11:35Salman Khurshid on Gyanvapi and Babri I nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation.
In this thought-provoking conversation, senior Congress leader Salman Khurshid reflects on some of India's most complex political and constitutional debates. He discusses the relationship between secularism and personal law, questioning how philosophical and religious belief systems interact with…
मस्जिदों के साथ आप देख रहे हैं क्या हो रहा है। आपने तो बाबरी और संभल और कमल मौला मास का जो जजमेंट है आपके हिसाब से क्राइसिस कितना डीप है। हमने कानून बनाया था प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट का कि हमने ये तय किया [संगीत] कि एक कहीं ना कहीं लकीर खींच कर ये कहा जाए कि इससे पहले जो कुछ हुआ है उसको अब भूल जाइए। [संगीत] इसके बाद अब कुछ नहीं होगा। जब ये लोग बोलते हैं कि भ हिंदुस्तान का मुसलमान सेकंड [संगीत] क्लास सिटीजन बन रहा है तो आपके हिसाब से कॉन्स्टिट्यूशनली स्पीकिंग क्योंकि आपकी एक्सपर्टीज है। व्हाट डस दैट मीन? सवाल ये होता है कि इसका हम क्या जवाब दे पा रहे हैं? मुझे अफसोस इस बात का [संगीत] है कि हम इसका जवाब नहीं दे पाते या तो हम चुप हो जाते हैं। लेकिन जो डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैं वो बड़े वाज़ हैं कि भ हमें यूनिफार्म सिविल कोर्ट की तरफ बढ़ना है। हमें या काऊ सैक्रिफाइस [संगीत] या बहुत सारी ऐसी मुख्तलिफ चीजें हैं जो कहीं ना कहीं टेंपरामेंट सेट करती है कि आपकी रीडिंग भी किस डायरेक्शन में हो। कोर्ट ने यह कहा कि आपको एक बेहतर जगह दे देते हैं। लेकिन यह मान के कहा कि ये आपका हक था यहां और आपके साथ हकतफी हुई है। ये कहा है कोर्ट ने। सेकुलरिज्म या सेकुलरिटी [संगीत] और कोई भी पर्सनल लॉ या कोई आईडियोलॉजी जो अपने बिलीफ सिस्टम से आती है वो फिलोसोफिकली मेटाफिजिकली टकराएगा ही टकराएगा। [संगीत] नहीं टकराएगा। सेकुलर जो वो है निजाम है वो वो पर्सनल लॉ निजाम से अलग नहीं है। पर्सनल लॉ सेकुलर निजाम का ही हिस्सा है। बट सवाल ये होता है कि जब बाबरी [संगीत] मस्जिद में कोई जजमेंट आता है तो ये बात होती है कि एसेंशियलिटी क्या है? या इसकी रीडिंग कौन करेगा? हु विल डू द रीडिंग? दैट [संगीत] चेंजेस द गेम। सच कमेटी में सबसे पहले सबसे पहले हमने माइनॉरिटी से हटकर [संगीत] मुसलमान का नाम रखा था सचड कमेट में। लेकिन जनरली जो सेकुलर पॉलिटिक्स या सोशलिस्ट [संगीत] पॉलिटिक्स हुई है चाहे वो रीजनल हो उसका जो हैविएस्ट बर्डन है वो तो मुसलमानों को सहना पड़ा है। गिव एंड टेक होता है किसी भी कम्युनिटी के साथ गिव एंड टेक होता है। लेकिन इस वक्त स्पेसिफिकली क्या चाहते हैं मुस्लिम्स वो मुस्लिम्स कम्युनिकेट करें। जो इंडिया का डिस्कोर्स है, गांधियन डिस्कोर्स है या दूसरे डिस्कोर्स हैं पॉलिटिक्स एंड रिलीजन को बहुत सीरियसली के हाउ मच कैन इट इनफॉर्म द सोसाइटी क्योंकि यहां पे एंबेडेड है जब बात हो रही है कि भ एक [संगीत] नई डील होनी चाहिए वो रीजनल पार्टी से भी होगा वो दलितों से भी होगा ओबीसी के भी वो अक्रॉस द बोर्ड एक नया काइंड ऑफ़ इमेजिनेशन वेयर [संगीत] इज द मुस्लिम इन दैट इमेजिनेशन एज मुस्लिम नाउ से एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी [संगीत] और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। [संगीत] [संगीत] आपका नाम उसके पॉडकास्ट में बहुत खैरमकदमम है। खुर्शीद साहब आप एक जमाने से जिसे कहते हैं अपनी यंग ऐज से हिंदुस्तान का जो इंस्टीट्यूशनल कॉन्स्टिट्यूशनल सिस्टम है आप उसमें एंबेडेड भी रहे हैं और आप बहुत इंपॉर्टेंट रोल्स मुझे लगता है शायद बहुत कम ऐसे मुसलमान होंगे हिंदुस्तान में जिन्होंने इतने इंपॉर्टेंट पोर्टफोलियोस फॉरेन अफेयर्स माइनॉरिटी अफेयर्स कॉमर्स लॉ दीज़ आर वन ऑफ दी मोस्टेंट पोर्टफोलियोस जो किसी कंट्री को रन करने के लिए कैबिनेट में इंपॉर्टेंट होते हैं। तो ये तो पहली बात ये इस बात की भी एक तरह से इंडिकेशन है कि मुसलमान एक जमाने तक उन ओहदों पर पहुंच सकता था। लेकिन ये भी सच्चाई है कि द कर्व इज रिसीडिंग। वो इस तरह से समझ सकते हैं कि आजादी के बाद मौलाना आजाद जो हैं नेहरू गांधी के बिल्कुल इक्वल अह फुटिंग पे हैं। या आपके जो नाना रहे हैं डॉ. जाकिर हुसैन। आई मीन दीज़ आर द पीपल हु आर बेसिकली बिल्ड द नेशन। एंड द कर्व सीम्स टू बी फॉलिंग डाउन हम फॉर व्हाटएवर रीज़ंस वी विल डिस्कस या तो उस सबसे पहले तो मैं ये जानना चाहूंगा कि 2014 के बाद का जो हिंदुस्तान है मैं अक्सर ये बात बोलता हूं पॉडकास्ट में कि मैंने दोनों हिंदुस्तान देखे हैं। ऑफ कोर्स आपने भी देखे होंगे लेकिन क्योंकि हम जिस जनरेशन से आते हैं वो हिंदुस्तान भी देखा है कि जहां पे हम लोग सर उठा के कॉन्फिडेंटली बात कर सकते हैं। डिस्पाइट ऑल ऑफ दी डेप्रिवेशन सच अ कमिटी रिपोर्ट एवरीथिंग देयर वास स्टिल सिक्योरिटी और उसके बाद का जो आज का हिंदुस्तान है कि जहां पे बुलडोजर जहां पे आपकी इक्वल सिटीजनशिप जहां पे एसआईआर जहां पे सीएए जहां पे आपके जो कन्वर्शन लॉस है आई मीन द लिस्ट इज़ अनइंडिंग वफ मस्जिदों के साथ आप देख रहे हैं क्या हो रहा है आपने तो बाबरी और संभल और कमल मौला मास का जो जजमेंट है आपके हिसाब से क्राइसिस कितना डीप है? क्या है? क्योंकि अब आप इंडिया इंटरनेशनल इस्लामिक सेंटर के भी प्रेसिडेंट हैं। अपने जो पुराने जो इंगेजमेंट्स हैं आपके जो कांग्रेस के साथ हैं इंस्टीट्यूशनल रूल्स में एज अ कम्युनिटी लीडर आज की डेट में जो आपके इंगेजमेंट्स हैं। आप मैं देखता हूं कि बहुत सारे जो एडवोकेसी के प्रोग्राम्स होते हैं वो आप रेगुलरली अपीयर होते हैं। व्हाट डू यू थिंक इज द क्राइसिस? मुसलमान हो या जनरली हिंदुस्तान हो। व्हाट इज इट फेसिंग? देखिए क्राइसिस तो एक एक बुनियादी क्राइसिस है डेमोक्रेसी का। हम लोग जम्हूरियत को किस नजरिए से देखते हैं और नापते हैं और जाहिर है जब जम्हूरियत पर सवालिया निशान लगता है तो जम्हूरियत में उन लोगों पर खासतौर पर सवालिया निशान लगता है जिनको जम्हूरियत ने एक खास प्रोटेक्शन खास हिफाजत करने का वायदा किया है और माइनॉरिटीज का जो हक बनता है जैसे भी हक बनता हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में, आईन में, जम्हूरियत में उसको हम किस नजर से देखते हैं? हम उसको मानते थे और मानते रहेंगे कि वो हक का हिस्सा है। सबका हक होता है। उतना ही माइनॉरिटी का हक होता है। लेकिन क्योंकि माइनॉरिटी माइनॉरिटी है। अक्सरियत अक्सरियत है और उसको जो आपका आईन है कॉन्स्टिट्यूशन है उसमें खास तवज्जो देने की बात कही गई है। और इस बात इस बात को कहने पर लोग लोग कहते हैं कि आप अलग हैं क्या? आपको खास तवज्जो दी जा रही है क्या? आपको खास अपीज़मेंट किया जा रहा है। ये सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि अगर डेमोक्रेटिक पॉलिसी को डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर्स को आप समझे तो ऐसा नहीं है। उनको सिर्फ कंपनसेट किया जाता है अपने अकलियत होने की वजह से। क्योंकि जब आपकी आप अपनी बात को उतने पुरजोर तरीके से नहीं कह सकते हैं जितने पुरजोर तरीके से अक्सर अक्सरियत कह सकती है तो आपको उस आवाज को नुमाया करने के लिए कुछ प्रोविज़ंस कॉन्स्टिट्यूशन पे रखे गए हैं वो अपीज़बल नहीं है वो कंपनसेशन है और इस बात को आज लोग समझने के लिए तैयार नहीं है। खासतौर पे वो लोग जो इख्तदार में है इसको समझने के लिए तैयार नहीं है। तो ऑब्वियसली एक बुनियादी क्राइसिस है। अब उसको अकलियत के लोग मुसलमान ये समझे कि ये हमारा क्राइसिस है और ये हम पर तवज्जो है और उस वजह से हमको ये तकलीफ है और शिकायत है और हमारे लिए हमारे लिए दुश्वारियां हैं। लेकिन ये सबके लिए है। जो अक्सरियत में है उसके लिए भी है। लेकिन अक्सरियत में किस पर खास तवज्जो है वो अलग बात हो गई। लेकिन यह क्राइसिस सबका है। हमारा उतना ही है जितना अक्सरियत का यह क्राइसिस है। और जब यह क्राइसिस फुल ब्लोन होगा और होगा एक ना एक दिन ये फुल ब्लोन होगा तब पता चलेगा कि ये सबके खिलाफ है। ये किसी एक के खिलाफ नहीं है। सिर्फ एक के एक के मंसूबे को कुचलने की बात नहीं है। ये सबके खिलाफ है। क्योंकि क्राइसिस की बात हो रही है और अक्सर आजकल यह बोला जाता है कि आपने भी जैसे बोला कि देयर इज अ पर्टिकुलर फोकस और उसको हम इस तरह देख सकते हैं ग्रेडेशन है कि एक-एक करके वो मरहले जब गुजरते चले जाएंगे तो धीरे-धीरे जितने भी ग्रुप्स हैं वो उसका शिकार होंगे। लेकिन फिर भी एक रेंज रहेगी डिफरेंट। तो व्हेन इट कम्स टू मुस्लिम्स एंड आल्सो क्रिश्चियंस आई बिलीव। ईसाइयों के साथ भी जो पिछले हमने कुछ दिनों में देखा जो क्रिसमस में होता है या बाकी सारी चीजें हैं। दे आर पर्टिकुलरली सब्जेक्ट टू क्राइसिस की जो एक्सट्रीमिटी है। तो मैं आपसे समझना चाहूंगा कि जब ये लोग बोलते हैं कि भ हिंदुस्तान का मुसलमान सेकंड क्लास सिटीजन बन रहा है तो आपके हिसाब से कॉन्स्टिट्यूशनली स्पीकिंग क्योंकि आपकी एक्सपर्टीज है। व्हाट डस दैट मीन? नहीं नहीं ये ये सवाल जो आपने रेज किया है इसके दो पहलू एक वो लोग हैं जो कहते हैं कि इनको सेकंड क्लास सिटीजन ही बनकर रहना है। जी और दूसरे वो लोग हैं जो शिकायत में कहते हैं कि हमको सेकंड क्लास सिटीजन बनाए जा रहा है। तो ये अलग-अलग इसके पहलू हैं उसको उस उस नजर से देखना पड़ेगा। बाय द वे सेकंड क्लास सिटीजन बन जाना ही जैसे क्राइसिस का हिस्सा है कि अगर किसी को आप सेकंड क्लास सिटीजन बना रहे हैं तो उसका मतलब डेमोक्रेसी का ढांचा जो है वह बिगड़ चुका है। वो तबाह हो चुका है या उसको आप तबाह करने में जुटे हुए हैं। तो सेकंड क्लास सिटीजन तो कोई नहीं हो सकता क्योंकि जो बेसिक बेसिक जो वायदा है कॉन्स्टिट्यूशन का आइन का वो इक्वलिटी का है। फ्रेटरनिटी और इक्वलिटी का है। दोनों का है कि आपको अक्सरियत के बराबर ही माना जाएगा। हालांकि कुछ फर्क तो रहता है ना। गिनती में फर्क रहता है। अगर एक इस कमरे में हम में हम में से 10 लोग हैं और 10 में से आठ एक खास उसके नयत के हैं और दो एक और नौयत के हैं तो आठ 10 पर दो पर भारी तो रहेंगे लेकिन वो भारी ऐसे ना रहे कि दो के अपने मकसद जो है वो डिस्ट्रॉय हो जाए। ये कॉन्स्टिट्यूशन का वो होता है, पर्पस होता है और वो कॉन्स्टिट्यूशन ने हमको दिया है, सबको दिया है, इंडिविजुअल को दिया है। लेकिन खासतौर पर माइनॉरिटी को भी दिया है। जो हमारे आर्टिकल्स कॉन्स्टिट्यूशन के माइनॉरिटी को हक देते हैं। अलग से देते हैं। वो बिय्ड जो हक सबको मिला है वो है। अब इसको सुनकर और इस बात को दोहराने पर वो सवाल हम पर उठाया जाता है कि आप इतने प्रिविलेज्ड हैं क्या? हम आपको यह खास लोग हैं जिनको यह सब दिया जाएगा और फिर उसको जोड़ दिया जाता है हिंदुस्तान की तकसीम से कि वही लोग यह बात करते-करते हिंदुस्तान को तकसीम करके चले गए। आप फिर वही बात कर रहे हैं। तो ये सरासर गलत है। झूठ है। इसके इसकी कोई बुनियाद नहीं है। लेकिन बहरहाल प्रोपेगेंडा है। प्रोपेगेंडा लोग करते हैं। सवाल ये होता है कि इसका हम क्या जवाब दे पा रहे हैं। मुझे अफसोस इस बात का है कि हम इसका जवाब नहीं दे पाते। या तो हम चुप हो जाते हैं। जब मैं कह रहा हूं हम चुप हो जाते हैं तो मैं सेकुलर जमातों की बात कर रहा हूं। या तो हम चुप हो जाते हैं और कहते हैं कि इसको फ़िजूल है इसको बढ़ाना। इसको बढ़ाओगे तो और तकलीफ होगी और शिद्दत के अटैक्स आप पर होंगे। एक्सट्रा एक्सट्रा तो इसको माफ़ करिए। वक्त वक्त के साथ ये सारी चीजें खत्म हो जाएंगी। वो गलत है। इसका जवाब देना चाहिए। हमारे पास जवाब हैं और वह जवाब हमको देने चाहिए और जवाब देंगे तभी यह माना जाएगा कि आप डिस्कोर्स आपका डेमोक्रेटिक डिस्टोर्ट जिंदा है। अगर डेमोक्रेसी को भी कहीं ठेस लग रही है तो कम से कम डेम डेमोक्रेटिक डिस्कोर्स जो है वो जिंदा रहेगा और वो बहुत जरूरी है। इस पॉइंट पे आगे भी हमें आना है इस थीम पे कि जवाब क्या होने चाहिए और चाहे वो सेकुलर जमातें हो, चाहे वो मुस्लिम्स हों, चाहे वो दूसरी कम्युनिटीज़ हो, उनका किस तरह का वोकैबलरी होना चाहिए। लेकिन फिर भी मैं इस सवाल को एक बार और थोड़ा सा कि आपको क्या लगता है क्योंकि आप सुप्रीम कोर्ट के लॉयर भी हैं और जो कोर्ट्स हैं क्योंकि वो