Nous Podcast· 16 Jun 2026· 43:15

US-Iran Deal Explained: Why Amaresh Misra Calls Iran the Clear Winner

Did Iran emerge as the clear winner in the latest US-Iran ceasefire negotiations? In this discussion, senior journalist Bushra Khanum speaks with political commentator and author Amaresh Misra about the reported tentative deal between Iran and the United States, the geopolitical consequences of t…

Full Transcript

यानी सिक्योरिटी काउंसिल रेज़ोल्यूशन मेंमेंशन की जाएगी कि अमेरिका कभी भी ईरान पेअग्रेशन नहीं करेगा।क्या डोन्ड ट्रंप नवंबर तक का टाइम ले रहेहैं और उसके बाद कुछ बड़ा हो सकता हैअक्टूबर में इजराइल का इलेक्शन और नवंबरमें मिड टर्म पोलदुनिया में कोई ऐसा सिक्योरिटी काउंसिलरेोल्यूशन मुझे बता दे जिसमें एक देश यहकह रहा है कि मैं उस देश पे हमला [संगीत]नहीं करूंगा। अगर यह तमाम पूरे वेस्टर्नमीडिया से लेकर तमाम जगह ये कहा जाता हैकि भाई देखिए इस वॉर के बाद ईरान इज दक्लियर विनर एंड एंड अमेरिका एंड ट्रंप इजद क्लियर लूजरलेकिन ईरान ने सीधे आके अपने सीने पे गोलीलेके इस बुल्ला का सवाल उठा दिया गाजा कासवाल उठा दिया यमन का सवाल उठा दियाएक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस की पूरी बात करनेलगीक्या आपको लग रहा है कि वो इस डील को रहनेदेगा क्योंकि ईरान की तो शर्त ही यह है किअगर यह पीस डील होगी यह जंगबंदी होगी तोतमाम फ्रंट्स पर होगी तो ये देखिए एकक्लियर विनर इसमें ईरान है। ये अलग बात हैकि ये जंग एक फिर से इसका फेस टू शुरू होसकता है।तो अब भारत की पोजीशन को आप कहां देख रहेहैं और क्या आपको लग रहा है कि पाकिस्तानकी पोजीशन पहले से बेहतर हुई है।2047 में जो बीजेपी की विकसित भारत कानारा है वो कभी सफल नहीं हो सकता जब तकभारत अपनी जिओपॉलिटिकल प्रायोरिटीज चेंजना करे। नाउ में हम डाटा और ग्राउंडरियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामनेलाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता हैया गलत तरीके से पेश किया [संगीत] जाताहै। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है यानीहमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेटबैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं।अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरीस्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तोहमारी [संगीत] वीडियोस को आप ज्यादा सेज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइबकरें और अगर आपके लिए मुमकिन [संगीत] होतो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिएआप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके[संगीत] सामने स्टोरीज लाते रहें और यूंही काम करते रहें।आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूंआपके साथ बुशरा खानम फहाद। क्या 110 दिनकी इस जंग के बाद अब यह जंग पूरी तरीके सेथमने जा रही है? क्या ईरान अमेरिका के बीचमें एक पीस डील होने जा रही है? क्या यहअमेरिका की अब तक की सबसे बड़ी हार है? औरक्या ईरान ने दुनिया को यह बता दिया है किभले ही दुनिया आपको कमजोर आंकने की गलतीकर रही हो लेकिन अगर आप अपनी पूरी ताकत,स्ट्रेटजी, हिम्मत और कुत के साथ अगर आपलड़े तो दुनिया की सुपर पावर को भी आपघुटनों पर ला सकते हैं और हरा सकते हैं।यह मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि अब तक आपसबको यह पता चल गया होगा कि ईरान औरअमेरिका के बीच में अब एक पीस डील होने जारही है। अब तक हालांकि 39 बार के करीब जोडोनल्ड ट्रंप हैं बार-बार यह कहते हुए नजरआए कि देखिए यह डील होने जा रही है। यहफाइनल होने जा रही है। लेकिन लोगों ने उसपर यकीन नहीं किया। लेकिन जैसे ही ईरान कीतरफ से ऑफिशियल स्टेटमेंट आया कि ये डीलहोने जा रही है। 19 तारीख को स्विट्जरलैंडमें इसको इस पर साइन किए जाएंगे बाकायदातौर पर ऑफिशियली और फिर 60 दिन तक इसकोजांचा और आंका जाएगा और बहुत सारी चीजेंउस 60 दिन में होने जाएंगी। तो पूरीदुनिया में इसको लेकर अब चर्चा हो रही है।आज इसी की हम तमाम बारीकियों पर बात करनेजा रहे हैं कि इस डील का मतलब क्या है? इसजंग के बाद दुनिया कितनी बदली है? इस जंगके बाद क्या ईरान उन सुपर पावर जो कंट्रीजहै क्या उनकी लिस्ट में शुमार हो गया है?क्या ये मल्टीपोलर से बायपोलर सेमल्टीपोलर वर्ल्ड में क्या अब दुनिया बदलगई है? क्या ग्लोबल नॉर्थ से पावर का जोसेंटर है क्या वो ग्लोबल साउथ में शिफ्टहो गया है? और इस सबके बीच भारत कहां परखड़ा है? इस सबके बीच पाकिस्तान ने जोइंपॉर्टेंट भूमिका निभाई है, उसको किस तरहसे देखा जाए? इस पर बात करने के लिए मेरेसाथ बेहद खास मेहमान आप देख सकते हैंस्क्रीन पर वॉर हिस्टोरियन वेस्ट मामलोंके जानकार जिन्हें आप सुनना बहुत पसंदकरते हैं। अमरीश मिश्रा जी मेरे साथ जुड़गए हैं। अमरीश जी बहुत-बहुत इस्तकबाल आपकानाउज़ नेटवर्क में।थैंक यू सो मच। थैंक यू सो मच मिश्रा।अमरीश जी आप लगातार अलग-अलग वॉर्स को आपनेदेखा है। उनका आपने एनालिसिस किया है।उनको जांचा है, परखा है। उनके बारे मेंलिखा है। इस वॉर को और इस वॉर के 110 दिनके बाद होती होने जा रही इस सीज फायर याअब तो सीज फायर नहीं बल्कि पीस डील हम कहसकते हैं। इस डील को आप कैसे देख रहे हैंऔर इससे दुनिया कितनी आपको बदलती हुई नजरआ रही है। क्योंकि अब डोनल्ड ट्रंप ये कहरहे हैं कि इसी फ्राइडे जो स्टेट ऑफहॉर्मोस है वो भी खुलने जा रहा है। जो कभीबंद ही नहीं था जो उन्होंने नेवल ब्लॉकेटलगाया था वो अब खुलने जा रहा है और अबदुनिया में तेल जो है वो बहने जा रहा है।इसी तरह के अल्फाज़ का उन्होंने इस्तेमालकिया है।नहीं देखिए बुशरा जी सबसे पहले मैं येकहना चाहूंगा कि ये जो डील है और इसके जोडिटेल्स हैं अभी सारे डिटेल्स आए नहीं है।