate Mian Tufail Muhammad, later head of Pakistan's Jamaat-e-Islami, travelled to Tehran within weeks of the revolution and stayed an extended period, later reporting what he had witnessed there. Indonesia's Muhammadiyah movement, Zaidi notes, was likewise founded by people who had studied directly under Afghani.

Zaidi draws one further Indian parallel: Shah Waliullah Dehlavi, he says, belongs to the same rare category as Iran's Mulla Sadra — scholars who were simultaneously jurists, philosophers, mystics and strategists in one person, rather than specialists confined to a single discipline. That comprehensiveness, present on both the Sunni and Shia sides of the tradition well before the colonial encounter, is itself evidence for Zaidi that the interconnection he is describing has always been structural rather than accidental.

Najaf and Tehran's Parallel Awakenings

In Iraq, the same current took a directly political form. The 1920 revolt against British control, aimed at Iraqi independence, was led by the Shia ulema of Najaf — figures Zaidi says were themselves shaped by Afghani's ideas. Six decades later, Ayatollah Muhammad Baqir al-Sadr founded Hizb al-Dawa on explicitly Islamic foundations to organise against the Ba'ath Party; before his martyrdom in 1980 he issued a fatwa declaring Ba'ath Party membership religiously forbidden and resistance to it religiously obligatory.

Iran's own contribution begins earlier than 1979. The Constitutional Revolution of 1905–1911 was driven in significant part by Iranian ulema — some based inside Iran, others, curiously, based across the border in Najaf, from where they remained just as influential on events inside Iran. Zaidi treats this as an early demonstration that national borders never really contained this network of ideas. Ayatollah Kashani carried a version of the same project through the 1950s and into the 1960s; Shahid Mutahhari through the 1960s and 1970s; and Ali Shariati, through the same period, reached with his writing an audience — younger, less traditionally religious — that the clergy alone had struggled to move.

Khomeini's Singular Achievement: From Idea to State

By Zaidi's own account, a bird's-eye survey of the twentieth-century Muslim world up to this point would show two contradictory trends running together: an intellectual awakening spreading in pockets — a percentage point here, a few percent there, in Egypt, Iraq, Iran, India, Indonesia — inside a Muslim world that was, overall, growing more fragmented, more colonised, more impoverished with each decade. What sets Imam Khomeini apart from every figure so far in this genealogy, in Zaidi's reading, is not originality of doctrine but scale of mobilisation: Khomeini was, in his words, the vehicle through which this current moved for the first time beyond specialist circles and into an entire society.

That mobilisation produced the 1979 revolution, and with it something no earlier figure in this history had achieved — a written constitution, ratified by referendum, whose central pillar, velayat-e faqih (guardianship of the jurist), Zaidi describes as a direct derivative of the Shia doctrine of Imamate now applied to statecraft. What had been argued in books and sermons for a century was, for the first time, made the operating principle of a state.

Khamenei, Iqbal and Qutb: The Thread Made Visible

Zaidi's most striking evidence for the continuity of this cross-sectarian thread concerns Iran's current Supreme Leader. In a 1986 speech to a conference on Iqbal studies held in Tehran, Ali Khamenei called that day among the most memorable and exciting of his entire life, and declared that the Islamic Republic "is the embodiment of Iqbal's aspirations" — Khamenei's own phrase, as Zaidi reads it aloud from the printed text. That a Shia head of state, representing a specifically Shia doctrine of governance, would frame his revolution as the fulfilment of a Sunni-associated Indian Muslim poet's dream is, for Zaidi, exactly the kind of gesture that keeps this genealogy alive rather than merely historical.

Khamenei's own bibliography extends the connection further back. In 1969, a decade before the revolution, he published a book on the role of Muslims in India's independence movement — in form a translation of an Arabic work by Sheikh Anmar, an al-Azhar scholar who had himself spent time studying at Darul Uloom Deoband, but expanded with so much of Khamenei's own material that the published length doubled, and the title page credits him with both translation and authorship. Zaidi calls this a triangle joining al-Azhar, Deoband and Khamenei in a single text, two decades before anyone in the West was speaking of an Iranian revolution at all.

Khamenei also translated two of Sayyid Qutb's books into Persian, drawn in particular to Qutb's concept of jahiliyyah — a framing Zaidi says still surfaces in Khamenei's own rhetoric today. Qutb, for his part, belonged to the Muslim Brotherhood that traced its own founding back through Hassan al-Banna to Abduh and Afghani, and was reportedly asked by the Egyptian court that later executed him whether he had read Maulana Maududi's sermons — one more thread pulling Cairo, Lahore and Tehran into the same weave. For Zaidi, Khamenei's habit of quoting Iqbal serves a deliberate rhetorical purpose: when Sunni admirers of Iqbal hear the Shia leader of Iran claim him too, he says, it "softens the heart" toward the wider argument being made.

Recovering, Not Inventing, a Shared History

Zaidi is emphatic that none of this amounts to erasing real differences between Sunni and Shia tradition, or suggesting that scholarly disagreement should simply dissolve. His claim is narrower and, he thinks, more useful: that the appearance of a total, ancient sectarian divide is itself a distortion — produced, in his phrasing, by centuries of internal neglect and by deliberate designs of adversaries — laid over a history that was, and remains, far more interconnected than the popular narrative allows. "This is recovery, not invention," is how he sums up the argument.

His closing point is addressed as much to fellow Muslims as to outside observers, and specifically to an Indian audience: India was, for centuries, one of the central poles of this shared civilisational space, not a periphery of it, and it produced several of the very nodes in this genealogy — Shah Waliullah, Iqbal, Azad, Maududi. Understanding that history, Zaidi argues, is the precondition for understanding why an avowedly Shia revolution in Iran keeps reaching for a Sunni Indian poet to explain itself, and why dialogue that starts from what different Muslim traditions already share tends to open doors that starting from their differences keeps closed.

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