डिफेंड करते हैं राइट्स को जो कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स हैं कौन-कौन से ऐसे मरहले हैं कि जहां पे रिडक्शन हुआ है। कॉन्स्टिट्यूशनल रिडक्शन हुआ है और जैसे व है बाकी चीजें और क्या यह रिवर्सिबल है या रिवर्सिबल है कि क्या यह सिर्फ यह है कि जब तक सरकार है मान लीजिए बीजेपी की और कई बार ऐसा होता है कि पॉलिटिकल विल बन जाती है कि ठीक है रिवर्सिबल है बहुत सारी ऐसी चीजें अब राम मंदिर बन गया है या कोई और चीजें कमल मौला माउस का जजमेंट हो गया वो इतना डीपली इंटर हो गया है कम्युनिटी के साथ मेजॉरिटी के विल के साथ उसकी सेंटीमेंट के साथ कि उसे रिवर्स करना भी एक तरीके का सिर्फ चैलेंज नहीं वो और ज्यादा डिसरप्टिव हो जाता है। नहीं नहीं आपकी बात आपकी बात सही है। जो हुआ है वो भी तो एक रिवर्सल है। जी जी जी एक एक निजाम था चला आ रहा था 500 साल से 600 साल से 700 साल से एक निजाम चला आ रहा था। उसको भी रिवर्स किया गया है। और उसको डेमोक्रेसी के नाम पे रिवर्स किया गया है। ये कहा गया है कि ये वो लोग थे जो तानाशाह थे। उन्होंने यह निजाम बनाया था और अब क्योंकि हमको यह मौका मिला है डेमोक्रेटिक मौका मिला है तो हम डेमो डेमोक्रेसी का सहारा लेकर इसको रिवर्स करते हैं तो रिवर्स तो हो रहा है ना और रिवर्स वहां हो रहा है जहां पर बहुत दिन तक हम लोग ये सब समझते रहे [नाक से की जाने वाली आवाज़] सिर्फ खास किसी एक कौम के लोग नहीं बल्कि पूरे मुल्क के लोग ये समझते रहे अक्सरियत मुल्क की ये समझते रहे कि इसको रिवर्स करना गलत है और उसी की उसी उसी को नज़र अंदाज हम ना कर दें। हमने कानून बनाया था प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट का कि हमने यह तय किया कि एक कहीं ना कहीं लकीर खींच कर यह कहा जाए कि इससे पहले जो कुछ हुआ है उसको अब भूल जाइए। इसके बाद अब कुछ नहीं होगा। अब कोई तब्दीली नहीं लाई जाएगी। 15 अगस्त 1947 के बाद कोई तब्दीली नहीं होगी। उस दिन तक जो हो गया सो हो गया। किसी का फायदा रहा, किसी का नुकसान रहा। लेकिन उसके बाद इसको बार-बार मत होने दीजिए। हम लेकिन मसला यह है कि आज वह कुरदा फिर जा रहा है जो आपने अभी जिक्र किया है कमाल मौला मौस का जो जिक्र किया है भोजशाला का उसको अब को लग गया है ना वो आज का फैसला है वो 47 से पहले का नहीं है वो आज का फैसला है और आज के फैसले में उसको रिवर्स किया गया जो भी वहां पर निजाम था उस निजाम को बदला गया है रिवर्स किया गया है ये कहकर रिवर्स किया गया है कि 600 साल पहले यहां जो निजाम था हम उसी निजाम में वापस ले जा रहे हैं तो ये बुनियादी सवाल मुल्क का है। हमारे पूरी पूरी हिंदुस्तान के सारी ही आवाम का यह बुनियादी सवाल है कि हम कितना रिवर्स करेंगे। कहां-कहां तक हम वापस जा ले जाएंगे। आवाम को कहां-कहां तक निजाम को वापस ले जाएंगे या कहीं पर लकीर खींच कर ये कहेंगे कि चलिए अब मुस्तकबिल को देखिए। अब आप गुजरे वक्त को मत देखिए। अब मुस्तकबिल को देखिए। क्योंकि हमने जब कॉन्स्टिट्यूशन 1950 में अपना बनाया और उसको हमने अडॉप किया तो उस कॉन्स्टिट्यूशन में हमने यह लिहाज रखा कि पिछले जमाने में क्या हुआ था। लेकिन हमारा उसमें मकसद ये साफ है कि अब हम पीछे ना देखकर आगे देखेंगे और आगे का हमारा जो मंसूबा है उस पर हम यकीन करते हुए आगे बढ़ेंगे। आपने दो बहुत इंपॉर्टेंट बातें बोली। एक तो यह कि माज़ी जो है वो दो चीज़ हैं। एक तो माज़ी में बहुत कुछ हुआ है। हिस्ट्री में अगर आप खुरीदने लगे हैं तो चाहे वो कम्युनिटीज़ कोई भी हो कोई भी कंप्लीट जिसे कहते हैं क्लीन चिट किसी को नहीं मिलेगी। बट उसके बावजूद जितने भी हमने बाबरी और कमल मौला मौक और इनके जजमेंट्स देखे आर्कियोलॉजी को देखा तो ये भी है कि वहां पे एक्सट्रीमली सेलेक्टिव रीजनिंग है। मतलब ऐसा भी नहीं है कि भ वो क्लियर कट कोई चीज हुई हो और उसका एक क्लियर कट रिवर्सल है। नहीं नहीं बाबरी मस्जिद पर आप मुझसे सवाल पूछिए। मैं बताऊंगा कि वो क्लियर कट रिवर्सल नहीं है। वो लोग पूरी तरह से बाबरी मस्जिद के फैसले को समझे नहीं है। जी और मैंने तो जो बहस की थी कमाल मौला मौस में जो मैंने बहस की थी, मैंने वहां सिर्फ एक ही बात कही थी कि आप बाबरी मस्जिद के फैसले को अप्लाई कर लीजिए। लोग समझते हैं कि हम उसकी मुखालफ़त करेंगे या हम उससे कतराएंगे। मैं आपसे ये इल्तजा कर रहा हूं कि आप बाबरी मस्जिद के फैसले को यहां पर लागू कीजिए। कोई मसला नहीं है। लेकिन उन्होंने नहीं किया। उन्होंने बाबरी मस्जिद के फैसले को लागू ना करके एक नया फैसला दे दिया। तो ये समझने की जरूरत है कि बाबरी मस्जिद का फैसला क्या था? आप इसको प्लीज एक्सपेंड कीजिए। मतलब फॉर मी इट्स आल्सो समथिंग। श्योर देखिए बाबरी मस्जिद का फैसला क्या है? समझना चाहिए। एक बात तो बहुत वाज़ है और बहुत साफ़ है और जिस लोगों जिस बात की बहुत सारे लोगों को शिकायत है और शिकायत का उनको हक़ होता है कि हमारी यहां एक मस्जिद थी वो मस्जिद हमसे ले ली गई। जी ठीक है। ये ये बात तो अपनी जगह अपनी जगह पर समझ आती है कि कोई शिकायतें करे कि हमारी यहां एक मस्जिद थी। वो मस्जिद ले ली गई। लेकिन जो जो फैसले में जो आर्गुमेंट्स हैं उनको समझने की कोशिश करें। बाबरी मस्जिद के दो हिस्से थे। एक बाहर का चबूतरा था जिसको राम चबूतरा कहते हैं और एक बाबरी मस्जिद की जो खास इमारत थी वो थी। तो चबूतरे के लिए तो सब ने ये कहा मुसलमानों ने ये कहा कि ये हमारे पोजेशन में नहीं रहा है। सैकड़ों साल से ये हिंदुओं के पोज़ेशन में रहा है और यहां पूजा होती रही है। तो हमको इससे मतलब नहीं है। तो जब किसी ने कह दिया कि हमको इससे मतलब नहीं तो फिर कोर्ट क्या करता है कि नहीं यहां हम जबरदस्ती आपको देंगे। हम तो वो तो वो क्लेम ही नहीं है। वो क्लेम ही नहीं था। क्लेम ही नहीं था। तो वो बात खत्म हो गई। अंदर का मसला ये था कि ये यहां हमारा पोजेशन रहा है। हमारा यहां पे कंट्रोल रहा है। हम यहां नमाज पढ़ते रहे हैं और ये हमारी मस्जिद है और ये हमको मिलनी चाहिए। टाइटल सूट था। टाइटल सूट था जो कि कमाल मौला में टाइटल सूट नहीं था। कमाल मौला में सिर्फ एक रिट पिटीशन था कि जो एएसआई ने किया है और जो उन्होंने इजाजत दी है वो गलत है। हम राम मंदिर वाला जो केस था जो बाबरी मस्जिद वाला केस था वो एक टाइटल सूट का था। ये जमीन किसकी है कि ये जमीन किसकी है और जमीन किसकी है? उसमें जुरिस्टिक पर्सनालिटी जो भगवान को मानते हैं ये लोग जहां पर एक मूर्ति होती है उस मूर्ति को एक ये जरिस्टिक पर्सनालिटी मानते हैं। कानून में हिंदुस्तान में ये हमेशा माना गया है। अच्छा तो राम मंदिर कहकर और वहां पर भगवान राम विराजमान कहकर ये माना गया कि हम टाइटल सूट में हम एक प्लेेंटिफ है टाइटल सूट में। और उसका जवाब वफ को देना था या उसका जवाब जिन जो मस्जिद जिनके जिनके हाथ में थी उनको जवाब उसका देना था और आखिर में जो कोर्ट ने फैसला किया सब कुछ सारी सारी एविडेंस देखने के बाद जो कोर्ट ने फैसला किया तो उन्होंने यह कहा कि चबूतरा तो उनके पोज़ेशन में रहा उनका टाइटल है लेकिन जो मस्जिद है वो आपके पोज़ेशन हालांकि पोज़ेशन आपका लोग वक्तन वक्तन डिस्टर्ब करते रहे लेकिन वो आपके पोजीशन तो आपको हक बनता है और बहुत बहुत बेहूदगी से यहां पर आपके पोज़ेशन को डिस्टर्ब करने की कोशिश 19 1949 1949 में की गई तो क्या मतलब हुआ कि ये आप ही का हिस्सा है और आप ही के लिए है। लेकिन उसके बाद कोर्ट ने ये कहा कि ये तो अब बिस्मार हो चुकी है। यहां तो कुछ बचा नहीं है। अगर मस्जिद होती तो वो दे देते। लेकिन कहा कि अब तो मस्जिद की इमारत यहां बिस्मार हो चुकी है। यहां कुछ बचा नहीं है। चलिए एक काम करते हैं। हम आर्टिकल 142 जो और जज और कोर्ट्स के पास नहीं है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है। और टू डू कंप्लीट जस्टिस। तो उन्होंने कहा हम आपको पांच एकड़ जमीन यहीं पर जहां जमीन एक्वायर्ड हुई है मंदिर के लिए उसी में से पांच एकड़ जमीन हम आपको दे देते हैं। आप अपनी मस्जिद बना लीजिए। हम और किसी वजह से आपको अगर यह नहीं दी जा सकती है तो हम अयोध्या के अंदर ही आपको 5 एकड़ जमीन देंगे। हमने यानी कि जिन लोगों ने जो जो फरी जिनके जिनके जिनकी हिमायत में यह फैसला किया गया उन्होंने कहा कि हम जमीन नहीं लेंगे। हम नहीं ली हम अगर ले लेते अगर वह जमीन ले लेते और वहां एक आलीशान मस्जिद बन जाती तो मंदिर और मस्जिद आमनेसामने होते हम और जब भी कोई मंदिर जाता तो वो देखता कि एक आलीशान मस्जिद भी है और वो एक नमूना बन जाता हिंदुस्तान के सेकुलरिज्म का हम वन साइडेड नहीं होता। अब आज जब आप जाते हैं अयोध्या तो वन साइडेड लगता है ना हम कि मस्जिद तो गायब हो गई। मस्जिद तो है नहीं। हम यहां पे तो सिर्फ मंदिर है। तो वह अब वह हमारी गलती थी। किसकी गलती थी कि हमने वहां जमीन लेने से इंकार कर दिया। तो आपको लगता है कि उस फैसले में इस तरह की पोजीशन लेना कि मिले तो पूरा मिले। मतलब अगर वही जगह मिले ना लेके जो मिल रहा है। नहीं और असल में जब वहां कुछ बचा नहीं था। वहां कुछ बचा नहीं था तो कोर्ट ने ये कहा कि आपको एक बेहतर जगह दे देते हैं। हम लेकिन ये मान के कहा कि ये आपका हक था यहां। हम और आपके साथ हकतफी हुई है। यह कहा है कोर्ट ने हम कि आपके साथ हकतफी हुई है। लेकिन हम आपको देंगे तो दो गज जमीन आपको दे देंगे। ना उसमें मस्जिद है ना इमारत है। क्या करेंगे आप? चारों तरफ से आप सराउंडेड हैं मंदिर की जमीन से। तो इसका आप क्या करेंगे? हम आपको पांच एकड़ जमीन दे देते हैं। तो अब सही किया, गलत किया। उनका मकसद यह था कि किसी ना किसी तरह से इस मामले को अब खत्म करें हम लोग। हमेशा हमेशा के लिए इस पर इस पर एक फाइनल हम स्यूशन करके दे दें और खुशी-खुशी लोग आपस में आमनेसामने रहकर अपनी अपने अपनी ईमान पर भी बेकाम कायम रहें और एक दूसरे के साथ रिश्ता बनाकर भी रहे। ये कोर्ट का मकसद था। ये कोर्ट ने करना चाहा। अब आप कह सकते हैं कि ये गलत था। कोर्ट को क्या पड़ी थी कि वो हम लोगों की दोस्ती कराते। कोर्ट को क्या पड़ी थी कि वो हमको जगह देते। कोर्ट को क्या पड़ी थी? हम तो वही लेते। हम तो वही लेते। लेकिन वही लेते में तो बहुत देर हो चुकी थी। तो आप अभी भी यह कह सकते हैं कि जो कोर्ट ने किया वो गलत था। हमारी तो ज़िद थी कि वही दीजिए। तो वहां पर अगर मस्जिद बन जाती तो छोटी सी मस्जिद बनती। बहुत सारा हिस्सा उसका तो आपने खुद छोड़ दिया था। छोटी सी मस्जिद बनती। चारों तरफ से मंदिर की जमीन उसको घेरे हुए होती। जाने का रास्ता तक आपको आसानी से ना मिलता। तो क्या बेहतर था कि आपको पांच एकड़ जमीन दे दी जाए और जो जमीन आपने गवाई है वह मेरे ख्याल से मेरे ख्याल से शायद आधे एकड़ की होगी एक एकड़ भी नहीं होगी और उसके उसके एवज में आपको पांच एकड़ दिया जा रहा था वो नहीं लिया उसके बाद व बोर्ड आया वर्क बोर्ड ने कहा कि हमको जहां भी दीजिए वहां हम ले लेंगे तो 25 किमी दूर व बोर्ड ने किसी गांव में कोई जमीन ले ली है आज तक वहां कोई मस्जिद तो बनी नहीं बहुत लोगों का यह कहना है कि क्योंकि पिछले 100 साल से भी और पिछले 101 साल से ज्यादा जो ये क्लेम है कभी 3000 400 तो वो एक बार अगर दे भी देते और अगर दे भी दें तो इट्स अ परपेचुअल साइकिल। नहीं नहीं वो साइकिल है लेकिन जाहिर है थोड़ा सा दूर अंदेशीर से कोर्ट ने कहा कि हम इसका एक सशन निकाल लें। वो सिर्फ सशन जैसे जो जो हाई कोर्ट ने किया था हाई कोर्ट ने कहा था कि हम इनको तीन हिस्से में बांट देते हैं। तो उनको तीन हिस्से में बांटने का हक नहीं था। टाइटल सूट था। टाइटल सूट में या तो आप किसी को देते हैं या किसी को आप मना कर देते हैं। तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा ये तो टाइटल सूट है। उसका जजमेंट आपके हिसाब से एज अ टाइटल सूट ही हुआ। एज अ टाइटल सूट हुआ और कहा कि यह टाइटल सूट है। अब जब आप कमाल मौला में आते हैं तो कमाल मौला में उन्होंने कहा था कि हम टाइटल सूट नहीं चाह रहे हैं। हमने टाइटल सूट नहीं फाइल किया है। हम लोग ये बहस करते रहे कि ये टाइटल सूट फाइल करें और टाइटल सूट फाइल करेंगे तो वो पहले सबसे पहले ट्रायल कोर्ट में जाएगा। सीधे हाई कोर्ट क्यों आ गए? हम और हाई कोर्ट में यह सिर्फ रिट पिटीशन लेकर आए हैं कि जो एएसआई ने जो भी एएसआई ने इजाजत दी है वह गलत है। हम तो एज एएसआई की इजाजत को क्वाश करने