19 जून को डिटेल्स सारे आएंगे और येऑफिशियली पब्लिश होगा क्योंकि किसी भी डीलका और खासतौर पे मेमोरेंडम ऑफअंडरस्टैंडिंग का एमओयू साइन हो रहा हैबकायदा तो वो उसके डिटेल्स तभी सामने आतेहैं जब वो पब्लिश होता है। नंबर एक अब अभीतक क्या है? अभी जो सिचुएशन है कि डीलअनाउंस हुई और डील अनाउंस होने पर दोबातें कही गई कि एक तो स्टेट ऑफ हुमूस खुलजाएगा और अमेरिका नेवल ब्लॉकेट अपना हटानाशुरू कर देगा। स्टेट ऑफ हुरमूस भी खुलजाएगा मतलब धीरे-धीरे ईरान के नेतृत्व मेंऔर यह बात बहुत महत्वपूर्ण है ईरान केनेतृत्व में खुलेगा। बल्कि कुछ ऐसे जहाजहैं जो ईरान के साथ कोऑर्डिनेट करके आजनिकले भी जिसमें भारत का भी एक जहाज बतायाजा रहा। अब देखिए अब हम देखिए बात से शुरूकरते हैं। मतलब अब आप सोचिए कि 60 दिन होगए हैं डील हो गई फॉर्मलाइज हो गया। इसमेंजो एक लास्ट क्लॉज़ है वो ये है कि जबफाइनल एग्रीमेंट होगा वो सिक्योरिटीकाउंसिल रेोल्यूशन में तब्दील हो। और उसफाइनल रेजोल्यूशन में जो फाइनल एग्रीमेंटअगर होता है इफ उसमें अमेरिका लिखेगाउसमें यह बात मेंशन की जाएगी यानीसिक्योरिटी काउंसिल रेोल्यूशन में मेंशनकी जाएगी कि अमेरिका कभी भी ईरान पेअग्रेशन नहीं करेगा। दुनिया में कोई ऐसासिक्योरिटी काउंसिल रेोल्यूशन मुझे बता देजिसमें एक देश ये कह रहा है कि मैं उस देशपे हमला नहीं करूंगा। दिस इज़अनप्रेसिडेंट। दिस हैज़ नेवर हैपन बिफोर।और यह अपने आप में दिखा रहा है कि अमेरिकाकितना डेस्पेरेट था स्टेट ऑफ हुमूस सेनिकलने के लिए वहां से पीछे हटने के लिए।ट्रंप आज भी कह रहे हैं कि अगर 60 दिन मेंबातचीत सफल नहीं हुई, न्यूक्लियर इशू ठीकसे रिजॉल्व नहीं हुआ टू माय सेटिस्फेक्शनऔर टू अमेरिका सेटिस्फेक्शन तो फिर हम जंगफिर से शुरू कर सकते हैं। ईरान भी कह रहाहै ईरान तो यह कह रहा है कि उतनी देर वेटक्या करना? अभी हम दो दिन में जंग शुरू करदेंगे। अगर साउथ लेबरन से इजरयली फर्सेसनहीं हटी और यह एक मामला बड़ा बन गया हैक्योंकि ऐसा हो सकता है कि 19 जून के पहलेकुछ बड़ा एक कांड हो जाए। क्यों? क्योंकिनेतऊ ने जो खबर आ रही ट्रंप और नेतऊ कीबात हुई ट्रंप ने कहा कि भाई लेबनन भीहमने इंक्लूड कर लिया है। ये ईरान काइंसिस्टेंस था। और ये तब हुआ है इंक्लूडजब 14 जून को एक बड़ी गलती नेत्र्याओं नेकी कि बेरूत पर दोबारा हमला कर दिया। फिरट्रंप भी नाराज हुए। यह सब हुआ और ट्रंपउन्होंने उसी शाम डील ओके कर दी। जबकिलेबिन के सवाल पर डील अटकी हुई थी। अब जबट्रंप नेतन्याओं से कह रहे हैं कि लेबिनसे तुम्हें विड्रॉ करना होगा। तो नित नेऊकह रहे हैं कि भाई हम यूएस और ईरान के बीचडील है। उसमें हम सीधे इन्वॉल्व नहींहोते। हम कहां से इन्वॉल्व है या हमारापूरी तरीके से हमें हमें हमारे ऊपरमैंडेटरी नहीं है कि हम उसको माने। फिर जोइजराइल कार्ड्स हैं डिफेंस मिनिस्टरउन्होंने भी कहा है कि हम विड्र नहींकरेंगे। बन गिवर ने कहा है कि इस डील कोही रिजेक्ट कर देना चाहिए। इजराइल से कोईमतलब नहीं है। हमें अपना जो हम कर रहे हैंवो हम करते चलेंगे। उधर ईरान कह रहा है किअगर यह सारी चीजें इंप्लीमेंट अगर इजराइलने विड्र करना नहीं शुरू किया तो हम एक दोदिन में स्ट्राइक शुरू कर सकते इजराइल औरऐसी स्थिति में अमेरिका कुछ कर नहीं पाएगाक्योंकि अमेरिका के सामने ये हमेशा एकस्थिति बनी रहेगी कि 19 जून को उसको एकएमओयू साइन करना है। ट्रंप उसको अब बेचचुके हैं। ही हैज़ एक्चुअली गॉन ऑल द वे टूसेल दिस होल डील टू ह ओन पीपल। देखिएट्रंप का जो एक पूरी परिस्थिति है जो एकउसकी कॉम्प्लेक्सिटी भी हम लोग को समझनीचाहिए इस इस लिहाज से कि ट्रंप की का असलमकसद था कि वेनेजुला की तरह ईरान पे कब्जाकरना और बल्कि वेनेजुला में तो प्रेसिडेंटको उठाया था। यहां तो यह था कि खरग आइलैंडपे कब्जा कर लेना और यह बात ट्रंप ने खुदही दो-तीन दिन पहले कही थी और उसी समय लगगया था कि अब यह आदमी हार चुका है क्योंकिट्रंप ने कहा कि हम हमारा मकसद था खरगआइलैंड कब्जा करना। हमें बहुत फायदा होता।ईरान का तेल हम उसी तरीके से डोमिनेट करतेईरान के ऑयल मार्केट पे और उसके रिसोर्सेजपे जैसे वेनेजुला पे हम कर रहे हैं। लेकिनहमारा देश इसके लिए तैयार नहीं था। ही यूज़द वर्ड अमेरिका वास नॉट अप फॉर इट। और हमक्या करते ऐसी स्थिति में तो यह देखिए एकबात साबित हो गई थी कि जो डोमेस्टिककंपलशन है प्लस जो गल्फ एलई के प्रेशरक्योंकि कतर इधर ईरान के साथ अपनी सेपरेटडील कर रहा था और क़तर ने बल्कि 14 जून कोकतर का डेलीगेशन कल ही ईरान में था और यहबात हो रही थी कि अगर जंग शुरू होती है तोईरान कतर के गैस फैसिलिटीज पे हमला ना करेबदले में क़तर खुद ही सप्लाई रोक दे। उसनेकतर ने कहा हम खुद ही सप्लाई रोक देंगे।मतलब इस तो जब ट्रंप को यह लगा कि भाई यहलोग अपने आप जाकर डील कर लेंगे। कतर ने आजडील की है। कल सऊदी अरेबिया कर लेगा। यूएईजो कि सबसे बड़ा पिट्ठू इनका है वो कल करलेगा। तो क्या कर लेंगे? हमबहराइन कर सकता है, कुवैत कर सकता है। भाईअभी जो पिछले दिनों अभी मतलब एक हफ्तापहले जो बीच में अमेरिका से जो जंग हुई थीएक रात की दो बार हुई एक-एक रात की जंग तोउसमें तो ईरान ने बहराइन में फिर सेअमेरिका के बड़े एयरबेस को नष्ट कर दिया।कुवैत में बहुत तबाही की। तो ये और यूएईपे अटैक नहीं किया। सऊदी अरेबिया भी नहींकिया और क़तर पे भी नहीं किया। तो ये सबईरान भी यह ट्रंप भी समझ रहे थे कि यहईरान की इन सब देशों से बातचीत चल रही है।वैसे भी टर्की, पाकिस्तान, इजिप्ट सारेमुस्लिम देश कमोबेश वो ईरान के साथ थे। तोट्रंप ये अभी अफोर्ड नहीं कर सकते थे। अबउन्होंने कहा कि हमारे डोमेस्टिककंपल्शनंस थे। लेकिन जो उन्होंने नहीं कहावो ये कहा कि इंटरनेशनल प्रेशर भी थे। अबसोचिए आप कि जुविश लॉबी का इतना बड़ाप्रेशर। नंबर एक जुविश लॉबी अमेरिका मेंआज भी है। ट्रंप के पूरे कैंपेन को जिनलोगों ने समझ लीजिए 60 टू 70% फाइनेंसकिया था उनका पूरा फ्री हैंड था ट्रंप।उन्होंने फ्री हैंड ट्रंप को दिया था। कुछभी करो तुम ईरान में। हमारे हमारा पूरासपोर्ट है। हम लोग दुनिया में जो भीनेगेटिव चीज फैलेगी संभाल लेंगे। तो दूसरागाजा होगा तब भी हम संभाल लेंगे। यहां तककी बात है। उसके बाद ईरान ने जो झुकाया हैऔर 40 दिन की जंग तो उसका एक पहलू है। 