Nous Podcast· 25 Jun 2026· 1:56:27

What Does Citizenship Mean for Indian Muslims? | Prof. Tanweer Fazal

Is the crisis facing Indian Muslims about more than citizenship? In this thought-provoking conversation with Asad Ashraf, Political Sociologist Prof Tanveer Fazal argues that the challenges confronting Muslims in India extend beyond legal citizenship to what is described as a broader process of d…

Full Transcript

सो दैट इज व्हाई से दैट व्हेन इट कम्स टू इंप्यूनिटी इट इज हियर वेयर द मुस्लिम केस लूजेस इट्स स्पेसिफिसिटी। अब मुसलमान अकेले ही नहीं है। जी ऑल केसेस ऑफ मास वायलेंस इन इंडिया। हां। वहां पे एक इट इट हैप्स बिकॉज़ देयर इज़ अ गारंटीड इंप्युनिटी। आप बार-बार [संगीत] आपके काम में ल्यूसिव सिटीजनशिप नाम की एक चीज आती है जो कि पेपर पर अलग है और प्रैक्टिस में अलग है। व्हाट इज हैपनिंग विथ मुस्लिम्स और हैज़ हैपेंड विथ मुस्लिम्स इज़ पॉइंट व्हिच आई हैड रेफर्ड टू अर्लियर आल्सो इज इट नॉट ओनली द सिटीजनशिप बट इट इज़ द प्रोजेक्ट ऑफ़ डीनेशनलाइजेशन। राइट? जो मुस्लिम्स का सिचुएशन [संगीत] है, जो मुस्लिम्स की पर्टिकुलर सिचुएशन है, सिटीजनशिप को लेकर, क्या ऐसे एक्सपेरिमेंट्स और भी कम्युनिटीज के साथ किए गए हैं? इट इज नॉट अ कोइंसिडेंस कि आप चाहे देखिए इकबाल या जिन्ना या इवन मौदूदी ये लोग सभी एट वन पॉइंट ऑफ टाइम वेरी क्लोजली एसोसिएटेड वि द इंडियन नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स। हम लेकिन क्या वो आईडियोलॉजी इतनी डीपली पेनिट्रेट कर गई है [संगीत] समाज में कि अब समाज में भी वह ऑटोमेटिकली हो रहा है मुसलमानों का नो वन हैज़ टू कम एंड से दैट कि मुसलमानों काइजेशन करो जो पॉपुलर आजकल यूपी से खास के निकल के आया है योगी मॉडल जिसको कहा जाता है और काफी सेलिब्रेट भी किया जाता है जी पर बुलडोजर जस्टिस है क्या इट इज़ कंप्लीट डिनायल ऑफ़ एनी कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोसेस इट इज़ अनकस्टिट्यूशनल इज़ इललीगल आप सीएए एनआरसी को इंप्लीमेंट नहीं कर पाए तो आपने एक नया फ्रंट खोल दिया है एसआईआर को और एसआईआर के थ्रू आप वही करना चाह रहे हैं [संगीत] जो आप सीए एनआरसी के थ्रू करना चाह रहे हैं। नाउ अ डेज मिस्टर असदुद्दीन ओवैसी इज ट्राइंग टू बी एज अग्रेसिवली एंड एंटी पाकिस्तान और एज अग्रेसिवली यू नो नेशनलिस्ट एस पॉसिबल ट्राइंग टू बी अ स्टेप अहेड ऑफ़ इवन द हिंदुत्व नेशनलिस्ट बट डजंट दैट डजंट मेक एनी डिफरेंस एस मच हेलो सलाम आदाब नाउ नेटवर्क के एक और पडकास्ट में आप सबका खैरमकदम है। मैं हूं असद अशरफ और आज हम जिस मौजू पर बात करने वाले हैं वो मौजू है मुसलमानों से जुड़े हुए सिटीजनशिप के सवाल और इस मौजू पे बात करने के लिए हमारे साथ मौजूद हैं प्रोफेसर तनवीर फजल। प्रोफेसर तनवीर फजल एक जानेमाने पॉलिटिकल सोशियोलॉजिस्ट हैं। जिन्होंने स्टेट, माइनॉरिटी राइट्स, एक्सक्लूजन, सिटीजनशिप जैसे फंडामेंटल इश्यूज पे कई सारी किताबें लिखी हैं। कोऑथर की हैं और एडिट भी की है। फिलहाल यह बीएएमएल मंजाल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। तो मेरा पहला सवाल आपसे यह है कि आप बार-बार आपके काम में ल्यूसिव सिटीजनशिप नाम की एक चीज आती है जो कि पेपर पे अलग है और प्रैक्टिस में अलग है। तो उसके बारे में थोड़ा सा हमें बताएंगे कि क्यों यह इंडियन मुस्लिम के संदर्भ में कॉन्टेक्स्ट में बार-बार आती है। इल्यूसिव सिटीजनशिप एक्चुअली एक मेरी हम लोग की भी हाल की किताब है अ मुस्लिम्स एंड मोबिलिटी एंड मार्जिनलिटी करके जिसमें हमने इल्लुसिव सिटीजनशिप टाइटल में ही रखा है। बट यू आर राइट कि जो मेरे काम को अगर देखा जाए तो ज्यादातर काम उसी नजरिए से सिटीजनशिप के क्वेश्चन को एड्रेस करता है। नाउ सवाल यह है कि सिटीजनशिप एज एन आईडिया जब इमर्ज किया तो इट इमर्ज विद दिस आईडिया कि सिटीजनशिप आपको क्या देता है? मेंबरशिप इन अ स्टेट लीगल मेंबरशिप। इट इज़ अस्यूम कि हर सिटीजन किसी भी स्टेट में इक्वल राइट्स एंजॉय करता है। जो इंडिया के कॉन्स्टिट्यूशन में भी एनशाइंड है। लेकिन अगर आप उसको गौर से देखें और उसको जमीन पर उतरते हुए जब देखें तो आपको लगेगा कि यह सिटीजनशिप बहुत हद तक एक शिमरा की तरह है जो है जिसकी जरूरत मतलब जो कॉन्स्टिट्यूशनल राइट टू सिटीजन बीइंग इक्वल सिटीजन वो इंपॉर्टेंट है पर वो जमीन पर उतरने की वाली बात जो उसको लेकर के कही जा सकती है वो बहुत दूर है उससे इसकी वजह बहुत है। अ समाज के अंदर जो बहुत सारी इनकलिटी है वह भी एक वजह है और उस इनकलिटी को मैं देख रहा हूं कि ओवर द इयर्स दूर होने के बजाय बल्कि रीइंफोर्स हो रही है। और समाज के अंदर के अलावा जो सरकारें हैं, जो सत्ता है, जो सियासत है वो जो एक इंस्ट्रूमेंट हो सकता था इस कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजन को इंप्लीमेंट करने का वो हाल के दौर में कम से कम एक दो डिकेड से अगर आप देखें खास करके तो इस सिटीजनशिप के नजरिए से कंप्लीटली अलग है दूरी बना रखी है। जब से खास करके हिंदुस्तान में एक हिंदुत्व रिजीम का यू नो एस्टैब्लिशमेंट हुआ है सेंटर में और बहुत सारे स्टेट्स में हम देख रहे हैं कि जो फॉर्मल जो सिटीजनशिप का यू नो प्रॉमिस है वो भी इरोड हो रहा है बहुत हद तक। यह तो छोड़ दीजिए कि माली हालात में यू नो जो एजुकेशनल स्टेटस या सामाजिक तौर पे जो भी बदहाली है उसके अलावा जो लीगल राइट्स हैं जो कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजंस हैं उसमें भी दिन प्रतिदिन देख रहे हैं कि किसी ना किसी तरह उसको कमजोर करने की कोशिश हो रही है। खास के मुसलमानों के नजरिए से अगर देखें अब आप एक जो पॉपुलर आजकल यूपी से खास के निकल के आया है योगी मॉडल जिसको कहा जाता है और काफी सेलिब्रेट भी किया जाता है। जी हमारे मीडिया के डिस्कोर्सेज में हमारे जो मेजॉरिटेरियन पॉलिटिकल डिस्कोर्स है उसमें भी और वो कहा जाता क्या है कि बुलडोजर जस्टिस। पर बुलडोजर जस्टिस है क्या? इट इज कंप्लीट डिनायल ऑफ एनी कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोसेस। इट इज अनक्स्टिट्यूशनल इज इललीगल। राइट? लेकिन हमारे ब्यूरोक्रेसी हो, पॉलिटिक्स तो है ही है। पर चाहे ब्यूरोक्रेसी हो जिन्होंने ओथ लिया कॉन्स्टिट्यूशन पे पुलिस एडमिनिस्ट्रेशन हो, जुडिशरी हो एक दो आपको कुछ इंस्ट्रशंस वगैरह बीच में आए थे। पर डिस्पाइट दैट किसी ना किसी तरह वो चल रहा है। जहां पर कि किसी को आप अक्यूज करें और जाकर के खुद ही पनिशमेंट भी दे दे। राइट? तो यह व्हेन वी टॉकिंग अबाउट इल्यूसिव सिटीजनशिप बहुत सारी इस तरह के जो मसले हैं जो जो डे टू डे जिंदगी से जुड़े हैं और आम इंसान मैं ये नहीं कह रहा हूं कि सिर्फ मुसलमान इसमें यू नो इस इल्ल्यूसिव सिटीजनशिप से परेशान हैं। बल्कि बहुत सारे और दूसरे भी कमजोर तबके पर हाल के दौर में खास के मुसलमानों के मामले में मा क्या हम देखते हैं कि अपार्ट फ्रॉम इरोडिंग देयर सिटीजनशिप राइट्स देयर इज अ कंसंट्रेटेड अटेमप्ट कि उसको उनको डीनेशनलाइज किया जाए बाय डीनेशनलाइजिंग आई मीन कि उनका जो जो क्लेम है बीइंग अ कोनल उसको ही उसको ही सवालियों के घेरे में डाल दिया गया चाहे बहुत तरह के दूसरे अलग-अलग तरह के नोमेनक्लेचर दे के उनको बाहरी बता करके उनको ट्रेटर्स बता करके उनके पेट्रियोटिज्म पे कास्टेंटली क्वेश्चन मार्क लगा के उनकी हिस्ट्रीज को डिनाई करके तो ये है व्हाट आई वुड से इन सम टोटल व्हाट वी सी इलसिव सिटीजनशिप इसका हल क्या है मुसलमानों को या आप कह रहे हैं जो दूसरे समाज के लोग भी हैं जिनको इल्यूसिव सिटीजनशिप करनी पड़ती है और कहीं ना कहीं उनके ऑन ऑन द सरफेस तो इक्वल सिटीजंस हैं कागजी तौर पे लेकिन प्रैक्टिस में नहीं है। तो ऐसी कम्युनिटीज को कैसे रिसोंड करना चाहिए इस सिचुएशन में? वन इज ऑफ कोर्स ऑर्गेनाइजिंग देमसेल्व्स। और मुझे लगता है कि इसमें सॉलिडेरिटी एक बहुत ही जरूरी और अहम चीज है। सॉलिडेरिटी अमंग्स मुस्लिम्स एज वेल एज अक्रॉस मार्जिनल कम्युनिटीज। इस सॉलिडेरिटी कई बार अटेम्प्ट हुई है पर वो सस्टेन नहीं रहती है। उसकी वजह यह है कि मुझे लगता है कि मार्जिनालिटी पे ही अभी तक हम कोई कंसेंससेस पे नहीं पहुंच पाए हैं कि मार्जिनलिटी क्या है? किस तरह से अलग-अलग कम्युनिटीज को इंपैक्ट कर रही है। क्या माली हालात की मार्जिनलिटी मार्जिनलिटी में यू नो काउंट होगी कि नहीं? क्या जो कास्ट बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन है उसको हम किस तरह से समझ रहे हैं? मुसलमानों के अंदर भी और दूसरी कम्युनिटीज में भी। हम किस तरह से जो जेंडर के बेसिस पे वायलेंस है। अगेन रूटीन डिस्क्रिमिनेशन है उसको किस तरह से एड्रेस करेंगे और इन सबके साथ-साथ जो कम्युनिटीज हैं उनकी अपनी ऑटोनोमी को को समझना विदाउट मेकिंग एनी यू नो प्रिस्रिप्टिव डिमांड ऑन देम। तो एक पॉलिटिक्स ऑफ़ सॉलिडेरिटी की जरूरत है। राइट? दिस पॉलिटिक्स ऑफ़ सेलरिटी कैन इमर्ज कोई ड्राइंग ड्राइंग रूम से या यू नो सेमिनार हॉल से तो नहीं हो सकती। ये कास्टेंटली अ डोमेन ऑफ प्रैक्टिस से ही हो सकता है कि लोग लगातार एक दूसरे के सवालों के साथ हमदर्दी रखें। उसमें एंगेज करें। राइट? अच्छा सर आपने ये भी कहा कि जो सिटीजन जो इलसिव सिटीजनशिप का मसला है वो कहीं ना कहीं इंटरनल प्रॉब्लम भी है और आपने जो पहला स्टेटमेंट जो आपका था वो आपने कहा कि ये एक इंटरनल भी सवाल है मुसलमानों के बीच में और उसको मैं थोड़ा समझने की कोशिश कर रहा हूं कि हाउ इज इट एन इंटरनल क्वेश्चन एंड विद इन मुस्लिम्स व्हाट हैपेंस कि सिटीजनशिप के सवाल है उसके नो बाय दैट आई मीन के जो मुसलमानों के अंदर बीच में भी अलग-अलग एक तो फिरके हैं और अलग-अलग तरह के उसको चाहे आप बिरादरियां हैं उनकी अपनी पहचान है। उनकी अपनी आपस की लड़ाईयां हैं वगैरह-वगैरह और आल्सो एक सोशल हरार्की भी एक्सिस्ट करती है। औरतों का सवाल है। उन सब चीज जो एक मैं ये मान ये जरूरी नहीं है कि जो वेस्टर्न मॉडर्निटी है उसी के फ्रेमवर्क से सोचा जाए। जी पर एट द सेम टाइम बहुत सारी जो आजादियां जो पसंद जो तरक्की पसंद थॉट्स हैं वो वेस्टर्न मॉडर्निटी जरूरी नहीं है कि वो वेस्टर्न मॉडर्निटी को वो इंटरनली भी इमर्ज कर सकती है बाय रेफरिंग टू द इंडियन नॉन वेस्टर्न या इवन इस्लामिक हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस राइट राइट तो जरूरत है कि वो सही वो लफज़ यूज़ किया कि तरक्की पसंद जो तहरीक हैं जी उनके साथ एसोसिएट करके और उनसे जो फिल फिलॉसफर इमर्ज किया है जी उसके साथ सीरियस इंगेजमेंट करके एक अल्टरनेटिव विज़ इमर्ज कर सकते हैं। करना सर आपकी 2014 की एक किताब है माइनॉरिटी नेशन स्टेट एंड माइनॉरिटी राइट्स और उसमें आप मुस्लिम आइडेंटिटी जिसको उसको तीन कैटेगरी में बांट रहे हैं। कौम मिल्लत और उमा थोड़ा उसके बारे में हमें बताएंगे क्या है यह कैटेगरीज और जो पोस्ट कॉलोनियल स्टेट है और जो पार्टीशन का हैंगओवर है वो कैसे इनको रीइंफोर्स करता है नहीं ये बहस जो है बेसिकली नेशनहुड के कॉन्टेक्स्ट में ज्यादा आती है जो आईडिया ऑफ़ बिलोंगिंगनेस है वगैरह जो पहले मेंशन किया था डीनेशनलाइजेशन डीनेशनलाइज करने की जो कोशिश हो रही है तो एक अराउंड लेट कॉलोनियल पीरियड में भी यह बहस बहुत तेज थी और उस उस दौरान में भी कुछ लोग अलग-अलग तरह से वतन वतन परस्ती और वतनियत या कौमत वगैरह को समझने की कोशिश कर रहे थे। रेफरेंस पॉइंट सबका विद अमंग्स द मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स खास इस्लामिक इंटेलेक्चुअल्स रेफरेंस पॉइंट इस्लामिक थियोलॉजी ही थे। दे वर ड्राइंग एग्जांपल्स फ्रॉम डिफरेंट अ इस्लामिक ट्रेडिशन और उसके साथ बाद उससे वो अपने कंक्लूजंस में पहुंच रहे थे। तो यह जो बहस थी ये इसमें आप कहिए कि आज के दौर में अगर कहेंगे तो इसमें जमात इस्लामी के फाउंडर मौजूदी हम जमीत उलमा के वन ऑफ़ द वेरी की स्कॉलर्स हुसैन अहमद मदनी और जो पोएट फिलॉसफर इकबाल मौलाना आजाद ये लोग सब वेरी डीपली दे वर डिबेटिंग व्हाट इज ये नेशनहुड का आईडिया जो क्योंकि अल्टीमेटली जो नेशन का जो कंस्ट्रक्ट है वो तो वेस्ट से आया था। राइट? वहां पे जब 16 17 सेंचुरी में काफी लड़ाईयां हो गई रिलीजन के बेसिस पे, सेक्स के बेसिस पे उसके बाद उन्होंने ये तय किया। हां। ये फार्मूला इमर्ज किया कि भाई जो जबान बोलने वाले लोग हैं उनका अपना स्टेट होगा। जी तो फ्रेंच स्टेट जर्मन स्टेट वगैरह इस्टैब्लिश हुए लेकिन उससे मसला तो हल नहीं हुआ क्योंकि इसी से माइनॉरिटी का सवाल भी इमर्ज किया कि जो लोग जर्मन स्पीकिंग पीपल लिविंग इन फ्रेंच एरियाज अब उनको किस तरह से आप ट्रीट करेंगे उनकी लॉयल्टी का क्या होगा जी वो शक के घेरे में हमेशा आ जाते थे तो इस ये बहस जो है हिंदुस्तान में भी आई जब हम वी स्टार्टेड इमेजिनिंग आवरसेल्व्स कि पोस्ट ब्रिटिश किस तरह का नेशन आएगा? क्या [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसके जो अलग-अलग कम्युनिटीज है वह किस तरह से को एक्सिस्ट करेंगे या करेंगे या नहीं करेंगे? अमंग्स मुस्लिम्स जो बहस थी वो बहस आज के दौर में भी इंपॉर्टेंट है टू सम एक्सटेंट के इस्लामिक थियोलॉजी में पॉलिटिकल थियोलॉजी खास के उसमें एक दारुल हर्ब और दारुल इस्लाम का कांसेप्ट है जो बार-बार आजकल भी कुछ लोग वो कोट करते हां निकाल के लाते हैं और कोट करते हैं। जी पर जो चीज वो कन्वीनिएंटली भूल जाते हैं कि हिंदुस्तान नहीं मुसलमानों ने और यहां पर जो इस्लामिक थियोलॉजियंस या इंटेलेक्चुअल्स रहे हैं। उन्होंने अपने इनोवेटिव कंट्रीब्यूशन भी किया है। उन्होंने कहा कि दारुल इस्लाम और दारुल हर्ब तो सही है एक जगह है। लेकिन एक दारुल अमन का भी कांसेप्ट है। राइट? और दारुल अमन वो है कि जहां दारुल इस्लाम में इस्लामिक