के लिए वो हाई कोर्ट आए हैं। तो वो बाबरी मस्जिद के फैसले से कमाल मौला मौस का फैसला है वो बहुत दूर है। हम तो चाह रहे थे कि बाबरी मस्जिद का फैसला वहां लागू हो। क्योंकि वहां पर ये ये शिकायत नहीं आती कि अब तो बिस्मार हो गया। अब तो कुछ बचा नहीं। वहां उस वक्त तक जब तक फैसला हुआ है जब तक यह फैसला हुआ है उस वक्त तक वहां नमाज़ हो रही थी तो टाइटल सूट में आपको मिल जाता टाइटल सूट में हमको मिल जाता वहां पर रजिस्टर्ड है ये जो प्लॉट था वो वफ के नाम पे रजिस्टर्ड है वो टाइटल सूट में मिल जाता और यही हमने कहा कि आप हमको टाइटल सूट में इसको रेलिगेट कर दीजिए टाइटल सूट में जो दूध का दूध है पानी का पानी वो सब हो जाएगा लेकिन वो टाइटल सूट नहीं चाहते थे तो ये तो तरकीब हुई ना कि जहां पर टाइटल सूट से फायदा है वहां टाइटल सूट करें। जहां पे टाइटल सूट से नुकसान है वहां पर आप रीड पिटीशन करें। तो यह तो तरकीब हुई। तो यह शिकायत तो हम लोग कर सकते हैं। ये शिकायत हम कर सकते हैं कि इसको थोड़ा सा साफ गोही से फैसले करने की जरूरत है कि कहां पे टाइटल सूट होना चाहिए और कहां पर कुछ और होना चाहिए। दूसरी बात क्लेरिटी मैं आपसे चाहूंगा कि जो ये डिबेट हुई कि भई टाइटल सूट हो या रेड पिटीशन हो। वो विद इन मुस्लिम्स डिस्कशन हो रहा है या फिर नहीं नहीं तो कोर्ट में हुआ ना कोर्ट में कोर्ट ने डिसाइड किया कि भ क्या कोर्ट ने ये डिसाइड किया कि नहीं हम वे पिटीशन हम सुन सकते हैं क्योंकि उनको पता था कि इससे फायदा नहीं अब ये अब समझ लीजिए कि हां उनको ऐसा लगा होगा कि हम अगर टाइटल सूट में जाएंगे तो 20 साल चलेगा एविडेंस आएगी और 20 साल जब चलेगा तो उसमें टाइटल अपना कैसे कोई दूसरी दूसरी साइड कैसे इस्टैब्लिश करती है अपना टाइटल जैसे बाबरी मस्जिद में तो तो ये बात थी कि भाई 12 साल से किसका यहां कब्जा रहा है? उस टाइटल सूट में सबसे पहले पोजेशन देखा जाता है ना। तो जहां कब्जा था राम चबूतरे पे कब्जा था वो मुसलमान की तरफ मुसलमानों की तरफ से खुद कह दिया गया कि आपका इनका कब्जा रहा है। ठीक है हम इस पर अपना हक नहीं जमा सकते हैं। लेकिन जहां कब्जा नहीं है वो तो हमको दीजिए। और वह कोर्ट ने बुनियादी तौर पर थरेटिकली कोर्ट ने वह मुसलमानों के फेवर में ही फैसला किया है और यह कहा है कि आपके साथ बेइंसाफी हुई है, बदसलूकी हुई है। ये सब कहा और कहा कि चलिए अब हमेशा के लिए इसको खत्म करने के लिए आपको पांच एकड़ जमीन दे देते हैं। अगर पांच एकड़ जमीन पर हम इसार करते कि हम वहीं पर लेंगे जहां पर कोर्ट ने कहा है और वहां नहीं दे सकते तो कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या के अंदर ही कहीं पर पांच एकड़ जमीन दीजिए। हम तो हालात कहां से कितने बेहतर होते? हम्म। कमिंग बैक टू ये जो प्लेसेस ऑफ़ वरशिप की बात हो रही थी इस कॉन्टेक्स्ट में के 1947 में ये डिसाइड किया गया फ्यूचर में भी और उस वक्त भी कि अब जो इससे पहले डिस्कशंस हुए क्योंकि ऐसा नहीं है कि लोग अक्सर समझते हैं कि जो देश है वजूद में आया है तो जीरो से हिस्ट्री शुरू हो रही है। उससे पहले एक 100 150 साल का एक फ्रीडम मूवमेंट भी है। लेकिन कम्युनल इंटरेक्शंस भी हैं। शुद्धि मूवमेंट भी हो रहा है। लीग की पॉलिटिक्स भी है। हिंदू महासभा के अखाड़े भी हैं और आपकी यह भी है कि भ हिंदू महासभा और लीग मिलके गवर्नमेंट्स भी बना रहे हैं और यह भी है कि भ कम्युनल वायलेंस भी हो रहा है। लिंचिंग्स भी उस जमाने में काऊ के हवाले से दूर ये सारी चीजें एक टेंपलेट है जो इंस्टीट्यूशनल नहीं था। कॉलोनियल इंडिया में था अलग-अलग जगह पे हो रहा था। वो मॉडल पूरी तरीके से लव जिहाद हो, पॉपुलेशन जिहाद हो ये सारी चीजें। तो ये डिसीजन जो हुआ कॉन्स्टिट्यूशनल मैं हल्का सा आपसे समझना चाहूंगा कि बारगेन क्या था मतलब 1947 में जो कॉन्स्टिट्यूशन की बुनियादी जो प्रिंसिपल्स हैं अगर हम उसका ढांचा खींच दें देन वी कैन यू नो टॉक अबाउट के व्हाट इज दी बेसलाइन अगेंस्ट व्हिच आज भी मुसलमान और पिछले 70 साल में जो अपने दावे कर रहा है व्हाट वास जी बड़ा सिंपल था वो तो वाज़ है लिखा हुआ है जी मतलब ऐसा तो है नहीं कि मैं कहूं कि चलिए हम हिस्ट्री बुक जाके देखते हैं कि उस वक्त क्या किसी ने कहा और क्या किसने किस क्या हिमायत करी और क्या बात मानी गई क्या बात नहीं मानी गई वो तो कॉन्स्टिट्यूशनल हिस्ट्री में बड़ा क्लियर है। हर शख्स को हर शख्स को अपनी इबादत करने का हक है। अपनी इबादत करने का हक है। हर शख्स को अपने इंस्टीटशंस की की हिफाजत करने का हक है। हर शख्स को अपने तौर तरीकों का पर कायम रहने का हक है। यह सारी चीजें कॉन्स्टिट्यूशन में लिखी हुई हैं और हर एक बराबर है। एक दूसरे के बराबर है। यह सारी कॉन्स्टिट्यूशन में लिखी हुई है। पर्सनल लॉ का प्रोटेक्शन कॉन्स्टिट्यूशन में लिखा हुआ है। आज जो सवाल हो गया है वो ये हो गया है कि पर्सनल लॉ का हक आपको है। लेकिन पर्सनल लॉ का हक किस हद तक है? किस हद तक है? जहां पर पर्सनल लॉ और सेकुलर लॉ टकराता है। वहां पर प्रिवेल कौन करेगा? यह सवाल आ गया है। आज आज के जो मसाले अगर इसको फिलोसोफिकली लें जस्ट टू के सेकुलरिज्म या सेकुलरिटी और कोई भी पर्सनल लॉ या कोई आईडियोलॉजी जो अपने बिलीफ सिस्टम से आती है वो फिलॉसोफिकली मेटाफिजिकली टकराएगा ही टकराएगा। नहीं टकराएगा। इसी यही यही मैं बार-बार लोगों को समझाता हूं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] सेकुलरिज्म सेुलर जो वो है निजाम है वो वो पर्सनल लॉ निजाम से अलग नहीं है। पर्सनल लॉ सेकुलर निजाम का ही हिस्सा है। हम् जो सेकुलर निजाम है उसी का हिस्सा पर्सनल लॉ है। अक्सर लोग ये कहते हैं ना कि जो सेकुलर लॉ है पहले उसको देखिए और उसके बाद देखिए पर्सनल लॉ क्या कहता है। लेकिन पर्सनल लॉ सेकुलर लॉ का हिस्सा है। आप इसको इस तरह से देख रहे हैं कि जैसे कोडिफिकेशन कि भई आपको ऑलरेडी अस्यूम कर लिया गया कि भई ये जो फेथ बेस्ड लॉस हैं। ये हमारे विदिन है और उसकी एक मेथोडोलॉजी डिफाइन कर दी गई कि इनसे कैसे डील वो तो वो तो कॉन्स्टिट्यूशन कहता है मुझे मुझे कहने की जरूरत नहीं है कॉन्स्टिट्यूशन कॉन्स्टिट्यूशन कहता है लेकिन उसको जब आज हम अप्लाई करते हैं जब आज इस पर हम गुफ्तगू करते हैं जब कॉन्स्टिट्यूशनल गुफ्तगू होती है तो लोग अक्सर ये समझते हैं कि ये दो अलग-अलग रास्ते हैं। इनका आपस में कोई ताल्लुक नहीं है। इनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है। तो एक ये देखें कि पर्सनल लॉ के कौन-कौन से पहलू हैं। कौन-कौन से पहलू हैं जिसको लोग समझते हैं कि वो सेकुलर लॉ से क्लैश करते हैं। हम पहले वो देखें। हम वो देखें। अब मुझे यह बताइए हिंदुस्तान तो वेजिटेरियन मुल्क नहीं है। हम हिंदुस्तान वेजिटेरियन मुल्क नहीं है। मसला तब होता हिंदुस्तान में जब के हिंदुस्तान के मुसलमान या किसी और किसी और मजहब के लोग और किसी और जमात के लोग नॉन वेजिटेरियंस होते और अक्सरियत हिंदुस्तान के वेजिटेरियन होती। तो एक मसला होता कि यह इसलिए है कि अपने तौर तरीके पर यह कायम है और यह इसलिए इनका अपना पर्सनल लॉ है। यह कुर्बानी भी देते हैं और ये गोश्त भी खाते हैं। लेकिन अक्सरियत गोश्त नहीं खाती। लेकिन ऐसा मसला तो है नहीं। ऐसा मसला तो है नहीं। मसला खड़ा कर दिया जाता है। कोई कोई बहाना ढूंढता है कि किसी तरह से कुर्बानी पे रोक लगाएं। कोई बहाना ढूंढता है कि किसी तरह से गोश्त खाने पे रोक लगाएं। कब को रोक लगाएं? जब यहां से हमारे प्रोसेशंस गुजर रहे होंगे या हमारी इबादत का कोई वक्त होगा या कोई खास दिन होगा जिस दिन हम इस पर रोक लगाएंगे तो वो इसलिए तो नहीं है कि कोई क्लैश है सेकुलर लॉ में और पर्सनल लॉ में अकोमोडेशन और एडजस्टमेंट तो हर एक करता है कि अब जैसे अजान का वक्त है तो अजान के वक्त में मुसलमान अगर तकरीर कर रहे हैं तो वो तकरीर खुद भी रुक जाता है। रुक जाते हैं। लेकिन अगर कोई और शख्स है जो मुसलमान नहीं है वह तकरीर करता है तो वह भी लिहाज़ में वह भी चुप हो जाता है। वह भी कहता है 2 मिनट हम रुक जाते हैं। इसमें क्या बात है? 2 मिनट रुक जाते हैं। उसी तरह से जो खास कोई ऐसा इनके मजहब में कोई ऐसा खास दिन हो, मौका हो जब के मुसलमानों को थोड़ी सी कुर्बानी देनी पड़े इस बात की कि हम आज यहां पर हम आज यहां पर गोश्त नहीं बेचेंगे। आज हम गोश्त नहीं खाएंगे। तो मुसलमान तो करने के लिए तैयार हैं। हम इस मुल्क में एक साथ एक एक दूसरे के साथ मिलकर और एडजस्ट करके हम अपनी जिंदगी जीते हैं। और जीने के लिए हम लोग तैयार हैं। इसमें तो कोई मसला नहीं है। मसला कहां है? मसला वहां है कि आप जो करते हैं उससे दूसरे पर कोई असर नहीं पड़ता। हम उससे दूसरे पे कोई असर नहीं पड़ता। अब जैसे नमाज़ का मसला है कि आप नमाज़ पढ़ते हैं और आप घर के अंदर मैं उस हादसे की बात कर रहा हूं जहां घर के अंदर नमाज़ हो रही है। हम अब जमात में जमात तो घर के अंदर भी हो सकती है ना जब आप बाहर नहीं जा पाए किसी वजह से बारिश हो रही है। मौसम खराब है। तो आपने घर में जमात जमात कर ली। अब कोई पुलिस वाला आके कहे कि आप जमात कैसे कर सकते हैं? ये मस्जिद नहीं है। हम तो उनको क्या उनको क्या तकलीफ हो रही है कि आप घर में नमाज़ पढ़ रहे हैं। उनको क्या तकलीफ हो रही है? आप उनकी छाती पर जाकर नमाज पढ़े तो वो शिकायत कर सकते हैं। आप सड़क पर नमाज पढ़ें और वो कहें कि भाई हमको तकलीफ है हम जा नहीं सकते हैं तो वो शिकायत कर सकते हैं। लेकिन आप फिर जवाब में ये कहते हैं कि भाई इस सड़क पर कभी आपके भी प्रोसेशंस निकलते हैं। कभी आपका भी यहां से यहां पर कोई रिलीजियस प्रोसेशन कल निकलता है तो हम भी रुक जाते हैं। एक घंटे दो घंटे के लिए हम भी रुक जाते हैं। अगर हमारे पास जगह नहीं है। आप मस्जिद की जगह दे दीजिए। हम मस्जिद में पड़ेंगे। आप ईदगाह की जगह दे दीजिए। हम वहां पड़ेंगे। जैसे गुड़गांव में जो मसले हुए थे कि आप हमको जगह दे दीजिए। हम वहां पढ़ेंगे। लेकिन अगर जगह नहीं है तो हम नमाज तो नहीं छोड़ सकते हैं। इसलिए हम यहां पढ़ते हैं और उसकी इजाजत लेकर हम पढ़ेंगे और इजाजत लेंगे तो हमको सिर्फ एक घंटे के लिए आधे घंटे के लिए इजाजत चाहिए होती है। आप हमको आधे घंटे के लिए इजाजत दे दीजिए। आपको पहले से मालूम होगा। तो ये एडजस्टमेंट और अकोमोडेशन है। ये सेुलर लॉ प्रिवेलिंग ओवर पर्सनल लॉ या पर्सनल लॉ प्रिवेलिंग ओवर सेकुलर लॉ नहीं है। क्योंकि पर्सनल लॉ सेुलर लॉ का हिस्सा है। कॉन्स्टिट्यूशन से अलग नहीं है। जो भी पर्सनल लॉ है और उसको जो भी जो भी उसको महफूज़ रखने का वायदा किया गया है वो कॉन्स्टिट्यूशन में है। दो इंटरेस्टिंग चीजें अह ऑब्जरवेशन फिर दो सवाल। एक जैसे एक फैमिली होती है। दो तरह के भाई हैं, फादर हैं। डिफरेंस है। हालांकि फैमिली का एक सिस्टम है। उसके बावजूद आप एडजस्ट करते हैं। बहुत सारी चीजें होती हैं। दूसरा ये मैं समझना चाह रहा था कि ठीक है। सेकुलर लॉ का हिस्सा है पर्सनल लॉ। जैसे इवन इस्लामिक लॉ में आपके यहां पे अगर टू यू योर ओन रिलजन टुवर्ड्स योर। जहां पे भी है उसके बाद ये कि आपके पर्सनल लॉ है। तो जो लीगल प्लूरलिज्म है वो एंबेडेड है शरिया में। अब्सोलुटली। इसी तरह सेकुलर लॉ में पर्सनल लॉ एंबेडेड है। अब्सोलुटली। वंस यू हैव डिसाइडेड टू अियर टू अ सर्टन कोड ऑफ़ कंडक्ट। अब्सोलुटली। सेकंड चीज ये है कि ठीक है ये बात सही है आपकी। मैं इससे एग्री करता हूं प्रिंसिपली। बट सवाल ये होता है कि जब बाबरी मस्जिद में 1991 में कोई जजमेंट आता है तो ये बात होती है कि एसेंशियलिटी क्या है? कि अब इसकी रीडिंग कौन करेगा? सवाल ये है ना कि भ अब उसको सेुलर और उसके बीच की जो रीडिंग है हु विल डू द रीडिंग? दैट चेंजेस द गेम ऑन। एक मसला है एसेंशियलिटी ऑफ़ रिलीजन। लेकिन कोर्ट ने कोर्ट ने भी जब भी एसेंशियलिटी पर कुछ कहा है तो अक्सर कोर्ट ने यह कहा है कि भाई हम कौन होते हैं इसको तय करने वाले हम इसको तय करने वाले कौन होते हैं इसको तो वही लोग जो जो रिलीजन से जुड़े लोग हैं जो मजहब से जुड़े लोग हैं वही तय कर पाएंगे ना हम कौन होते हैं तय करने वाले ये तो कोर्ट ने खुद कहा है अब जैसे एक फैसला आने वाला है सबरीमाला का हम उसमें ये सारी चीजें वाज़ होंगी उसमें में तो मुसलमान नहीं है ना तो उसमें वो इशू नहीं है कि ये मुस्लिम वर्सेस नॉन मुस्लिम्स है। वो हिंदू समाज के अंदर का ही एक