40दिन की जंग के बाद जो इतने सारे मतलब शायद107 दिन हो गए हैं 28 फरवरी से अभी तक 40दिन की जंग के बाद जो 8 अप्रैल को सीजफायर हुआ और अभी तक जो एकजंग चली है कॉग्निटिव कॉग्निटिव वॉर चलीहै। नैरेटिव की जंग चली है। पोजीशंस कीजंग चली कि बयानबाजी क्या हो रही है? कौनकिस दिन क्या स्टैंड ले रहा है? औरबीच-बीच में वो हॉट वॉर में भी तब्दील होरही। उसमें कुछ ईरान के लोग मारे जा रहेहैं। कुछ यूएस के लोग उसमें हताहत हो रहेहैं। इजराइल के लोग हताहत हो रहे हैं। येसारी चीजें भी चलती थी। तो इतने लंबे समयतक एक 40 दिन की हॉट वॉर और वो भी हॉट वॉरऐसी नहीं थी कि ग्राउंड ट्रूप्स कहींइन्वॉल्व थी। आप देखिए मिसाइल वॉर थी।दुनिया के सामने एक पहली मिसाल मिसाइल वॉरऔर उसके साथ-साथ एयरक्राफ्ट वॉर और उसकेबाद उसके बाद जो लंबी जो एक जंग चली हैडिप्लोमेसी के फ्रंट पे फिर जो छिटपुटझड़पें होती रही हैं और वहां पर ईरान नेअमेरिका को झुका दिया। जी अमरीश जी मेरासवाल आपसे यह है कि एक तरफ तो हम यह देखरहे हैं कि पीस डील और अब ईरान की तरफ सेभी यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान नेइसमें इंपॉर्टेंट रोल निभाया है। कतर कीआप बात कर रहे हैं और ये पीस डील होने जारही है। अराची ट्रैवल करेंगे, अलिबागट्रैवल करेंगे और उधर से भी तमाम लोग जोहैं, वह ट्रैवल करने जा रहे हैं अमेरिकासे और यह डील होने जा रही है। दूसरी तरफहम यह देख रहे हैं कि इजरायल अपनीपोजीशनिंग करता हुआ नजर आ रहा है। बनगिवरसे लेकर और जो दूसरे मिनिस्टर्स हैं यहांतक कि जो इजराइयली मीडिया है वो ये कह रहाहै कि ये ट्रंप की अब तक की सबसे बड़ी हारहै। न्यूज़पेपर्स में इस तरह की हेडलाइंसऔर टीवी चैनल्स पर इस तरह की हेडलाइंस जोहै वो इजराइल में बन रही हैं। और यह भीकहा जा रहा है कि हम इस डील का हिस्सानहीं है। हम ये डील मानेंगे नहीं। और वोलगातार लेबनान पर अभी भी हमले जारी हैं।तो क्या आपको लग रहा है कि इजराइल जिसकोइस डील में शामिल नहीं किया गया। कम से कमअमेरिका ऐसा दिखा रहा है। यह दिखावा कररहा है। क्या आपको लग रहा है कि वो इस डीलको रहने देगा? क्योंकि ईरान की तो शर्त हीयह है कि अगर यह पीस डील होगी, यह जंगबंदीहोगी तो तमाम फ्रंट्स पर होगी।जी बिल्कुल देखिए उसमें गाजा का सवाल भीऔर गाजा का सवाल जो 60 दिन में 60 दिन काजो नेगोशिएशन होगा उसमें गाजा का सवाल भीउठाया जाए और वहां जो इजराइल ने अभी भी60% गाजा की जमीन येलो लाइन वगैरह जो बनअपनी बना रखी है। लेबन की 14% जमीन इस समयइजराइल के कब्जे में है। तो अब देखिए सबसेपहले लेबनन में कन्फेशन होगा क्योंकि वहांपर अभी जंग चल रही है। अगर इजराइल मार रहाहै तो उससे ज्यादा हजबुल्ला मार। अभी जोलेटेस्ट फिगर्स आए हैं कि दो मार्च से लेअभी तक 1200 से ऊपर इजराइली सोल्जर्स घायलहो चुके हैं। 30 से ऊपर मरे जा चुके हैं।और ये इजराइल कह रहा है। वो इतना बड़ी इतनीइतना बड़ा गैप होता नहीं है मारे जाने मेंऔर घायलों। इसका मतलब है कि 4 से 500इजराइली सोल्जर्स इसमें कहीं ना कहींहताहत हुए हैं। अगर एक मीन फिगर लिया जाएइंजर्ड जो इंजर्ड है और जो जो डेथ्सइजराइल ने कबूलीतो इजराइल की हालत वहां खराब है। लेकिनचुनाव का साल है। नेतन्याओं की पार्टी इससमय पीछे चल रही है। जो लेटेस्ट ओपिनियनपोल्स हैं कि जो अपोजिशन अलायंस है वो भीजाइनिस्ट है अपोजिशन अलायंस। लेकिन वोनेतन्याओं से आगे चल रहा है। और इजराइल कीजनता में एक फीलिंग आ रही है कि इस समय एकडील हमको भी एक डील किसी के साथ करनीचाहिए। मतलब अपने ये लेबिनन के साथ या फिरहमास के साथ पैलेस्तीनियन रेिस्टेंस केसाथ हमको भी एक डील करनी चाहिए। और इस तरहकी स्टोरी न्यूयॉर्क टाइम्स में आई जिसमेंइजराइली कह रहे हैं। अब उसमें देखिए क्याहै कि 3:1 है। तीन लोग नेत्र्याओं केखिलाफ हैं। एक साथ हैं। अब जो नेत्र्याओंके खिलाफ है वो ये कह रहे हैं कि एक हमेंऐसी लीडरशिप चाहिए जो नेगोशिएट करें। अबहम कब तक दो साल हो गए? 7 अक्टूबर 2023 सेअब कुछ ही महीनों में तीन साल हो जाएंगे।लगातार हम जंग में है और हर बार यह नाइटमैन हो गया है। हर हफ्ते हमको बंकर मेंछुपना पड़ता है। तीन साल हो गए। तो ट्रंपइस काउंटिंग ऑन द इजराइली पब्लिक ओपिनियनआल्सो। इसीलिए वो बीच-बीच में कहता है किइजराइल में मैं चुनाव लड़ जाऊं तो जीतजाऊं। उसका मतलब यही है वो यह इस पर काउंटकर रहा है कि नेतन्या के खिलाफ पब्लिकओपिनियन है। अगर दो तीन कड़े स्टेटमेंटट्रंप ने दे दिए तो नेतों के लिए संभालनामुश्किल हो जाए। यह एक संभावना दूसरीसंभावना क्योंकि ट्रंप काया यह कभी नहींभाई ऑब्वियसली वो वो तो सुपर पावर है औरवो तो अपने पैरों तले रौंदना चाहता थाइजराइल को और ठीक है वो बिजनेसमैन है तोवो अब इसको भी एक्सेप्ट करेगा जो अभी होरहा है लेकिन अगर उसको ये ये लग गया कि एकइंपॉसिबल एक अंधी गली में हम फंस गए हैंट्रंप तो वो ये डील तोड़ भी सकता इसमेंकोई बड़ी मतलब बड़ी बात बहुत नहीं है औरवो तोड़ेगातुरंत जंग शुरू करके नहीं उसके बहुत सारेऔर तरीके मतलब और भी उसमें एक छिटपुट कुछहोगा कुछ लंबा और खींचेगा 19 जून को साइनसाइनिंग नहीं होगी ये भी हो सकता है 19जून की साइनिंग हो जाए और उसके बाद लेबननके सवाल पे इजराइल और ईरान में जंग शुरूहो जाए और ट्रंप फिर अपने ये पोजीशन ले किवो अपील करें कि जंग रोको जंग रोको लेकिनजंग होने देंगे ये भी हो सकता है तो देखिएअभी जो एक हफ्ते पहले की सिचुएशन थी उससेस्थिति बहुत बदल गई। हालात बहुत बदल गएहैं। ओपन एंडेड मामला हो गया है और पहलीबार जो एक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस है उसने एकतरह से इनिशिएटिव ले लिया है। उसका काउंटरऑफेंसिव शुरू हो गया है।तो ये एक देखिए एक बहुत एक बड़ा अचीवमेंटहै। अब इसमें वही है कि जो रीजनलपॉलिटिक्स है जो बाकी देश इसमें इनवॉल्वरहे हैं यह इंडिविजुअली हर तरह से कैसेइफेक्ट हो रहे हैं क्योंकि भाई ये इट्स अटेक्टोनिक शिफ्ट इन जियोप जो अभी हो रहाहै और ट्रंप देखिए मेरा ये अंदाजा है किवो एक ईरान और इजराइल में जंग होगी और वोउसको दूर से देखेगी कुछ समय तक और उसकेआगे क्या होगा ये कहना बहुत मुश्किल हैलेकिन अभी फिलहाल ये संभ संभावना बन रहीक्योंकि इजराइल एकदम से साउथ लेबनन छोड़देगा ऐसा भी नहीं होगा।