रूल इज देयर। पीपल आर फ्री टू यू नो प्रैक्टिस देयर रिलजन एटसेट्रा दारुल हर्ब है जहां ये सब चीजों पे बंदिशें लग जाती हैं। पर दारुल अमन वो है जहां पे को एक्सिस्ट कर सकते हैं। मुस्लिम्स आर को शेयरर्स ऑफ़ पावर और मौलाना आजाद इन लोगों का यही आईडिया था कि ये शुरू होता है अगर इसकी कॉनसेप्चुअल हिस्ट्री देखें तो वी कैन गो बैक टू सर सैयद वगैरह जो दारुल अहद या दारुल अमन की बात कर रहे थे। तो जो कुछ लोग अभी आजकल ये सब कहते हैं दारुल अमन सॉरी दारुल दारुल इस्लाम वगैरह मुझे याद है कि एक पुलिस ऑफिसर तमिलनाडु में बैठे हुए हैं बीच-बीच में ये सब चीजें उठाते रहते हैं। थोड़ी भी हिस्ट्री उन्होंने पढ़ रखी है। हम लेकिन बहुत कन्वीनिएंटली इस इस हिस्ट्री के ये एस्पेक्ट को निगेट कर देते हैं। कि इंडियन मुस्लिम्स ने दारुल अहद के रास्ते को समझा और उसको थियोलॉजिकली जो है इस्टैब्लिश करने की कोशिश की और उसको उन्होंने इस्लामिक हिस्ट्री में भी जो [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रॉफेट का जो एक किसी तरह का अलायंस बना था मदीना के जस के बीच से उसको एक यू नो जिसमें प्रॉफेट ने डिक्लेअ किया कि ये भी हमारे हम वतन हैं। जी भले ही अलग रिलजन के हो जी तो इस आईडिया के साथ दारुल अहद और दारुल अमन के फाउंडेशन हुआ। तो ये बहस जो मैं कौम मिल्लत और उमा के थी उसमें मैं यही दारुल अहद के आईडिया के साथ समझने की कोशिश कर रहा था। जी तो कौम की बात तो यह है कि कई बार लोग कहते हैं कि भाई मुसलमान जो है एक कौम है जी और एक कौम जो है नेशन के साथ भी जोड़ा जाता है राइट मतलब टेरिटोरियल आईडिया है वही था हां और उमा जो है उसको उसी उम्मा के आईडिया के साथ ही मुस्लिम के की जो पेटियोटिक यू नो उनके जो अर्ज है उसको तो उसको उसके सवालिया निशान लगाया जाता है कि आप जो है अपने आप [गला साफ़ करने की आवाज़] को एक उम्मा का हिस्सा मानते हैं तो आप किसी स्टेट के किसी कंट्री के किसी टेरिटरी से एसोसिएट नहीं करेंगे करेंगे लेकिन मुस्लिम मुसलमानों के बीच में इसको लेकर के बहुत सारी हर हर कंट्री में इसको लेकर के बहुत सारे बहसें हुई हैं और बहुत तरह के इनोवेटिव आइडियाज इमर्ज की और इंडियन कॉन्टेक्स्ट में उमा को हमेशा एक स्पिरिचुअल आईडिया माना गया हम नॉन टेरिटोरियल और यह देखा गया कि ऐसा कोई कॉन्टेस्टेशन नहीं है। आप एक अच्छे मुसलमान के तौर पर हिंदुस्तान में रह सकते हैं। और एट द सेम टाइम हां अपने को रिलीजनिस्ट जो दूसरी जगहों पे हैं उनके साथ भी खास के स्पिरिचुअल मामले में नॉट नेसेसरी ऑन पॉलिटिकल क्वेश्चंस पर स्पिरिचुअल मामले में आप एक तरह से सोच सकते हैं। तो इस तरह से ये चीजें रॉल्व हुई हैं। मेरा अगला सवाल आपसे यह है कि आपने मुसलमानों के अराउंड जो सवाल हैं जो सिटीजनशिप को लेकर सवाल है आपने उसको सिख से भी कंपेयर किया है और कई पैरेलल्स ड्रॉ किए हैं और उसमें मैं ये समझना चाहता हूं कि वो डायवर्ज कहां पे करता है हम और इंडियन स्टेट जो है वो माइनॉरिटीज को अलग-अलग कैटेगरीज में ट्रीट करती है या माइनॉरिटीज को एक एक कॉमन कैटेगरी मान के ट्रीट करती है या दैट माय एक्चुअली द फर्स्ट बुक यू आर रेफरिंग टू नेशन स्टेट एंड माइनॉरिटी राइट्स कंपेरेटिव पर्सेक्टिव ऑन मुस्लिम एंड सिख आइडेंटिटीज नाउ मुस्लिम्स और सिख ये दो केसेस को मैंने स्टडी करने की कोशिश इसलिए की क्योंकि दोनों के अंदर अ एक हिस्टोरिकली एक आईडिया ऑफ नेशन इमर्ज किया था। ठीक है? हम और वो उसका कोई थियोलॉजिकल नेसेसरी ओरिजिन नहीं था। उसका पॉलिटिकल एंड सोशल ओरिजिन ही था। पर अ व्हाट इज इंटरेस्टिंग इज कि इन प्रीडमिनेंट हिंदुत्व डिस्कोर्स और टू सम एक्सटेंट ये डिस्कोर्स जो है इंडियन नेशनलिस्ट इससे भी एग्री या कन्वर्ज कर जाता था कि अगर आप उसको यू नो एनालाइज करें, एनालिटिकली सेपरेट करें। तो देखिए कि माइनॉरिटी ऑलदो देयर इज अ लिस्ट ऑफ माइनॉरिटीज इन इंडिया नेशनल माइनॉरिटीज। उसमें मुस्लिम्स भी हैं, सिख्स भी हैं। अब शायद जैस भी आ गए हैं। बुद्धिस्ट हैं वगैरह-वगैरह। लेकिन ऑन मेनी काउंट्स देयर इज़ अ डिस्टिंशन मेंटेन बिटवीन रिलीजंस व्हिच आर ऑफ इंडियन ओरिजिन एंड दोज़ व्हिच आर कंसीडर्ड टू बी ऑफ़ नॉन इंडियन ओरिजिन। और यह एक्चुअली दिस आईडिया ऑफ डिस्टिंशन बिटवीन रिलीजंस ऑफ डिफरेंट काइंड्स एंड देयर फॉर पीपल हु आर डेयर टू दोज़ रिलीजंस। यह शुरू होता है सावरकर के हिंदुत्व के पब्लिकेशन के बाद। पर उसका इन्फ्लुएंस काफी रहा है इंडियन थॉट में। तो द होल आईडिया वाज़ कि दोज़ हु आर ऑफ़ नॉन अब्राहमिक ओरिजिन। देयर फादर लैंड्स लाई आउटसाइड ऑफ इंडिया एंड देयर फॉर दे कैन नॉट बी ट्रस्टेड ऑन काउंट ऑफ देर लॉयल्टी और कुछ लोग तो इस हद तक जाकर कहते थे कि इनको सेकंड क्लास सिटीजन बना दिया जाए लाइक गोलवर्कर और सब वर्कर वगैरह वो चीजें अब इन प्रैक्टिस रिवील हो रही है। तो यह दो सेपरेट केसेस मैंने इसलिए लिया था कि एक तो है ऑफ इंडिक या इंडियन ओरिजिन सो कॉल्ड और दूसरा सो कॉल्ड ऑफ नॉन इंडिक और नॉन इंडियन ओरिजिन अब्राहमिक एंड नॉन हां दैट वे यू कैन से एंड देन ट्राई टू सी दैट इन दोनों के बीच में जो पॉलिटिकल आइडेंटिटी है उस किस तरह से डेवलप हुई हिस्टोरिकली और हमने देखा कि दोनों मुसलमानों में भी एक टाइम में ऐसा दौर था जब अपने आप को एक सेक्शन ऑफ़ मुस्लिम्स लुक सीइंग देमसेल्व्स एस डिस्टिंक्ट नेशन। दे हैड सर्टेन आर्गुमेंट्स व्हिच मे बी टुडे इंपेरिकली नॉट वेरी वैलिड। अ उसी तरह से सिखों के अंदर भी जो बाद में हमने देखा कि खिस्तान का आईडिया आया। उसका ओरिजिन जो है बोथ मुस्लिम नेशनलिज्म एज वेल ऐ सिख नेशनलिज्म। दोनों का ओरिजिन जो है वो डिस्कोर्सेस अराउंड पार्टीशन जो हो रहे थे वो ऑल कम्युनिटीज़ वास लुकिंग एट अ फ्यूचर एंड दे वर अनश्योर के हाउ विल इंडियन नेशनलिज्म अकोमोडेट देयर कंसर्न्स। सो सम हु फ्ट दैट इट इज़ इनकेबल ऑफ़ अटेंडिंग टू देयर कंसर्न्स। तो उन्होंने अपना अलग रास्ता एडवोकेट किया। इट इज़ नॉट अ कोइंसिडेंस कि आप चाहे देखिए अगवाल या जिन्ना या इवन मौदूदी ये लोग सभी एट वन पॉइंट ऑफ टाइम इन वेर वेरी क्लोजली एसोसिएटेड वि द इंडियन नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स अ जिन्ना वास सेक्रेटरी ऑफ़ तिलक मौदूदी रोट अ बायोग्राफी ऑफ गांधी अह एंड देन द इकबाल साहब ऑफ कोर्स वाज़ वन वन ऑफ़ दोज़ वेरी की फिगर्स इन टर्म्स ऑफ़ सारे जहां से अच्छा है। हां उस जो हु रोट द नेशनल सॉन्ग एंड ऑल दैट बट एट सम पॉइंट अ वो चीजें समझनी जरूरी थी ये कि इट इज़ नॉट समथिंग इंस्टिंक्टिवली देयर इन द इस्लामिक थॉट और नॉन अब्रहमिक रिलजन बट पॉलिटिक्स टेक्स अ कोर्स और ये पॉलिटिक्स कोई आइसोलेशन में नहीं है। वह पॉलिटिक्स इन कॉन्टेस्टेशन विद द नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स है और वहां पर वह जहां पर देखते हैं कि वीकनेसेस हैं दे सम ऑफ देम शिफ्ट टू अ डिफरेंट आईडिया दे स्टार्ट ड्रीमिंग डिफरेंटली। यही कोर्स जो है वी सॉ इन द सिख मूवमेंट एज वेल। अह अल्टीमेटली आई एम नॉट वन हु वुड एडवोकेट रिलीजियस नेशनलिज्म। राइट? आई वुड सी से दैट इनफैक्ट अह इट इज़ एन अनसस्टेनेबल आईडिया। राइट? और और देयर फॉर मैं तो अपने जो नेशन स्टेट एंड माइनॉरिटी राइट्स वाली किताब है उसमें आई हैव ट्राइड टू फॉलो माय यू नो अ सुपरवाइजर प्रोफेसर टी के वुमंस वर्क राइट वेयर ही हैज़ एम्फेसाइज अपॉन द आईडिया ऑफ़ मल्टीीनेशनलिज्म। आज की डेट में इस पे बात करने ही एंटीनेशनल माना जाएगा। जी पर इट इट इट एक्चुअली वाज़ एन आईडिया व्हिच सेड कि एवरीवन आइडेंटिटी एटसेट्रा कैन बी अकोमोडेटेड विद इन अ सिंगल स्टेट सिस्टम एंड सो इन दैट सेंस अ इंडिया एज एन अकोमोडेटिव नेशनलिज्म वुड वुड बी अ मल्टीीनेशनलिस्ट प्रोजेक्ट व्हिच वुड वर्क फार बेटर देन अ नेशनलिस्ट आईडिया तो सिख और और मुस्लिम नेशनलिज्म जो है अल्टीमेटली इवन इफ मुस्लिम नेशनलिज्म सक्सीड इस्टैब्लिशिंग पाकिस्तान बट इट डिड नॉट सेटल पाकिस्तान प्रॉब्लम्स राइट 71 में वो एक लैंग्वेज के क्वेश्चन पे अलग हो गए और वो सवाल अभी भी पाकिस्तान के अंदर है। फाइव नेशनलिटीज हैं। वहां भी बलूचिस्तान है वगैरह-वगैरह है। और कहते हैं कि पाकिस्तान नहीं है, पंजाबिस्तान है। सो मच ऑफ़ पंजाबी डोमिनेशन। दूसरी तरफ सिख नेशनलिज्म कुछ दिन तो चला लेकिन उसके बाद अमंग्स द सिक्स देमसेल्व्स आल्सो एंड देयर वर डिफरेंसेस एंड इट कुड नॉट बी सस्टेंड द आर्गुमेंट व्हिच आई वाज़ ट्राइंग टू पुट फॉरवर्ड इज़ दैट रादर देन यू नो सीइंग अह नॉन अब्राहमिक रिलीजंस एज़ इन एस इंट्रिंसिकली जो है डिसलॉयल और समथिंग लाइक दैट यू यू शुड कंसंट्रेट ऑन द अनफोल्डिंग ऑफ़ हिस्ट्री एंड पॉलिटिक्स एंड देन यू ट्राई टू अंडरस्टैंड यू विल कम टू बेटर रिजल्ट्स आफ्टर ऑल व्हाई डिड सिक्स स्टार्ट सीइंग देमसेल्व्स एस अ डिफरेंट नेशन राइट है ना तो तो अ इफ दे वर ऑफ हिंदू ओरिजिन इफ दे वर ऑफ़ इंटीग्रेटेड टू द इंडियन नेशनलिस्ट आइडिया तो उसकी समझ अब हम तभी कर सकते हैं इफ वी लीव द थियोलॉजिकल आईडिया एंड गो इनू द डोमेन ऑफ पॉलिटिक्स हिस्ट्री मे बी पॉलिटिकल इकॉनमी टू फाइंड द आंसर राइट सर मुस्लिम नेशनलिज्म कहीं ना कहीं जो मुस्लिम पॉलिटिकल थॉट है वहां से निकलता भी है लेकिन जो सिख सिख सिख नेशनलिज्म है वो क्या उनके धार्मिक जो अंडरस्टैंडिंग है वहां पर उसका स्पेस है सिख सिख नेशनलिज्म का और क्या उस बेस जो बेसिस था सिख नेशनलिज्म का जो खिस्तान का पूरा मूवमेंट था हिंदुस्तान में उसकी बेसिक वजह क्या थी इज इट जस्ट बिकॉज़ मुस्लिम्स गॉट अ डिफरेंट कंट्री एंड दे थॉट दैट इक्वल शेयर वाज़ नॉट गिवन टू देम एंड देयर फॉर दे डिमांडेड अदर स्टेट फॉर सेक्स टू और इज़ इट समथिंग इंट्रेंसिक टू देयर ओन रिलजन एंड कल्चर व्हिच लेड टू द डिमा कमांड ऑफ खिस्तान नथिंग इंट्रिंसिक टू रिलजन बट अगेन आई वुड से कि द पॉलिटिक्स पोस्ट पार्टी पार्टीशन एंड पोस्ट पार्टीशन पॉलिटिक्स इफ वी सी द थिएटर इज पंजाब पंजाब वाज़ अ स्टेट अ लार्ज स्टेट वि थ्री प्रीडमिनेंट कम्युनिटीज रिलीजियस कम्युनिटीज द हिंदूस द मुस्लिम्स द लार्जेस्ट बीइंग द मुस्लिम्स द सिख एस वेल वंस द पार्टीशन टूक प्लेस ईस्ट एंड वेस्ट पाकिस्तान द मुस्लिम पापुलेशन एंटायरली फ्रॉम ईस्ट पंजाब मूव्ड इंटू द वेस्ट पंजाब इट वास टोटल ऑलमोस्ट ट्रांसफर पपुलेशन इनफैक्ट पार्टीशन इंपैक्टेड डीपली ओनली टू स्टेट्स ऑफ इंडिया बंगाल एंड पंजाब अह सो नाउ इट इट कंप्लीटली नाउ चेंज द डेमोग्राफी देयर द सिक्स हु व अरर्लियर सीइंग देमसेल्व्स एस पार्ट ऑफ इन सम सेंस द इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कोर्स नाउ वर इन पंजाब बट इन अ लार्जर पंजाब व्हिच आल्सो इंक्लूडेड पार्ट्स ऑफ़ हरियाणा एंड पेप्सू स्टेट्स एंड यू नो हिमाचल प्रदेश एटसेट्रा दे वर स्टिल अ माइनॉरिटी सो सिक्स फेल्ट एट सम टाइम एंड लॉट ऑफ इट इज आल्सो अराउंड द क्वेश्चन अबाउट बिकॉज़ इट्स लार्जली एन एग्रीकल्चरल स्टेट एंड मोस्ट ऑफ द सिक्स व पर्टिकुलरली द डोमिनेंट सिक्स वर जाट्स अह द क्वेश्चन ऑफ यू नो इरीगेशन कनाल वेरियस अदर क्वेश्चंस वर आल्सो वेरीेंट फॉर देम तो सेक्स स्टार्टेड फीलिंग एट सम पॉइंट ऑफ़ टाइम कि अनलेस एंड अंटिल दे हैव अ स्टेट ऑफ़ देयर ओन दे विल नॉट बी एबल टू मेंटेन देयर डिस्टिंक्टिवनेस इन अ इन अ मल्टीकल्चरल इंडिया एंड पंजाब वाज़ द सेक्रेट लैंड। राइट? सो फर्स्ट दे स्टार्टेड पंजाबी सुबह मूवमेंट 1960 उसमें ये आर्गुमेंट था कि पंजाबी बोलने वाले एरियाज जो हैं उनको अलग कर दिया जाए। दे फेल्ट कि आफ्टर दैट सिक्स विल कम इंटू अ मेजोरिटी। व्हिच हैपेंड व्हिच अल्टीमेटली आफ्टर बट दैट पंजाबी सुपर मूवमेंट आल्सो टूक एट ऑल। उसमें कुछ वेरी प्रीडम प्री प्रोमिनेंट सिख गुरु एंड ज्ञानीज दे हैड टू फतेह सिंह वगैरह उनकी जाने चली गई अल्टीमेटली दे सक्सीडेड देयर पर एट द सेम टाइम एक बड़ा सिख डायस्पोरा तैयार हो गया था राइट व्हिच वाज़ आल्सो लुकिंग टुवर्ड्स सम काइंड ऑफ़ अ यू नो स्पेस व्हिच इज़ एक्सक्लूसिवली फॉर फिजिक्स हां तो वो वो एक शुरू हुआ बट देयर वाज़ आल्सो अ लॉट ऑफ़ मिस हैंडलिंग फ्रॉम द इंडियन साइड अल्टीमेटली ऑपरेशन ब्लू स्टार एटसेट्रा तो सिख नेशनलिज्म वाज़ अ शॉर्टलिव्ड वन पर सिख नेशनलिज्म इज़ स्टिल देयर व्हाट इज़ नॉट देयर इज़ द सेपरेटिज़्म सेपरेटिज़्म हां तो वो द आईडिया कि सिख आर पंजाबी दे कॉल इट एट आई रिमेंबर फकरी कौम लेट इज़ सेपरेट डिस्टिंक्ट नेशन द वर्ड कॉम इज यूज्ड इन देयर एस वेल तो वो आईडिया अभी भी है एंड दैट इज द रीज़न व्हाई दे डोंट वांट टू बी कोऑप्टेड विद इन अ लार्जर हिंदुत्व आईडिया हां तो बट एट द सेम टाइम सेपरेटिज्म इज़ नॉट इंसिस्टेड अपॉन बिकॉज़ दे फाउंड दैट इट वाज़ फ्यूटाइल राइट अह लॉट ऑफ़ लाइफ्स आर लॉस्ट एंड एट द सेम टाइम टू फॉर अ डिस्टिंक्ट पंजाब एस अ सेपरेट स्टेट टू सर्वाइव एंड एक्सिस्ट विल बी अ चैलेंज आई थिंक। सो हम सो दैट वाज़ वन वे इन व्हिच सो द होल थिंग इज़ अह टू से दैट वेल इट इज़ नॉट नेसेसरली द थियोलॉजी नॉट रिलीजन बट वी हैव टू एड्रेस द क्वेश्चन ऑफ़ पॉलिटिक्स द क्वेश्चन ऑफ़ हिस्ट्री अह द क्वेश्चन ऑफ़ अगेन पॉलिटिकल इकॉनमी एटसेट्रा एंड देन अंडरस्टैंड अह दीज़ काइंड्स ऑफ़ अह मोबिलाइजेशंस। तो शायद हम कुछ और बेहतर समझदारी पर पहुंच पाएंगे। राइट सर सर आपने बात करी टीम साहब की और आपने बोला कि मल्टीपल नेशनलिटीज विद इन अ नेशन स्टेट रह सकती है और एक साथ एक तरफ हम बात कंपोजिट नेशनलिज्म की कर रहे थे जहां पे अलग-अलग तरह के लोग जो है एक नेशनल आईडिया के साथ वो हिंदुस्तान के साथ साथ रहे और हम लोगों ने इस प्रोजेक्ट को माना था कि ये एक सक्सेसफुल प्रोजेक्ट रहेगा जिसमें सबको अकोमोडेट कर लिया जाएगा एंड टू बी वेरी असर्टली सेइंग दैट कि वी पर्सनली रिजेक्ट द [नाक से की जाने वाली आवाज़] थ्योरी ऑफ़ पार्टीशन एंड एनी थ्योरी ऑफ़ ससेशन फ्रॉम ऑफ द इंडियन स्टेट और और द स्टेट फॉर दैट मैटर। लेकिन कमियां कहां रह गई थी कंपोजिट नेशनलिज्म में कि हिंदुत्व इतना ज्यादा उजागर हो गया और इतना मजबूत फोर्स बनके आज के टाइम में इस्टैब्लिश कर लिया अपने आपको कि एक तरह से पूरे स्टेज स्टेट को कैप्चर कर लिया राइट इट्स अ गुड क्वेश्चन व्हिच यू रेस्ड एंड दिस इज़ समथिंग व्हिच आई हैव बीन आर्गुइंग एंड मतलब इट डजंट कट आइस अमंग्स मोस्ट पीपल पर जैसे मैंने पहले भी कहा है कि हिस्ट्री इज़ वेरीेंट वी हैव टू पे अटेंशन टू द क्वेश्चन ऑफ़ हिस्ट्री एंड नॉट [नाक से की जाने वाली आवाज़] नेसेसरी टू टेक अ रिवेंज। हिस्ट्री शुड नॉट बी वेपनाइज्ड बट एटलीस्ट टू अंडरस्टैंड थिंग्स बिकॉज़ विदाउट दैट प्रोबब्ली इफ वी डू नॉट कम टू एनी एक कंप्लीट अंडरस्टैंडिंग तो चीजें हाफ बेक ही रह जाती हैं। राइट। अब जहां तक कंपोजिट नेशनलिज्म का सवाल था, आई थिंक इट सर्व मोर एज अ स्लोगन सम अमाउंट ऑफ कमिटमेंट बट वाज़ नॉट यू नो इवन अमंग्स दोज़ हु द प्रोपोनेंट्स ऑफ़ कंपोजिट नेशनलिज्म। उनके बीच में भी वो पूरी तरह से कन्विक्शन नहीं था। इस वजह से ही एक मेजॉरिटेरियन टेंडेंसी शुरू से ही रही। और पार्टीशन का रीजन भी पार्टली वो था। जी। दोज़ हिस्टोरियंस वुड से कि भाई एक मुस्लिम नेशनलिज्म या मुस्लिम लीग वगैरह एकतरफ़ा ही एक अभियान चला रखा था उन्होंने। पीपल लाइक आयशा जलाल एंड ऑल वुड हां वुड हैव अ डिफरेंट व्यू। और इन एनीवेज़ कॉमन सेंस वुड आल्सो टेल यू कि दो हाथ से एक हाथ से ताली तो बजती नहीं है। राइट? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो व्हाट वाज़ देयर? व्हाई डिड दैट क्वेश्चन व्हिच आई रेड्ड अर्लियर कि इकबाल जिन्ना ऑल द प्रॉमिनेंट फिगर्स ऑफ सेपरेटिज्म इफ यू से व्हाई वर दे ऑल नेशनलिस्ट अर्लियर एंड व्हाट वास दैट मोमेंट ऑफ़ ब्रेक व्हाई डिड दे स्टार्ट थिंकिंग डिफरेंटली और उस वो पीरियड को उस उस दौर की पॉलिटिक्स को समझे बिना हम आज के दौर में जो राइज ऑफ हिंदुत्व एक फैशिस्ट टेंडेंसी इन इंडियन पॉलिटिक्स इमर्ज किया है उसको समझने में इनकंप्लीट रहेंगे। तो मेरी तो यह समझदार है कि अगर आप कॉन्स्टिट्यूशन असेंबली डिबेट्स देखें, डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स देखें, बहुत सारे कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविज़ंस भी हैं जो कि एक मेजॉरिटेरियन टेंडेंसीज को यू नो उसके साथ फ्लर्ट भी करते हैं और उसको उसको अकोमोडेट भी करते हैं। अब देखो हिंदी का सवाल है जैसे लैंग्वेज का क्वेश्चन था एक आईडिया जो इंडियन नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स से इमर्ज किया था कि भ एक जबान होगी जो हिंदुस्तान के अलग-अलग जबानों से मिलजुल के बनी हुई हिंदुस्तानी होगी। लेकिन आते-आते उसको हिंदी कर दिया गया और उसमें भी अंडरलाइन किया गया कि हिंदी ड्रॉन लार्जली फ्रॉम संस्कृत एंड पार्शियली फ्रॉम अदर लैंग्वेज। हम यही नहीं 1955 में इफ आई एम करेक्ट एक संस्कृत कमीशन इंस्टीट्यूट किया गया। संस्कृत कमीशन का अ जो टर्म्स ऑफ रेफरेंस था उसमें ये था कि टू सी वेदर संस्कृत कैन बिकम द नेशनल लैंग्वेज ऑफ़ इंडिया। अब हमें पता है कि संस्कृत का क्या है? वो इट इज़ नॉट अ स्पोकन लैंग्वेज। इट इज़ नॉट अ वर्किंग लैंग्वेज। बट एट द सेम टाइम एक काफी तरह का इमोशनल एसोसिएशन विद संस्कृत है। एंड सरप्राइजिंगली दिस संस्कृत कमीशन जो है उसने रेकमेंड किया कि हां संस्कृत इज द ओनली लैंग्वेज इन इंडिया व्हिच डिर्व्स टू बी द नेशनल लैंग्वेज बिकॉज़ एव्री अदर लैंग्वेज ड्रॉ सम वोकैबलरी और द अदर फ्रॉम संस्कृत। थैंकफुली वो नहीं हुआ क्योंकि वो शायद प्रैक्टिकल नहीं था। इस वजह से उसको नहीं लाया जाएगा। इसी तरह से जो हम आर्टिकल 341 देखते हैं अ खास करके जिस जो सवाल जो शेड्यूल कास्ट का है हम उसमें हम देखते हैं किस तरह से क्रिश्चियन और मुस्लिम दलित्स को उससे बाहर कर दिया गया। दो ही उसमें कंसेशन किए गए हैं। उसमें साफ-साफ लिखा हुआ है क्लॉज़ थ्री में कि जो अनटचेबल कास्ट वो हैं जो हिंदू धर्म से निकलते हैं। बट दो कंसेशन उसमें किए गए। एक था सिख 1956 में सम सिख कास्ट व इंक्लूडेड एज अ शेड्यूल कास्ट। राइट? एंड देन 1990 में वीपी सिंह के सरकार के टाइम में न्यू बुद्धिस्ट को भी वो इंक्लूड किया गया। इफ यू सी द पैटर्न क्रिश्चियन एंड इस्लामिक कम्युनिटीज हु अदरवाइज फॉलो सेम काइंड ऑफ ऑक्यूपेशन वो सफर करते हैं उसी तरह के ह्यूमिलेशन से पर इसके बावजूद वो उसमें अकोमोडेटेड नहीं होंगे और एज अ रिजल्ट व्हेन यू कंपेयर दीज़ कम्युनिटीज़ हु आर अ क्रिश्चियन और मुस्लिम ओरिजिन एंड देयर सिमिलर काइंड ऑफ़ ऑक्युपेशंस व्हिच अदर्स डू और यूज़्ड टू डू अर्लियर रिजर्वेशन के बेनिफिट की वजह से वहां पे एक तरह का मतलब मोबिलिटी अपवर्ड मोबिलिटी हुई है जो मुसलमानों में खास करके बिल्कुल एब्सेंट है। जी तो वी अगेन सी दैट सेम डिस्टिंशन द हिंदुत्व डिस्टिंशन बिटवीन द अब्राहमिक एंड नॉन अब्राहमिक रिलीजंस इज़ वेरी वेरीरी एविडेंट इन द कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविज़न। राइट? तो इसी तरह से बहुत सारे डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैं जो उस डायरेक्शन में जाते हैं। और अपार्ट फ्रॉम दैट सून आफ्टर द अस्ट इंडिपेंडेंट गवर्नमेंट वाज़ इस्टैब्लिश्ड। इवन व्हेन नेहरू वाज़ द प्राइम मिनिस्टर वी सी दैट एट द स्टेट लेवल बहुत सारे ऐसे लॉज़ पास हुए जो प्रीडमिनेंटली वो हैं जैसे कि एंटी कन्वर्शन लॉ जैसे कि एंटी काउस लॉटल लॉ वगैरह जो कि अकोमोडेट करते हैं टेंडेंसी उनके कंसर्न्स को तो दैट इज व्हाई आई से कि इवन इफ कंपोजिट नेशनलिज्म वाज़ देयर कंपोजिट नेशनलिज्म इफ इट वी सी अंडरस्टैंड इट इट इट बिटड इट्स ओन आईडिया राइट इट वाज़ नॉट अकोमोडेटिव टू द एक्सटेंट इट शुड हैव बीन इंडिया इज़ अ ह्यूजली डवर्स कंट्री रिलीजियस डायवर्सिटी के अलावा लिंग्विस्टिक डायवर्सिटी वगैरह भी बहुत ज्यादा है और इसके बावजूद अह इट एट द सेम टाइम आई मस्ट टेल यू कि जो एक एक यू नो नेशनलिस्ट थिंकिंग होती है कि हम होमोजेनिटी ले आएंगे तो उससे जो है जो लॉयल्टी वगैरह का सवाल रिॉल्व हो जाएगा। स्टेट की तरफ पीपल हु आर पार्ट ऑफ अ सिमिलर काइंड ऑफ़ अ कल्चरल प्रैक्टिस, सिमिलर काइंड ऑफ़ रिलीजन, लैंग्वेज, एटसेट्रा दे विल बी मोर लॉयल। कम बनिस्बत दूसरों के। लेकिन फैक्ट ऑफ द मैटर डायवर्सिटी आल्सो ब्रिंग्स इन स्टेबिलिटी। आज की डेट में दिस इज़ अ रियलिटी। डिस्पाइट द फैक्ट कि देयर इज़ ह्यूज यू नो इनकलिटी इन इंडिया। डिस्पाइट द फैक्ट दैट अह देयर इज़ अ ह्यूज अनइवन डेवलपमेंट। हम देयर आर सर्टन स्टेट्स बंगाल, बिहार, आसाम यू कैन नेम अस फ्यू मोर हम कंपेयर टू दोज़ हु ऑन द वेस्टर्न कोस्ट्स गुजरात, महाराष्ट्र या सदर्न स्टेट्स देयर पर कैपिटा इनकम, देयर यू नो वेल्थ, देयर यू नो प्रोस्पेरिटी कोई कोई कंपैरिजन ही नहीं है। डिस्पाइट ऑल दीज़ अनइवन यू डू नॉट हैव अ दोज़ काइंड्स ऑफ टेंडेंसी व्हिच वेरियस अदर कंट्रीज इन द वर्ल्ड हैव फेस एंड दिस इज़ वन ऑफ द रीज़ंस इज़ बिकॉज़ ऑफ़ द डायवर्सिटी बिक इट अ तो तो बिकॉज़ ऑफ़ द डायवर्सिटी एक ऑर्गेनाइज्ड काइंड ऑफ जो हमने देखा बांग्लादेश में हुआ जो हमने देखा नेपाल में हुआ श्रीलंका में हुआ वो हिंदुस्तान में शायद उसी उस हद तक मुश्किल है और इसलिए जो लोग इस तरह की सोच छोटी सोच नैरो थिंकिंग ये है कि सबको वन लैंग्वेज वन वन नेशन वन कल्चर वन पीपल वगैरह जो है वो काउंटर प्रोडक्टिव है। इनफैक्ट दे शुड रियलाइज कि इट इज़ डायवर्सिटी व्हिच इज़ गिविंग सस्टेनेंस टू द स्टेट रादर देन होमोजेनिटी। सर वी आर टॉकिंग अबाउट सिटीजनशिप राइट्स। वी आर टॉकिंग अबाउट इनकलिटी इट्स वेरी ऑब्वियस दैट द क्वेश्चन ऑफ़ मुस्लिम पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन आल्सो कम्स टू द फोर। और मुस्लिम पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन जब भी जब भी होने की कोशिश की गई है वो पूरी तरह से हुआ भी है या नहीं हुआ है लेकिन आईडिया के आईडिया के तौर पे आज भी इवॉल्व आज भी जिंदा है और जहां पे एक हमारे हैदराबाद के एमपी जो है उसको कहीं ना कहीं मटेरियलाइज करने की कोशिश करते हैं। तो पहले शबुद्दीन साहब थे जो उस आईडिया पर काम करने की कोशिश कर रहे थे। तो ऐसे मोबिलाइजेशन को आप कैसे देखते हैं? ये क्या फ्रूटफुल हो सकते हैं कम्युनिटी के लिए? और मेरा दूसरा सवाल वहीं से यह निकलता है कि एक तरफ तो हमें एक तरफ तो यह समझने की कोशिश कि यह कम्युनिटी के लिए वाकई फ्रूटफुल है या नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ जो सेकुलर लेंस से भी हम ऐसे मोबिलाइजेशन को देखते हैं तो कहीं ना कहीं हम उनको हम उनको सस्पेशन के नजरिए से देखते हैं और जो कांसेप्ट ऑफ उ्मा है सॉरी जो कांसेप्ट ऑफ कौम है और कौम का कांसेप्ट वहां पे फिर आ जाता है कि अगर मुस्लिम पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन होता है तो वो कहीं वापस वही स्थिति ना पैदा हो जाए जो 1947 से पहले थी। नाउ फर्स्ट ऑफ ऑल इन अ डेमोक्रेसी अ पॉलिटिक्स विल टेक डिफरेंट शेड्स राइट कोई एक तरह का प्रिस्रिप्टिव पॉलिटिक्स आप कहते हैं कि यही होना चाहिए दूसरा नहीं होगा वो तो पॉसिबल नहीं है इन अ इफ इट इज़ अ ट्रूली अ डेमोक्रेसी राइट तो कुछ ऐसे भी होंगे पॉलिटिकल प्रक्सेस जो कि से फॉर एग्जांपल क्लास बेस्ड होंगे कम्युनिस्ट काइंड ऑफ़ पॉलिटिक्स थे जो वर्किंग क्लास का सवालों को सबसे इंपॉर्टेंट सवाल के तौर पर उठाएंगे। वो अपने मीन्स एंड मैकेनिज्म्स भी डेवलप करेंगे उस पॉलिटिक्स को आर्टिकुलेट करने का। कुछ ऐसे होंगे जो जो इंडियन इसमें कास्ट के सवाल को सबसे जरूरी सवाल समझते हैं। उनको लगता है कि हर चीज जो है सब कास्ट के ही आपके अराउंड है। और वही सबसे प्रॉमिनेंट ये है और उसी के बेसिस पे पॉलिटिक्स भी ऑर्गेनाइज होनी चाहिए। एंड देयर आर अदर्स आल्सो व्हिच कुड फील दैट रिलीजन इज वेरीेंट एंड पर्टिकुलरली इन दिस सिचुएशन व्हेन देयर इज़ अ आई वुड से अ मेजोरिटेरियन ऑन स्लॉट हिंदुत्व मेजॉरिटेरियन ऑन स्लॉट ऐसे सिचुएशन में रिस्पांससेस कैन बी वैरिड माइनॉरिटीज़ माइट सी और सी यू कैन से रिफ्यूज इन सर्टेन काइंड ऑफ़ कम्युनिटेरियन डिस्कोर्स। क्यों ना कि एक्सक्लूसिव पॉलिटिक्स वगैरह की तरफ ही ड्रॉ मतलब ड्रॉन हो सकते हैं। तो टू सी देम विद सस्पिशन तो वो तो मतलब कि कंप्लीटली यू नो अनएक्सेप्टेबल है क्योंकि इफ यू इफ यू रियली अ डेमोक्रेसी इफ यू थिंकिंग अबाउट डेमोक्रेसी इन दैट सेंस इट कैन नॉट टेक अ सिंगुलर पाथ। उसका वो तो प्लूरलिटीज ही होती है उसमें। अ पर एट द सेम टाइम जो मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में डवोर्स है और मुसलमान भी यहां पे अलग-अलग हां और एक्सपीरियंसेस भी उनके अलग हैं। एक्सपीरियंसेस अलग हैं। जैसे कि मैं जब बिहार और ये नॉर्थ इंडिया के मुसलमानों को देखता हूं। तो आई कैन से कि इट्स अ थर्ली एमावरिश्ड कम्युनिटी। एक स्माल सेक्शन ऑफ़ एलिट फॉरेशन है। जी। जी लेकिन 80 टू 90% मुसलमान जो है वो खास के अर्बन पावर्टी देखो ह्यूज अमंग मुस्लिम्स जी लेकिन अगर आप यहां से डाउनवर्ड्स आप चले जाइए साउथ वगैरह की तरफ तो आपको कुछ दूसरा नजारा दिखेगा खास केरला में या जो हैदराबाद का एक पार्ट है वगैरह तो वहां लगेगा कि वो मुसलमान सिर्फ गरीब ही नहीं होते हैं दे कैन बी ऑफ डिफरेंट काइंड दे आर इन बिनेस दे आर इन प्रोफेशंस दे आर रनिंग देर ओन इस्टैब्लिशमेंट सब चीज है। तो उसी तरह से पॉलिटिक्स भी जो है मुसलमानों की भी अगर पॉलिटिक्स होगी तो हर जगह उसके अपने डिफरेंट कंसर्न्स होंगे। द प्रॉब्लम वि हैदराबाद मॉडल राइट? कि वो हैदराबाद के लिए सूटेबल हो सकता है। लेकिन वो बिहार के लिए भी सूटेबल हो, बंगाल के लिए भी सूटेबल हो क्योंकि यहां का एक्सपीरियंस अलग है। अलग-अलग एक्सपीरियंस [गला साफ़ करने की आवाज़] है? हां। जैसे बिहार में एक लॉन्ग पीरियड ऑफ़ सोशलिस्ट पॉलिटिक्स रही है। जी और जिसमें कि अह वही डिफरेंट ग्रुप्स कम्युनिटीज़ एंड मुस्लिम्स हैव जनरली बीन पार्ट ऑफ़ दैट सोशलिस्ट आईडिया। लाइक टू स्टॉप यू ओवर देयर एंड देन अ क्वेश्चन कम्स फ्रॉम देयर कि अ डिस्पाइट द फैक्ट कि बिहार में एक सोशलिस्ट पॉलिटिक्स रही है। बंगाल में भी लेफ्ट की पॉलिटिक्स बहुत टाइम तक डोमिनेट की है। लेकिन हम दोनों स्टेट्स को उठा के देखते हैं और उनके माइनॉरिटीज के इंडिकेटर्स को देखते हैं तो दोनों जगह बहुत ही बैकवर्ड कम्युनिटी रही है मुसलमान। तो वहां पे आके अगर कोई तीसरा प्लेयर बोलता है कि आपका मॉडल फेल हो चुका है। एंड नाउ वी विल टॉक अबाउट अ डिफरेंट मॉडल। हाउ डू यू सी दैट? सी द व्हाट अ लिटिल बिट प्रोस्पेरिटी व्हिच यू सी इन सदर्न स्टेट्स अमंग्स मुस्लिम्स। इवन ऑन इन सदर्न स्टेट्स देयर कैन बी रिलेटिवली प्रोस्पेरस यू कैन से व्हेन कंपेयर टू द नॉर्दन स्टेट्स पर्टिकुलरली ईस्टर्न स्टेट्स हस के पर अगर वहां मैं कम्युनिटीज के बीच में कंपैरिजन करो तो वहां भी मुसलमानों के सिचुएशन सबसे खराब है अमंग्स अदर कम्युनिटीज तो ऐसा नहीं कि उनका मॉडल जो है बहुत सक्सेसफुल रहा है। है ना? दूसरी चीज है कि पॉलिटिक्स के थ्रू तो अचीव नहीं हुआ है। जो भी हुआ है। उसकी अपनी एक हिस्ट्री रही है। जी। और जो बिहार और बंगाल आसाम में है जो सच्चाई ये है कि जो अ मुस्लिम्स वैसे कहा जाता है कि आर एन अर्बन कम्युनिटी अर्बन सेंटर्स में उनका ज्यादा पापुलेशन रहा होता है। लेकिन बिहार, बंगाल, आसाम में मुसलमान पेजेंट्स बहुत हैं। रूरल अ सेटअप्स में बहुत ज्यादा नंबर्स में है। खास के बंगाल और आसाम में तो पेजेंट्री ही लार्जली मुस्लिम्स आर पार्ट ऑफ द प्रेजेंट्स। तो वहां जो है जो गरीबी अगर काउंट होगी तो जाहिर सी बात है उसमें मुसलमान