मसला है। एक पर्टिकुलर सेक्ट का मसला है। लॉर्ड आयापा का मसला है कि उनके जो फॉलोअर्स हैं वो किस तरह से मजहब को मजहब की नयत को देखते हैं। वो है मसला। अब उसमें ये सारे सवाल उठे हैं कि इसको कौन तय करेगा? हम वो लोग खुद तय करेंगे या हम जजेस तय करेंगे या हिंदू समाज जनरली तय करेगा। यह सारे मसले बहस में आए थे और इन चीजों पर कुछ ना कुछ बहुत साफ गोई से सुप्रीम कोर्ट कहेगा। तो इंतजार करते हैं क्योंकि अक्सर क्या होता है कि कोई सवाल के जवाब देने में कभी-कभी तासुब आ जाए तो मसला हो जाता है। कभी-कभी पब्लिक प्रेशर आ जाए तो मसला हो जाता है। लेकिन यहां पर जो तासुब या पब्लिक प्रेशर का अंदेशा हो सकता है वो इस केस में नहीं होगा। क्योंकि वह मेजोरिटी के मसला प्रेसिडेंट भी तय करेगा किस जो आएगा जो ऐसा आएगा जो ऐसा फैसला होगा वो फिर सबको लागू होगा सब पर लागू होगा तो एप्लीकेशन तो हो सकता है उसमें पर्सनल लॉ वाले लोग जो हैं उनके लिए कि फायदे की बात भी इस इस जजमेंट पे आए तो इसका इंतजार करें देख क्या होता है मुझे याद है कि जो सेकुलर लिबरल इंटरप्रिटेशन है मान लीजिए हिजाब के टाइम पे और बहुत सारे जो हिंदुत्व के जो लॉयर्स हैं मतलब उस साइड से लड़ते हैं। वहां पे ये था कि भ हिजाब इज़ एन एसेंशियल प्रैक्टिस को डिसाइड करने का हक उनके क्योंकि कल को ये सबरीमाला में हमारे ऊपर भी आएगा अगर ये वो बनता है। और दूसरी जगह ये था कि भ नहीं यू हैव टू इंटरप्रेट इट फ्रॉम ए पर्टिकुलर पर्सपेक्टिव। तो कई बार ये भी होता है मतलब ऑड है कि जो कम्युनिटीज से हम डिफरेंट काइंड ऑफ़ अरेंजमेंट्स एक्सपेक्ट करते हैं वो डिफरेंट कॉन्फ़िगरेशन है। बेशक बेशक बेशक। लेकिन आखिर में ये वही लोग फैसला कर सकते हैं जिनका मजहब से कोई ताल्लुक है वही कर सकते हैं और जाहिर है कोर्ट इस इस बात इस बात को अहमियत देगा कि हम जो भी समझे और हम जो भी चाहें लेकिन जब मजहब से जुड़े हुए लोग ये मानते हैं कि इस लेकिन मजहब से जुड़े हुए लोग हो या खास मामूली मुसलमान हो वो अपनी बात को कहने का तरीका समझें कि वो तरीका वो होना चाहिए जिससे दूसरा आदमी बात को समझ सके। हम यह भी कह सकते हैं कि आप चाहो जो चाहो कर लो हम तो यह करेंगे। यह भी कह सकते हैं। हम यह भी बता सकते हैं कि जरा इस पे गौर करिए कि कितनी अच्छी चीज है। इससे आपका कोई नुकसान नहीं है। जिस तरह से आप और मजहब के लोगों को अलऊ करते हैं। जैसे सिख मजहब के लोगों को अलाऊ करते हैं। पगड़ पहनने के लिए अलाऊ करते हैं। कभी-कभी आप ये जरूर कहते हैं कि भाई उसका रंग जो है वो रंग आपके यूनिफॉर्म से मिलना चाहिए। वो रंग यूनिफॉर्म्स के अलग ना हो। इतना आप जरूर करिए। कोशिश करिए कि आप इसमें असिमिलेट हो सके। उसी तरह से हिजाब में भी आप यह कह सकते हैं कि उसका रंग यूनिफार्म से मिलना चाहिए। उसको यूनिफार्म से अलग ना हो। और ये हमारी खुशकिस्मती है कि हिजाब पर कोई ये कहीं ताकीर नहीं की गई है कि हिजाब एक किसी किस्म के रंग का ही होगा। ये कहीं ताकीर नहीं की गई। तो जहां मसला नहीं है वहां मसला क्यों खड़ा करें? अच्छा आपने एक और ये जो इससे एक और ऑब्जरवेशन फिर हम आगे बढ़ेंगे। हम आपने बोला कि जो कॉन्स्टिट्यूशन है और उसका जो सेुलर फ्रेमवर्क है उसमें जो पर्सनल लॉज़ हैं वो एंबेडेड हैं। लेकिन अब मैं लॉ में ट्रेंड तो नहीं हूं लेकिन क्योंकि फिलॉसोफी मेरा सब्जेक्ट रहा है और फिलॉसफी ऑफ़ लॉ के पर्सेक्टिव से कई बार चीजों को देखता हूं। तो जो आपका प्रियमबल है जो आपका कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडी है और जो आपका डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स है जो आपका प्रएमबल है उसमें तो 10 ऐसे वर्ड्स हैं जिसको आप जिस तरह फ्रेटरनिटी को आप अपनी फिलॉसफी से कैसे सोच रहे हैं या दूसरे जो आपकी चीजें हैं लेकिन जो डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैं वो बड़े वाज़ हैं कि भ हमें यूनिफॉर्म सिविल कोड की तरफ बढ़ना है। हमें या काऊ सैक्रिफाइस या बहुत सारी ऐसी मुख्तलिफ चीजें हैं जो कहीं ना कहीं टेंपरामेंट सेट करती है कि आपकी रीडिंग भी किस डायरेक्शन में हो। नहीं देखिए इसको भी बहुत सिंपलीफाई कर दिया गया है। हम पहली बुनियादी बात तो हम याद रखें कि कोर्ट ने बार-बार ये कहा है कि डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स स्टेट पॉलिसी जो है वो फंडामेंटल राइट्स को ओवरूल नहीं करते। हमें डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स और फंडामेंटल राइट्स को साथ देखना पड़ेगा। हार्मोनाइज करना पड़ेगा। हानाइज का मतलब ये है कि कभी फंडामेंटल राइट भी डायरेक्टिव प्रिंसिपल के ऊपर हो सकता है। ये भी हो सकता है कि फंडामेंटल राइट इतना इंपॉर्टेंट है कि वो डायरेक्टिव प्रिंसिपल के ऊपर रहेगा। ये भी हो सकता है। और फंडामेंटल राइट कितना मजबूत है एक बुनियादी तौर पर किसी भी इशू पर फंडामेंटल राइट कितना इंपॉर्टेंट है। पहले उस पर हम लोग गौर फरमाएं। उसको उसको हम देखें। हम ये ना समझे कि क्योंकि क्योंकि डायरेक्टिव प्रिंसिपल में कोई बात कह दी गई है। कह दी गई है तो उस बात पर कहीं आप 19 से 20 नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह कहीं नहीं कहा गया है कि डायरेक्टिव प्रिंसिपल में जो है उसके बाद फंडामेंटल राइट का कोई मकसद नहीं बचता है। फंडामेंटल राइट में बिना डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के भी फंडामेंटल राइट में जो रीज़नेबल रिस्ट्रिकशंस हैं वो हैं। हम रीज़नेबल रिस्ट्रिकशंस ये हैं कि आपको अपनी बात कहने का हक है। लेकिन आपको अपनी बात कहने का हक मतलब ये नहीं है कि एक भरे हुए थिएटर के अंदर जो लॉयर्स को बच्चों को सिखाया जाता है कि भरे हुए थिएटर के अंदर जब अंधेरा हो और आप चिल्ला दें आग लग गई आग लग गई आग लग गई और उस उस चिल्लाने की वजह से लोग वहां भगदड़ मच जाए और लोगों को लोगों को तकलीफ हो लोगों को शिकायत हो और लोगों को वहां पर वो उठाना पड़े नुकसान उठाना पड़े ये तो करने का आपको हक नहीं है तो रीज़नेबल रेस्ट्रिक्शन है तो रीज़नेबल रिस्ट्रिक्शन में ही फंडामेंटल राइट्स जो है वो महदूद है। रीज़नेबल रिस्ट्रिकशंस में। अब क्या रीज़नेबल है वो मौके पर डिपेंड करेगा। वो हालात पे डिपेंड करेगा। जब आप अगर आप किसी इमरजेंसी के हाल में हैं आपके मुल्क पर कोई हमला कर रहा है तो उस वक्त कितनी इजाजत है आपको अपनी बात कहने की और जिस वक्त पीस टाइम है उस वक्त कितनी इजाजत है आपको अपनी बात कहने की? इसमें फर्क होगा। जी इसमें फर्क होगा कॉन्टक्सुअल है कॉन्टक्सुअल है तो आपको ऐसा नहीं है कि यही कहीं पर अगर अगर डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ने कुछ कह दिया और मैं ये समझता हूं कि जैसे यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का मसला है यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट को अभी तक डायरेक्टिव प्रिंसिपल में जो कहा गया है उसको अभी किसी कोर्ट ने पूरी तरह से टेस्ट नहीं किया है। यह नहीं कहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का मतलब क्या यह है कि पर्सनल लॉ खत्म हो जाएगा। हम्। क्या यह मतलब है कि पर्सनल लॉ ख़ हो जाएगा? आज तक कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि पर्सनल लॉ ख़ हो जाएगा। जब पर्सनल लॉ ख़ होगा तो किस हद तक खत्म होगा? किस हद तक खत्म होगा? पर्सनल लॉ में जैसे वो यह मानते हैं कि पर्सनल लॉ में बुनियादी तौर पर जो फोकस है वो फोकस हमें करना है। सक्सेशन पे करना है। प्रॉपर्टी पे करना है। मैरिज लॉ मैरिज और डिवोर्स पे करना है। वो कहते हैं बस यही चीजें हैं। पर्सनल लॉ में तो बहुत सारी चीजें और भी हैं। लेकिन इन्हीं पे क्यों तवज्जो दे रहे हैं? अगर वो जिस पर तवज्जो दे रहे हैं उसका उसका जो वो रीजन है जो उसका पर्पस है वो ये है कि आपके इस पर्सनल लॉ से किसी और को तकलीफ पहुंच रही है। इसलिए हम इस पे रोक लगाना चाहते हैं। तो पहले ये बताएं कि क्या तकलीफ है? ये तो बताएं कि क्या तकलीफ है? अब जैसे डिवोर्स का मसला है। तीन तलाक का मसला है। इस पे मैं आपको कुछ बताऊं। तीन तलाक का मसला उसमें एक इंटरप्रिटेशन बहुत क्लियर है। वो इंटरप्रिटेशन क्या है? और मैंने कई लोगों से ये बात कई दफा ओवर द इयर्स पूछी है। तो बेसिक बात क्या है कि तीन तलाक का मसला यह है कि तलाक तो तलाक ही होती है। और मुझे किसी ने ये कहा कि आप 100 दफा दें या आप 1000 दफा दें। तलाक एक ही दफा होती है। तलाक होती है और यह एक बड़ा मॉडर्न एक बहुत मॉडर्न वो है। हमको एक ओपोरर्चुनिटी दी गई है कि जहां पर तलाक की जरूरत है वहां आप तलाक दे सकते हैं। आपको 20 साल रुकने की जरूरत नहीं है। लेकिन तलाक के लिए कुछ कंडीशंस रखी गई है कि तलाक से पहले दोनों तरफ के बुजुर्ग आपस में बैठकर कोशिश करें कि तलाक टल सके। तलाक का का मामला जो है उसको रोका जा सके और अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर आपने जो वायदे किए हैं आपने जो आपका जो आपके फर्ज बनते हैं उनको आप पूरा जो आपका कॉन्ट्रैक्ट था या जो कॉन्ट्रैक्ट है उस कॉन्ट्रैक्ट को फुलफिल करिए फिर आपको तलाक मिल जाएगी दिस इज अ वैरी मॉडर्न जो लोग ये समझते हैं लोग ये समझते हैं डू इट योरसेल्फ डिवोर्स आज अमेरिका में हो रहा है लोग ये समझते हैं कि तलाक का मतलब क्या है कि बस खड़े-खड़े आप औरत को बाहर निकाल देते हैं ऐसा नहीं है ना नफा आपको तीन महीने की उसको उसको रेजिडेंस देने का वह सारी चीज़ है। इद्दत के दौरान उसको अब इद्दत के दौरान उसको आप तलाक दे देते हैं। तलाक हो जाती है। लेकिन टेक्निकली मानिए कि वो सेपरेशन है। क्योंकि इद्दत के दौरान आप वो तलाक वापस ले सकते हैं। रुजू कर सकते हैं। वापस ले सकते हैं। हम दूसरी दफा आप कहते हैं तो वो रिफर्म हो जाती है। उसको भी आप रुजू कर सकते हैं। तीसरी दफा तलाक देने के बाद आप फिर वापस नहीं ले सकते हैं। नहीं ले सकते हैं। तीसरी दफा के बाद क्यों नहीं ले सकते हैं? क्योंकि यह एक फ्रिवलस बात हो गई ना कि आपने जब चाहा तलाक दे दी फिर वापस ले ली। जब चाहा तलाक दे दी वापस ले वो भी एक राइट्स का मसला हो जाएगा। और वो भी एक राइट्स का मसला होगा। तो इसलिए पाबंदी है। किस पर है? पाबंदी देने वाले पर है। देने वाले पर है। और लोग यह भी नहीं यह भी नहीं याद रखते हैं कि तलाक तो मर्द देता है। यह सही है। लेकिन अपने अपने निकाहनामे में मर्द डेलीगेट भी कर सकता है। तलाक का हक अपनी अपनी वाइफ को डेलीगेट भी कर सकता है। फिर आपका म्यूचुअल डिवोर्स का भी एक तरीका है कि आप म्यूचुअल डिवोर्स भी कर सकते हैं। तो जो बीवी को भी बहुत सारे हुकूक दिए गए हैं जिस पर लोग जिसको नजरअंदाज करते हैं वह सिर्फ यह कहते हैं कि आपके यहां तो बस तलाक तलाक तलाक हुआ वो खत्म हो गया। तो तीन तलाक तो कहीं जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तीन तलाक तो है ही नहीं कहीं इस्लाम में लेकिन तीन तलाक दे देने के बाद फिर आपको बहुत सारे आपको जो हुकूक मिले हुए हैं वो आपसे ले लिए जाते हैं। बड़ा सिंपल है। एक बड़ा मॉडर्न सिस्टम है और इस मॉडर्न सिस्टम को मॉडर्न तरीके से हम इस्तेमाल करें तो उसमें क्या हर्ज है और दूसरे का क्या हर्ज हो रहा है? दूसरी तो 20 साल कोर्ट में जा रहे हैं। हाजिरी लग रही है और कोर्ट के डेट के बाद डेट लग रही है। तो उनका सिस्टम क्या बेहतर है? इस सिस्टम से यह सवाल है इस पे गुफ्तगू हो डिस्कशन हो डिस्कोर्स हो फिर हम दिखा सके डाटा दिखा सकें कि कौन लेकिन इसका गलत इस्तेमाल कुछ लोग अगर करते हैं तो वो वो बात अलग है आप गलत इस्तेमाल गाड़ी को गलत जगह पार्क करते हैं तो आपकी ये थोड़ी होगा कि आपको गाड़ी नहीं मिलनी चाहिए और कम्युनिटी में भी उसके खिलाफ आर्गुमेंट्स है ऐसा नहीं है कि सारे आर्गुमेंट्स हैं। ठीक है? ये बात तो हो गई कि इस तरह से हम देख सकते हैं कॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यूस को, कॉन्स्टिट्यूशन के वजूद को। लेकिन यह बात भी सच है कि पॉलिटिकल थ्यरी में एप्लीकेशन में पावर एसिमेट्री ये भी एंबेडेड है। नेशनलिज्म में मेजोरिटेरियनिज्म और आज जो हिंदुस्तान को एथनो नेशनलिस्ट स्टेट बोला जाता है। यहां तक कि हिंदुत्व एक सिविलाइजेशनल स्टेट बन चुका है। तो जब ये सारी बात सामने आती है और मैं ये देखता हूं आपका करियर कि भ आप एक बहुत ही जो शुरू में भी बात