अगर अगर अगर इजराइल अगर नहीं छोड़ता है औरईरान की जो शर्तें हैं उसमें सबसेइंपॉर्टेंट यही है। पाकिस्तान की तरफ सेभी ये कहा गया है कि लेबनान को भी शामिलकिया गया है। इजराइल अगर नहीं मान रहा तोफिर ये डील तो तब तक एक तरह से डाइसी हीरहेगी। क्या आपको लग रहा है 19 तारीख तकयह देखना पड़ेगा और अगर माना कि डील साइनहो जाती है और उसके बाद भी तब तक इजराइलखामोश रहे और उसके बाद फिर उसके बाद वोहमला कर दे तो फिर इस डील का क्या मतलब रहजाता है? ये तो बड़ी अजीब सी सिचुएशन है।एक तरफ दुनिया इसको सेलिब्रेट उस तरह सेकर रही है कि देखिए तेल का संकट खत्म होनेजा रहा है। दुनिया फिर से एक तरह से प्रीवॉर एरा में शायद लौटने जा रही है। लेकिनदुनिया बदल भी गई है। तो इस सबके बीच अगरइजराइल अपने हरकतों से बाज नहीं आता हैक्योंकि इलेक्शन भी है अक्टूबर में। उसेकुछ तो चाहिए नितिन याू को जनता के सामनेजाने के लिए। तो अगर ऐसा होता है तो फिरये तो डील अभी से ही ऐसा लग रहा है कि कुछखटाई में पड़ पड़ सकती है या अभी से ही येएक तरह की एक अजीब सिचुएशन आकर खड़ी हो गईहै।नहीं वो तो देखिए है वो तो बिल्कुल दुनियाके सामने पूरी स्थिति है और ईरान ऑनरिकॉर्ड ईरान का जो लेटेस्ट बयान है वोयही है कि अमेरिका जिम्मेदार है इजराइल केबिहेवियर के लिए। इस डील को अमेरिका नेसाइन किया जिसमें लेबन का नाम भी मतलबसाइन करेगा जिसमें लेबन को बकायदा मेंशनकिया गया है तो अमेरिका के ऊपर है कि वोइजराइल को फोर्स करे अगर नहीं अमेरिका करपाए तो फिर ईरान को स्टेप इन करना तो येये देखिए ये सब मैं यही कह रहा हूं कि येसंभावना है कि इजराइल और ईरान में जंग अभीहोगी और ट्रंप उसको देखेंगे। ट्रंप उसमेंइंटरवीन नहीं करेंगे। यह भी हो सकता है औरउधर बातचीत भी चलती रहेगी।यह यही नई दुनिया है। यही नई दुनियाक्योंकि देखिए इजराइल कोतो आप बड़ी इंटरेस्टिंग बात कह रहे हैं।आप ये कह रहे हैं कि ये वॉर जो फिलहाल थीजो इललीगल वॉर ईरान के ऊपर छेड़ी गई। येअमेरिका और इजराइल ने मिलकर छेड़ी। इजराइलके कहने पर अमेरिका इस वॉर में शामिल हुआ।अमेरिका में यह कहा गया कि इजराइल फर्स्टकी नीति है। यह हमारी जंग नहीं है। यहइजराइल की जंग है। और अब आप यह कह रहे हैंकि अमेरिका इससे अपने आप को दिखावे के लिएअलग कर सकता है। और इजराइल और ईरान के बीचजंग हो सकती है इस पीस डील के बाद भी।क्योंकि अमरीश जी आप ये बखूबी जानते हैंऔर हम सबको ये पता है कि बिना अमेरिका केइजराइल कुछ भी नहीं है। ये जो पूरी जाइनेसलॉबी है ये अमेरिका को रंग करती है।अमेरिकन पूरी सिस्टम को सरकार को सारेडिसीजन मेकिंग को हर चीज को वही रन करतीहै। तो ये जो भी अगर ऐसा होगा भी किअमेरिका दूर से बैठकर तबाही का नजारा अगरदेखेगा तो लेकिन शामिल तो वो कहीं ना कहींपीछे से होगा ही बिना उसके तो इजराइल कुछनहीं कर सकता।नहीं देखिए इसमें दो चीजें हैं। अमेरिकाकुछ इजराइल को कोर्ट एक जो मदद देता रहाहै वह देगा नहीं देगा या अब जो अभी भीअमेरिकन एसेट्स अमेरिकन प्लेेंस वगैरह सबइजराइल के बन गुरियन एयरपोर्ट पे अभी भीखड़े हैं तो जो 60 दिन की बातचीत है उसमेंये भी बातचीत होनी है कि अमेरिका अपनेफौजे मिडिल ईस्ट से हटाए तो उसमें इजराइलभी आता है। बहुत सारी चीजें हैं अभी।देखिए एक बात आप जान लीजिए कि जोलॉ है वो लॉ है जंग का। जंग बेसिकलीप्राइमरी सेकेंडरी है पीस। तो इसलिए हमेशायह याद रखना चाहिए कि जंग प्राइमरी है।जंग प्राइमरी रहेगी एक लंबे समय तक।क्योंकि जो ये जियोपॉलिटिकल शिफ्ट है। एकबार दो दो वर्ल्ड वॉारर्स हुई। तब जाकेयूरोप का डिक्लाइन शुरू हुआ। कितने देशआजाद हुए। कितने मिलियंसवहां मारे गए। मतलब दोनों वर्ल्ड वॉर मेंआप देखिए तब जाके वो शिफ्ट हुआ कि इतनेदेश इतने देश आजाद हुए यूरोप का डिक्लाइनहुआ अमेरिका और रशिया उस समय यूएसएसआर दोबड़ी ताकतों के रूप में उभरे उसी तरह काटेक्टोनिक शिफ्ट अभी हो रहा है कि अमेरिकाका जो यूनिपोलर वर्ल्ड था खासतौर पेयूएसएसआर के विघटन के बाद 89 से 91 का जोदौर था उसके बाद जो अमेरिका एक एक छत्रराजथा वो शिफ्ट हो रहा है तो उस शिफ्ट उसशिफ्ट शिफ्टिंग में अभी तो और वायलेंसहोना है और वायलेंस कई तरह के हो सकतेहैं। लेकिन ओपन वॉर की जो पूरी सिचुएशन हैऔर जिसको ईरान ने फोर्स किया। एक्चुअलीअगर ईरान नहीं होता सीन पे तो बहुत सारीप्रॉक्सी वॉारर्स चल रही हो। लेकिन ईरानने सीधे आके अपने सीने पे गोली लेके एकपूरी सिचुएशन ऐसी क्रिएट कर दी। हिजबुल्लाका सवाल उठा दिया, गाज़ा का सवाल उठा दिया,यमन का सवाल उठा दिया, एक्सेस ऑफरेजिस्टेंस की पूरी बात करने लगे। आखिरीस्टेटमेंट मुस्तफा कामनी का यही है कियूनिटी ऑफ़ ऑल रेजिस्टेंस फ्रंट्स यानीयमन, गाज़ा, लेबनन, इराक, सीरिया, ईरान एक।तो ये जो पूरी बात है इससे देखिए क्या हैकि अमेरिका वगैरह बहुत घबरा उनको प्रॉक्सीवॉर समझ में आती है। उनके सोल्जर्स मारेजाए जो कि मारे गए हैं। 13 उन्होंने एडमिटकिए हैं। संख्या कहीं ज्यादा है। लेकिनअगर अभी ग्राउंड इन्वजन होता तो क्याहोता?जो कह रहे थे खर गलैंड हम लेंगे यह करेंगेइसलिए लेकिन यह संभावना बन सकती है कि कलको अमेरिका ग्राउंड इन्वेशन भी कर सकता हैएक मजबूरी में मतलब मजबूरी इन द सेंस किअमेरिका की क्या मजबूरी है कंपल्शन जोउसका है लेकिन सिचुएशन का ऐसी स्थिति बनजाती है कि जिसमें घुसना पड़ता है जैसेहिटलर ने सोवियत यूनियन का इन्वजन किया वोओवर कॉन्फिडेंस था उसका बहुत सारे और उसकेऊपर प्रेशर भी थे अगर देखा जाए आज अगर एकनए तरह से एनालाइज किया जाए और वो बहुतबड़ी गलती थी। तो उसी तरह की गलती ट्रंपकर सकते हैं। उसमें बहुत सारे फैक्टर्स होसकते हैं। तो इसलिए देखिए यहां पर अभी जोसेन ओपिनियन है अमेरिका में वो यही कह रहाहै कि पीछे हट जाओ इजराइल को ईरान याहिजबुल्लाह ही निपटा दे। बेसिकली लोग यहीकह रहे हैं जो वेस्टर्न पब्लिक ओपिनियन हैउसमें जो सेनियर ओपिनियन वो यही कह रहा हैकि अब हिजबुल ही उसको देख लेगा जो बाकीअगर सिविलियंस पे ज्यादा इजराइल ने मारातो ईरान संभाल लेगा। ट्रंप अपना अपील करताहै पीस की।एक अगर जंग होती है तो जंग में हार और जीतहोती है। यहां पर क्या आपको क्लियर येक्या दुनिया के सामने यह सिद्ध हो गया है?