अच्छे खासे नंबर में रहेंगे। क्योंकि जहां एग्रीक जो इंडस्ट्रियल स्टेट्स नहीं है जो डेवलप नहीं हो पाए। तो वहां जो पावर्टी है उस पावर्टी का असर मुसलमानों पर ज्यादा है। [गला साफ़ करने की आवाज़] नाउ वेदर पॉलिटिक्स कैन चेंज इट। ऑफकोर्स पॉलिटिक्स इज़ व्हाट अ व्हाट हैज़ द व्हिच हैज़ द कैपेसिटी? बिकॉज़ ऑल डिसीजंस आर जनरली पॉलिटिकल डिसीजंस। अह व्हाट काइंड ऑफ़ अ पॉलिटिक्स इमज़ एंड व्हाट इज़ इट्स गोल? व्हाट इज़ दिस एजेंडा? हाउ डस इट लुक एट टुवर्ड्स मुस्लिम्स एटसेट्रा? वो तो एक अ मतलब पॉलिटिकली डिसाइड होता है। तो पॉलिटिक्स ऑफ कोर्स हैज़ द ये अ पोटेंशियल कि उसको अल्टरनेट ऑल्टर कर सके। इस सिचुएशन को चेंज कर सके ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम। हम हां एक कंसंट्रेटेड अटेम्प्ट तो नहीं हुआ है और वो सिर्फ मुसलमानों के मामले में नहीं है। गुरबत जिन स्टेट्स की मैं बात कर रहा हूं उसमें दूसरी कम्युनिटीज उतनी ही गरीब है। और इवन इफ सोशलिस्ट पॉलिटिक्स इमर्ज हम पर हाल का डाटा आप देखिए अ बिहार में फॉर एग्जांपल बिहार ने कास्ट सेंसस कराया। हम बिहार का डाटा देखिए तो बिहार में करीब 30 35 साल से ओबीसी पॉलिटिक्स हो रही है। हम लेकिन ओबीसी अभी भी अमंग द पोरेस्ट है। पोरेस्ट है। तो कोई ट्रांसफॉर्मेटिव चेंज तो हुआ नहीं है। जिसके लिए आई थिंक अलग तरह का वेयर विद ऑल और डिटरमिनेशन चाहिए। अभी जो है कि वो रिप्रेजेंटेटिव रिप्रेजेंटेशन के मामले में हो सकता है कि चीजें बेहतर हुई हो। लेकिन उसको लेकर के सोशल और इकोनमिक ट्रांसफॉर्मेशन हुआ वो अचीव नहीं हुआ है। राइट? और वो लॉन्ग डाउन प्रोसेस भी होता है। और अगर वो जब अगर कोई ऐसी कोशिश कंसंट्रेटेड कोशिश होगी जैसे कि नक्सलाइट पॉलिटिक्स ने कोशिश की थी। पर वो उसके वो एक पेनफुल प्रोसेस भी होता है। वो इट मे नॉट नेसेसरी सक्सीड ऑलवेज। तो दैट वे यू कैन से से कि हां आई डोंट सी दैट मतलब व्हाट मुस्लिम पॉलिटिक्स एट द मोस्ट कैन डू इन सम प्लेसेस इट कैन इंक्रीस मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन राइट डिपेंडिंग ऑन द डेमोग्राफिक सिचुएशन डिपेंडिंग ऑन द एक्सटेंट ऑफ इकोनमिक डेवलपमेंट राइट डिपेंडिंग आल्सो अपॉन द एक्सटेंट टू व्हिच द पॉलिटिकल पोलराइजेशन हैज़ टेकन प्लेस जहां-जहां पोलराइजेशन बहुत ज्यादा है जी वहां पे मुस्लिम मुस्लिम कैंडिडेट्स का जितना भी डिफिकल्ट है क्योंकि अकेले तो आप नहीं जीतते तो पहला टास्क तो यह है कि आप ऐसी पॉलिटिक्स के बारे में सोचिए जो कि पोलराइजेशन को डिफिट करके डिफीट कर सके विदाउट व्हिच इट विल बी डिफिकल्ट टू अचीव वी विश टू अचीव सो कमिंग बैक टू सिटीजनशिप अगेन आपने बांग्लादेशी पैराडॉक्स के बारे में सीएए एनआरसी के बहुत पहले बात की है। हालांकि बांग्लादेश पैराडॉक्स जो है वो ऐसा लगता है कि अभी रीसेंट फिनोमिना है 14 के बाद ज्यादा उसके बारे में बात होने लगी है। उससे पहले तो अदराइजेशन है पाकिस्तान को ही एक इमेज क्रिएट किया गया था। लेकिन ये बांग्लादेशी पैराडॉक्स जो है और उसके अराउंड जो पॉलिटिक्स है और उसके अराउंड फिर जो मोबिलाइजेशन होता है सीएए एनआरसी के बाद में उसको आप कैसे देखते हैं? इनफैक्ट सीए एनआरसी एंटीसीए एनआरसी जो मोबिलाइजेशन था आई हैव रिटन आल्सो सम लिटिल हियर एंड देयर आई सी अ ह्यूज पॉसिबिलिटी इन इट फर्स्ट ऑफ ऑल जो अगर उसकी देखिए उसको उसका जो कैरेक्टर था वो जो मोबिलाइजेशन हुआ जो एजिटेशंस हुए तो वन आई कुड नोटिस कि एंड दिस वाज़ आल्सो इंडिकेट िंग कि किस तरह से मुस्लिम सोसाइटी में बदलाव आ रहे हैं। राइट? एक तो आप देखिएगा कि प्रोमिनेंट वॉइसेस मेनी ऑफ़ देम वुमेन राइट? वेरी आर्टिकुलेट वुमेन राइट? एंड नॉट ओनली वो नंबर्स में थी पर दे वर आल्सो इन लीडरशिप रोल्स। दे वर टेकिंग डिसीजंस एटसेट्रा। राइट? अह बसाइड्स जो रिलीजियस ऑर्थोडॉक्सी है वो नियरली एब्सेंट थी इन मोबिज्म दिस वास मोर और लेस अ सिटीजनशिप प्रोटेस्ट सिटीजंस का प्रोटेस्ट था। हां बिल्कुल अभी तक लोग कहते थे कि भाई आप ज्यादातर जो है कल्चरल सवालों पे ही मोबिलाइज होते हैं। सिंबॉलिक क्वेश्चंस पे ज्यादा एजिटेट हो जाते हैं। लेकिन ये था बिल्कुल मटेरियल क्वेश्चन पे कि हमारा जो एकिस्टेंस इटसेल्फ इज़ बीइंग चैलेंज्ड। वी देयर इज़ एन अटेम्प्ट टू डीनेशनलाइज अस। और यहां पर जो है सडनली जो है अलग-अलग शहरों में ह्यूज नंबर्स में लोग आए और दे पुट अक्रॉस द पॉइंट वेरी स्ट्रांगली एंड एट द सेम टाइम दे वर ओपन टू बिल्डिंग सॉलिडेरिटीज विथ अदर्स तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] मुझे उस पूरे इस दौर में बड़ा मैंने देखा कि घर के में के भी लोग आम औरतें हम हु वुड जनरली नॉट स्टेप आउटसाइड देयर होम्स और इवन इफ दे वुड गो बट दे विल नेवर बी सी देमसेल्व्स एस पार्ट ऑफ़ एनी पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन। वो जा रही थी से जो सिटिं्स हो रहे थे वगैरह उसमें पार्टिसिपेट कर रही थी। दे वर नेगोशिएटिंग वि द स्टेट। [गला साफ़ करने की आवाज़] दे वर चैलेंजिंग सम ऑफ़ द मतलब एस्टैब्लिश आइडियाज ऑफ़ पॉलिटिक्स जो है कि कुछ लोग आके उनको प्रिस प्रिस्रिप्टिव पॉलिटिक्स का दे देते थे कि आपको ये करना है ये नहीं करना है। एंड दे वर क्वेश्चनिंग देम एज वेल। राइट? तो एक इंडिपेंडेंट जो है ट्रेजरी डेवलप हो रही न्यू इमेजिनेशन और देयर वाज़ लॉट ऑफ़ होप देयर। आई आई आई वुड से कि थिंग्स आर लॉस्ट। अ दो चीजें हुई। एक तो कोविड की वजह से जो लॉकडाउन और उसकी वजह से एक उसी इमीडिएटली जो है पूरा डीमोबिलाइजेशन का प्रोसेस वो शुरू हो गया। और दूसरे ह्यूज रिप्रेशन फ्रॉम द इंडियन स्टेट। एक पीसफुल प्रोटेस्ट लार्जली। स्टूडेंट्स, यंग पीपल, वुमेन लेड प्रोटेस्ट प्रोटेस्ट जिसमें कि ज्यादातर मैंने देखा कि लोग जो नेशनल फ्लैग के अंडर वो प्रोटेस्ट कर रहे थे और उस प्रोटेस्ट को जिस तरह से स्टेट ने रिसोंड किया इट सीम्ड एज़ इफ कि दे वर डीलिंग विथ एनिमेटेड यू नो एलिमेंट्स। तो इट वास ऑलमोस्ट लाइक अ वॉर वेस् अगेंस्ट द मुस्लिम प्रोटेस्टर्स। राइट? 20 22 लोग यूपी में मार दिए गए। राइट? जामिया के अंदर जो है कैंपस के अंदर घुस के लोगों को मारा गया। स्टूडेंट्स को अलीगढ़ में भी सिमिलर काइंड ऑफ। सो एंड दिस वाज़ अ पैटर्न फाउंड वेरी मेनी प्लेसेस। या बगलोर में आई थिंक हॉस्पिटल में घुस के प्रोटेस्टर्स को पीटा गया है। मारा गया है। तो अ मतलब दिस काइंड ऑफ़ अ रिप्रेशन प्रोबब्ली द कॉलोनियल पुलिस मतलब इट रिमाइंडेड वन ऑफ़ जालियांवाला बाग काइंड ऑफ़ सिचुएशन। आई थिंक दिस वाज़ फर्स्ट ऑफ़ इट्स काइंड एंड इंडिपेंडेंट इंडिया दैट सच अरेशन वाज़ टेकिंग प्लेस अगेंस्ट प्रोटेस्टर्स वेयर पीपल वेर बीइंग फायर्ड अपॉन। पहले भी हुए हैं कुछ केसेस आई थिंक नहीं जैसे जो एमकेएसएस बिहार का अरवल में हुआ था जिसमें कि पर ये अर्ली 80ज वगैरह आज के फज़ में खास करके जब पीपल आर सो कॉन्शियस देयर इज़ अ लॉट ऑफ़ आल्सो [नाक से की जाने वाली आवाज़] आईडिया अबाउट पुलिसिंग न्यू वेज़ ऑफ़ पुलिसिंग और वहां पे जो इस जिस तरह से जो अह अह लोगों के खिलाफ जो स्टेट रिप्रेशन का जो देखते हैं पूरा नजारा तो इट लुक्ड एस इफ वी आर अंडर इदर अंडर एनी कॉलोनियल पावर या फिर कोई डिक्टेटरशिप है जहां पर कि आप सवाल उठाते ही आपको जो है क्रश कर दिया जाएगा। राइट? तो दैट काइंड ऑफ़ दैट आल्सो हैज़ बीन अ सेटबैक बिकॉज़ ऑफ़ वि थोड़ा सा आई थिंक मुस्लिम जो एक्टिविस्ट प्रोटेस्टर्स वगैरह थे वो इट डिसरेज देम प्रोबब्ली पर दिस आल्सो इंडिकेटेड कि एक न्यू मिडिल क्लास इमर्ज कर रहा है मुसलमानों के अब्सोलुटली एंड आई हैव रिटन अबाउट इट कि मुझे लगता है कि एक नई तरह की सिविल सोसाइटी भी इमर्ज कर रही है मुसलमानों के बीच में हम जो कि इंडिपेंडेंटली बहुत कुछ कर पा रही है और वो इंडिपेंडेंटली मोबिलाइज भी कर रही है रिसोर्सेज को जाके मेवात में काम भी कर रही है कश्मीर में काम भी कर रही है तो मुझे लगता है कि उसके आउटकम्स ऐसे भी रहे हैं हां मेरे लगता है इन हाउस इटसेल्फ इटसेल्फ समथिंग व्हिच हैज़ इमर्ज आउट ऑफ़ राइट और ऐसे भी कोई भी मूवमेंट जो होता है हम लोग सोशल मूवमेंट वगैरह पढ़ाते हैं तो मूवमेंट का जो आप जो सक्सेस या उसके जो फेलियर्स हैं वो वो आप इमीडिएटली देख नहीं सकते क्योंकि अ मूवमेंट लीव्स एन इंपैक्ट ह्यूजली ऑन डिफरेंट सेक्शंस और वो जो है इवन व्हेन द मूवमेंट ऑन पेपर डजंट एक्सिस्ट पर उसके इन्फ्लुएंस ऐसे होते हैं जो कि मतलब काफी डीप होता है। तो यू आर राइट कि सब मेनी कई तरह के मैं देख रहा हूं यंग लोग सिविल सोसाइटी एक्टिविज्म नए तरह का पुराने पैटर्न पे नहीं कर रहे हैं जो कि फंडिंग के लिए ऑल द टाइम या यूएन का जो रेजोल्यूशन के हिसाब से अपना एजेंडा शिफ्ट कर देते थे वगैरह पर दे आर वेरी वेरी रूटेड अमोंग्स द मुस्लिम्स एट द सेम टाइम देयर इज़ अ ह्यूज कंसर्न फॉर व्हाट इज़ हैपनिंग इन टुडेज़ इंडिया एंड अह दीज़ आर आल्सो काइंड ऑफ़ सिविल सोसाइटी एक्टिविज़्म व्हिच इज़ सम एक्सटेंट पॉलिटिकल दैट अंडरस्टैंड्स अह जो वेज़ इन डिफरेंट वेज़ इन व्हिच द मुस्लिम्स सिटीजनशिप क्वेस्ट इज़ बीइंग इरोडेड। तो वो उन सवालों को एड्रेस कर रहे हैं। वो मतलब कि पुराने तरह के आइडेंटिटी मॉडल वगैरह को भी आई डोंट थिंक हां दे आर सो मच एक्साइटेड अबाउट इट। राइट? तो दैट इज अ डेवलपमेंट व्हिच इज हां व्हिच व्हिच गिव्स सम प्रॉमिस सम होप सर जब अदराइजेशन की बात करते हैं व्हेन वी टॉक अबाउट अदराइजेशन ऑफ़ मुस्लिम्स मे बी अदर ग्रुप्स टू आप कहते हैं कि अदराइजेशन जो एक डेलीबेट प्रोजेक्ट है जो कि अनलिश किया जा रहा है मुस्लिम माइनॉरिटीज पे और कल्चरल इनविटेटिबिलिटी का प्रोसेस से नहीं आ रहा है। क्योंकि एक आर्गुममेंट ये भी है कि कल्चरल है। मुसलमान कल्चरली बहुत अलग है और अपने आपको एडवाइस करना खुद पसंद करते हैं। लेकिन यू वर टॉकिंग अबाउट इट एस अ डेबेट प्रोजेक्ट और जहां पर सोशल तरीके से इकोनमिक तरीके से अदराइज किया जाता है माइनॉरिटीज को मुसलमानों को तो उस पे थोड़ा सा शेड कैन यू प्लीज शेड सम लाइट ऑन दैट दैट व्हाट डू यू मीन बाय दैट अगर उसको आम जबान में हमको अपने ऑडियंस को समझाना हो उस के प्रोसेस को तो आप उसको थोड़ा सा बताने की कोशिश करेंगे। आप अदराइजेशन एज अ प्रोजेक्ट व्हेन आई एम सेइंग लुक एट अ चीफ मिनिस्टर एक है हेमंता विश्व शर्मा आसाम के वो डे इन एंड डे आउट कोई ना कोई तरीके ढूंढ रहे हैं कि किस तरह से जो मुसलमान खास करके आसाम में है और ज्यादातर आसाम के मुसलमान बंगाली आर जिनके एक स्माल सेक्शन है जो अपने को आसामिया भी समझता है। वो सोच रहा है कि वो स्पयर्ड है। राइट? बट उनका पता नहीं क्या दैट इज अनदर थिंग ऑल टुगेदर पर ये दिस चीफ मिनिस्टर हु हैज़ टेकन द ओर्थ ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन पर उनके रवैया उनके अटरेंसेस उनका पूरे एक्शंस आप देखिए कि किसी ना किसी तरीके से चाहे उनका पापुलेशन पॉलिसी हो चाहे उनका लैंड पॉलिसी हो वो इसी दिमागी इससे चल रहा है कि किस तरह से ज्यादा से ज्यादा तकलीफ मैं मुसलमानों में खास करके जो बंगाली मुसलमान हो उनको पहुंचा सकूं। अदराइजेशन व्हेन आई सी इट इट इज़ नॉट सिंपली मतलब पॉलिटिक्स ऑफ कोर्स इज़ द इंस्ट्रूमेंट राइट बट इट इज़ नॉट सिंपली थ्रू द अह इट डजंट अनविल इटसेल्फ जस्ट इन पॉलिटिक्स। बट आल्सो इफ यू लुक इंटू हिस्ट्री अह वे इन व्हिच कल्चरल प्रोडक्शन इज़ टेकिंग प्लेस टू द होल काइंड ऑफ़ फिल्म्स ऑफ़ वेरियस डिफरेंट काइंड्स व्हिच आर कमिंग अप नाउ बहुत सारे गाने ऐसे बन रहे हैं जो कि खास करके है ना मुसलमानों को टारगेट करते हुए हिंदुत्व पॉप कल्चर हिंदुत्व पॉप कल्चर बहुत पॉपुलर भी है बहुत सारे जगह पे अ रीरीडिंग ऑफ़ हिस्ट्री व्हिच इज़ हैपनिंग द वे इन व्हिच व्हिच आवर डोमेस्टिक एंड फॉरेन पॉलिसी आर बीइंग शेप्ड ऑलमोस्ट सेम हो रहा है। जबकि पहले कुछ डिस्टिंशन होता था हर जगह का होता है। पर आज की डेट में लग रहा है कि एक्सटेंशन है। अ तो अदराइजेशन दैट वे इज़ अ प्रोजेक्ट व्हिच अह हैज़ वेरियस डिफरेंट फसेस एंड यू नो कंट्रीब्यूटिंग फैक्टर्स। लेकिन अल्टीमेटली इट इज़ डेलीबेट। यू आर राइट इट इज़ डेली इट इज़ नॉट समथिंग व्हिच इज़ यू नो हैपनिंग स्पॉनटेनियसली बिकॉज़ कम्युनिटीज़ लिव टुगेदर एटसेट्रा इट इज़ डेलीबेट अब द चेंजिंग ऑफ़ नेम्स फॉर एग्जांपल ऐसे तो सिंबॉलिक चीज है। आपको लगेगा कि क्या फर्क पड़ता है मटेरियली बट इट इज़ डिनाइंग यू योर एकज़िस्टेंस इन हिस्ट्री। राइट? इट इज़ मतलब कि इन सम वेज़ लैंग्वेज में इन द वे इन व्हिच सबसे बड़ा इसका जो इंपैक्ट और जो जो लीव्स मी वि सम काइंड ऑफ़ अ यू नो कंसर्न एटसेट्रा इज़ अबाउट व्हाट इज़ हैपनिंग इन द लेबर मार्केट। अगर आप अब आज की डेट में देखें तो मेरा अपना जनरल ऑब्जरवेशन है। आई डोंट हैव अ फिगर एस सच विथ मी राइट नाउ कि अगर आप एक फोन करें किसी भी यू नो सर्विस रिक्वेस्ट से राइट लेकर के तो एट आउट ऑफ 10 चांसेस होगा कि द पर्सन विल कम टू प्रोवाइड दैट सर्विस विल बी अ मुस्लिम राइट और वो जो है सबसे लोली पेड वर्क होगा मोस्ट आडुस वर्क एक सस्टेन प्रोसेस ऑफ इनफॉर्मलाइजेशन, कैजुअलाइजेशन वैसे जनरल है, हो रहा है बिकॉज़ ऑफ न्यू इकॉनमी आल्सो। पर इसका इंपैक्ट मुसलमानों में बहुत ज्यादा है। एंड द रीज़न इज़ बेसिकली दिस हेट कैंपेन व्हिच इज़ हैपनिंग। पीपल आर फियरफुल ऑफ़ एंप्लॉयंग मुस्लिम्स। और दे आर डूइंग इट डेलीबेटली। अह इट इज़ फार मोर डिफिकल्ट फॉर अ मुस्लिम एट वेरियस डिफरेंट लेवल्स। इवन एज एन एकेडमिक टुडे हु नेवर आइडेंटिफाइड हिमसेल्फ एस अ मुस्लिम आई कैन से टुडे दैट दैट काउंट्स अ लॉट कि आज की डेट में आप इफ यू अप्रोच योर एंप्लयर एट द बैक ऑफ द माइंड ऑफ़ द एंप्लॉयर इज़ दैट योर आइडेंटिटी एज वेल अपार्ट फ्रॉम व्हाटएवर प्रोफेशनल अचीवमेंट्स