हुई कि वेल अकंप्लिश्ड इंडियन मुस्लिम रहे हैं। कभी आपको महसूस हुआ अपने करियर में 2014 से पहले कि देयर इज लिमिट्स टू एक्टिंग लाइक अ मुस्लिम इन मुस्लिम डिमांड्स। मैं ये नहीं बोल रहा हूं कि भ और जगह पे जनरल जो इशूज़ हैं मैं आपको दिलचस्प जवाब दूंगा इसका। मुझे अब यह यह मानिए कि मेरी खुशकिस्मती हो और यह हुस्ने इत्तेफाक है कि मुझे कभी यह एहसास जिंदगी में नहीं हुआ कि मैं मुसलमान हूं इसलिए मेरे खिलाफ डिस्क्रिमिनेशन हो रहा है या मुझे वह मौका नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिए। मुझे इसका एहसास कभी जिंदगी में नहीं हुआ और शायद ऐसा हर एक के साथ नहीं होता है। मैं खुशकिस्मत होगा इसलिए मेरे साथ हुआ। लेकिन अगर मुझे कभी मसला हुआ है तो अपनी ही कौम से हुआ है क्योंकि उनके जो तवकात होते हैं वो ऐसे होते हैं कभी-कभी कि अक्सर वो ये सोच सकते हैं कि आपने ऐसा क्यों नहीं किया हम जिस जमाने में बाबरी मस्जिद का मसला चल रहा था तो हम लोग हुकूमत में थे उस वक्त और आप को याद होगा वो वो वक्त याद होगा जब बाबरी मस्जिद पर इन लोगों ने चढ़कर बाबरी मस्जिद को डिमोलिश करने की कोशिश की थी तो ये सवाल सवाल पूछे जाते थे कि आप क्या कर रहे हैं हुकूमत में? आप क्यों हैं हुकूमत में? आपको शर्म नहीं आ रही कि आप हुकूमत में हैं? हमारे अपने लोग पूछा करते थे। और हम इस इस बात पे इस बात पे इलेक्शंस हारे भी हैं। हम अब ये दूसरी बात है कि इलेक्शन हारने के बाद अगली अगली दफा इलेक्शन हुआ तो लोग समझ गए। लोगों ने जिताया भी। हम लेकिन अक्सर यह होता है कि मुसलमान को भी सेटिस्फाई करने में हम शायद नाकाम और रहते हैं क्योंकि उनकी तवकात जो है वो इतनी है कि उनको पूरा नहीं कर सकते। आप एक मिक्स सोसाइटी में रहें तो आप जब भी एक बात कहें तो जो दर्द है उसको बयान जरूर करें। लेकिन बयान करें। किस तरीके से करें ताकि उसका कुछ फायदा उसको हो सके। जो दर्दमंद है उसको कुछ फायदा हो सके। यह एक स्ट्रेटजी की बात होती है और अक्सर मैं लोगों से यह कहता हूं कि आईडियोलॉजी और स्ट्रेटजी में बड़ा फर्क होता है। आईडियोलॉजी हमारी सही रहे, मजबूत रहे, पाबंद रहे हम आईडियोलॉजी के। लेकिन स्ट्रेटजी में कभी-कभी हमको वो कदम उठाने पड़ते हैं जो स्ट्रेटजी आपके फायदे की हो। जिससे आपको फायदा हो जाए। हम आपका नुकसान करके और ये कहें कि हम बहुत बड़े सुरमा हैं। हमने देखिए नुकसान कर दिया। लेकिन हमने अपनी बात कह दी तो क्या फ़ायदा है? अब जैसे आप आज देखिए हम लोग जो कांग्रेस पार्टी में हैं और कांग्रेस पार्टी में या एक सेकुलर जमात में रहते हैं और हम अपनी बात को कहने की कोशिश करते हैं और कहते रहते हैं। तो हम किन-किन चीजों के दायरे में बंद रहकर भी बात को कहने की कोशिश करते हैं और उसमें कितने कामयाब होते हैं नहीं होते हैं ये तो आवाम को जज करना है। लेकिन वहीं असद असद असदुद्दीन ओवैसी साहब उनकी अपनी जमात है। वह कितना खुलकर बिना किसी बिना किसी रुकावट के बिना किसी पाबंदी के वह अपनी बात को कहते हैं। तो आदमी यह तो कह सकता है कि यार ओवैसी तो बहुत खुल के बात करते हैं। आप खुल के नहीं बात करते हैं। लेकिन ओवैसी को क्या वो करना है इस मुल्क में जो हमको करना पड़ेगा या करना चाहिए या करना है कि हम किस तरह से मुल्क को एकजुट करके लोगों को जोड़कर और एक सेकुलर समाज को मजबूत करके इस मुल को आगे बढ़ाएं। या हम यह कहें कि हम अपनी दो ईंट की अलग से मस्जिद बनाएंगे, अलग नमाज पढ़ेंगे, अलग अपना काम करेंगे। एक्सट्रा क्या वो एक हमारे मुल्क का मुल्क को आगे बढ़ाने का का हमको नजरिया होना चाहिए या यह नजरिया सही है? अब इस पर फैसला तो उसका है जो हमसे डील करता है, जो आवाम हमसे डील करती है, उसका फैसला है। मैं तो अगर इसको प्रिंसिपली बात की जाए, जो आप बात बोल रहे हैं, मैं उससे एग्री करता हूं। लेकिन सवाल जब यह होता है कि हम एक आजादी के बाद से लेकर 90ज और उसके बाद का यह पूरा सिलसिला देखते हैं तो उसमें बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिसमें कॉम्प्रोमाइजज़ पॉलिटिकल चाहे वो आइडियो जैसा आपने बोला कि भई एक आईडियोलॉजी है एक स्ट्रेटजी है। तो कई बार ऐसा लगता है कि शायद जो कांग्रेस की एक आईडियोलॉजी थी या है जो उसकी प्रिंसिपल आईडियोलॉजी है। क्या स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स हुई हैं? नहीं यकीनन हुई है। उसमें दो राय नहीं है। देखिए आप इतनी कॉम्प्लेक्स सोसाइटी को अगर चलाएंगे तो उसमें स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स आप कभी नहीं करेंगे। ये ये जो इस इस बात को कहने में हम लोगों को कोताही नहीं होनी चाहिए कि स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स होते हैं। लेकिन मुझे तकलीफ किस बात की है? मुझे तकलीफ इस बात की है कि आप अपने स्ट्रेटेजिक मिस्टेक को कभी पब्लिकली पब्लिकली एडमिट करें। कि हां हमसे ये गलती हुई। हमसे गलती हुई तो उसका बखान इतना किया जाता है और उसको गलत इस्तेमाल इतना किया जाता है। अब आज का एक एक इशू देखिए आज जो इमरजेंसी थी इमरजेंसी जिसको 50 50 साल हो गए 75 की [नाक से की जाने वाली आवाज़] इमरजेंसी उस पर बड़ा हंगामा कर रहे हैं। बीजेपी वाले कर रहे हैं और लोग कर रहे हैं। कुछ लिबरल्स भी होंगे जो कहते होंगे कि इमरजेंसी गलत थी। हां अब दबी जबान में लोग यह कह देते हैं कि वो इमरजेंसी गलत थी लेकिन जो अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी आज की है ये भी यह भी गलत है। अब इमरजेंसी के बारे में अगर कोई हमसे सवाल पूछे कि वो गलत थी या सही थी तो हम क्या जवाब दें? अगर हम ये कह दें कि हां भाई गलत तो थी। बहुत गलतियां तो हमसे हुई उस पर और उसका हमको नुकसान भी हुआ। हमें एहसास भी है इसका कि हमको एहसास तो फिर अगले दिन की हेडलाइंस क्या होगी? सलमान खुर्शीद ने कहा कि इमरजेंसी जो थी वो गलत थी। खैर इसीलिए मोदी अपनी गलती कभी नहीं मानते। अब चलिए ऐसा मानने से फिर उनकी स्ट्रेटजी वो है कि वो नहीं मानते। लेकिन मैं ये कहता हूं कि हमें अपनी गलती को मानना जो है और उसका एहसास होना बहुत जरूरी है। बिकॉज़ हम अपने आप को बेहतर और कैसे करेंगे? इंप्रूव कैसे करेंगे? अगर हमें ये कॉन्फिडेंस ना हो कि हम अपनी बात को कह सकें। हम लेकिन साथ-साथ हमको यह भी तो कहना पड़ेगा कि इमरजेंसी कॉन्स्टिट्यूशन के बाहर से नहीं थी। कॉन्स्टिट्यूशन के अंदर से थी। अब वो उसका इंटेंट गलत हो सकता है। उसका इस्तेमाल गलत हो सकता है। उसके आउटकम्स गलत हो सकते हैं। वो अपनी जगह है। लेकिन कॉन्स्टिट्यूशन के तहत ही इमरजेंसी लगी थी। तो वो तो कॉन्स्टिट्यूशन जिन्होंने बनाया जिन्होंने कॉन्स्टिट्यूशन को को पेश किया मुल्क को और मुल्क मुल्क ने उसको रिसीव किया कॉन्स्टिट्यूशन को। उस कॉन्स्टिट्यूशन के तहत इमरजेंसी लगी थी तो ये कॉन्स्टिट्यूशनल लिमिट्स को भी वाज़ करता है और उसको सुप्रीम कोर्ट ने उसको सुप्रीम कोर्ट ने अपहोल्ड किया था। एडीएम जबलपुर में सुप्रीम कोर्ट ने उसको अपहोल्ड किया था। अब वो सुप्रीम कोर्ट को उस जजमेंट को रिवर्स करने में 25 साल लग गए। 25 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नहीं वो गलत थी जजमेंट। वो जजमेंट गलत थी। 25 साल बाद कहा तो 25 साल तक तो ये कहा जाएगा कि हमने जो किया था वो कॉन्स्टिट्यूशनली गलत नहीं था। और 25 साल के बाद आप क्या सजा दोगे? जब आप आप सजा हमको दे चुके हैं। आपने यह दिखाया कि आपने हमको हमको हुकूमत से बाहर कर दिया। आपने इख्तदार से बाहर कर दिया। और 18 महीने बाद आपने उस पर फिर से गौर फरमाया और आप फिर हमको जिता के ले आए। उसी शख्स को ले आए जिसको आपने बाहर निकाला था। इंदिरा गांधी को आप लेके आ गए। तो ये भी तो कोई चीज है। इसका भी तो बैकड्रॉप इसका भी तो कॉन्टेक्स्ट है। उसको पूरा समझाना होगा। सिर्फ ये कहना है कि ये तो कॉन्स्टिट्यूशनल कॉन्स्टिट्यूशन के ही खिलाफ है। इन्होंने तो कॉन्स्टिट्यूशन को दफा ही कर दफन ही कर दिया था। कॉन्स्टिट्यूशन को खत्म ही कर दिया था। ये बात कहना भी तो नाजायज है। इसमें तो लेकिन खुशी साहब कई बार ऐसे भी हो सकता है कि डिस्पाइट द फैक्ट दैट द बीजेपी गवर्नमेंट टुडे बहुत ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है आम हिंदू को भी। लेकिन उसके बावजूद उनको जिता देते हैं। कई बार क्या होता है कि मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि कई बार जज्बात कॉन्टेक्स्ट बांग्लादेश का उस वक्त क्या चल रहा था वो आई मीन अ लॉट ऑफ़ थिंग्स एवरीथिंग एवरीथिंग लेकिन भाई एक ही दफा नहीं जिताया ना कई दफा जिताया अच्छा आपने क्योंकि ये बोला कि ठीक है गलती मानी बहुत अच्छी बात है और मुझे लगता है कि ये एक बेहतर तरीका भी होता है और उसके बाद लेकिन दो चीजें इससे निकल कर आती है दो सवाल एक सवाल ये है कि वो जो 70 साल में ये कांग्रेस की सिर्फ बात नहीं है कांग्रेस को तो उसका एक वो बना दिया जाता है। लेकिन जनरली जो सेुलर पॉलिटिक्स या सोशलिस्ट पॉलिटिक्स हुई है चाहे वो रीजनल हो उसका जो हैविएस्ट बर्डन है वो तो मुसलमानों को सहना पड़ा है। मतलब चाहे वो सच कमिटी रिपोर्ट हो जिसमें हम आएंगे। तो द कॉस्ट ऑफ दोज़ स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स मे बी डिस्रोपोशननेटली सो हाई दैट द कम्युनिटी फोर्स टू यू नो एक्सप्रेस देयर फ्रस्ट्रेशन देयर एंगर। हम जरा सी जरा सी कहीं पर कोई गलती करते थे। हम पर उंगली उठती थी ना। ऐसा नहीं था कि हम पे कभी उंगली नहीं उठ। हमने स्कॉलरशिप्स दिए। बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप्स दिए। अगर वह स्कॉलरशिप्स में 5 लाख से 4 लाख किसी साल हो जाते थे तो फौरन खड़े हो जाते थे लोग कहने के लिए देखिए कांग्रेस का नियत जो है वो खराब है और कांग्रेस ने देखिए ये गलत किया और कांग्रेस ने हमारी हमारी स्कॉलरशिप छीन ली। वो सब कहा कहते थे कि नहीं कहते थे। अब जीरो सिफर स्कॉलरशिप दी जा रही है। कोई कुछ नहीं कह रहा है। कोई कुछ नहीं कह रहा है। जो आज जो आज पुलिस हमारे जमाने में भी गलत हरकतें करती थी। हमारे जमाने में भी राइट्स होते थे। हमारे जमाने में भी राइट्स में लोग शिकायत करते थे। लेकिन कम से कम हम लोग बैठ के लोगों की बात सुनते थे। हम लोगों के साथ जाकर गुफ्तगू करते थे। हम उनके यहां घर-घर जाकर पूछते थे। क्या हुआ? कैसा हुआ? क्या हम आपको राहत दे सकते हैं? एक्सट्रा। आज क्या हो रहा है? सीएए और एनआरसी के राइट्स के बाद आज क्या हो रहा है? तो आज ये भी तो एहसास होना चाहिए कि हम इनकंप्लीट थे या इनपरफेक्ट थे। लेकिन आज वो इमपरफेक्ट होने की वजह से और आपकी जो शिकायतें थी और आपकी जो जो अपोजिशन थी उसने आज मुल्क को कहां ला के खड़ा किया है? आज कहां ला के खड़ा किया कि आपको शिकायत करने का हक भी नहीं है। ये तो मानना पड़ेगा ना। बिल्कुल। और एक अब असल में हो ये जाता है कि एप्पल्स और ऑरेंजेस का समाज का वो करने लगता है कंपैरिजन। जैसे कई बार जब मुझे मिला मौका बोलने का बहुत जगहों पे हमारा अपना क्रिटिक है। चाहे वो कांग्रेस का हो चाहे दूसरे का हो। वो आप ओवैसी को भी क्रिटिक करते हैं। मतलब विद इन कम्युनिटी हर तरह की पॉलिटिक्स का क्रिटिक है। उसने क्या दिया, कहां पे कैसे दिया। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस को कंपेयर करना यह भी एक जिसे कहते हैं मैसिव जंप हो जाता है। एक थ्योरेटिकल जंप भी हो जाता है। और उससे क्या होता है कि कई बार कि जो इंटरप्रिटेशंस आते हैं कि भ एट द एंड ऑफ़ द डे इट इज़ अलाइक चाहे बीजेपी हो चाहे कांग्रेस हो वो भी ना थ्योरेटिकली ना सब्सटेंटिवली इट डजंट मेक उसकी मीनिंग नहीं आती है कुछ। लेकिन उस सबके बावजूद एक और सवाल जो इसका निकल कर आता है वो ये निकल कर आता है कि गलती मान ली हमें ये पता लग गया कि जो अब जो ताकतें हैं वो किस तरह की हैं लेकिन 2014 के बाद से लेकर 2026 तक अभी शायद रिसेंटली ये हुआ कि मुसलमान शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए अगर उनके खिलाफ वायलेंस हो रहा है। सच्च कमेटी में सबसे पहले सबसे पहले हमने माइनॉरिटी से हटकर मुसलमान का नाम रखा था सच कमेटी में और वो एक बहुत बहुत सारे लोग उसको शायद पकड़ नहीं पाए लेकिन वो बहुत डेलीबेटली बहुत सोच समझ के वो कहा गया था और उसमें डॉक्टर मनमोहन सिंह का बड़ा हाथ था कि हम इस बात से कतराएं क्यों हमको डील करना है मुस्लिम आउटकम्स पे और मुसलमानों के जो हालात है उस उस पर हम लोगों को गौर करना है तो हम उनको मुसलमान ही कहें उन्हें माइनॉरिटी क्यों कहें सच्चे कमेटी में इस्तेमाल हुआ था उसके बाद फिर लोगों ने कहा कि यार देखो पोलराइजेशन बढ़ता है मुसलमान मत इस्तेमाल करो माइनॉरिटीज पे आ जाओ अल्पसंख्यक पर आ जाओ एक्सट्रा एक्सट्रा जो अभी बात फिर से कही है राहुल गांधी साहब ने फिर से कही है उन्होंने कहा कि नहीं लेट्स फोकस लेट्स फोकस हमारा फोकस क्या है अगर कोई चीज मुसलमान के खिलाफ हो रही है तो मुसलमान कहो उसको अगर किसी कोई जैन के खिलाफ हो रही है तो जैन कहो उसको अगर सिख के खिलाफ हो रही है तो सिख कहो कहो उसको माइनॉरिटीज का बट डू यू थिंक इट टूक अ लॉन्ग टाइम 14 इयर्स ऑफ़ इट्स नॉट अ क्वेश्चन ऑफ़ नॉट अ क्वेश्चन ऑफ़ 14 इयर्स क्योंकि आपने जैसे बोला 2007 में प्रिंसिपल अंडरस्टैंडिंग थी ऐसा नहीं है कि अब ये अंडरस्टैंडिंग अब हालात देख के बनी है बीच में क्या हुआ बहुत सारे लोग बहुत सारे लोग सर्च कमेटी के खिलाफ थे ना मैं तो माइनॉरिटी मिनिस्टर रहा हूं बहुत सारे लोग कहते थे इसको दबाइए इसको दबाइए इसका रिएक्शन अच्छा नहीं होगा और आज आप लोगों से पूछे बहुत सारे लोग शायद यह कहें कि भाई आपने जो सर्च कमेटी वगैरह किया इक्वल ऑपर्चुनिटी कमीशन वाली बात कही उससे ही सारे रिएक्शन हुए लेकिन वो सरासर गलत है। रिएक्शन तो बहुत चीजों की वजह से हुए होंगे और उस पर आप तफसीली अगर रिसर्च करेंगे तो यकीनन आपको वो सारे स्टैंड्स मिल जाएंगे कि वो रिएशंस क्यों हुए? समाज में बदलाव आते हैं। समाज में ये अप्स एंड डाउन्स आते हैं और उसकी वजह से ये रिएक्शंस आए हैं। अब इसका उसमें कोई हिस्सा था कि नहीं था। आई डोंट नो। लेकिन मैं यह मानता हूं कि सचर कमेटी का जो पैगाम था वो हिंदुस्तान के मुसलमानों को एक अच्छा और मजबूत पैगाम दिया गया था। बहुत कुछ फायदा हम कर भी पाए लेकिन जितना फायदा का तसवुर हमने किया था सर्च कमेटी के दायरे में वो हम नहीं कर पाए। बिफोर कमिंग बैक टू दिस इशू क्योंकि एक थीम है जिसमें हम इस पर बात करेंगे। में हल्का सा हिंदुत्व और हिंदुत्व का जो इंटरेक्शन रहा है क्योंकि एज अ पार्टी बीजेपी जनसंघ पहले फिर बीजेपी लेकिन रियल कंसोलिडेशन शायद जैसे कहते हैं 200 के बाद और स्पेशली 2014 के बाद हुआ लेकिन उससे पहले भी ये पॉलिटिक्स चलती रही और जैसे हमने पहले भी बोला कि भ इसकी कॉलोनियल जिनलॉजी भी है। आप मदन मोहन मालविया को ले लीजिए। एक जमाने में जब हम कांग्रेस को देखते हैं प्री पार्टीशन और पोस्ट पार्टीशन या इंडिपेंडेंस कांग्रेस भी दो अलग एंटिटीज हैं। एक तरीके से अगर देखा जाए प्रिंसिपल आईडियोलॉजी सामने रख लें अलग बात है। लेकिन अगर कार्डर को देखा जाए एक वो कांग्रेस है जो कॉलोनियल मूवमेंट में सोशलिस्ट भी साथ हैं। हिंदू नेशनलिस्ट भी साथ हैं। मुस्लिम नेशनलिस्ट भी साथ हैं। मुस्लिम्स वो जो सेपरेट इलेक्टोरल चाह रहे हैं वो भी साथ हैं। हिंदू हिंदुत्व के जो सोच रखने हिंदू महासभा भी इट इज़ अ कॉम्प्लिकेटेड कॉकटेल ऑफ अ लॉट ऑफ़ आइडियोलॉजीस जो एक तरह से ये सोच रही है स्ट्रेटेजिकली ये जो फ्रेमवर्क है फिलहाल हम इससे ब्रिटिश से एंगेज कर सकते हैं। पार्टीशन के बाद या इंडिया के इंडिपेंडेंस के बाद वो बहुत सारा एलिमेंट क्योंकि राहुल गांधी और बाकी मुस्लिम लीडर्स ने या कांग्रेस लीडर्स ने कहा है कि हमारे यहां भी एक हिंदुत्व और फार राइट हिंदू नेशनलिज्म का एलिमेंट है हमारी लीडरशिप में भी। तो आपको क्या लगता है कि जो इसमें क्योंकि नेहरू ने भी एक बार बोला कि भ ये असरात आपको बाद में दिखेंगे जो विद इन पार्टी जो एक तरह की पॉलिटिक्स है तो यहां पे कहां पे कोताही हो गई कि स्ट्रेटेजिकली पॉलिटिकली क्योंकि ये फ्यूचर में भी जिस तरह से इंटरेक्शन रहेगा हिंदुत्व एज अ फोर्स व्हाट इज हिंदुत्व अकॉर्डिंग टू यू उसकी एंगेजमेंट की लिमिट्स क्या है सेकुलर पॉलिटिक्स के साथ देखिए हिंदुत्व हिंदुत्व जो अ वेरी क्लियरली उसके दो पहलू में एक हिंदुत्व है, एक एक कल्चरल कांसेप्ट है जो रिलजन से जुड़ा हुआ है, लेकिन एक्सक्लूसिवली रिलजन नहीं है। हम बिकॉज़ कल्चर हमेशा एक रिलजन से बढ़ के दायरा होता है। लेकिन रिलजन का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है कल्चर में। तो एक तो कल्चरल आस्पेक्ट है हिंदुत्व का। और अब कोई कहता है राजस्थान से कोई आता है राम-राम से, राम-राम से। मुझसे तो मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई राम राम से कहता है। एक जमाना था कि बहुत सारे लोग हिंदू आके आपसे मिलते थे तो वो वो आदाबज़ कहा करते थे। अब बहुत सारे लोग ये समझते हैं हिंदुस्तान में कंजर्वेटिव मुस्लिम्स ये समझते हैं कि आदाबज़ क्यों कहते हैं आप? आपको अस्सलाम वालेकुम कहना चाहिए। आप आदाबज़ क्यों कहते हैं? लेकिन, एक अह एक एक हार्मोनी थी। एक हार्मोनी थी हमारे सेकुलर समाज में। जहां एक दूसरे के एक दूसरे के जो तौर तरीके थे उनको हम एक्सेप्ट करने की कोशिश करते थे और जिस तरह से ये था कि भाई ईद बकरे ईद में हम एक मुसलमान के घर जाते हैं वहां पर उनके साथ बैठकर और बिरयानी खाते हैं एक्सट्रा और उसी तरह से होली दिवाली पर हम लोग एक हिंदू के घर जाते हैं और उनके उनके जो भी वहां पर तौर तरीके होते हैं उसमें हिस्सा लेते हैं। तो वो एक तरीका था और वो अभी भी जिंदा है। ऐसा नहीं कि वो खत्म हुआ है। लेकिन जो एक कल्चरल डायमेंशन था और है हिंदुत्व का जो कल्चरल डायमेंशन है उसको आप नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। वह मेजॉरिटी है इस मुल्क में और जाहिर है मुल्क में जो मेजॉरिटी है उसका एक हिंदू कल्चरल डायमेंशन है एक कल्चरल उसका एक दायरा है जिसको जिसको आप रिस्पेक्ट करें उसके बारे में कुछ जाने तो और बेहतर है। जिस तरह से वो जो एक मुसलमान के घर के दायरे को और उसकी कम्युनिटी के दायरे को समझने की कोशिश करें तो वही हमारी ट्रू कंपैटिबिलिटी है। हमारे मुल्क के हिंदू और मुसलमान की एक तरह की एक ट्रू कंपैट कंपैटिबिलिटी है। लेकिन जब उसको आप एक पॉलिटिकल मूवमेंट बनाते हैं तब मसला आ जाता है। जब कल्चरल हिंदूइज़्म को आप पॉलिटिकल हिंदूइज़्म में कन्वर्ट करते हैं तो मसला आ जाता है। जिस तरह से जब आप कल्चरल इस्लाम को पॉलिटिकल इस्लाम में कन्वर्ट करने की कोशिश करते हैं। कभी एक वक्त था जब हिंदुस्तान के मुसलमान नहीं सिर्फ लेकिन गैर मुस्लिम भी हिंदुस्तान के आइडेंटिफाई करते थे तुर्की से अतातुर से आइडेंटिफाई करते थे। फिलिस्तीन से आइडेंटिफाई करते थे। वो मुस्लिम इशू नहीं था। वो एक लिबरेशन का इशू था। वो एक फ्रीडम का इशू था। उसमें हम आइडेंटिफाई करते थे। और जाहिर है हिंदुस्तान के मुसलमान इराक के साथ भी आइडेंटिफाई करते थे। इसलिए करते थे कि वो फिर से उनको उसमें वो एक फ्रीडम आइडेंटिटी दिखा करती थी। इसलिए नहीं कि वहां के मजहब और हमारा मजहब एक ही है। और उसमें नॉन मुस्लिम्स भी हमारे साथ खड़े रहते थे और खड़े रहे हैं। आज लगता है कि वो चीज कुछ खत्म सी हो रही है। क्योंकि आज कोई फिलिस्तीन की या गाजा की बात करें तो ये समझा जाता है कि आप मजहब की वजह से कर रहे हो। ऐसा नहीं है। लेकिन, सिंपैथी और हमदर्दी आपकी उनके साथ है और जाहिर है उनके साथ होनी चाहिए। जिन जिनको घरों से निकाल-निकाल के टेंट में डाल दिया गया है। जो हज़ारों बच्चों को खो चुके हैं। अपने घर के लोगों को खो चुके हैं। हमदर्दी उनके साथ है। इसलिए कि वो हमदर्दी एक विक्टिम के साथ है। वो हमदर्दी एक मुसलमान के साथ की नहीं है। एक विक्टिम के साथ की हमदर्दी है। और वो हमदर्दी हिंदुस्तान के मुसलमान और नॉन मुस्लिम सभी को है। वो होनी चाहिए। आपने क्योंकि बात करी पॉलिटिकल इस्लाम, पॉलिटिकल हिंदूइज़्म इसको एक्सटेंड करें एज अ कैटेगरी तो पॉलिटिकल लिबरलिज्म, पॉलिटिकल कम्युनिज्म, पॉलिटिकल बुद्धिज्म कोई भी आईडियोलॉजी जब अपनी टोटलिटेरियन एब्सोल्यूट फ्रेमवर्क बनाता है उसको पॉलिटिकली कोशिश करता है एग्जीक्यूट करने की। हमने रशिया में भी देखा है, चाइना में भी देखा। मतलब ये सिर्फ रिलजन का नहीं है। इवन जो सो कॉल्ड सेुलर फ्रेमवर्क्स हैं, मटेरियलिस्ट फ्रेमवर्क्स हैं, वहां पे भी जब भी टोटलिटेरियन पॉलिटिकल विल डोमिनेट करी है, तो उन्होंने एक सेकुलराइजेशन और होमजनाइजेशन। सेकुलराइजेशन नहीं होना ऑफ कल्चर की कोशिश करी है। लेकिन दूसरी तरफ हम ये भी देखते हैं कि जो इंडिया का डिस्कोर्स है, गांधियन डिस्कोर्स है या दूसरे डिस्कोर्स हैं, पॉलिटिक्स एंड रिलीजन को बहुत सीरियसली कि हाउ मच कैन इट इनफॉर्म द सोसाइटी? क्योंकि यहां पे एंबेडेड है। तो हम इसको अनटेंगल तो नहीं कर पाएंगे इंडिया में। तो हाउ डू वी डील विथ दैट? नहीं अनटेंगल नहीं कर पाएंगे लेकिन आप अच्छा हुआ कि आपने गांधी जी की बात करी क्योंकि गांधी जी तो रिलीजन को बहुत करीब से जोड़ते थे पॉलिटिक्स से। उनके लिए पॉलिटिक्स विदाउट रिलिजन वाज़ नो पॉलिटिक्स एट ऑल। लेकिन वो एक अग्रेसिव वर्जन ऑफ़ रिलिजन नहीं था ना। दैट वाज़ अ इट वाज़ अ वेरी सिंक्रेटिक वर्जन ऑफ़ रिलजन। ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको समझ दे भगवान। ये वो कहा करते थे ना। वो ये नहीं कहते थे कि ईश्वर ही ईश्वर हो। वन गॉड, वन रिलीजन, वन पीपल, वन वन नेशन, वन वन क्लोथ्स, वन फूड। वो ये नहीं कहते थे ना वो ही वाज़ हैप्पी दैट यू हैड डायवर्सिटी। तो आपने ये जो बात करी है आपने जैसे लिबरलिज्म की बात करी। लिबरलिज्म जो है वो आई एम सॉरी। लिबरलिज्म रिकोने नहीं हो सकता है। क्योंकि लिबरलिज्म की जो बुनियादी चीज है वो ये है कि यू हैव टू गिव दी अदर पर्सन अ राइट टू बी रोंग। आप पटरनलिस्टिक नहीं हो सकते हैं। आप यह नहीं कह सकते मैंने जो कह दिया बस वह लकीर की फकीर है। आप उसके आगे नहीं जा सकते। आपको कोई हक नहीं है सोचने का। लिबरलिज्म तो ये कहता है कि आप जो भी सोच रहे हैं उसका आपको हक है और वो अगर मुझसे डिसएग्री करता है। आई स्टिल हैव टू फाइट फॉर योर डिसए्रीमेंट। लिबरलिज्म वो है। खैर ये आपके से मैं एग्री भी करूंगा। लेकिन बहुत जगहों पे लिटरेचर में जैसे हिजाब और उसके हवाले से पूरी दुनिया में इवन प्योरली लिबरल वैल्यूस को भी पिटिकली इस्तेमाल किया गया इन डिबेट्स को और जस्टिफिकेशन में किस तरह मैं मैं वही मानता हूं कि जो बहुत सारे लोग अपने आप को लिबरल कहते हैं वो लिबरल है। है नहीं। तो आप जो बात कर रहे हैं वो ये है कि जैसे प्योर सेकुलरिज्म एक न्यूट्रल कैटेगरी है। प्योर लिबरलिज्म भी एक न्यूट्रल कैटेगरी है। इट्स अ प्रिंसिपल ऑफ इंगेजमेंट विद प्लुरलिटी रादर। सच्ची बात ये है कि आजकल सब सेकुलरिज्म को इतना बदनाम किया है मुल्क में। हमारे हिंदुस्तान में इतना बदनाम किया है कि मैं तो उम्मीद करता हूं कि लोग सेकुलरिज्म की जगह लिबरलिज्म इस्तेमाल करेंगे। क्योंकि सेकुलरिज्म सम हाउ लगता है कि सेकुलरिज्म का कुछ रिश्ता है या कुछ रुसूक है रिलीजन के साथ। लिबरलिज्म को ये माना जा सकता है कि कंप्लीटली इंडिपेंडेंट है। ऑटोनॉमस है। उसका ना रिलीजन से ताल्लुक है ना उसका इकोनॉमिक्स के कोई खास उससे ताल्लुक है। लिबरलिज्म इज़ ट्रू फिलोसोफिकल फ्रीडम। जो एक और सवाल जो इसमें एंबेडेड था कि रियलाइजेशन तो कांग्रेस को भी है, उसकी लीडरशिप को भी है कि देयर इज़ सम सॉफ्ट हिंदुत्व जो पॉलिटिकल हिंदूइज़्म या हिंदुत्व है उसका एलिमेंट विद इन कांग्रेस? हाउ डू यू डील विथ दैट? नहीं नहीं हाउ डू वी डील विथ दैट इज़ इज़ ऑब्वियसली हाउ डू यू डील विद समबडी हु बिलीव्स इन द अमेरिकन मॉडल ऑफ कैपिटलिज्म। हम वो भी हमारे यहां लोग रहे हैं जो कैपिटलिज्म के मॉडल को फॉलो करते हैं वो भी हमारे यहां लोग रहे हैं। हमारे यहां स्ट्रांग सोशलिस्ट भी रहे हैं। हमारे यहां वो लोग रहे हैं जो फ्रेंड्स ऑफ़ सोवियत यूनियन अपने आप को कहते थे। हमारे यहां वो लोग भी रहे हैं जिन्होंने ये चाहा कि हम अमेरिका की तरफ बढ़ जाए। अब रूस को छोड़ दें। अमेरिका की तरफ बढ़ जाए। हमारे यहां वो लोग भी रहे हैं जो चीन के साथ अच्छे ताल्लुकात चाहते थे। हमारे यहां वो लोग भी रहे हैं जिन्होंने चीन को अपना दुश्मन माना है और यह कहा है कि हमको चीन कभी आगे बढ़ने नहीं देगा एक्सट्रा एक्सट्रा तो एक रेनबो अलायंस कांग्रेस पार्टी हमेशा रही है एक रेनबो अलायंस रही है तो रेन रेनबो रेनबो में कौन से रंग नुमाया होंगे वो