यह तय हो गया है कि इस जीत का क्लियर विनरजो है वह ईरान है। और अगर ऐसा होता हैजिसको अमेरिका में भी कहा जा रहा है जिसकोवेस्टर्न मीडिया कह रहा है जिसको एक्सपर्टकहते हुए नजर आ रहे हैं। क्योंकि एक ऐसादेश जिस पर 40 साल से सेंशंस लगे जिसको एककमजोर मुल्क कहा जाता था जिसको दुनिया सेपूरी तरीके से काट दिया गया था। उस देश नेअपने आप को किस तरह से तैयार किया और पूरीदुनिया को यह बताया कि कैसे आप इस तरह कीवॉर भी जीत सकते हैं। एक तरह कीएसोमेट्रिक वॉर जो है उसका एक नमूना एकएग्जांपल पेश किया है ईरान ने। मेरा सवालआपसे ये है कि अगर ये तमाम पूरे वेस्टर्नमीडिया से लेकर तमाम जगह ये कहा जाता हैकि भ देखिए इस वॉर के बाद ईरान इज दक्लियर विनर एंड एंड अमेरिका एंड ट्रंप इजद क्लियर लूजर। क्या ट्रंप इसको एक्सेप्टकरेंगे? क्योंकि वो सुबह सोते जागते उठतेबैठते तो वो यह कहते हुए नजर आते हैं किउन्होंने इस वॉर को जीत लिया है। बहुतपहले ही जीत लिया था। आर्मी उन्होंने पूरीतरीके से खत्म कर दी। नेवी खत्म कर दी औरअब ये डील लेकिन इस डील में वो हार और जीतकहते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। बस ये कहरहे हैं कि हमारी ईरान के साथ डील हो रहीहै। तो ये जो वोकैबलरी है ये जो पोजीशनिंगहै ये किस तरह से होती हुई नजर आएगी आगे?नहीं जी देखिए मैं आपको बताता हूं कि 16अब लोग कहेंगे आप पहले चले जाते हैं लेकिनजाना पड़ेगा 1685 और 1690 के बीच औरंगजेबने यहां ईस्ट इंडिया कंपनी को बहुत बुरीतरह मारा था और ईस्ट इंडिया कंपनी पैरोंपड़ गई थी और इजेक्ट कर दिया था मतलब यहांसे निकाल दिया था इंडियन सबक्टिनेंट सेउसको भी हार नहीं कहा उन लोगों ने कहा किहम लोग की गलती थी और ये था अलग-अलग तरहके उसको नाम दिए जाते हैं लेकिन मैं आपकोएक बात बताता हूं कि वो जो औरंगजेब नेईस्ट इंडिया कंपनी को यहां से निकाला था1685 1690 के बीच अब 300 साल इससे ऊपर होगए पहली बार 300 साल से ऊपर पहली बार किसीमुस्लिम देश की जीत हुईमोर देन 3 मैं आखिरी जंग कह रहा हूंऔरंगजेब ने जीती थी ईस्ट इंडिया कंपनी केखिलाफ उसके बाद से एशियाटिक फर्सेस चटपुटजंग जीतती रही है लेकिन वॉर्स हारी और ये300 साल की हिस्ट्री रहीफर्स्ट वर्ल्ड वॉर में ऑटोमैन अंपायर कोतोड़ दिया। ईरान को खत्म कर दिया। उसकेबाद भारत का क्या हाल हुआ? जो तीनबड़े-बड़े एंपायर्स थे मुगल, सफावेद और औरऑटोमन। तो यह देखिए एक क्लियर विनर इसमेंईरान है। यह अलग बात है कि यह जंग एक फिरसे इसका फेज टू शुरू हो सकता है। लेकिनइससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि फेज वनमें अगर हम इसको फेज वन माने क्योंकिदेखिए ये भी हो सकता है कि ये जंग एक अलगरूप ले ले। जैसा कि मैं कह रहा हूं किअमेरिका और ईरान के बीच सीधी जंग ना होकेये फिर से इजराइल और ईरान के बीच जंग।लेकिन उसमें ईरान की कोशिश रहेगी अमेरिकाको इनवॉल्व करें। तो फिर से वही एकसिचुएशन लौट सकती है जो कुछ दिन पहले थी।क्योंकि देखिए मैं फिर कह रहा हूं अमेरिकाको सूट करता है कि प्रॉक्सी वॉर्स चलेचले। लेकिन ईरान इसी बात पे अड़ गया है किप्रॉक्सी वॉर हम नहीं होने देंगे। हम सीधेआ जाएंगे। हम जब सीधे आएंगे तो इजराइल केवजूद को खतरा होगा तो अमेरिका आ जाएगा। तोयह जो देखिए यह एक बहुत एक नई परिस्थितिहै। अभी जिसको बहुत सारे वॉर एनालिस्ट वॉरहिस्टोरियन भी समझ नहीं पा रहे। हां इसमेंरशिया चाइना का भी पूरा एक रोल है औरबल्कि ट्रंप ने तो बड़ी अजीब एक उसने कलएक बयान भी दिया। कहा कि रश चाइना को भीहम थैंक्स कहते हैं कि उन्होंने भी बड़ादिल दिखाया। अब ये सब बातें वहां पर एकतरह से व्हील्ड एक वो भी था। उनका एक येथा कहने का मतलब कि ईरान को ये लोग देखोचुपचाप हेल्प कर रहे थे तो वो तो देखे रहरहेगी और रशिया चाइना ने ईरान को येएश्योर किया है कि कि तुम आगे बढ़ो और येजो सीधे सीधे अपने सीने मतलब अपना सीनाआगे करो हम लोग हैं पीछे और जब जरूरतपड़ेगी तो हमारी फर्सेस भी आएंगी क्योंकिअल्टीमेटली देखिए जो साउथ चाइना सी मेंचाइना को घेरा जा रहा है रश ऑलरेडीप्यूटिन ने तीन दिन पहले बयान दिया कियूरोप से जंग तय है और यूरोप से उसनेयूक्रेन नहीं कहा क्योंकि वहां भी यूरोपभी यही चाह रहा है कि प्रॉक्सी वॉरयूक्रेन लड़े लेकिन अब स्थिति ऐसी बन रहीहै कि यूरोप को खुल के आना पड़ रहा हैक्योंकि यूक्रेन हार रहा और कल को कीव पेकब्जा होगा रशिया का तो वो यूरोपियंस देखनहीं सकते तो इसलिए देखिए ये एक जो पूरीजो पोलिटिकल सिचुएशन है उसमेंकॉम्प्लेक्सिटीज है लोगों को एक चीज से कोविदा कह देनी चाहिए वो ये है किसिंपलीसिटी सिंपलीसिटी की दुनिया अब नहींरही। इसके सिंपल एक्सप्लेनेशन नहीं है।हां इसमें अभी भी हीरो और विलेन है लेकिनवो बहुत कॉम्प्लेक्स हो गया। और जो तरीकाहै जो तरीका है वो हीरो ने विलेन के बहुतसारे तरीके अपनाए। विलेन ने हीरो के बहुतसारे तरीके अपनाए। ये ये भी एक सिचुएशनहै। लेकिन अंतिम स्थिति में हीरो एक ही हैऔर विलेन एक ही। जी कुछ क्विक क्वेश्चनआंसर राउंड मैं आपके साथ में करना चाह रहीथी कि एक तो सबसे पहले मैं आपसे ये जाननाचाहती हूं कि फिलहाल अगर हम इस ख्ते कीबात करते हैं जीसीसी की अगर हम बात करेंजीसीसी का दादा बनना चाहता है इजराइल अभीभी उसकी यही ख्वाहिश है। उसने हम ये देखरहे हैं कि तमाम यूएई से लेकर सऊदी अरब सेलेकर अगर हम दूसरी तरफ चले जाएं तो उधरटर्की और दूसरे कंट्रीज की तरह अगर हम बातकरें जॉर्डन वगैरह की तो वो पहले से ही एकतरह के इजराइल के अमेरिका के पिट्ठू हैंऔर खासतौर पर इजराइल के। क्या इस जंग केबाद और अब जिस तरह की पोजीशन में ईरान आगया है। क्या ईरान ने अब ये स्थापित करदिया है? ने क्या यह बता दिया है किजीसीसी का अनडिक्लेयर्ड एक तरह का दादा तोमैं नहीं कहूंगी क्योंकि ईरान दादा नहींबनना चाहता लेकिन सबसे बड़ी ताकत अब वहीहो गया है और उसके कहने पर अब बहुत सारीचीजें होंगी।