अकम्प्लिशमेंट्स व्हिच यू हैव और यही जो सबसे वनरेबल सेक्शन है उसको सबसे ज्यादा ये फेस करना पड़ा तो अदराइजेशन का जो ये डाय डायमेंशन है। इट इज़ रियली समथिंग ऑफ़ अ कंसर्न व्हिच इज़ रियली डिफिकल्ट टू चेंज इवन इफ द चेंज ऑफ़ गवर्नमेंट एटसेक्टर। सर आपकी एक को एडिट एडिटेड वॉल्यूम आई है जिसमें आप बात कर रहे हैं अ मार्केट स्पेस में अश मतलब बेसिकली व्हाट यू आर टॉकिंग अबाउट इज़ दैट सिटीजनशिप जो है वो अलग-अलग स्पेयर्स में अलग-अलग तरह से काम कर रही हैं। चाहे वो एक नेशन के नेशन के स्फेयर में हो और नेबरहुड के स्फेयर में हो, मार्केट के स्फेयर में हो। सिटी के स्पेयर में हो तो कैन यू वक अस थ्रू दैट अ बिट प्लीज एंड आल्सो एक्सप्लेन दैट हाउ इज इट हाउ इज इट हाउ इज़ अ सिटीजनशिप हाउ इज़ द आईडिया ऑफ़ सिटीजनशिप डिफरेंट यू लुक एट इट थ्रू द प्रिज़्म ऑफ़ नेशन [गला साफ़ करने की आवाज़] एंड थ्रू द प्रिज़्म ऑफ़ मार्केट फॉर एन एग्जांपल। सी मार्केट का तो मैंने एक जैसे एग्जांपल दिया कि लेबर मार्केट के सिचुएशन जो है आई रिमेंबर प्राइम मिनिस्टर मेड अ कमेंट ऑन पंचरवालाज़ राइट जो कि एक्चुअली डायरेक्टेड टुवर्ड्स मुस्लिम्स जो कि बहुत मेनी ऑफ़ दोज़ हु आर इन द पंचर रिपेयर शॉप्स आर मुस्लिम्स। एंड दिस इज़ प्रोबब्ली द मोस्ट वन ऑफ़ द मोस्ट लो पेइंग काइंड ऑफ़ अ जॉब। अह दिस रेफरेंस टू देम कैन आल्सो बी सीन एज अ डॉग वेसल। हम कि यह है वहां पे हम अ एट द सेम टाइम इट वाज़ आल्सो रिसीव्ड एज अ स्टिगमेटाइजेशन का कि ये लोग तो पंचर वाले हैं। इस तरह से भी उसको समझा गया। कई लोगों के मार्केट में यह प्रोसेस ऑफ़ जो कि अदरवाइज नॉन इकोनॉमिक प्रोसेस है बट इंपैक्ट्स द इकोनॉमिक रिलेशंस आल्सो इज़ थ्रू स्टिगमेटाइजेशन थ्रू अदराइजेशन वगैरह अह मार्केट मार्केट इटसेल्फ इज़ बीइंग आल्सो पोलराइज़ ऑन वेरियस ग्राउंड्स। से फॉर एग्जांपल यूपी में अगेन एक कैंपेन चला कि हलाल फूड वाला जो लेबल है उसको हम करने नहीं देंगे। कई जगह जो है मुसलमानों को अपनी दुकानें लगाने नहीं दी जा रही है। अ दे आर बीइंग आस्क कि इफ यू आर अब नाम लगा भी रहे हो दुकान तो नाम फला रखना पड़ेगा, फला नहीं रखना पड़ेगा। हम्। एंड मैसेज इज़ बीइंग सेंट टु पीपल दैट दीज़ आर मुस्लिम ओन शॉप्स। सो अवॉयड देम। ऑलराइट। अह मार्केट व्हिच इज़ अदरवाइज़ सपोज़ टू बी एन इकोनमिक इंस्टीट्यूशन। द आईडिया ऑफ़ द मार्केट इज़ दैट इट इज़ ऑफ़ कोर्स प्रोड्यूसेस इनकलिटी। क्योंकि अलग-अलग लोग अलग-अलग कैपेसिटीज से मार्केट में एंटर करते हैं। और यह माना जाता था मार्केट में अल्टीमेटली क्या मैटर करता है कि बाय एंड सेलर बाय एंड सेलर कॉम्पिटिटिवनेस हां वगैरह लेकिन अभी क्या हम देख रहे हैं कि कल्चरल पॉलिटिकल सारे तरह के प्रोसेससेस मार्केट को किस तरह से ऑर्गेनाइज हो रहा है। राइट वी हैव बी मुस्लिम क्रिएट किया जा रहा है। राइट? व्हेन यू टॉक अबाउट द आईडिया ऑफ अदराइजेशन कनेक्टेड टू सिटीजनशिप एंड द नोशन ऑफ नेशनहुड अगेन अ सिमिलर द होल आईडिया अबाउट नेशन वाज़ कि नेशन क्रिएट्स अ सर्टेन काइंड ऑफ़ अ हॉरिजॉन्टल कॉमरेटशिप कि भाई इररेिस्पेक्टिव ऑफ किस कास्ट क्या-क्या है। वी आर कोशनल्स बट डेफिनेटली वि द राइज़ ऑफ़ हिंदू नेशनलिज्म दैट इज नॉट देयर इट इज़ वेइंग वेइंग वेरी क्लियरली इन समटाइ्स रेटोरिक सेंस में भी कहा जाता है कि आप पाकिस्तान चले जाइए अदरवाइज इट इज़ डीपली आल्सो मतलब डीप डाउन इट इज़ देयर इन प्रैक्टिसेस एस वेल कि जिस तरह से जो सीएए अमेंडमेंट किया गया जिस तरह से एनआरसी के थ्रू 1.9 लाख 9 मिलियन 1.9 मिलियन पीपल बट व्हिच आर आल्सो इंक्लूड्स अदर बंगाली स्प्रेकर्स राइट को एक्सक्लूड किया गया और अगर आप देखें एसआईआर इज़ अ सिमिलर काइंड ऑफ़ प्रोसेस तो होल अ यू नो यू वुड से दैट इट इज़ नॉट समथिंग व्हिच इज़ इंपैक्टिंग जस्ट वन सेक्टर इफ यू विल लुक एट द सिटीज़ सिटीज़ आर बिकमिंग इंक्रीसिंगली मोर सेग्रिगेटेड गेटवाइज़ेशन है इज़ टेक गेट इज़ अह यू नो टू द मैक्सिमम राइट नाउ एंड इवन इफ यू वांट टू नो अवॉयड दैट वांट टू एस्केप इट कॉन्शियसली ट्राई टू लिव आउटसाइड अ कैटो बट यू विल बी कॉन्स्टेंटली पुच्ड टू योर लेफ्ट विथ लिटिल चॉइस बिकॉज़ दूसरी जगहों पे थिंग्स आर नॉट बीइंग मेड अवेलेबल टु यू | राइट तो पूरा जो एक अह विज़न ऑफ़ कंपोज़िट नेशनलिज़्म व्हिच यू रेफरिंग टु अर्लियर व्हिच ऑल्सो इंक्लूड इंक्लुडेड कि मिक्स नेबरहुड्स वर्ज एटसेक्ट्रा वगैरह राइट राइट बट वो सब तो अब थ्रू आई एम नॉट सेइंग इट इज़ सिंपली एट द सोसाइटल लेवल दैट दीज़ थिंग्स आर हैपनिंग देयर इज़ अ कंसंट्रेटेड वे इन व्हिच द वे इन व्हिच द जुडिशरी इज़ रिस्पोंडिंग द वे इन व्हिच द पुलिस और द स्टेट सिविल एडमिनिस्ट्रेशन इज़ रिस्पॉन्डिंग द न्यू लॉज़ आर बीइंग यू नो इनएक्टेड तो उसके थ्रू भी जैसे कि कुछ गुजरात में मुझे ये है कि इल्म है कि कुछ लैंड रिलेटेड लॉस के कि आप फला जगह पे ले सकते फला जगह में नहीं ले सकते वो वगैरह वगैरह तो ये सारी चीजें जो है ये एक अल्टीमेटली टारगेटेड टुवर्ड्स मेकिंग मुस्लिम्स एज नॉन सिटीजंस और इवन इफ देयर आर सिटीजंस देयर सिटीजंस हु सी देमसेल्व्स यू [नाक से की जाने वाली आवाज़] नो और हु आर मेड टू सी देमसेल्व्स एज एस सेकंड सेकंड क्लास राइट राइट सर एक तरफ तो यू आर टॉकिंग अबाउट स्टेट व्हिच इज़ डेलिबेटली डूइंग इट द गवर्नमेंट दैट इज़ डेलिबेटली डूइंग इट राइट तो एक तरफ तो वो है लेकिन क्या वो आईडियोलॉजी इतनी डीपली पेनिट्रेट कर गई है समाज में कि अब समाज में भी वो ऑटोमेटिकली हो रहा है मुसलमानों का नो वन हैज़ टू कम एंड से दैट कि मुसलमानों का अदराइजेशन करो इट इज़ बीइंग डन एट द लेवल ऑफ़ इंडिविजुअल्स देमसेल्व्स कि अगर ये मुसलमान है तो थोड़ा अलग तरीके से सी वन इज दैट आई वुड टेल यू दैट पॉलिटिक्स इटसेल्फ इज अ एक्सट्रीमली पावरफुल इंस्ट्रूमेंट इट इंपैक्ट्स एव्री सेक्शन यू नो एंड व्हेन अ पॉलिटिकल नैरेटिव सो पावरफुल फॉर द लास्ट 10 12 इयर्स और मोर देन दैट हैज़ बीन फोकस्ड अबाउट पोट्रेइंग अ सर्टेन काइंड ऑफ़ अ पिक्चर अबाउट मुस्लिम्स स्टिग्विटाइजिंग देम एंड अह यू नो क्रिएटिंग अ सर्टेन काइंड ऑफ़ नो डेमन आउट ऑफ देम है ना भाई तो अ उस उसका तो अपने आप में ही इंपैक्ट हर जगह हर लेवल पे काफी होता है फ्रॉम द रेड फोर्ट इफ द प्राइम मिनिस्टर हिमसेल्फ मेक्स इन दोज़ काइंड्स ऑफ़ यू नो स्पीचेस इन द इलेक्शन स्पीचेस इफ अह यू आर टू [गला साफ़ करने की आवाज़] दैट यू नो इन वेरियस डिफरेंट मेटोफोरिकल वेज़ आल्सो द रेफरेंस टू मुस्लिम इन अ वेरी नेगेटिव सेंस इज मेड। तो उसका तो एक सोसाइटल इंपैक्ट भी होता ही है। राइट? वी कैन सी दैट दैट काइंड ऑफ़ अ पोलराइजेशन इज़ एविडेंट। अ इट हैज़ डेफिनेटली अफेक्टेड लार्ज सेक्शंस ऑफ़ इंडियन पापुलेशन। राइट? आई वुड नॉट से कि इट्स अ होपलेस सिचुएशन। हम बिकॉज़ खैर मुझे लगता है कि पार्टीशन के आसपास जो वायलेंस हुआ था वगैरह उसके आसपास भी बहुत अच्छी सिचुएशन सोशल प्लेन पे नहीं थी। लेकिन ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम सोसाइटी रिसरेक्टेड इटसेल्फ बहुत सारी चीजों को मतलब एक अनसेड एंड अनरिटन प्रोसेस के थ्रू रिकंसिलेशन भी हुए। [नाक से की जाने वाली आवाज़] एंड बसाइड्स दिस 100 एंड थाउजेंड्स इयर्स ऑफ़ को एकिस्टेंस। तो बहुत सारी चीजें जो है जो कल्चरली बहुत यू नो इंटरमिक्स्ड हैं। बट एज वी सी टुडे आई कैन सी दैट बिकॉज़ दिस पॉलिटिकल डिस्कोर्स आल्सो हैज़ सम हाउ इंपैक्टेड ह्यूजली द मीडिया डिस्कोर्स। टुडे मीडिया इज़ हैज़ अ ह्यूज प्रेजेंस यू नो थ्रू वेरियस डिफरेंट काइंड्स ऑफ़ ऑर्गेनाइज्ड मीडिया एज वेल एज अ लार्ज सेक्शन अनऑर्गेनाइज्ड मीडिया तो इस वजह से द मैसेजिंग वगैरह हैज़ लेफ्ट एन इंपैक्ट इट इज़ इजी टू सर्कुलेट हिट राइट कम्युनिटीज़ हैव सम आईडिया अबाउट दी अदर्स इन सम सेंस होता है सर्टन काइंड ऑफ़ स्टिपिशन इज़ आल्सो देयर पर उसी को अगर हम जो है एक ऑर्गेनाइज पॉलिटिक्स का पार्ट बना ले तो इट इट बिकम्स पोटेंशियली वेरी डेंजरस वेरी परशियस तो वो चीजें जो है वो हो रही हैं। राइट सर ये सीएए एनआरसी का जब हमारा बिल पास हुआ जब वो कानून की तरह बन गए और और आज के डेट में जो एसआईआर है सीए एनआरसी को तो बहुत हद तक प्रोटेस्ट के वजह से स्टॉल कर दिया गया था और बहुत हद तक वो इंप्लीमेंट नहीं हो पाया। लेकिन जो एसआईआर आज के डेट में कर रहे हैं बंगाल में हमने देखा कि 90 मोर देन 90 लाख पीपल हैव बीन एक्सक्लूडेड हम अलग-अलग स्टेट्स में भी हो रहे हैं। तो क्या ये पैरेलल हैं? मतलब आप सीएए एनआरसी को इंप्लीमेंट नहीं कर पाए तो आपने एक नया फ्रंट खोल दिया है एसआईआर को और एसआईआर के थ्रू आप वही करना चाह रहे हैं जो आप सीए एनआरसी के थ्रू करना चाह रहे थे। यू आर राइट इन सम वेज़ सीएए, एनआरसी, एसआईआर शुड बी सीन इन कंटिन्यूएशन। अह सीए पूरी तरह से इंप्लीमेंट नहीं हो पाया। उसकी एक वजह ऑफ कोर्स जो मैसिव प्रोटेस्ट हुए जो इंटरनेशनलली जो है नोटिस भी हुआ। तो, उसका एक बहुत इंपॉर्टेंट रोल रहा। तो, दैट इज़ व्हाई वी से कि मूवमेंट्स हैव देर इंपैक्ट। इवन इफ वी कैन नॉट नेसेसरीली टेंजिबल वे में उनको मिले ये ना कर सके। लेकिन एट द सेम टाइम सीएए के इंप्लीमेंट करने में जो कुछ और भी रुकावटें हैं। एक सबसे बड़ी रुकावट ये है कि टू अवेल सीएए यू हैव टू फर्स्ट डिक्लेअर योरसेल्फ एज एन इमीग्रेंट। हम तो दोज़ पीपल हु हैव ऑलरेडी गॉट सिटीजनशिप [गला साफ़ करने की आवाज़] दे हैव द डॉक्यूमेंट्स दे हैव पासपोर्ट दे हैव दे आर ऑन द वोटिंग लिस्ट व्हाई विल दे मेक दैट डिक्लेरेशन बिकॉज़ वंस दे मेक दैट डिक्लेरेशन दे फियर कि आज नहीं तो कल कभी भी दैट कैन बी यूज़्ड अगेंस्ट देम। राइट? सो नेचुरली सो आई एम टॉकिंग अबाउट जो एक सेक्शन ऑफ हिंदू बंगाली जो सीए यूज कर सकते हैं या फिर मटुआज़ इन बंगाल वगैरह राइट इवन अ वै स्मॉल पोर्शन ऑफ़ पाकिस्तानी हिंदू वुड कम एंड देम इन इंडिया सेटल डाउन इन पेफरीज़ ऑफ़ दिल्ली एंड तो कुछ तो उसके जो क्लॉज़ वगैरह हैं इट देयर इज़ अ टेक्निकल डायमेंशन व्हिच आल्सो इज नॉट एनकरेजिंग पीपल नेसेसरी टू मेक सीएए सक्सेस एस सच व्हाट अ एनटीसीए प्रोटेस्ट सीम टू हैव डेफिनेटली अचीव्ड इज़ कि जो ऑल इंडिया एनआरसी होने वाला था वो इंस्टॉल हो चुका है कंप्लीटली इट लुक्स लाइक दिस एंड दैट इज़ व्हाई प्रोबब्ली यू आर राइट कि उसको एक अनदर इंस्ट्रूमेंट इलेक्ट्रोरल जो रोल है उसके उसके थ्रू उसको इंप्लीमेंट करने की कोशिश कोशिश हो रही है और एसआईआर जो है ना ऑल दिस प्रोसेस वेयर सीए एनआरसी एटसेट्रा दिस हैव दिस न्यूट्रलिटी एज अ कवर सीए वाज़ आल्सो सेलिब्रेटेड बाय सम ऑफ़ द नॉट सॉरी द एनआरसी वाज़ सेलिब्रेटेड बाय सम ऑफ़ द वेरी सेकुलर इंटेलेक्चुअल्स ऑफ़ आसाम हम आर्गुइंग दैट हाउ इट इज़ गोइंग टू सेटल दिस प्रॉब्लम वंस एंड फॉर ऑल दैट हाउ न्यूट्रल द प्रोसेस इज़ दैट टेक्निक टेक्नोलॉजिकली काफी द यूज़ ऑफ आईटी एंड ऑल दैट वास कंसिस्ट कि ये जो है बड़ा उस पे जो है ह्यूमन जो प्रिजुडिसेस होते हैं उसको मिनिमाइज कर दिया है। लेकिन अह एज़ वी सी दैट द इंटेंट वाज़ डिफरेंट सेम विद सी एसआईआर आल्सो। सो इवन इफ द आर्गुमेंट इज दैट दे आर गोइंग टू यू नो क्लीन द इलेक्टोरलिस्ट रिमूव द फेक वोटर्स और दोज़ हु हैव ऑलरेडी नो लगर इन द कंट्री और हैव माइग्रेटेड और डाइड व्हाटएवर पर एसआईआर वन वन थिंग इज़ दैट इट हैज़ बीन मतलब ये कोई नई चीज नहीं है होती रही है पहले भी लेकिन द इंटेंसिटी विथ व्हिच द एक्सक्लूजंस हैव टेकन प्लेस दिस टाइम इट्स टाइमिंग जस्ट बिफोर इलेक्शंस इन दोज़ स्टेट्स अ ये सब जो है उसको सस्पिशन के दायरे में ले आए एंड देन व्हेन वी वन स्टार्टेड नोटिस अ न्यू काइंड्स ऑफ़ कैटेगरीज वेर इंट्रोड्यूस्ड हम्म लाइक अह इन बंगाल अह व्हाट इज़ कॉल्ड द लॉजिकल इनकंसिस्टेंसी लॉजिकल इनकंसिस्टेंसी राइट राइट राइट राइट। सो दैट एज अ न्यू कैटेगरी वाज़ इंट्रोड्यूस अनडिफाइंड कैटेगरी एंड विद इन व्हिच इवन इफ देयर इज़ अ स्पेलिंग मिस्टेक और देयर इज़ सम लिटिल बिट वेरिएशन इन द नेम्स ऑफ द पेरेंट्स वगैरह तो वो इमीडिएटली जो है वो उस कैटेगरी में चला जाता है। एंड एज अ रिजल्ट योर वोटिंग राइट एटलीस्ट फॉर दैट इलेक्शन वाज़ टेकन अवे। राइट? और ये इस तो ऐसा लग रहा था कि एसआईआर अदरवाइज इलेक्शन कमीशन इन अ डेमोक्रेसी शुड बी इंक्लाइंड टुवर्ड्स मेकिंग द इलेक्ट्रोरल लिस्ट एज यू नो इंक्लूसिव एस पॉसिबल ज्यादा से ज्यादा लोगों को हम इलेक्ट्रोरल रोल पे ला पाएं ये उनकी कोशिश होनी चाहिए थी बट हियर द टास्क दे हैव टेकन अपॉन देमसेल्व्स डिफरेंट कि कैसे मैक्सिमम लोगों को एक्सक्लूड करें जो नहीं एक्सक्लूड कर हो पा रहे हैं उनको नई कैटेगरी के थ्रू एक्सक्लूड कर दें और एज अ रिजल्ट वहां देखा हमने कि 90 लाख तो वो टोटल बट 35 36 लैक्स अदरवाइज अंडर द लॉजिकल इनकंसिस्टेंसी एंड देन अह देयर आर रिपोर्ट्स दैट आउट ऑफ दैट 35 36 लैक्स इन अस इन बंगाल हु वर एक्सक्लूडेड थ्रू एसआईआर अंडर लॉजिकल इनकंसिस्टेंसी 65% वर मुस्लिम्स है ना? सिमिलरली 90 लाख में भी मुस्लिम प्रोपोर्शन इज़ फार मोर देन देयर शेयर इन द पपुलेशन पापुलेशन। तो इट इज़ राइट दैट मुस्लिम्स आर नॉट द ओनली कैटेगरी ऑफ़ पीपल हु आर बीइंग एक्सक्लूडेड। बट व्हाई इज़ इट दैट द प्रोपोर्शन ऑफ़ मुस्लिम इज़ फार मोर देन देयर नंबर्स। दैट इज़ समथिंग व्हिच इज़ सब्जेक्ट ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन। हम [गला साफ़ करने की आवाज़] अ डाटा एंटायरली इज़ नेवर रिवील्ड हम सो एज अ रिजल्ट द प्रोसेस इज़ नॉट वेरी ट्रांसपेरेंट आल्सो हम [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो एस एसआईआर आई सी एसआईआर एज अ डबल एज्ड वेपन डबल एज इन द सेंस कि एक तो एसआईआर के थ्रू आपके नाम एक्सक्लूड कर दिए गए आपके वोटिंग राइट्स चले गए इन बंगाल इट