डिपेंड करेगा वक्तन वक्तन आपकी लीडरशिप आपकी लीडरशिप किस रुझान की है आपकी लीडरशिप किस किस जानिब आपको ले जाना चाहती है इट विल डिपेंड अ लॉट डू थिंक दिस इज द लिमिट आल्सो और सेंट्रिस पॉलिटिक्स के वो जो शेप है उसमें आप उसको रिकॉन्फिगर कंफिगर कर सकते हैं अक्रॉस दी रेंज अब्सोलुटली वो होता है और वो होता है आई मीन आप नेहरू के जमाने से देखें इंदिरा जी के जमाने से देखें जो रिफॉर्म मूवमेंट राजीव जी लाए रिफॉर्म मूवमेंट देखें आपने डॉक्टर मनमोहन सिंह का जमाना देखा आपने उससे पहले जब वो फो फाइनेंस मिनिस्टर थे आपने नरसिम्हा राव का जमाना देखा तो बहुत सारे बहुत सारे पहलू हैं जिसमें जो कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से अपना रंग बदला है या आपने अपना एमफेसिस बदला है इकोनॉमिक और सोशल एम्फेसिस बदला है और जिस तरह से सोशलिस्ट से न्यू लिबरल भी एक शिफ्ट जो रहा है [नाक से की जाने वाली आवाज़] सोशलिस्ट हां सोशलिस्ट से न्यू लिबरल बट न्यू लिबरल विद अ वेल एज अ वेलफेयर स्टेट एज अ वेलफेयर स्टेट तो हम हम ये मानते हैं कि हमारे पास एक बहुत अच्छा बहुत अच्छा मॉडल था और बहुत कामयाब मॉडल था लेकिन अनफॉर्चूनेटली जो पिटिकल सरकमस्ट्ससेस बन गए उन पिटिकल सरकमस्ट्ससेस की वजह से हमको उसे अंजाम तक पहुंचाने का मौका नहीं मिला। एक जो क्रिटिक भी होता है कि आपने क्योंकि राजीव गांधी का नाम लिया बाकी चीजों का नाम लिया जो सेंट्रिस मॉडल में कई बार जो मेजोरिटेरियन पॉलिटिकल विल नुमाया होगी फ्रॉम दी बॉटम अप तो उस टाइम पे पॉलिटिकल स्ट्रेटजी ऐसी लेनी पड़ी जिसकी वजह से आज हिंदुत्व आया। ये भी लोग बोलते हैं कि फॉर एग्जांपल राम जन्मभूमि मूवमेंट है, शिलान्यास है। उसके बाद बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिस पे लोग बोलते हैं कि भ ये स्ट्रेटजी अगर नहीं होती या फिर और आज भी कई बार ये होता है कि अब जैसे बोला गया कि भ मुस्लिम वर्ड होना चाहिए। ये क्वेश्चन मैं ऐसे नहीं पूछ रहा हूं कि कंक्लूसिवली मैं ये क्वेश्चन पूछना चाह रहा हूं। समझना चाह रहा हूं क्योंकि इतने कॉम्प्लेक्स देश में इतने मल्टीकल्चरल मल्टीप्लूरल देश में आप किस तरह स्टियर करेंगे कि जहां पे कहीं ना कहीं चाहे वो मेजोरिटेरियन विल हो या पर्टिकुलर कॉम्बिनेशंस ऑफ़ कास्ट एंड क्लास हो या कहीं पे इवन हो सकता है मुसलमान कहीं पे अगर बहुत कंसंट्रेटेड हो वो भी वही काम कर रहा हो। मतलब मैं यह नहीं कह रहा कि भ यह कैटेगरी कंप्लीटली न्यूट्रल है। तो आज जो हम क्राइसिस फेस कर रहे हैं हाउ डू यू थिंक कांग्रेस या आपकी लीडरशिप व्हाट इज द इंटेंशन? व्हाट इज दी डायरेक्शन कि आप इसको स्टीयर करना चाहते हैं वापस एक देखिए वो नैरेटिव नैरेटिव बनाने की बात होती है। एक तो सबटेंटिव आपकी पॉलिसीज हैं। बहुत जाहिले उनकी अहमियत होती है। लेकिन एक नैरेटिव का भी मसला है। नैरेटिव आप क्या बनाएंगे और नैरेटिव कैसे बनाएंगे इट हैज़ अ लॉट टू डू कि जो जबान एक लीडर इस्तेमाल करता है जो कासेप्ट से एक लीडर इस्तेमाल करता है जो सिंबल [नाक से की जाने वाली आवाज़] से एक लीडर इस्तेमाल करता है तो कुछ चीजें होती है एक बहुत हद तक सिंबॉलिक होती हैं और कुछ चीजें होती है सबट्रिक होती है। मैं ये मानता हूं मैंने कल किसी से गुफ्तगू में ये बात कही कि बहुत अरसे से लोग ये कह रहे थे कि राहुल गांधी क्या चाहते हैं कैसा हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं मैंने कहा इसका जवाब राहुल गांधी ने 4000 किलोमीटर चल के दिया और हम वो जो उनके साथ चले बहुत फासला हमने पूरा किया उनके साथ कश्मीर तक गए कन्याकुमारी से कश्मीर तक तो हमने ये देखा कि फॉर द फर्स्ट टाइम हमने ये देखा कि जो लोग आ रहे हैं वो हमको मालूम भी नहीं था कि कांग्रेस के लोग हैं कि नहीं है कि उन्होंने कभी कांग्रेस को वोट दिया है कि नहीं दिया है। लेकिन एक एक जागरूकता और एक एक एंथूजियाज्म था उनमें कि हम कुछ कर सकते हैं। इस मुल्क के लिए हम लोग कुछ कर सकते हैं। वो एक अजीब सा एक अजीब सी कैफियत थी वहां उस जमाने में। और उसका असर हुआ मैं समझता हूं कि इलेक्शन रिजल्ट्स में कुछ ना कुछ उसका असर हुआ। यकीनन उसका असर हुआ। लेकिन बहुत सारे लोगों ने कहा कि आप एक यात्रा और करिए। फिर उन्होंने न्याय यात्रा की वो बात नहीं आई। न्याय यात्रा में वक्त कम था। गाड़ी से जा रहे थे वो जो पैदल चल के गए थे वो नहीं था। उसका उतना इंपैक्ट नहीं हुआ। लेकिन जो जो पैदल यात्रा उनकी 4000 कि.मी. की थी। उसका यकीनन बहुत गहरा इंपैक्ट वा मोर एक्सेसबल। आप चलते हुए मतलब एक डिफरेंट डायनामिक्स डायनामिक्स थी। लोग आ रहे थे। क्यों कोई आ रहा है जिसको देखो वो मिलना चाह रहा है साथ चल रहा है देयर वर नो कंस्ट्रेंट्स देयर वर नो रिस्ट्रिकशंस विद इन सिक्योरिटी के मामले के बावजूद वहां कोई रेस्ट्रिकशंस नहीं थे तो अब उस चीज को आप एक परमानेंट एक परमानेंट मैसेज कैसे देंगे कैसे दे सकते हैं ये हमारे लिए एक चैलेंज है कि जो चीज हमने उस यात्रा में देखी या उन्होंने दिखाई और उन्होंने वाज़ की उसको हम एक परमानेंट फीलिंग कैसे दे सकते हैं इस मुल्क में अगर वो हम दे दें तो मुझे पूरी उम्मीद है कि एक मैसिव रेवोल्यूशन आएगा। एक बहुत बड़ा फर्क हिंदुस्तान में आएगा। एट द एंड ऑफ़ द डे जो हम है फॉर एग्जांपल ये चैनल है बहुत ज्यादा फोकस करता है इंडियन मुस्लिम इश्यूज पे। ऑफ कोर्स विद इन द लार्जर फ्रेमवर्क ऑफ़ व्हाट इंडिया इस सपोज टू बी। तो इसीलिए क्योंकि एंगेजमेंट एक सीनियर कांग्रेस लीडर के साथ हो रहा है। इस वक्त बीजेपी का रूल है और हम चाहते हैं कि भ एक डिफरेंट पॉलिटिकल इमेजिनेशन और पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन हो। तो इसलिए ये जरूरी भी हो जाता है कि जिस पास्ट की फीलिंग को हम ले चल रहे हैं उसके जवाब भी कुछ-कुछ हमें मिले चीजों को। तो इसी तरह के कुछ सवालात हैं। मैं चाहूंगा कि आप अगर उसके ऊपर थोड़ा क्लेरिटी लाएं हमारे पास अभी तक मैंने जवाब नहीं दिया। नहीं आए हैं। बट अब कुछ पर्टिकुलर चीजों के ऊपर जैसे फॉर एग्जांपल अभी तक हम लोग ज्यादा मैक डिस्कशंस थे। तो अभी जो जैसे फॉर एग्जांपल एक बात 2020 में जो यह पूरा शाहीन बाग मूवमेंट हुआ सारी चीजें अक्सर हम बताते हैं मैं भी जेएनयू में था उस टाइम पे आपको भी बता रहा था मैं करीब से देखा स्टूडेंट मूवमेंट को उसके बाद जो क्रैकडाउन हुआ उससे पहले मुझे भी फ्रैंकली स्पीकिंग नहीं पता था यूएपीए क्या है फलाना क्या है सारी चीजें फिर डिबेट्स आई कि ये लॉज़ जो हैं वो कांग्रेस एरा में इनको बनाया गया उस टाइम पे भी इनको बहुत सारे जगह जगहों पे मिसयूज किया गया या फिर जैसा आपने राय्स के बारे में कहा बाकी सारी चीजें गई। पहली बात कि व्हाई व्हाट दे जस्टिफाइड एट दैट टाइम? एंड व्हाट डू यू थिंक कि भाई उनको इस्तेमाल जिस तरीके से हो रहा है तो आगे इसको रिस्ट्रेन कैसे हो? देखिए दिलचस्प बात क्या है कि ये कानून जैसे यूए यूएपीए पीएमएलए पीएमएलए वगैरह किसने बनाए थे? इसमें हमारे एक बहुत जहीन साथी और बहुत मूम साथी चिदंबरम साहब ने बनाए थे। हम तो उन्होंने यह कानून इसलिए नहीं बनाए होंगे कि एक दिन उनको उस कानून का सामना करना पड़ेगा। वह जेल जाएंगे। इसलिए तो नहीं बनाए होंगे। उस वक्त यह अंदाजा था कि कुछ लोग हिंदुस्तान के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं और जो इकोनॉमिक खिलवाड़ कर रहे हैं या और किसी तरीके से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप ये याद फरमाएंगे कि आपने देखा कि लोग मुख्तलिफ मुख्तलिफ मज़ाहिब के लोग टेररिज्म से जुड़ रहे थे। किसी किस्म के टेररिज्म से जुड़ रहे थे। तो उसके लिए जब यह बनाया गया तो यह तो नहीं समझ के बनाया गया कि इसको सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे। उसको तो यह समझ के बनाया गया था कि हम जो भी टेररिज्म के का हाथ पकड़ेगा हम टेररिज्म की मुखालफत में ये इस्तेमाल करेंगे। इसको इस्तेमाल करेंगे। ये किसको मालूम था कि निजाम ऐसा बदल जाएगा कि इसका गलत इस्तेमाल किया जाएगा। आज यह गलत इस्तेमाल हो रहा है। इसमें दो राय नहीं है। और कहीं अगर थोड़ी सी 2% 4% 5% 10% अगर राहत मिली है तो वो कोर्ट्स से मिली है। कभी किसी हाई कोर्ट ने दी है। कभी सुप्रीम कोर्ट ने दी है। जितनी उम्मीद हमको सुप्रीम कोर्ट से थी उतनी हमको उम्मीद उतनी उम्मीद पर खरा सुप्रीम कोर्ट नहीं उतर पाया। लेकिन बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट ने किया है। बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट ने दिया है जिसका हम लोग फायदा उठा सकते हैं। यह तो आप बात कर रहे हैं इस एरिया की जो लिबर्टी से रिलेटेड एरिया है और भी हैं और और भी एरियाज हैं। आप अलीगढ़ का मसला देखिए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मसला देखिए। वो भी कानून हमारे ही बनाए हुए थे। हम अलीगढ़ के कानून हमारे ही बनाए हुए थे। और आज जाकर उस पर यह फैसला होना था कि अलीगढ़ एक माइनॉरिटी कैरेक्टर है कि नहीं। जो आदमी कानून नहीं समझता नहीं जानता उससे आप पूछिए कि अलीगढ़ माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन है कि नहीं तो वो फट से कहेगा कि अरे अलीगढ़ नहीं है तो कौन है? अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अगर माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन नहीं है तो फिर कौन सा मॉनिटरी इंस्टीट्यूशन होगा? तो आप कहें भाई जामिया जामिया माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन है कि नहीं? अरे साहब जामिया भी होगा। जामिया क्यों नहीं होगा? लेकिन जामिया में और अलीगढ़ में जमीन आसमान का फर्क है। कानूनी तौर पर जमीन आसमान का फर्क है। और बहुत खतशा इस बात का था कि अलीगढ़ को माइनॉरिटी स्टेटस नहीं मिल पाएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दिया और मैं ये समझता हूं कि बावजूद इसके कि वहां बहुत सारी अच्छी बहस लोगों ने ये की ये कहने के लिए कि अलीगढ़ एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और अलीगढ़ सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। इसलिए माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन नहीं हो सकती। उसके बावजूद उस वक्त चंद्रचूत साहब के जजमेंट से अलीगढ़ को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन माना गया। वो भी कानून हमारे ही बनाए हुए थे। हमारे ही बनाए हुए थे। लेकिन हमने उस वक्त कानून बनाए थे ये समझ के और ये उम्मीद करके कि उस कानून से अलीगढ़ का बरकरार रहेगा माइनॉरिटी कैरेक्टर। लेकिन उस कानून का जो इंटरप्रिटेशन किया गया इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो उसका इंटरप्रिटेशन किया वो इंटरप्रिटेशन ये किया कि ये माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन नहीं है। और उसी कानून की बुनियाद पे कहा। जैसे कमल मौला मौस के जजमेंट में भी जो प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट आप किस तरह से आप किस तरह से कानून को इंटरप्रेट करते हैं वो एक और जनरेशन ऑफ जजेस को तय करना होता है। आप जब फैसला करते हैं और जब कानून बनाते हैं तो आपका नजरिया कुछ होता है। आपकी उम्मीद कुछ होती है। आपका तसवुर कुछ होता है। लेकिन एक जनरेशन बाद के जजेस जब उस पर गौर फरमाते हैं और उस जमाने के जो हालात हैं उनको देखते हुए वह गौर फरमाते हैं तो उस पर वह क्या कह पाते हैं? में क्या कहते हैं, क्या करते हैं, उसका अंजाम हमको झेलना पड़ता है। तो यह यह मानना है कि हम कंसिस्टेंटली देखिए एक समाज एक समाज में जब एक एक अहद होता है समाज में और उसमें उस जमाने के थिंकर्स उस जमाने के स्कॉलर्स उस जमाने के उस जमाने के एक्टिविस्ट एक्सेट्रा किस नजरिए के होते हैं और उस जमाने के जजेस किस नजरिए के होते हैं। एक जमाना था कि आप अगर अह लैंडो अटेनेंट का मामला सुप्रीम कोर्ट में या किसी कोर्ट में ले जाते थे। मैं जस्टिस भगवती या और जस्टिस कृष्णा के जमाने की बात कर रहा हूं। तो आपके लिए वकील फौरन कहता था कि भाई टेनेंट हो तो यह तो टेन प्रो टेनेंट कोर्ट है। आप को हम महफूज रखेंगे कोई मसला नहीं है। लेकिन अब वो बदल गया है। अब जजेस खुद कहते हैं कि नहीं भाई देखिए आपने किसका घर 20 साल से ले रखा है। कब तक आप लेकर रखेंगे? बताइए बताइए कितना वक्त चाहिए आपको? 