देखिए इस समय ईरान पूरे मिडिल ईस्ट मेंसबसे बड़ी पावर है। इजराइल को उसनेडिस्प्लेस कर दिया। तो जिस तरीके सेइजराइलजबकि सब कुछ इजराइल जो कर रहा था एंटीमुस्लिम था एंटी पलेस्टाइन था सारे जिसदेश कम से कम मौखिक रूप से कहते हैं कि देपे लिप सर्विस टू द पैलेस्तीनियन कॉस्टलेकिन वो इजराइल के साथ किसी न किसी संबंधमें थे सब लोग थे कतर से लेके सऊदीअरेबिया से लेके सब थे और ये लोग तो खुलके थे यूएई कुवैत बहरेन ये सब जॉर्डन तोये देखिए अब ये साफ हो गया है कि अबइजराइल सुपर पावर नहीं रहा। अमेरिका का भीजो हाथ इजराइल पर जितना मजबूत था ईरान केपास वो कुत हो गई है कि उस हाथ को भी उसनेकमजोर कर दिया। मतलब ईरान ने इजराइल औरअमेरिका के बीच पहली बार ऐसा हुआ है। जबसे इजराइल बना है 1948 में इजराइल बना है।तब से लेके आज तक पहली बार अमेरिका औरइजराइल में किसी ने दरार पैदा की। फर्स्टटाइम वरना बड़े-बड़े हमले इजराइल एक बारतो 1967 में इजराइल ने एक अमेरिकन शिप पेहमला कर दिया था जानबूझ के उसके पीछे बहुतसारी वजह थी इसमें कई अमेरिकनंस मारे गएथे तब भी अमेरिका ने संबंध नहीं तोड़ेबल्कि और मजबूत कर लिए इजराइल[गला साफ़ करने की आवाज़] से और आज आज येस्थिति है कि ट्रंप को दो-दो बार एफ वर्डयूज़ करना पड़ रहा है। किया कि नहीं अलगबात है। लेकिन कहना पड़ रहा है कि हांहमने किया है। तो यह जो पूरी एक देखिएसिचुएशन है यह अनप्रेसिडेंटेड है और इसमेंजहां तक आपने जीसी पे सवाल किया वहां परहमने सीधा जवाब दिया ईरान इज द ओनली पावरजी अब मुझे ये बताइए कि पाकिस्तान कीपोजीशन को आप कैसे देख रहे हैं? मैंने दोही ट्वीट देखे पहले देखा ट्रम्प का आयाफिर शाहबाज शरीफ का आता है और वो लगातारपीस डील जो नेगोशिएशन है उसका एक तरह सेसेंटर बना हुआ था। वो तमाम पार्टी से बातकरता हुआ नजर आता है। वो एक ऐसा कंट्री हैजो जिस जो करीब है चाइना के भी जो करीब हैअमेरिका के भी जो करीब है ईरान के भी औरवो करीब जो है वो रशिया के भी वो नजर आताहै। तो ये ये एक एक अजीब सी सिचुएशन ये हैकि भारत ने क्या आपको लगता है और भारत सेमेरा मेरा मेरी मुराद है सरकार से। क्यानरेंद्र मोदी ने रॉन्ग टाइम रॉन्ग साइडचूज़ की है? क्या यह इंटेंशनल था? क्या उसीतरफ आइडियोलॉजिकली भी और तमाम तरीके सेअमेरिका और इजराइल और यूएई के साथ जो खड़ाहुआ भारत नजर आ रहा है क्या उसका खामियाजाभारत की जनता भुगतने जा रही है क्योंकिशायद नरेंद्र मोदी को ये लगा होगा किअमेरिका और इजराइल जैसी सुपर पावर्स कोकौन हरा देगा और जंग से कुछ दिन पहले वोवहां पर गए और फिर उसके बाद हमने देखा किये तो पूरी पूरी कहानी एक तरह से पलट गई40 दिन में ही और अब हम 107 दिन में जोदेख रहे हैं पूरा ये सिलसिला तो अब भारतकी पोजीशन को आप कहां देख रहे हैं और क्याआपको लग रहा है कि पाकिस्तान की पोजीशनपहले से बेहतर हुई है और लोग उसको अब औरदूसरी निगाह से आप देखते हुए उसे नजर आरहे हैं क्योंकि ही हैज़ आई मीन पाकिस्तानहैज़ प्लेड अ वेरीेंट रोल इन दिस डील। नहींदेखिए पाकिस्तान को लेके एक सोच बदली हैऔर उसमें पाकिस्तान की सरकार ने शायद बहुतमंथन किया है और एक ये पोजीशन एक ली गई हैकि हम अमेरिका के साथ तो रहेंगे हमक्योंकि बीच में संबंध खराब हुए थे लेकिनअमेरिका के साथ संबंध सुधारे लेकिन चाइनाको छोड़ेंगे नहीं। चाइना के साथ और मजबूतीसे बल्कि खड़े होंगे और अगर चूस करने कीबात आएगी तो हम चाइना को करेंगे। ट्रंप कोयह बात पता है। ट्रंप को यह बात पता है किजो पाकिस्तानी लीडरशिप है अगर मौका अगरअमेरिका और चाइना में चूज़ करना है तो वोचाइना को चूज़ करेगी। इसीलिए ट्रंप बहुतज्यादा पाकिस्तान को छेड़ते नहीं है। तारीफकरते रहते हैं क्योंकि उनको अपनी तरफ भीपाकिस्तान को रखना है। कब तक? लेकिन यहखेल चल पाएगा। इसमें बहुत बड़ा सवाल हैक्योंकि चाइना अमेरिका में आज नहीं तो कलजंग तय वो जंग किसी भी रूप में ट्रेड वॉरहो सकती है। सीधे-सीधे एक बंदूकों औरमिसाइलों की वॉर हो सकती है। जो भी होलेकिन जंग तय है दोनों पे क्योंकि दोनोंएक साथ नहीं रह सकते। वो एक इस्टैब्लिशपावर है। एक उभर रही है। चाइना उभर रही हैऔर डिस्प्लेस उसे अमेरिका को करना है। तोइसलिए यहां जंग होगी। अब यहां परपाकिस्तान को चूस करना होगा और यह चीज आनेवाले दिनों में पाकिस्तान की लीडरशिप परहै। भारत की जहां तक हम बात करें भारत मेंदेखिए मिसकैलकुलेशन हुआ बहुत बड़ा हुआ जो26 फरवरी को यहां के प्रधानमंत्री इजराइलगए और आज का दिन वाकई एक रीअसेसमेंट कादिन है। अगर अगर एक समझदारी है और मैंकेवल प्रधानमंत्री की बात नहीं कर रहाहूं। मैं पूरे इंडियन स्टेट की बात कर रहाहूं। मैं यहां की ब्यूरोक्रेसी की बात कररहा हूं। में पूरा जो एक माइंडसेट है जोइंडिया को चलाता है क्योंकि उस माइंडसेटने यह भी इंश्योर किया है कि ईरान के साथसंबंध टूटे ना और देर सवेेर कुछ ना कुछईरान के साथ भी एक जेस्चर के लेवल पर कुछना कुछ होता रहे वो अभी तक चल रहा है ताकिजिससे भारत की उतनी बुरी स्थिति नहीं हुईजितनी हो सकती थी जो 26 फरवरी को घटना हुईउसकी वजह से लेकिन यहां एक और बात बहुतमहत्वपूर्ण और जिसप बहुत कम बात हुई औरजहां पर एक सवाल वही आ जाता है कि अभी जोअमेरिका जैसी ऐसी फर्सेस है क्योंकि देखिएबैटल लाइंस क्लियर है। ईरान, रशिया, चाइनाऔर यूरोप, इजराइल, अमेरिका ये एक ये पूरेबैटल लाइन है। तो यूरोप, इजराइल, अमेरिकाइनके साथ ब्रॉडली भारत की मौजूदा सरकारमानी जाती है। इनका भारत के बारे में क्याप्लान है? क्या इनका प्लान है कि भारत कोहम चाइना से लड़ाएंगे? क्या इनका प्लान हैकि जैसे हम कुछ ऐसी प्रॉक्सी वॉर शुरू करदेंगेया इनका यह प्लान है कि भारत के साथ वोसंभव नहीं है। भारत रशिया और चाइना के साथलड़ नहीं पाएगा तो इससे अच्छा क्या भारतको तोड़ दिया जाए? देखिए ये बहुत बड़ासवाल है। ये बहुत बड़ा सवाल है कि एक बड़ीप्लानिंग अमेरिका इजराइल की है और इधर कुछदिनों में जो तल्खियां पड़ी हैं। बीजेपीके कुछ लोगों से मैं बात कर रहा था। उनकायह मानना था। हम क्या कह रहे थे कि आप सहीकह रहे थे कि यह यह एक बार भारत को तोड़ागया है 18 सेंचुरी में अंग्रेजों ने और यहवही माइंडसेट है जो इस समय काम कर रहा हैऔर भारत को वो यह चाहते हैं कि अंदर सेउनकी जो प्रो फोर्सेस हैं उनके माध्यम सेवो तोड़े लेकिन यहां पर यही बात आ जाती हैकि इवन बीजेपी जैसी फोर्स या आरएसएस जैसीफोर्स सीधे-सीधेएक इंडिया को तोड़ने का इंस्ट्रूमेंट नहींबनना चाहिए वहां पर एक रेजिस्टेंस भीआएगा। वो रेजिस्टेंस अभी चल रहा है। बहुतसारे सवालों पे। अभी देखिए जो एग्रीकल्चरको लेके अमेरिका और इंडिया की ट्रेड डीलहै वो अगर पूरी तरह से लागू हो जाती है।