इज़ रिपोर्टेड दैट विलेजेस आफ्टर विलेजेस पर्टिकुलरली दोज़ इन व्हिच व्हिच लार्ज प्रोपोर्शन ऑफ़ मुस्लिम्स हु वर लिविंग विलेजेस आफ्टर विलेजेस द नेम्स टू सिंपली रिमूव फ्रॉम द इलेक्ट्रोलिस्ट एंड व्हिच आल्सो वी सॉ दैट इंपैक्ट एंड ऑन पॉलिटिकल आउटकम वाज़ वेरी वेरीरी एविडेंट तो एक तो उस तरह से कि आपको इलेक्ट्रोरल लिस्ट से बाहर कर दिया। उसकी वजह से जो आपका जो इलेक्टोरल पॉलिटिकल वॉइस है उसको वीकन कर दिया। राइट। बट दूसरा है कि द दूसरा डायमेंशन ऑफ एसआईआर इज़ इट्स वर्किंग लाइक अ पोलराइजिंग टूल। हम्म सो इट इज़ मोर लाइक अ सिमिलर काइंड ऑफ़ अ डॉग वेसल एज़ व्हाट यू वुड से इज़ बुलडोजर। सो एज़ अ रिजल्ट इफ यू से दैट आई एम एक्सक्लूडेड फ्रॉम बिकॉज़ ऑफ़ द एसआईआर देयर इज़ अ सेक्शन ऑफ़ द पॉपुलेशन व्हिच इट डज़ंट अफेक्ट देम इट इनफैक्ट इज़ हैप्पी अबाउट इट बिकॉज़ अह दे डू फील दैट यू आर अननेसेसरीली बीइंग ग्रांटेड इक्वल सिटीजनशिप यू नो तो एक पोलराइजिंग वेपन की तरह भी उसको यूज किया जा रहा है। एंड दैट इज वाइज़ ऑल द प्रोटेस्ट अगेंस्ट एसआईआर इन बंगाल डिड नॉट जनरेट क्रॉस सेक्शनल एंगर। राइट? इट ओनली इंपैक्टेड माइनॉरिटीज और सम अदर स्मॉलर सेक्शंस ऑफ़ द पपुलेशन। पर एक जो इतना बड़ा नंबर्स में लोगों को एक्सक्लूड किया गया। लेकिन कॉस्ट सेक्शनल एंगर नहीं हुआ। बिकॉज़ द मैसेजिंग वाज़ दैट दैट वी आर टारगेटिंग मुस्लिम्स। हां। एंड देयर अदर्स विथ फेल्ट दैट दे आर जस्टली बीइंग टारगेटेड, राइट? राइट। या आई विल कम बैक टू द क्वेश्चन ऑफ इलुसिव सिटीजनशिप फ्रॉम वेयर वी स्टार्टेड दिस कन्वर्सेशन [नाक से की जाने वाली आवाज़] एंड वी डिड टॉक अबाउट हाउ मुस्लिम्स आर बीइंग एल्यूडेड फ्रॉम फ्रॉम फ्रॉम सिटीजनशिप राइट्स एटलीस्ट ऑन एटलीस्ट प्रैक्टिकली अगर पेपर पे नहीं हो रहा है तो प्रैक्टिकली हो रहा है तो जो ये इल्यूसिव सिटीजनशिप अगर हम इंडिपेंडेंस इंडिया की हिस्ट्री में देखते हैं। सिर्फ मुसलमान ही इसके टारगेट्स रहे हैं या और भी कम्युनिटीज के अगेंस्ट इसको यूज किया गया है और और भी कम्युनिटीज को इस तरह से ट्रीट किया गया है जहां पे उनको सेकंड क्लास सिटीजनशिप डिक सेकंड क्लास सिटीजन डिक्लेअ कर दिया जाए। अगर हम सोशल ग्रुप्स की बात करें तो डेफिनेटली कास्ट में हम देखते हैं कि दलित्स को हिरारकी में आप बिल्कुल ही नीचे रखते हैं। आप छुआछूत करते हैं। आप भेदभाव करते हैं। लेकिन पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन होने के बाद दलित्स का वो सिचुएशन थोड़ी बदली है। हालांकि वो आज भी एक्सिस्ट करती है। लेकिन जो मुस्लिम्स का सिचुएशन है, जो मुस्लिम्स की पर्टिकुलर सिचुएशन है, सिटीजनशिप को लेकर, क्या ऐसे एक्सपेरिमेंट्स और भी कम्युनिटीज के साथ किए गए हैं? अ मोमेंटली इट हैज़ हैपन। इट इज़ नॉट मुस्लिम्स अलोन हु सफर फ्रॉम दिस काइंड ऑफ़ अ सिटीजनशिप राइट्स बीइंग यू नो इरोडेड इन सम वेज़ और द अदर। आई वुड से दैट एट वन पॉइंट ऑफ़ टाइम ऑफ कोर्स द सिक्स वर दे वर सीन एस सस्पेक्ट कम्युनिटी अ आई हैव मायसेल्फ ऑब्ज़र्व्ड हाउ व्हाइल ट्रेवलिंग द ट्रेन एटसेट्रा देयर लगेजेस वुड बी चेक एंड अदर्स वुड बी स्पर्ड सो यस इट इट इन दैट सेंस आई वुड से कि मुस्लिम्स वर नॉट अलोन हाउएवर व्हाट हैज़ हैपनिंग वि मुस्लिम्स और हैज़ हैपन वि मुस्लिम्स इज अ पॉइंट व्हिच आई हैड रेफर्ड टू अरर्लियर आल्सो इज़ इट नॉट ओनली द सिटीजनशिप बट इट इज़ द प्रोजेक्ट ऑफ़ डीनेशनलाइजेशन राइट व्हिच अ कॉम्बिनेशन ऑफ़ टू मेक्स द मुस्लिम केस फार मोर यू नो एड्स टू द स्पेसिफिसिटी ऑफ़ द मुस्लिम केस और खास करके उसके वो जो है पोटेंशियली ज्यादा नो खतरनाक या डेंजरस यू कैन से इट हैप्स यू नो इन मुस्लिम मुस्लिम केस। सो व्हाट डीनेशनलाइजेशन डज़ इज़ कि एक तो आपके क्लेम ऑन इंडिया एज अ मदर लैंड एज अ नेशन इटसेल्फ इट क्वेश्चंस दैट यू कैन नॉट मेक इक्वल क्लेम। एवरी टाइम यू ट्राई टू मेक इट। जितना आप बोलेंगे उतना ही आप सस्पिशन के घेरे में आते हैं। लाइक फॉर एग्जांपल आई नो दैट नाउ अ डेज मिस्टर असदुद्दीन ओवैसी इज़ ट्राइंग टू बी एज अग्रेसिवली एंड एंटी पाकिस्तान और एज अग्रेसिवली यू नो नेशनलिस्ट एस पॉसिबल ट्राइंग टू बी अ स्टेप अहेड ऑफ़ इवन द हिंदुत्व नेशनलिस्ट बट डजंट दैट डजंट मेक एनी डिफरेंस एज़ सच बिकॉज़ डीनेशन प्रोजेक्ट इज़ सो डीप एंड इन द इंडियन सबकॉन्शियस दैट इट एव्री अदर एक्सरसाइज वुड बी सीन एस ओनली अ सिंबॉलिक वन एज समथिंग व्हिच वेयर योर हार्ट इज़ नॉट इंटू इट बट यू आर डूइंग इट एस फॉर परफॉर्मेंस अ दिस कॉम्बिनेशन जो सिटीजनशिप इरोजन एंड डीनेशनलाइजेशन यह टेक्स यू नो द डायरेक्शन ऑफ क्वेश्चनिंग द लॉयल्टी डायरेक्शन ऑफ इन वि अनवारंटेड वायलेंस यू नो यू आर फेस्ड विथ अनवरेंट इन द सेंस दैट द वे इन व्हिच वी हैव हर्ड स्टोरीज अबाउट लिंचिंग एटसेट्रा यू आर ट्रैवलिंग इन अ ट्रेन और यू आर अह गोइंग यू आर इन मार्केट प्लेस और यू आर एक्सक्लूडेड इन अ स्कूल और समथिंग दिस इज़ समथिंग व्हिच इज़ बीइंग नॉर्मलाइज नाउ तो यू यू टूक द एग्जांपल ऑफ दलित दलित हैव अ डिफरेंट व्हिच इज़ व्हिच इज़ स्ट्रक्चरल इन द सेंस। मैं उसको समझने की कोशिश कर करूंगा कि वो क्यों अलग है और उसको अगर आप बता पाए कि सो दलित क्वेश्चन इज़ एनेंट क्वेश्चन दैट वे अ बट एट द सेम टाइम इफ यू सी दैट दलित क्वेश्चन इज़ नॉट एसोसिएटेड विद द नेशनल नो वन इज़ क्वेश्चनिंग द नेशनलिटी नेशनलिटी है ना अह इनफैक्ट अह राइट फ्रॉम द फाउंडिंग ऑफ द इंडियन स्टेट अ दैट अ दलित हैव पे फेस्ड इंट्रेंस सोशल यू कैन से ऑपरेशन है ना डोमिनेंट ग्रुप्स हैव अटैक्ड देम आल्सो देयर हैव बीन वायलेंस अगेंस्ट देम अह बट व्हेन इट कम्स टू लार्जली द पॉलिटिकल डायनामिक्स नन ऑफ़ द पॉलिटिकल प्रोसेस इवन दोज़ ऑफ़ द हिंदुत्व वैरायटी हम इन टर्म्स ऑफ़ एटलीस्ट दे डिस्कोर्स दे अटरेंसेस देयर कैंपेन कैन क्लेम देमसेल्व्स टू बी एंड बिल्ड देयर पॉलिटिक्स बीइंग एंटी दलित दे माइट बी एंटी दलित इन इन टर्म्स ऑफ़ देयर थॉट एटसेट्रा बट व्हेन इट कम्स टू अट्रेंसेस कम्स टू देयर अह यू नो ऑर्गेनाइजिंग पॉलिटिक्स एटसेट्रा दे अह अह दैट डायनेमिक्स व्हिच व्हिच व्हिच मुस्लिम्स आर फेस्ड विथ इज़ नॉट वेयर दैट डज़। सो दलित आर सीन एस पार्ट ऑफ़ द नाउ एट प्रेजेंट बाय द हिंदुत्व थरी एज़ पार्ट ऑफ़ द हिंदुत्व प्रोजेक्ट। राइट अह इनफैक्ट देयर इज़ अटेम्प्ट बाय द हिंदुत्व नेशनल टू अकोमोडेट देम विद इन एंड दैट इज़ व्हाई यू सी दैट एटलीस्ट इफ मेनी ऑफ़ देयर प्रॉमिनेंट फिगर्स आर आल्सो दलित्स। दे आर आल्सो प्रोमिनेंट फिगर्स इंक्लूडिंग द प्राइम मिनिस्टर क्लेम्स दैट ही इज़ एन ओबीसी। तो जो अ मार्जिनलाइज्ड पॉलिटिक्स आइडेंटिटी फ्रेमवर्क में हो रही थी। हम उसको हिंदुत्व पॉलिटिक्स इज़ ट्राइंग टू अकोमोडेट इन सम वेज़। बट दैट द सेम थिंग दे विल नॉट डू विथ मुस्लिम्स। यू नो बिकॉज़ मुस्लिम्स हैव टू बी एन अदर इट इट इज़ इट इज़ेंट फॉर देम। टू रिमेन एस द अदर राइट विदाउट वि हिंदुत्व इटसेल्फ विल नॉट सर्वाइव राइट तो सर यहां पे हम जो डीनेशनलाइजेशन की बात कर रहे हैं और आपने बोला कि ये एक्सपेरिमेंट सिक्स के साथ भी एक छोटे दायरे छोटे पीरियड में किया गया है। लेकिन एस फ एस मुस्लिम्स आर कंसर्न ये एक्सपेरिमेंट काफी लंबे दौर से चल रहा है। पिछले 10 सालों में 12 सालों में ये बहुत तेजी से आगे गया है। क्योंकि एक प्रेफर्ड एस्टैब्लिशमेंट है जो इस पॉलिटिक्स को आगे बढ़ाती है। लेकिन ये एक्सपेरिमेंट लगातार चल रहा है एटलीस्ट एट द लेवल ऑफ आरएसएस की पॉलिटिक्स और बीजेपी की पॉलिटिक्स पे तो जो मुसलमानों के बीच जो मुसलमानों का डीनेशनलाइजेशन है और जो सिखों का डीनेशनलाइजेशन है उसको आप कैसे डिफरेंशिएट करते हैं क्योंकि बहुत सारे लोग ये भी सोचेंगे कि जो मुसलमानों के एक्सपीरियंसेस हैं वो सिमिलर है सिख एक्सपीरियंसेस से डीनेशनलाइजेशन के दम्स में उसको आप क्या आपको लगता है कि जो ग्लोबल इस्लामोफोबिया है स्पेशली इन द लास्ट 202 इयर्स जो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के अटैक के बाद उसने भी कहीं ना कहीं डीमैक्सिनेशन के प्रोसेस को आसान बनाया है हिंदुत्व पॉलिटिक्स के लिए। लेट मी टेक योर फर्स्ट क्वेश्चन फर्स्ट। द कंपैरिजन बिटवीन सिख एंड मुस्लिम केस सी मेनी टाइम्स कंपैरिजनस आर नॉट नेसेसरीली नीडेड राइट हां मैंने बस इसलिए पूछा क्योंकि शायद जो लोग देख रहे हैं वो ये समझने की कोशिश करेंगे कि वो एक्सपीरियंसेस कैसे हैं हालांकि मैं बिल्कुल उस तरह से समझ पाता हूं ये कंपैरिजन जरूरी नहीं है सबके अपने अलग-अलग एक्सपीरियसेस होते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] बिकॉज़ सिक्स आल्सो फेस ह्यूज अमाउंट ऑफ़ वायलेंस। जी। अह यू नो अह एंड फॉर देम इट वाज़ अ बिग शॉक बिकॉज़ सिक्स सॉ देमसेल्वज़ इंटीग्रेटेड टू द आइडिया ऑफ़ द इंडियन नेशन एट अ सिक्स वेर लार्ज नंबर्स इन द आर्मी देयर वर अ यू नो इन एनी अ सच नेशनलिस्ट मोबिलाइज़ेशन सिक्स वुड ऑल्सो बी इन अ इन गुड नंबर्स एटसेट्रा अह लॉट ऑफ़ लेवल अमोंग्स द सिक्स देमसेल्व्स अह अह अ सेक्शन ऑफ़ देम इज़ आल्सो इन द आरएसएस एंड ऑल दैट। अह सो फॉर देम इट वाज़ अ इट वाज़ अ शॉक अह व्हेन सिक्स केम टू बी टारगेटेड सीइंग देमसेल्व्स एज़ डिसलॉयल टू द नेशन और सीइंग देम देम एज़ असेसनिस्ट एंड आल्सो दैट लेबल टेररिस्ट एट वन पॉइंट ऑफ़ वाइल्ड टाइम स्टक टू द सिक्स। बट द सिक केस वाज़ इन दैट सेंस शॉट लिव्ड। याह। यू नो, एक्सट्रीमली बैड एक्सपीरियंस वेंट थ्रू द हॉरर ऑफ़ अह ह्यूज वायलेंस एज़ आई से अह बट अगेन फोर फाइव इयर्स। एंड देन अह इट डेफिनेटली अह वाज़ नॉट समथिंग व्हिच वाज़ परपीचुअली प्रेजेंट। हिंदुत्व पॉलिटिक्स फॉर एग्जांपल कैन नॉट ऑर्गेनाइज इटसेल्फ टू द सेम वे एन एक्सटेंट बाय टारगेटिंग सिक्स एज इट कैन बी द मुस्लिम अह सो इन दैट वे इन वन ऑफ़ द स्टेटमेंट्स आई थिंक आई मिस्टर मोहन भागवत हु इज़ द आरएसएस चीफ उन्होंने कहा कि भाई हम तो इमेजिन ही नहीं कर सकते हिंदू को विदाउट द मुस्लिम्स ही इज़ राइट बिकॉज़ इन देयर पॉलिटिक्स इज़ सेंटर्ड अराउंड फ्रॉम द बिगनिंग जी ऑफ ऑफ यू नो हां मुस्लिम्स इन एव्री वे सीइंग अ ऑर्डिनरी मुस्लिम एस लेचरस लेटवियस ऑर्डिनरी मुस्लिम एस वन हु इज़ अ जिहादी इफ नॉट दिस जिहादी दैट जिहादी ही इज़ लव जिहादी लैंड जिहादी सम जिहादी ही इज़ यू नो तो उस एक्सटेंट तक वो जो जो ये हेट को उन्होंने सर्कुलेट किया है उसको थराइज़ किया है हिस्ट्री से लेकर के प्रेजेंट तक। दैट इज़ नॉट व्हाट एनी अदर कम्युनिटी एस सच ह स्पेस। द मुस्लिम केसेस इज़ आल्सो बिकॉज़ आई वुड से दैट इट इज़ समथिंग वाज़ इनग्रेन इन द इंडियन नेशनलिज्म इंडियन नेशनल आइडियोलॉजी आल्सो एंड सो इट दैट सो इफ हिंदुत्व कॉन्क्रेटाइज्ड इट मेड इट अ प्रोजेक्ट विथ अ सिंगुलर फोकस। बट इट इजंट दैट इट वास कंप्लीटली एब्सेंट द रिसोर्स द कल्चरल पॉलिटिकल इडलॉजिकल रिसोर्सेज अवेलेबल इट हैड सर्टन काइंड ऑफ़ अ लेजिटिमेसी कि यू कैन टारगेट यू नो अ कम्युनिटी फॉर फॉर व्हाटएवर रीज़ंस अह तो वो चीजें अर्लियर एज वेल इट वाज़ देयर इन द इंडियन नेशनल आइडियोलॉजी इट वाज़ नॉट नेसेसरी ली कंप्लीटली बिल्ट ऑन ट्रूली सेुलर फाउंडेशंस राइट एंड दैट हेल्प्ड हिंदुत्व टू ईली एक्वायर हां लेजिटिमेसी एंड कंसोलिडेट राइट राइट सर यू आल्सो टॉक अबाउट कलेक्टिव वायलेंस एंड इंप्यूनिटी एंड आप बात कर रहे हैं कि कलेक्टिव वायलेंस हो रहा है साथ में इंप्यूनिटी भी है एक वायलेंस के बाद इम्प्युरिटी की वजह से दूसरा वायलेंस अनलीच हो जाता है क्योंकि लोग देखते हैं कि वहां पर कुछ हुआ नहीं। हालांकि अभी हमने कल देखा है कि काऊ विजिलांटिस को मध्य प्रदेश में शायद सजा हुई है लाइफ टर्म की। लेकिन [नाक से की जाने वाली आवाज़] इंप्युरिटी एक लार्जर एक्सटेंट पे है और कई बार ऐसा देखते हैं कि जो जो विक्टिम है उसी पे केस कर दिया जाता है। परपट्रेटर को छोड़ दिया जाता है। तो ये कैसे अनकल सिटीजनशिप परपचुएट करती है? हाउ डस दिस इंप्यूनिटी परपचुएट अनकल सिटीजनशिप अमोंग मुस्लिम्स एंड दैट आईडिया ऑफ इनफैक्ट जो इंप्यूनिटी है दैट इज व्हाट मेक्स इंडियन मुस्लिम्स इन मेनी वेज़ क्लोज़र टू अदर मार्जिनलाइज कम्युनिटीज़ टू क्योंकि आप अगर देखें कि ये जो मास वायलेंस व्हिच हैज़ आल्सो इंपैक्टेड दलित्स इन सम एरियाज लाइक फॉर एग्जांपल आई एम डूइंग रिसर्च ऑन लक्ष्मणपुर बाथे इन बिहार अराउंड 65 पीपल वर किल्ड वन नाइट बाय द रणवीर सिन्हा लोअर कोर्ट से सजा हुई जो परपिट्रेटर्स थे एज दे मूव्ड हायर कोर्ट्स एवरीवन वास एक्विटेड जी आज की डेट में लक्ष्मणपुर पाथ थे व्हेन आई रिसेंटली विजिटेड लास्ट 10 10 15 डेज एगो द सोशल रिलेशंस हैव चेंज्ड कंप्लीटली व्हेन इन दिस विजिट आई सॉ दैट दैट एपिटफ इन वि द नेम्स ऑफ एवरीवन हु वाज़ किल्ड वाज़ पुट अप हैज़ आल्सो बीन नाउ रिमूव्ड टू अ लिटिल रिमोटर साइड ऑफ द विलेज अह कई सारी चीजें चेंज हो गई और उसकी वजह जो जो दोज़ हु आर द पॉलिटिकल एक्टिविस्ट देयर दे वर आल्सो सेइंग दैट हाउ पीपल हैव लॉस्ट इंटरेस्ट एटसेट्रा एंड दोज़ क्वेश्चंस व्हिच वर अर्लियर देयर अबाउट वेजेस अबाउट लैंड एटसेट्रा इज़ नो वन इज़ इंटरेस्टेड इन इट एनी लगर एंड दैट इज़ प्रोबब्ली आई थिंक आई विल कनेक्ट इट विद इंप्युनिटी पीपल पुट ह्यूज एफर्ट इन सीकिंग जस्टिस है ना तो दे टूक रिस्क दे वेंट एंड डिपोज्ड इन द कोर्ट एंड अल्टीमेट ली थ्रू वन मैकेनिज्म और द अदर ऑल ऑफ़ देम हु वर नेम्ड अक्यूज़्ड वर यू नो एक्विटेड अ दिस मस्ट हैव डिरेज्ड द प्रोसेस ऑफ़ जस्टिस एंड दोज़ हु वर पुटिंग होप्स इन द प्रोसेस इटसेल्फ। और यही चीज मैंने भागलपुर के केस में देखा कि भागलपुर 1989 इंप्युनिटी इटसेल्फ इज़ अ स्ट्रक्चर। इट बिगिंस एट वेरियस डिफरेंट लेवल्स एंड नेटवर्क्स आर देयर व्हिच व्हिच अल्टीमेटली यू नो कम इंटू प्ले जैसे ही केसेस ऑफ़ वायलेंस होता है एंड द प्रोसेस ऑफ़ जस्टिस बिगिंस। फॉर एग्जांपल इन द केस ऑफ़ भागलपुर आई सॉ दैट अराउंड 2000 पीपल वर किल्ड। लेकिन मोस्ट ऑफ़ द केसेस में एफआईआर नहीं हुए। एफआईआर हुए भी तो उसमें अननोन पीपल के नाम डाल दिए गए। सो इट कैन नॉट बी प्रोसेस्ड अहेड। और इवन इफ देर नेम्ड एफ एफआईआर द स्पेलिंग्स व रोंग एंड एज अ रिजल्ट ऑफ़ व्हिच दोज़ पीपल कुड ईज़ली क्लेम दैट वी आर नॉट द पर्सन हु हैज़ बीन नेम्ड एंड गॉट ऑफ। बसाइड्स जानबूझकर के एफआईआर करने में डिले किया गया। उस दैट डिले वास यूज्ड इन द कोर्ट टू से दैट एफआईआर वाज़ एन आफ्टर थॉट। व्हाई वाज़ देयर सच अ बिग डिले? वन मंथ डिले और सो। सो व्हिच मींस दैट दैट द विक्टिम्स इनिशियली वर नॉट नेमिंग दोज़ पर पर्पिट्रेटर्स, बट दे मस्ट हैव बीन टॉट बाइ अदर्स एंड देयर फोर दे केम इन। सो इट वाज़ अ कॉन्ट्राइब प्रोजेक्ट। राइट। सो, दैट बिगिंस एट द लोअर लेवल। देन यू मूव टू द अह कोर्ट्स वेयर द गेम ऑफ़ द जजेस, द प्रोसकटर एज़ वेल एज़ द दोज़ आर अदर लॉयर्स, डाउट्स, एवरीथिंग कम्स इन टू प्ले एंड सीकिंग जस्टिस इटसेल्फ इज़ अ लॉन्ग [नाक से की जाने वाली आवाज़] ड्रोन एंड एक्सट्रीमली एक्सपेंसिव प्रोसेस। सो दैट इज़ व्हाई से दैट व्हेन इट कम्स टू इंप्यूनिटी इट इज़ हियर वेयर द मुस्लिम केस लूजेस इट्स स्पेसिफिसिटी। अब मुसलमान अकेले ही नहीं है। जी। ऑल केसेस ऑफ मास वायलेंस इन इंडिया मोर और लेसिटी वहां पे एक इट इट हैपेंस बिकॉज़ देयर इज़ अ गारंटेड इंप्युनिटी राइट फ्रॉम बिगिनिंग फ्रॉम द पार्टीशन वायलेंस राइट टू ऑल दैट केसेस ऑफ़ वायलेंस व्हिच वी कैन राइट नाउ यू नो एंटी सिख वायलेंस राइट ऑल दोज़ वायलेंस बाय रणवीर सेना इन वेरियस पार्ट्स ऑफ़ बिहार सब में तो याद वायलेंस जो तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ हुआ सब में अल्टीमेट जो आउटकम होता है वो कि पीपल विल गो एस गॉट फ्री जी अ न्यू ट्रेंड ऑफ कोर्स व्हाट वी हैव बीन वी हैव नोटिस्ड इज़ एंड प्रोबब्ली दिस मेक द मुस्लिम केस अपार्ट इज़ द नॉट ओनली द इंप्युनिटी बट व्हेन द पपिटेटर्स आर फ्रीड दे आर सेलिब्रेटेड देयर इज़ अ जुबिलेशन अराउंड दैट राइट देयर इज़ अ लॉट ऑफ व्हाट यू से या व्हिच इज अगेन ट्राइंग टू ग्लोटिंग टेक्स प्लेस व्हिच वी सॉ इन द केस ऑफ़ बिल्किस बानो और दोज़ हु और वो झारखंड में जो झारखंड में जो जहां पे आपके यशवंत सिन्हा के गलैंड पहनाया था एंड दिस इज़ रूटीन हैपेंस इन हरियाणा राजस्थान एवरीवेयर सो दैट इज़ प्रोबब्ली यू नो दीज़ आर ट्रीटेड एस हीरोज़ हम नॉट सिंपली एस दोज़ हु सम हाउ ओके मैनेज टू गेट अवे एंड यू नो सेव देमसेल्व्स बट नाउ दे आर ऑल नॉट ओनली दैट बट दे आर एक्चुअली हीरोज़ बिकॉज़ दे इनक्टेड समथिंग दैट दैट हैज़ वाइडर अप्रूवल तो तकरीबन हमारी सारी बातें हो चुकी हैं। मतलब जो बातें आपसे करनी थी सिटीजन के हवाले से मुसलमानों के बारे में क्योंकि आज एक बहुत बड़ा प्रॉमिनेंट मुद्दा बना हुआ है। चाहे वो सीए एनआरसी के डिबेट के बाद हो या एसआईआर के क्वेश्चन पे हो। मुसलमानों की सिटीजनशिप अपने आप में एक एकिस्टेंशियल क्वेश्चन है। तो मेरा एक आखरी सवाल आपसे यह है कि अगर हम पिछले 12 साल को देखते हैं जहां पे ये सरकार रही है। उस 12 साल में सबसे बड़ा थ्रेट कौन सा मोमेंट था मुसलमानों के लिए जहां पे उनकी सिटीजनशिप को एकदम डायरेक्ट डायरेक्टली चैलेंज किया जा रहा था। नो सीए ऑफ कोर्स वास वन सच अटेम्प्ट बट देयर आर सी यू कांट सी एनीथिंग इन आइसोलेशन फॉर एग्जांपल आई कांट सेपरेट एसआईआर फ्रॉम सीएए हम अ उसका भी एंड गोल सेम है इफ नॉट आपकी सिटीजनशिप लीगल सिटीजनशिप नहीं ले सकता तो आपको के पॉलिटिकल राइट्स जो है वो छीना जा सकता है। हम योर वॉइस बिकम्स इन इफेक्टिव बिकॉज़ इन हां इवन इफ यू वोट योर नंबर्स आर नॉट रिड्यूस्ड है ना राइट और अपार्ट फ्रॉम दैट इट्स एन ऑनगोइंग प्रोजेक्ट नाउ अभी रिसेंटली आई थिंक लास्ट 15 डेज में एक न्यू कमीशन का अनाउंस गवर्नमेंट ने किया है। इट इज़ कॉल्ड अ डेमोग्राफी कमीशन। हम्। एंड उसके टर्म्स ऑफ़ रेफरेंस में है कि लुक इंटू द अननेचुरल ग्रोथ ऑफ पापुलेशन इन सर्टेन कम्युनिटीज़। ऑलराइट द कम्युनिटी हैज़ नॉट बीन नेम। इन सर्टेन कम्युनिटीज़ व्हिच मींस कम्युनिटी वाइज़ डेटा दे कैन देखा जाएगा। हां इट इज़ देयर दे हैव द मैंडेट टू डू दैट। राइट? अ वी नो इफ यू अंडरस्टैंड द पॉलिटिक्स ऑफ द करंट टाइम्स वी नो दैट व्हाट इट इज इंटेंडेड टू डू राइट अ तो ये चीज तो एक यू नो वी कैन नॉट आइसोलेट वन फ्रॉम द अदर एव्री मोमेंट द बिकॉज़ द प्रोजेक्ट इज़ ऑन इट इज़ नॉट इट इज़ नॉट लाइक रीच्ड इट्स बैक गोल एज़ सच सो इट इज़ अ कंटीन्यूअस प्रोजेक्ट प्राइस आई स्टिल हैव लॉट ऑफ़ होप। होप बिकॉज़ वन हिस्ट्री टेल्स अस दैट थिंग्स डू चेंज। राइट एंड इफ फ़ैशिज़म इन यूरोप वाज़ डिफिटेड। विथ इट्स मैसिव वेयर विद ऑल। राइट। इट इट इट एंड इन मेनी अदर प्लेसेस अस वेल। वी हैव सीन द डाउनफॉल ऑफ डिक्टेटर्स हु हैव बीन देयर फॉर 30 35 इयर्स एंड देन अरब स्प्रेइंग एंड ऑल दैट व्हिच चेंज्ड इट ऑल टुगेदर व्हाट वाज़ द आउटकम वी डोंट नो बट दैट कैन नॉट बी प्रेडिक्टेड आल्सो दैट्स ट्रू बट नेवर द लेस देयर इज़ समथिंग व्हिच इज़ अ यू नो इन ह्यूमन यू नो स्पिरिट एंड ह्यूमन एनर्जी व्हिच वुड नॉट रेस्ट विथ आई बिलीव अ कास्टेंट कंटीन्यूस ऑपरेशन इट एट सम मोमेंट और द अदर अ दैट दैट पॉइंट ऑफ़ ब्रेक डज़ मच। सो वी हैव सीन द कोलैप्स ऑफ़ कॉलोनियलिज्म इन अफ्रीका इन अल्जीरिया इन इंडिया एटसेट्रा मैंने हालांकि कह दिया था। सो हिस्ट्री गिव्स मी होप दैट इज़ राइट। मेरा अगला क्वेश्चन यही था कि पॉलिटिकल सोशियोलॉजिस्ट होने के नाते आपका आपको होप कहां से आता है? आपने खुद बता दिया कि हिस्ट्री से आपको होप आता है। लेकिन मैं एक सवाल आपसे और करूंगा इस गुफ्तगू को खत्म करने से पहले। जो इंडियन मुस्लिम्स का एग्जांपल है। मैं कई बार उसको रोहिंग्यास के साथ कंपेयर करने की कोशिश करता हूं। पर्सनली आई ट्राई टू ड्रॉ पैरेलल्स। एंड ट्रस्ट मी शायद जब 13 साल पहले 14 साल पहले मैं रोहिंग्यास को कवर कर रहा था तो मुझे एक कई बार ऐसे थॉट्स भी आए हैं कि क्या हिंदुस्तान हिंदुस्तान के मुसलमानों का मुस्तकबिल में क्या ऐसा होने वाला है क्योंकि ठीक है पिछले 12 साल में एक्सक्लूजन का प्रोसेस जो है बहुत ज्यादा बढ़ गया है और बहुत ज्यादा रिप्रेशन है लेकिन उससे पहले भी चीजें खराब थी और और शायद मैं उस वक्त से ही यह एसोसिएशन ड्रॉ कर रहा हूं कि क्या मुस्लिम्स भी रोहिंग्या के पोजीशन में कभी आ सकते हैं या नहीं आ सकते हैं जहां पे आपको इललीगल चैनल्स से माइग्रेट करना पड़ जाए दूसरे स्टेट में जहां पे आप वाटर रूट्स के थ्रू भाग रहे हैं अपनी जान बचाने के लिए तो आपको लगता है क्या हिंदुस्तान में इसका पोटेंशियल है या हिंदुस्तान के जो डेमोक्रेटिक और सोशल स्ट्रक्चर्स हैं वो इसको कंटेन कर लेंगे और ऐसा नहीं हो पाया होगा हिंदुस्तान में नो सो देयर आर सम कमेंटेटर्स हु मेंशन दैट हाउ इंडिया इंडियन सिचुएशन विज़ अवे मुस्लिम्स टुडे इज़ सम वन स्टेज और द अदर ऑफ़ जेनोसाइड और समथिंग लाइक दैट अ रीज़ रिसेंटली द यूएस सेनेटर हैज़ आल्सो मेड दैट कमेंट सो देयर आर पैरेलल्स यू कैन से इन सम वेज़ और द अदर द ओनली थिंग वि आई बिलीव मे नॉट लीड अस टू अ सिमिलर सिचुएशन इज वन अ द डायवर्सिटी इन इंडिया हम सो अ यूनिलटरल सिमिलर काइंड ऑफ़ अ प्रोजेक्ट व्हिच रंस अक्रॉस द लेंथ एंड ब्रेथ ऑफ इंडिया हम फ्रॉम केरला टू कन्याकुमारी और फ्रॉम द वेस्ट कोस्ट टू द ईस्ट कोस्ट और समथिंग लाइक दैट दैट मे नॉट बी प्रोबब्ली पॉसिबल हम अह बिकॉज़ यू नो देयर आर रीजंस दे दोज़ रीजंस इवन इफ दे कम टू बी कंज्यूम्ड बाय सम काइंड ऑफ़ अ यू नो मेजॉरिटेरियन फ्रेमवर्क बट दे देयर यू नो रिस्पांस टू मुस्लिम्स अमोंग्स देम मे वेरीरी बिकॉज़ इन सम प्लेसेस मुस्लिम्स एंड सच स्मॉल नंबर्स एंड अदर प्लेसेस दे कुड बी सीन एज अ थ्रेट एटसेट्रा सो द सिचुएशन इज़ नॉट सेम लाइक फॉर एग्जांपल द एसएम सिचुएशन इज़ नॉट सेम एज से द सिचुएशन इन केरला केरला राइट अ सेकंडली द प्रोपोर्शन मुस्लिम्स इन इंडिया आर नॉट लेस देन आई थिंक 200 मिलियन एंड व्हिच इज अ ह्यूज प्रोपोर्शन फॉर फॉर अ एनी सच काइंड ऑफ़ अ एक्सरसाइज टू टेक प्लेस। राइट? अह सो व्हाट विल हैपन इज़ अ न्यू काइंड ऑफ़ अ यू नो प्रोजेक्ट ऑल टुगेदर अ न्यू काइंड ऑफ़ अ राइट विंग इमेजिनेशन। इन वि इट इज नॉट नेसेसरी विल नॉट रिक्वायर अ यू नो एनी एक्सटर्मिनेशन एक्सटर्मिनेशन ऑफ़ मुस्लिम्स एस सच बट देन कंटिन्यूस ऑपरेशन तो आप कह रहे हैं कि विद इन द टेरिटरी वो कंटीन्यूअस ऑपरेशन बना रहेगा और आप ये भी कह रहे हैं और शायद दैट्स बना रहेगा नहीं दैट्स दैट्स द प्रोजेक्ट दैट्स प्रोजेक्ट राइट राइट और एक सच्चाई यह भी है कि और शायद मेरी भी अंडरस्टैंडिंग यही है जो आपकी अंडरस्टैंडिंग है कि हिंदुत्व पॉलिटिक्स जो है वो अदराइजेशन ऑफ़ मुसलमानों पे डिपेंड करती है। और अगर मुसलमान नहीं रहेंगे इस प्रोजेक्ट में तो वो हिंदुस्तान हिंदुत्व पॉलिटिक्स सक्सीड ही नहीं कर पाएगी। वो आगे थ्राई भी नहीं कर पाएगी। आई विल जस्ट वांट टू ऐड टू इट इज़ दैट देयर आर सम पीपल इवन अमंग्स मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स एटसेट्रा। आई रिसेंटली वाज़ पार्ट ऑफ़ अ स्माल डिस्कशन। हम्म इन इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर फाइव सिक्स पीपल वर देयर एंड वन ऑफ़ देम वाज़ दो वाज़ दोज़ हु वाज़ बीन अ फॉर्मर इलेक्शन कमिश्नर एंड वाज़ इज़ आल्सो ही इज़ अ पार्ट ऑफ़ दैट ग्रुप व्हिच व्हिच फील्स दैट मुस्लिम शुड एंगेज विथ इंगेज विद आरएसएस दे आर एक्चुअली एंगेजिंग विथ आरएसएस चीफ मोहन भागवत एंड सो ऑन नाउ अह माय कंसर्न इज़ दैट हाउ डू वी सी फर्स्ट ऑफ़ ऑल ऑल यू हैव टू अंडरस्टैंड दिस एंटायर डिस्पेंसेशन दिस द होल यू नो अह 100 इयर्स ऑफ द ऑर्गेनाइजेशन एंड इट्स पॉलिटिक्स इट्स आइडियोलॉजिकल यू नो अह कंस्ट्रक्ट्स थ्रू व्हिच इट वर्क्स एटसेट्रा तो अगर हमारी यह समझदारी है कि मुसलमानों को टारगेट करना सिर्फ उनका पॉलिटिकल नीड है। वी मे स्टिल थिंक दैट ओके लेट अस ट्राई टू शिफ्ट द पॉलिटिक्स। इफ दे वांट नंबर्स वी विल जॉइन आरएसएस वी विल जॉइन बीजेपी एंड देन दिस विल बी ओवर ऑल टुगेदर। तो ऐसे कई लोग हैं जैसे कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच वाले लोग हैं जो कि सोच रहे हैं कि ज्यादातर तो हो सकता है कि पावर हैज़ इट्स ओन फ्रेंड्स राइट तो वो देख रहे हैं कि चाहिए यही है मौसम का उसी मौसम के हिसाब से अपने आप को भी ढाल लिया जाए लेकिन उसमें हो सकता है कुछ लोग ये भी सोच रहे हो के अगर हम उनसे करीब आएंगे तो जो वेनम है जो पोइजन है वो वो हम जो है मिनिमाइज कर देंगे। जैसे भगवान शंकर ने जो है विष पी लिया था। है ना? तो उस तरह से हम करके जो है अपने आप को प्रूफ करें कि हम भी आपसे कोई अलग नहीं है। हम आप ही की तरह हैं वगैरह। तो एक तो यह है कि इट इज नॉट बिकॉज़ ऑफ़ एनी मिसअंडरस्टैंडिंग। राइट? कि मुसलमानों को ठीक से समझ नहीं पाए हैं। इसलिए वह जो है इस तरह की चीजें कर रहे हैं कि उन्होंने हिस्ट्री में किसी ने उनको बहका दिया है कि आपके जो है औरंगजेब ने ऐसे नहीं किया था। ऐसे किया था। आपकी समझदारी हिस्ट्री की गलत है। तो उसके बाद जो है सब चीजें सही हो जाएंगी। तो ये तो नाइविटी है। इसको मुझे यही समझ में आता है कि आपने या तो समझा नहीं है इसको। यह कोई हिंदुस्तान का अकेला एक्सपीरियंस नहीं है। ये हर जगह कई जगह पे इस तरह इसी तरह के फैश आइडियोलॉजिकल मूवमेंट्स हुए हैं और बहुत हद तक सिमिलर भी है। कोई ज्यादा डिफरेंस नहीं है। आप इंडियन फैशिजम्म जो हिंदुत्व के थ्रू डेवलप हुआ है उसको ईली आप जर्मन फैशिम से कंपेयर कर सकते हैं। उसके ज्यादातर जो है मैकेनिज्म मेथड और यू नो इडलॉजी वगैरह जो है ऑलमोस्ट सेम है। कोई फर्क नहीं है। एक्सेप्ट फॉर मे बी हाउ दे यू नो अनफोल्ड इट इन प्रैक्टिस वो डिफर कर सकता है। जैसे जर्मन फैशज़्म एक्सपेंशनिस्ट हो गया था। एडवेंचरिस्ट हो गया था। ये शायद नहीं कर रहे हैं। टेरिटरी हां बिय्ड टेरिटरीज चला। यहां पे भी एक ऐसी सोच तो है कि भारत की हां राइट नाउ आई थिंक दे अंडरस्टैंड देयर मिलिट्री लिमिटेशंस एंड दैट इज नॉट ऑन द कार्ड। ओके? तो वो मैं नहीं देख रहा हूं एस सच। तो मुझे लगता है कि दैट इज़ व्हाट दे हैव लर्न फ्रॉम जर्मन फैशज़्म इज़ कि इफ जर्मन फैशज़्म हैड रिमेन प्रोबब्ली विद इन देयर ओन ये विद इन देयर ओन टेरिटरी बाउंड्रीज़। तो शायद जर्मंस को कोई ज़्यादा प्रॉब्लम तो था नहीं कि इस जस को जो है टारगेट किया जा रहा है। इनफैक्ट कुछ कई सारे जूस जो थे वो कोलैबोरेट भी कर रहे थे। एंड अ बट व्हेन दे बिकम एक्सपेंशनिस्ट देन व्हेन दे कॉनक्वट फ्रांस सेंट आर्मीज़ टू रशिया हियर एंड देयर ब्रिटेन वाज़ अंडर थ्रेड दैट इज़ व्हाट द अलाइड फोर्सेस केम टुगेदर राइट तो शायद वो एक उन्होंने सीखी है वहां से और प्रोब्ली वो एक्सपेंशनिस्ट आईडिया अभी उस तरह से तो दिखता नहीं ऑलदो दे एंड देयर आईडियोलॉजी इट इज देयर यस यस दैट इज व्हाट आई मीन टू से व्हेन दे टॉक अबाउट अखंड भारत एन एक्सपेंशनिस्ट आईडिया इटसेल्फ बट नेवर द लेस बहुत-बहुत शुक्रिया सर आपका कि आपने हमें टाइम दिया और एक बहुत अच्छी गुफ्तगू को अंजाम दिया। मुझे लगता है कि जो लोग भी [संगीत] ये शो देखेंगे उनको उनके ना सिर्फ नॉलेज में इजाफा होगा बल्कि साथ-साथ जो मुसलमानों के सिटीजनशिप के जो सवाल है उसको लेकर बहुत क्लेरिटी बनेगी। तो बहुत-बहुत शुक्रिया आपने टाइम दिया हमें और हम उम्मीद करते हैं कि फिर हम दोबारा आपके साथ कभी कनेक्ट करेंगे। थैंक्स अाउस फॉरव हैविंग मी ओवर। इट वास अ वंडरफुल एक्सपीरियंस। थैंक यू सर।