एक बहुत बड़ी एक बहुत बड़ा अपसर्ज इंडियामें आएगा। वो भी एक बहुत बड़ा ऐसे कई मौकेआते रहे। इसलिए इंडिया तो अब समस्याओं केदौर में चला गया। उसने इनवाइट कर लिया एकतरह से और वो घुस गया। अब इससे इंडिया किसतरह से निकलेगा आने वाले 20 सालों में?2047 में जो बीजेपी के विकसित भारत कानारा है वह कभी सफल नहीं हो सकता जब तकभारत अपनी जिओपॉलिटिकल प्रायोरिटीज चेंजना करें।इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं और बहुत ही एकतरह से आगाह करने वाली और चेताने वाली औरमैं कहूंगी कुछ हद तक खतरनाक भी है। जिसतरफ आप इशारा कर रहे हैं और हम ये देख भीरहे हैं कि जो साइट चूज़ भी की है सरकार नेउसका भी क्या फायदा हुआ है। आप देखें किजिन जहाजों को निशाना बनाया गया वो भारतीयजहाज थे। जो सेलर तीन मरे उसके बाद मार्कोरूबियो ने किस तरह से कितनी बदतमीजी की हैवो भी हमने देखा है। और उसको लेकर नरेंद्रमोदी ने एक लफ्ज नहीं बोला बल्कि अहफ्रांस में जाकर वहां नाच गाने का वो मजालेते हुए नजर आ रहे हैं। अजीब तरह के कीयह सरकार है और अजीब तरह के लीडर हैं औरतमाम तरह के सवाल हैं। लेकिन ऐसा लगता हैकि बेशर्मी और ढिटाई इस उरूज पर है कि कुछभी यहां पर कहते हुए वो नजर नहीं आते।जिनको दोस्त कहते हैं वो दोस्त ही उनकेसाथ क्या कुछ कर रहा है? आखिर क्या ऐसीमजबूरी है? यह एक बड़ा सवाल लगातार जेहनमें बना हुआ है। लास्ट मेरा क्वेश्चन आपसेअमरीश जी वेरी क्विकली कि ये जो 60 दिनहैं यह 60 दिन आप कितने महत्वपूर्ण आप मानरहे हैं? क्या इस 60 दिन में बहुत कुछबहुत कुछ डिसाइड हो सकता है? और क्या आपकोलग रहा है कि क्या डोन्ड ट्रंप नवंबर तकका टाइम ले रहे हैं और उसके बाद कुछ बड़ाहो सकता है अक्टूबर में इजराइल का इलेक्शनऔर नवंबर में मिड टर्म पोल।डॉनल्ड ट्रंप इज बाइंग टाइम। यह तो तय हैऔर उनकी कोशिश रहेगी क्योंकि देखिए इसमेंएक एग्रीमेंट यह भी एक इसमें ये जो साइनहोगा 19 जून को इसमें एक और पहलू है 60दिन का पीरियड एक्सटेंड हो सकता है और इसपे ईरान भी तैयार क्योंकि ईरान भी जानताहै इस बात को कि 60 दिन में सारी चीजें तयहो जाएंगी ऐसा संभव नहीं है और 60 दिन काएक्सटेंशन इसीलिए यह कहीं ना कहीं अभी जूनहै जुलाई अगस्त सितंबर अक्टूबर वो चारमहीने भी हो सकता है गाजा का कब हुआ11 अक्टूबर 2025 को अभी तक इंप्लीमेंटनहीं हुआ है। एक साल पूरे हो जाएंगे। तोइसका मेरा मतलब है कि यह ट्रंप खींच सकताहै इसको अपने इलेक्शन तक और उस बीच मेंहालात बिगड़ भी सकते हैं। ट्रंप को कुछ औरकरना पड़ सकता है। वो लेकिन हां 60 दिन तकक्या होगा? 60 दिन के अंदर क्योंकि मेरायह मानना है कि एक जंगइजराइल और ईरान के बीच होगी। इनहीं 60दिनों के के अंदर उस जंग के बिना इजराइलमानेगा नहीं। तो ऐसी सिचुएशन में देखिएअभी हम लोग की हम लोगों की पूरी नजर इसीपे है कि जंग प्रधान पहलू है और शांति गौणपहल।इंपॉर्टेंट बात और यह जो $2 अरब डॉलर जोदेने जा रहा है ईरान को यह शायद दोहिस्सों में दिया जाएगा और यह ईरान के लिएकितना महत्वपूर्ण आप मान रहे हैं क्या इसइस डील को लेकर ये लास्ट मेरा क्वेश्चन हैआपसे क्या इस डील को लेकर ईरान में कुछअसहजता आप देख रहे हैं क्योंकि हमने देखाथा कि सैयद अराशी जो है उनके खिलाफ कुछप्रोटेस्ट हमने देखे थे लोग नाराज थे इसडील के कुछ पॉइंट्स हो सकते हैं जो ईरानजिस पर एग्री किया है जिस पर ईरान की जनतानाराज हो सकती है क्योंकि उनको ये लग रहाहै कि हम तो जीत रहे हैं कंप्लीटली तो फिरइन पहलुओं पर क्यों खासतौर पर न्यूक्लियरजो एक पहलू है इसका यूरेनियम वाला जो पहलूहै इसका उस पर ऐतराज हो सकता हैनहीं देखिए यूरेनियम वाला पहलू भी अभीस्पष्ट रूप से सामने नहीं आया क्योंकिईरान के जैसे बुशहर प्लांट है जहां पररशिया के साथ ईरान एक पीसफुल न्यूक्लियरएनर्जी का इस्तेमाल कर रहा है अपने पावरप्लांट्स बनाने के लिए बहुत सारे और कामोंमें उसकी तो बात ही नहीं हो रही है किउसको बंद किया जाए वो बहस में ही नहीं था।जो 11 टन 11 टन जो ईरान के पास यूरेनियमहै जिसको ब्रॉडली कहा जाता है उसमें भी970 पाउंड के बारे में ट्रंप चिंतित हैयानी एक टन से कम और 11 टन है। तो अब येदेखिए ईरान के पास तो रियलिस्टिकलीअमेरिका में भी लोग मान रहे हैं कि हमेशाये ऑप्शन है कि वो कभी भी न्यूक्लियर डीलकी तरफ जा सकता है। ये ये सॉरी न्यूक्लियरपावर को वो कभी भी एक एक न्यूक्लियर पावरईरान कभी भी बन सकता है। हमतो वो एक सवाल है। लेकिन यहां पर ईरानपिटिकली भी देख रहा है इस चीज को कि अगरहमने इजराइल और अमेरिका को हमने एक कम समयके लिए दूर ही कर दिया या उनमें कुछ इलाफपैदा कर दिया और चाहे वो दोबारा फिर वापसआ जाए वो जो बीज बो दिए हैं ईरान ने वोरहेंगे और अल्टीमेटली एक रप्चर होगाइजराइल और अमेरिका में जिससे पूरी दुनियाको फायदा हो।ओके। तो अभी डील होती हुई भी नजर आ रही हैऔर उसके साथ बहुत सारे इफ्स एंड बड्स अभीभी लगे हुए हैं क्योंकि इजराइलएक बात मैं क्लियर कर दूं 25 बिलियन डॉलरवाली ईरान ने कहा है कि जो उसका आधाअमाउंट 12 बिलियन डॉलर और लेबनन का सवाललेबनन से इजराइल का विड्रॉल ये अगर नहींहुआ तो 19 जून वाला मामला खटाई में पड़सकता है। तो अभी से ही आप ये देखें कि होसकता है कि वो पैसे जो है उनको वो आधे मिलजाए। लेकिन अगर इजराइल लेबनान पर हमलेकरना अपने बंद नहीं करता है जो साफ तौर परलग रहा है जो पोजीशन की पोजीशनिंग की जारही है इजराइल की तरफ से उनके की तरफ सेमीडिया का प्रेशर तमाम चीजें जो हो रहीहैं और अगर ऐसा होता है तो आप सोचिए कि 19तारीख से पहले ही कुछ और होता हुआ नजर आसकता है तो अभी भी बहुत ही फर्जाइल स्टेटमें है ये पूरी की पूरी पीस डील और इसकेलिए इंतजार अभी करना होगा| बहुत-बहुतशुक्रिया अमरीश जी आपका नाउ नेटवर्क मेंआने के लिए और अपना टाइम देने के लिएबहुत-बहुत शुक्रिया।थैंक यू।