Companion article

Tanweer Fazal, a political sociologist who has written extensively on statehood, minority rights and exclusion, opened his conversation on the Nous Podcast with host Asad Ashraf by naming the central idea running through his work: "illusive citizenship" — a term, borrowed from his recent book with co-authors, for the gap between the equal legal membership the Indian Constitution promises every citizen and what actually happens on the ground. That gap, Fazal argued, has not narrowed with time. It has widened, reinforced both by social inequality within Indian society and by an increasingly hostile political establishment that has, in the last decade or two, moved from neglecting constitutional promises to actively eroding them.

Not Just Rights, But the Nation Itself

Fazal's sharpest distinction was between citizenship erosion, which he said other marginalised groups — Dalits, Adivasis, the rural poor — also experience in different forms, and what he called "denationalisation," a project specific in intensity to Muslims. Citizenship erosion takes away legal protections and equal treatment. Denationalisation goes further: it questions a community's very claim to India as a homeland, branding its members outsiders, traitors, and permanent suspects regardless of what they do to prove otherwise. He offered a pointed illustration: Asaduddin Owaisi's efforts to appear as aggressively nationalist and anti-Pakistan as any Hindutva figure change nothing, Fazal said, because "the denationalisation project is so deep in the Indian subconscious" that any such gesture is read as performance rather than genuine belonging.

He traced this asymmetry to how Hindutva discourse treats Dalits versus Muslims. Dalits, despite facing real violence and untouchability, are not typically accused of disloyalty to the nation; the Hindutva movement has, in fact, worked to accommodate them within its fold — hence a prime minister who claims OBC status and prominent Dalit figures within the BJP. Muslims cannot be absorbed the same way, Fazal argued, because Hindutva's politics has been organised around Muslims as its foundational "other" since its inception; RSS chief Mohan Bhagwat, he noted, has said as much, remarking that Hindutva politics is difficult to imagine without positioning itself against Muslims.

A Constitution That Was Never Fully Composite

Asked why "composite nationalism" — the founding vision of Nehru, Azad and others that all identities could be accommodated within a single Indian state — failed to prevent Hindutva's rise, Fazal resisted treating this as simply a betrayal of an otherwise pure ideal. Majoritarian tendencies, he said, were embedded in the constitutional structure from the start. He pointed to state-level anti-conversion and anti-cow-slaughter laws passed even under Jawaharlal Nehru's government, a 1955 Sanskrit Commission that seriously proposed Sanskrit — a language nobody speaks — as India's national language on the grounds that other Indian languages derive vocabulary from it, and Article 341's exclusion of Christian and Dalit Muslims from Scheduled Caste status, with only Sikh and Buddhist converts granted exceptions in 1956 and 1990 respectively. This distinction between religions of supposed "Indian origin" and those considered foreign, Abrahamic imports, Fazal said, traces back to Savarkar's writings on Hindutva and shaped Indian constitutional thought far more than is usually acknowledged — meaning Hindutva did not need to invent its ideological resources from nothing; it concretised material that was already present.

Learning From the Sikh Precedent, Without Equating It

Fazal has separately studied Sikh political identity alongside Muslim identity, and he was careful to explain both the parallel and its limits. Both communities, in the colonial and early independence periods, produced strands of thought imagining themselves as distinct nations — a strand of Muslim political thought that culminated in Pakistan, and a Khalistan movement grounded not in theology but in the specific politics of Partition-era Punjab, where Sikhs, having been a plurality in undivided Punjab, became a minority within the reorganised state and felt their distinctiveness threatened. Both movements, Fazal stressed, were products of history and political economy rather than anything intrinsic to Sikh or Islamic theology — a point he underlined by noting Indian Muslim scholars historically developed the concept of "dar-ul-aman" (abode of peace) and "dar-ul-ahd" (abode of covenant), building on precedents including the Prophet's pact with Medina's Jewish tribes, specifically to theorise coexistence within a non-Muslim-majority state, a lineage that critics invoking "dar-ul-harb" conveniently ignore.

The crucial difference, in Fazal's account, is duration and structure. Sikh targeting — during and after Operation Blue Star, including being branded separatists and terrorists — was traumatic but comparatively short-lived, roughly four or five years at its most acute. Hindutva politics, he argued, cannot organise itself against Sikhs to the same structural, permanent extent it does against Muslims, because its foundational grammar was never built around Sikhs as the constitutive threat.

From the Streets to the Statute Book

Much of the conversation traced how citizenship erosion has moved from abstract policy into daily, lived experience. Fazal pointed to the 2019-20 anti-CAA/NRC protests as evidence of a changing Muslim civil society: a movement notably led by articulate women in decision-making roles, largely free of religious orthodoxy, framed around a material, existential claim — "our very existence is being challenged" — rather than the symbolic or cultural grievances Muslim politics is often accused of prioritising. That momentum, he said, was cut short by two forces arriving almost together: the COVID-19 lockdown, which forced immediate demobilisation, and a severe state crackdown that he compared to colonial-era repression — students shot in Uttar Pradesh, police entering Jamia Millia Islamia and Aligarh Muslim University campuses to beat students, a pattern Fazal said had no real precedent in independent India's handling of civilian protest.

He argued that the current Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls should be read as a direct continuation of the CAA-NRC project by other means, particularly in West Bengal, where more than ninety lakh names were removed from voter lists, with a newly introduced and undefined category — "logical inconsistency," covering spelling errors or minor variations in parents' names — disproportionately applied to Muslims, who Fazal said made up roughly 65 percent of those excluded under that specific category despite being a much smaller share of the state's population. Because the process targets Muslims without naming them, he added, it manages to function as a polarising instrument without generating the cross-sectional public anger a more explicit exclusion might provoke: much of the wider population is simply unbothered, or even satisfied, by exclusions it believes are deserved.

Otherisation as Deliberate Policy, Not Cultural Drift

Fazal rejected the idea that Muslims are simply "othered" through organic cultural difference, insisting the process is deliberate and traceable through specific policy choices: Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma's population and land policies aimed, in Fazal's reading, squarely at Bengali Muslims; Hindutva-inflected popular culture and cinema; and a labour market where, by his informal observation, roughly eight in ten service workers a household calls on are Muslim, doing the lowest-paid, least secure work, with employers increasingly wary of hiring Muslims at all — a wariness Fazal, an academic who has never publicly foregrounded his own identity, said he now feels affects him personally in professional contexts. He cited the prime minister's own remark about "punctured-wala" repairmen — widely understood as a coded reference to Muslims in that trade — as an example of how such stigmatisation operates at the highest level of political rhetoric and cascades downward into ordinary commercial life, including campaigns against halal food labelling and pressure on Muslim shopkeepers to display Hindu-sounding names.

Why the "Hyderabad Model" Does Not Travel

Fazal was equally wary of one-size-fits-all prescriptions for Muslim political mobilisation, pushing back on the idea that any single party or strategy — including the AIMIM's Hyderabad-centred politics — could simply be exported to Bihar or Bengal. Muslim experience varies sharply by region, he argued: Kerala and parts of Hyderabad show Muslim populations with a substantial business and professional class alongside the poor, while Muslims in Bihar, Bengal and Assam are overwhelmingly poor, disproportionately rural and agrarian rather than urban, a demographic profile that runs against the common assumption that Muslims are predominantly a city-dwelling community. Decades of socialist and Left politics in Bihar and Bengal, he noted, did not meaningfully lift Muslim socio-economic indicators any more than thirty-five years of OBC-centred politics in Bihar has lifted OBCs out of being among the state's poorest groups — representation, he argued, has improved in some places, but the deeper social and economic transformation that politics promised has not followed, and may require a longer, harder, more determined organising effort than electoral politics alone has attempted.

Impunity as a Structure, Not an Accident

Fazal connected Muslim citizenship experience to a broader pattern of impunity for mass violence in India, drawing on his own research into the Lakshmanpur Bathe massacre in Bihar, where roughly sixty-five people were killed by the Ranvir Sena in a single night — convictions won at the lower court were overturned entirely on appeal, and the memorial listing victims' names has since been relocated to a more remote corner of the village. He described a similar structural pattern in the 1989 Bhagalpur riots, where most FIRs were never filed, filed against unnamed persons, or filed with the accused's names misspelled, and delays in registering complaints were later used in court to argue the FIRs were opportunistic afterthoughts rather than genuine testimony. This is, he argued, precisely where the Muslim case converges with other victims of mass violence — Ranvir Sena's killings, anti-Sikh violence, and caste atrocities against Dalits in Tamil Nadu all share this structural impunity. What distinguishes the Muslim case now, in his view, is a further step: convicted perpetrators are not merely freed but publicly celebrated as heroes, citing the garlanding of convicts in the Bilkis Bano case and similar incidents in Jharkhand, Haryana and Rajasthan.

Comparisons to Rohingya, and Reasons for Guarded Hope

Asked whether Indian Muslims could ultimately face a fate resembling the Rohingya's, Fazal acknowledged some commentators, including a recent US senator, have described India's trajectory as somewhere on a spectrum toward genocide. He pushed back only partially: India's sheer diversity and regional variation, he argued, make a uniform nationwide project unlikely to unfold identically from Kerala to Kashmir, and the scale of India's roughly 200 million-strong Muslim population makes any Rohingya-style expulsion logistically implausible. What is more likely, he said, is a "continuous operation" of pressure and exclusion without a fixed endpoint — not extermination, but permanent, unresolved otherness, formalised recently through the government's newly announced Demography Commission, whose mandate to examine "unnatural growth of population in certain communities" leaves little doubt, in Fazal's reading, about its intended target despite avoiding the word "Muslim."

He drew an explicit comparison between Hindutva's ideology and German fascism, arguing the mechanisms are nearly identical except that Hindutva, unlike Nazism, does not currently show serious appetite for territorial expansionism — though he noted the "Akhand Bharat" idea carries a latent expansionist charge. On efforts by groups like the Muslim Rashtriya Manch to build bridges with the RSS leadership, Fazal was skeptical, comparing the impulse to Shiva drinking poison to save the world — a well-meaning but naive strategy, he argued, since Hindutva's targeting of Muslims is not a misunderstanding correctable through historical clarification or friendly engagement, but a century-old organisational project with its own internal logic. Still, he closed on a note of qualified hope: history, he said, shows fascism and colonialism have collapsed before under pressures that seemed, at the time, impossible to reverse — and that same possibility, however distant it feels today, has not been foreclosed.

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