Companion article

A deal announced, its terms not yet published

After roughly 110 days since the conflict began, the United States and Iran announced an agreement, to be signed formally in Switzerland on 19 June and then tested over a 60-day period. The host, Bushra Khanum Fahad, opened her conversation with the war historian Amaresh Misra by asking whether this amounted to a peace deal, and whether it was America's biggest defeat. Misra began with a caveat: the details have not yet been published, and for a memorandum of understanding that is when the substance emerges.

What was announced, he said, is that the Strait of Hormuz will open, gradually and under Iranian coordination, and that the American naval blockade will begin to be lifted. He noted that some ships, including one Indian vessel by his account, had already passed after coordinating with Iran. The clause he found most striking is that a final agreement is to be converted into a Security Council resolution, which, as he described it, would record that the United States will never attack Iran. "This has never happened before," he said, adding that it shows how desperate Washington was to withdraw from Hormuz.

Why he thinks Trump stepped back

Misra argued that Donald Trump's real aim was to seize Iran's Kharg Island and dominate its oil as Washington has done in Venezuela. He pointed to Trump's own remark, made a few days earlier, that the country was not up for it. Two pressures compelled a settlement, in his account. One was domestic. The other came from the Gulf, where Qatar was negotiating a separate arrangement with Iran, and where Qatar had reportedly said it would halt its own gas supplies if war resumed, in return for Iran sparing its facilities. If Qatar could settle, he reasoned, Saudi Arabia and others could follow, and Trump could not afford to see his regional partners cut their own deals.

He also described a war fought in several registers: a 40-day hot war, mostly of missiles and aircraft with no ground troops, a ceasefire on 8 April, and then a longer contest of narratives and positioning with intermittent fire. In this long contest, he said, Iran bent Washington. By the account he gave, Iran did not hit the UAE, Saudi Arabia or Qatar in a recent exchange, but did strike American installations in Bahrain and Kuwait, which he read as evidence of a deliberate strategy of splitting the Gulf states from the United States.

Lebanon, Israel and the fragility of the agreement

Misra was blunt that the agreement may not survive contact with Israel. Iran's condition is that any ceasefire covers all fronts, and he said Trump has now agreed Lebanon should be included, after Israel struck Beirut again on 14 June. Israel's government, however, is signalling that it is not bound: he cited Israel's defence minister saying it will not withdraw, and another minister calling for the deal to be rejected. Israel, he said, occupies part of southern Lebanon and, by his figures, still holds large parts of Gaza. He cited Israeli-reported figures of more than 1,200 soldiers wounded and over 30 killed in Lebanon since 2 March, and argued the real toll is higher.

That puts Prime Minister Benjamin Netanyahu in a difficult position, in his account. An election is due in October, Netanyahu's party is trailing in polls, and he cited a New York Times report that, among Israelis, opposition to Netanyahu outnumbers support three to one, with many wanting a leadership that will negotiate. Trump, he said, may be counting on that public mood.

His forecast was that several outcomes are possible and none is stable. Trump may extend the 60-day window, which Iran also expects, since a full settlement in 60 days is unrealistic; he suggested Trump is buying time until the midterm elections in November. The signing may slip. Or it may happen and Israel and Iran may then go to war over Lebanon, with Trump watching from a distance and calling for calm. He said his own expectation is a clash between Israel and Iran within the 60 days, and that Iran will try to draw the United States in, because it will not accept a return to proxy war. If Washington does not restrain Israel, he said, Iran has said it will step in itself. The host, for her part, pressed him on whether Washington could really stay out, given how tightly she sees Israel and the United States bound together, and Misra allowed that American assets remain in Israel and that the presence of American forces in the region is itself part of the 60-day negotiation.

Who won

Asked directly whether Iran is the clear winner, as many Western commentators now say, Misra answered yes, while stressing that this is only the first phase. He described a country under 40 years of sanctions, written off as weak, that forced a direct confrontation instead of the proxy wars that suited Washington, and in doing so raised the issues of Hezbollah, Gaza and Yemen. He pointed to what he said was the latest message from Iran's leadership: unity of all resistance fronts, from Yemen and Gaza to Lebanon, Iraq and Syria. He also said Russia and China had assured Iran of support from behind, noting that Trump himself thanked them, and that Vladimir Putin had recently said a war with Europe is inevitable.

In Misra's telling, Iran is now the largest power in the Middle East, having displaced Israel, and for the first time since Israel's founding in 1948 the United States and Israel appear to have a real rift, with Trump forced to use crude language about Israeli actions. Countries that once offered Palestinians only lip service, while maintaining ties with Israel, will now have to reckon with that, he suggested. He did not, however, expect a quick resolution. War, he said, is the primary condition and peace the secondary one, in the way that the twentieth century's two world wars were needed to complete the decline of European empires. The shift from a unipolar world under the United States is still unfolding, and he expects more violence.

On the nuclear question, Misra was careful. The Bushehr plant, run with Russia for civilian energy, is not in dispute, he said. As he understands it, Iran holds around 11 tonnes of enriched uranium and Trump is specifically concerned about roughly 970 pounds of it, less than a tonne. Iran, he added, can always keep the option of moving toward a bomb, and it has judged that even a temporary pushing back of Israel and the United States sows seeds that will last and may eventually cause a rupture between the two. The host raised reports of unease in Iran over the terms, including protests against Foreign Minister Abbas Araghchi, and noted Iranian claims that about $25 billion is on offer, half of it, some $12 billion, at risk if Israel does not withdraw from Lebanon. Misra did not think the uranium terms were yet clear enough to judge.

Pakistan and India

On Pakistan, Misra said the country has settled on a stance in which it repairs relations with Washington but will not abandon China, and would choose Beijing if forced. Trump knows this, he said, which is why he praises Pakistan. He predicted a coming confrontation between the United States and China, whether as a trade war or a shooting war, at which point Pakistan will have to choose.

On India, Misra said there had been a serious miscalculation, tied to the prime minister's visit to Israel on 26 February, and that the moment calls for reassessment. He was careful to say this concerns the wider Indian state, its bureaucracy and mindset, and that this same establishment has kept relations with Iran from collapsing, which limited the damage. The host said Indian-flagged ships were among those hit and criticised the government's response. Misra added that if a trade deal on agriculture with Washington is fully implemented it will cause a major upheaval in India, and he raised, as a large open question, what American and Israeli planners intend for India, saying that some in the ruling party share the worry. His conclusion was that the government's 2047 goal of a developed India cannot be met unless the country changes its geopolitical priorities.

Misra closed by cautioning against simple readings. Heroes and villains still exist, he said, but the world of simplicity is over, and the next 60 days will show how much of this agreement was substance and how much was posture.

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