6 महीने चाहिए, 1 साल चाहिए, कितना वक्त चाहिए? बताइए आपको छोड़ना पड़ेगा। तो कुछ ना कुछ तो बदला है। कानून वही है। हम कानून में कोई कोई चेंजेस नहीं आए। कानून वही है जो पहले था वही कानून है। लेकिन जजेस का देखने का जो तरीका है वो बदल गया है। और आप ये नहीं कह सकते कि वो जजेस बेईमान थे और ये जजेस जो है ऑनेस्ट है या ये बेईमान है और वो ऑनेस्ट थे। ऐसा नहीं आप कह सकते हैं। जज हालात को देखकर हालात का जायजा लेकर ही एक फैसला करता है और वो कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में ज्यादा ज्यादा अहम अहमियत रखता है और कॉन्स्टिट्यूशन लॉ के फैसले इसी तरह से किए जाते हैं। कब आप किसी चीज को सही मानते हैं? कब आप किस चीज को गलत मानते हैं? और इसलिए बहुत कुछ बदलता है। किस चीज को आप इंडस्ट्री मानते थे। कि अब उसको आप इंडस्ट्री नहीं मानते हैं। वही वही जजेस हैं। जजेस मतलब जी बदल गए हैं। लेकिन है तो वही जजेस सुप्रीम कोर्ट के और वही वकील हैं। वही वोला हैं और वही कानून है। कानून में कोई बदलाव नहीं आया। लेकिन कोर्ट का रवैया बदल जाता है। तो इसलिए जो कानून हमने बनाए क्या सोच के और समझ के बनाए थे। आप ये उन लोगों से अगर आप गुफ्तगू करें बात करें जिन्होंने इसमें एक रोल प्ले किया था। तो उनका क्या उस वक्त नजरिया रहा होगा? क्या उनका मंसूबा रहा होगा? और उसका इस्तेमाल किस तरीके से किया गया? हम तो आज ये भी कहते हैं कि उसका इस्तेमाल गलत किया गया। उसका इस्तेमाल पुलिस ने गलत किया। उसका इस्तेमाल एडमिनिस्ट्रेशन ने गलत किया। और उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि हम इसको इस तरह से इस्तेमाल करेंगे कि हम इनको एक सबक सिखाएंगे। ये कहा। हमने सबक सिखाने के लिए तो कानून नहीं बनाए थे। हमने इस मुल्क को महफूज़ रखने के लिए कानून बनाए थे कि कोई पैसे का इस्तेमाल करके मुल्क की इकॉनमी को को ठेस पहुंचा रहा है और कोई पॉलिटिकल स्लोगंस इस्तेमाल करके मुल्क की जो यकचहती है उसको उसको तकलीफ पहुंचा रहा है। उसको कर रहा है। लेकिन अब ठीक है। अब ये एक मसला है कि जब एक स्टेज में एक एक मौके एक टाइम पे आप ये समझते हैं कि लिमिटी को ज्यादा मौका होना चाहिए। फिर कभी आप ये समझते हैं कि नहीं सिक्योरिटी का ज्यादा ज्यादा अहमियत सिक्योरिटी को देनी चाहिए। तो वो वन और वन बातें बदलती हैं। लेकिन हां यह सही है कि हम यह मानते हैं कि जो भी कानून बने उनका गलत इस्तेमाल आज हो रहा है और यकीनन हम हुकूमत में आते हैं तो हमको सबसे पहले इन्हीं पर वॉर करना पड़ेगा। एक इंप्लसिट जो रीजनिंग [गला साफ़ करने की आवाज़] मुझे आपके आर्गुमेंट में लगी और उसमें जो शुरू में भी बात हो रही थी कि जैसे प्रियमबल है, कोर कॉन्स्टिट्यूशनलिटी है, डायरेक्टिव प्रिंसिपल है। अ लॉट ऑफ़ इट इज़ टू डू विद दी रीडिंग ऑफ़ हु इज़ रीडिंग इट। हां बिलकुल। उसमें यह कि जो सक्सेस है आरएसएस का वो यह है कि उन्होंने मूवमेंट को ग्रास रूट्स बनाके हु इज़ गोइंग टू रीड इट वो हाथ बदल गई। तो एक्चुअली कांग्रेस वाज़ दैट मूवमेंट शुरुआत में इट इज़ दी मूवमेंट हु जिसने वो हर गांव में हर शहर में हर गली में वो एग्जांपल वहीं से आया था। उसमें तो वो आज की डेट में कांग्रेस की जो ग्रास रूट्स प्रेजेंस थी वो तो अक्सर लोग बोलते हैं बहुत क्या उस पे कुछ काम हो रहा है? देखिए उस पे काम हो रहा है। बहुत काम हो रहा है। लेकिन मैं आपको एक बात बताऊं आप बंगाल का वो देखिए बंगाल में जो हुआ उस पर विद इन अ मंथ कंप्लीट लेकिन ये कौन लोग हैं? ये कौन लोग हैं? ये वो लोग हैं जो एक जमाने में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ थे। लेफ्ट फ्रंट के साथ थे। लेफ्ट फ्रंट का का वक्त गुजर गया तो वह सारे के सारे टीएमसी में आ गए। टीएमसी का वक्त गुजर गया तो वो सारे के सारे बीजेपी में आ गए। वही लोग हैं जो मॉब्स रूल करते हैं बंगाल की स्ट्रीट्स को। ये वही लोग हैं और हर एक मानता है कि ओवरनाइट चेंज कर जाते हैं। ओवरनाइट आ जाते हैं। अब कुछ लोग बीजेपी में ये कह रहे हैं कि हमको हमको बहुत चौकन्ना रहना चाहिए। इन लोगों को बीजेपी मत आने दीजिए कि बीजेपी में ये आ गए तो ये बीजेपी को बर्बाद करेंगे। लेकिन वहां का एक वहां का एक तरीका बन गया है। एक रवैया वहां का है लोगों का। उसको ये लोग कैसे चेंज कर पाएंगे? इट स्टिक्स लार्जर देन लाइव पर्सन जो इस चीज को रोक सके। तो यही हुआ था जब इमरजेंसी के बाद जनता दल जीत के आई थी। तो उनके पास भी कोई ग्रास रूट्स ऑर्गेनाइजेशन तो नहीं थी। लेकिन हालात ऐसे बन गए कि वो ओवरनाइट जीत के आ गए। आपका यह भी कहने का मतलब है कैरिस्मैटिक आईडियोलॉजिकल लीडरशिप जो मूव कर सके उसका बहुत मेजर रोल होता है। सरकमस्टसेस, इवेंट्स, सरकमस्टेंसेस एंड कैरिस्मैटिक लीडरशिप इन तीनों का जो कॉम्बिनेशन होता है वो कुछ भी कर सकता है। आपने जैसे थोड़ी देर पहले बोला कि बहुत सारे लॉज ऐसे बनाए गए जिनका एक्सपेक्टेशन नहीं था कि भई ये इस तरह इस्तेमाल होंगे। अक्सर मैं जब लोग बोलते हैं कि भई बाबरी मूवमेंट में ऐसा नहीं करना चाहिए था, वैसा करना चाहिए था। उसमें मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है या सीए में ऐसा करना चाहिए था, ऐसा नहीं करना चाहिए था कि बहुत सारी चीजें बहुत उस वक्त के दायरे को सामने रखते हुए लोग डिसीजंस लेते हैं और इन हैंड साइड उसका क्रिटिक भी होता है। उसका एक्सेप्टेंस भी होता है। आसान होता है। बहुत आसान होता है कि हैंड साइड में आप कहें कि मैं होता तो मैं ऐसा करता। ऐसा कर देता। और उसमें भी कई बार मुझे लगता है बहुत सारे लोग बोलते हैं कि बाबरी उसी वक्त दे देते। तो मैं मेरे ज़हन में आता है। हो सकता है मैं गलत हूं। मेरा ओपिनियन है कि शायद जब दे देते तो बाकी सारी भी कमल मौला मौस भी जब ये हो जाता मथुरा भी मूवमेंट्स। अब जैसे एसआई और हो रहा है, सीए एकदम नहीं हो रहा। एक वक्त लग रहा है गवर्नमेंट को फिर से रिफ्रेम करने का इशू को या जो भी रिजीम है तो कुछ ना कुछ तो सोशल मूवमेंट्स का इंपैक्ट होता है। और उसके बाद जो उसके फॉलो अप्स होते हैं शायद हम उसको जो आपने बोला स्ट्रेटेजिक वोकैबलरी ना बना पाना एक रीडिंग ना हो पाना। लेकिन बहुत सारी चीजें ऐसी भी हैं जो जैसे 2002 में हुआ। जकिया जाफरी के साथ हुआ। तो सॉरी एहसान जाफरी के साथ हुआ। और उसमें बहुत वाज़ हुआ के अगर रिजीम पावर में आती है, हिंदुत्व को पावर मिलती है तो लॉज़ भी उनकी पॉलिटिकल विल भी इस लेवल पर इस्तेमाल हो सकती है। कुछ ना कुछ अभी भी जिस जिस तरीके से मतलब वो एक एग्जांपल्स आ चुके थे हम और उस वक्त को 2002 फिर 2007 में अगर हम आए जो स्ट्रक्चर कमेटी की रिपोर्ट आती है बाकी सारी चीजें होती हैं। मैं आपसे समझना चाह रहा था कि बहुत सारी चीजें आप भी करना चाहते होंगे। आपको भी जेहन में होगा कहां रुकावट आती है। इवन व्हेन देयर इज पावर। मान लीजिए यूपीए वन था, यूपीए टू था। यू हैड इमेंस पावर फॉर एग्जांपल। बट उस पावर की भी एज अ लेजिसलेटर या एज ए यू नो स्टेट्समैन गिवन के अह जो वर्ल्ड व्यू है कि अपीज़मेंट हो रहा है ये हो रहा है उसकी क्या लिमिट है और वो विद इन द पार्टी कैसे आती है? देखिए उस वक्त ऐसा तो हम पर कोई इतना बड़ा दबाव हम पर इस बात का नहीं था के हम जो करेंगे उसको अपीज़म माना जाएगा या उस पर सवाल उठाए जाएंगे था गुजरात के गुजरात में जो गवर्नमेंट थी मोदी साहब वहां पर सीएम थे और अक्सर जो मीटिंग्स हुआ करती थी उसमें वो आके उस बात को उठाते थे एक्सट्रा लेकिन जो हमारा फेडरल स्ट्रक्चर है देखिए क्या है कि एक एक नजरिए को मूवमेंट बनाने में वक्त लगता है और हमारे यहां इलेक्शंस इतने होते हैं कि एक इलेक्शन से अगले इलेक्शन में मूवमेंट्स जो है वो अक्सर अक्सर ठेस खा जाती हैं। प्रोफेशनलाइज हो गया है इलेक्ट्रोरल पॉलिटिक्स। इलेक्ट्रोल पॉलिटिक्स प्रोफेशनलाइज़ हो गया है। आप का फोकस मुस्तकिल शिफ्ट करते हैं। करते हैं और एक जो नेशनल इशू होता है वो अक्सर अक्सर खो जाता है जब आप रीजनल पार्टीज में जाके काम करते हैं। हमारे लिए जो सबसे बड़ा मसला था कि हमको अभी मैं नहीं कह सकता हूं कि आज इंडिया अलायंस में क्या होगा। हम लेकिन वो वक्त जो गुजरा वो वक्त ऐसा गुजरा कि रीजनल पार्टीज जो थी उनकी कोशिश ये होती थी कि कांग्रेस को कमजोर किया जाए क्योंकि रीजनल पार्टीज को जो जगह मिल रही थी वो इस वजह से मिल रही थी कांग्रेस जहां से सुकर रही थी कांग्रेस वो जगह उनको रीजनल पार्टीज को मिल रही थी तो अब हम उनसे अगर समझौता भी करते थे तो हम अपनी जगह छोड़ के समझौता करते थे कर पाते थे और वो डोमिनेंट रहते थे एक मुझे याद है एक दफा हम लोग सफर में थे प्रणव मुखर्जी साहब के साथ तो हम लोग चाय के लिए एक जगह रुके थे तो ऐसे ही कुछ गुफ्तगू शुरू हो गई तो उन्होंने एक बात कही थी। उन्होंने कहा कि देखो आप लोग एक बात ज़हन में रखो हम लोग या तो हिंदुस्तान पे रूल कर सकते हैं या फिर हम स्टेट्स पर रूल कर सकते हैं। यू कांट रूल इन बोथ केसेस कि आप स्टेट्स भी करें और और सेंटर में भी करें। ये मुमकिन नहीं है। ये बहुत दूरंदेशी की उन्होंने बात कही लेकिन यही हुआ कि हमने पहले एक अरेंजमेंट ये किया कि हम स्टेट्स में अपर हैंड देते जाएं हम और तवको ये करें कि लोग इस बात से मुमन रहे कि उनको स्टेट मिल गया है। हम तो थोड़ा सा हिस्सा हमको भी वहां स्टेट में मिले। लेकिन सेंटर में वो हमको आने दें। ये डीएमके के साथ हमारा ऐसे ही समझौता था। यही हमारा समझौता मायावती के साथ हुआ औरों के साथ हुआ। लेकिन धीरे-धीरे जो रीजनल पार्टीज हैं उनके एंबिशंस बढ़ते गए। हम फिर उन्होंने कहा कि यह तो हमारे सारे सेंटर में है तो हम क्यों नहीं सेंटर में पहुंचेंगे? हम प्राइम मिनिस्टर बनेंगे। हम सेंटर में पहुंचेंगे और फिर वो जो अरेंजमेंट था स्टेट और सेंटर का जो अरेंजमेंट था वो वो फ्रेजाइल हो गया। रिवर्स हो गया और जहां-जहां वो रिवर्स हुआ तो हम पीछे पीछे पीछे पीछे हटते चले गए। और फिर हम वहां पहुंच गए जहां डोमिनेंस जो था वो रीजनल पार्टीज का हो गया। फिर रीजनल पार्टीज अपने फैसले करने लगी कि आज हम आपको छोड़कर किसी और के साथ चले गए फिर हमको छोड़कर कहीं और चले गए एक्सट्रा एक्सट्रा तो आज हमको जो सोचना है और जिस बात पे हमें गौर करना है वो ये है कि क्या रीजनल पार्टीज के साथ एक नया कॉम्पैक्ट उनके साथ एक नया मेजर ग्लोबल एग्रीमेंट हम कर सकते हैं कि नहीं कर सकते हैं जो जो कोशिश हुई इंडिया अलायंस और ये सारी चीज़ कोशिश हुई है लेकिन आपने देखा उस कोशिश में एक हद तक हम लोग उसका फायदा उठा पाए सब हम लोग मिलकर फायदा उठा पाए 2024 में। लेकिन जितना हम उठाना चाहते थे उतना नहीं उठा पाए। इसलिए कि कुछ लोग टूट टूट-टूट के चले गए। ममता चली गई। आम आदमी पार्टी आम आदमी पार्टी अलग हो गई। तो अब ये है कि सब लोग उस पर एक दफा फिर से नए सिरे से गौर करें और फिर एक नया अरेंजमेंट बनाएं। जिस अरेंजमेंट के तहत हम लोग मिलकर एक दफ़ा चुनाव लड़के दिखाएं कि यह मुमकिन है कि जहां 60% वोट है, जहां 60% वोट है, वह आज 15 साल से बाहर बैठा है और जहां 40% या 40 से कम परसेंट वोट है, वह आज 15 साल से इख्तेदार में है। ये बड़ा चैलेंज भी रहेगा क्योंकि डीसेंट्रलाइज्ड चीजों को एक अंब्रेला में लाना क्योंकि देयर इज़ सो मच कॉम्प्लेक्सिटी डिमांड्स। उसकी एक अलग नेगोशिएशन है। बनिस्बत इसके जो एक टॉप डाउन अप्रोच है। थोड़ा सा हम लोग क्योंकि इंडिया के जो मुसलमान है उनके ऊपर जो सबसे ओवरवेल्मिंग जो इंपैक्ट है वो सच कमिटी रिपोर्ट का है। मतलब ऐसा नहीं था कि उससे पहले पेपर्स नहीं लिखे जा रहे थे। खुद अबू साले शरीफ और बहुत सारे ऐसे थिंकर्स थे जो कास्टेंटली लिख रहे थे और नॉन मुस्लिम थिंकर्स भी थे कि जो बता रहे थे कि भ हिंदुस्तान में माइनॉरिटीज को एस्पेशली मुसलमानों का ये है जो एकेडमिया में थे जो छोटी-छोटी स्टडीज कर रहे थे लेकिन सचर कमिटी ने पहली बार वो कंप्लीटली फ्रॉम डेटा फ्रॉम द गवर्नमेंट इटसेल्फ आप तो बेहतर जानते हैं मैं आपको इसमें क्या वो पूरा का पूरा आर्किटेक्चर सामने आया तो सचर कमिटी रिपोर्ट में जो बहुत सारी चीजें आई जैसे मेन एंड ग्रुप्स का इक्वल अपोरर्चुनिटी कमीशन बिल है। कुंडू का यू नो डायवर्सिटी इंडेक्स है। खुद पीएम के जो 15 पॉइंट प्रोग्राम है। 2007 से लेकर 2014 के बीच में बहुत सारी चीजें जो उसमें थी 2009 से लेकर कुछ वफे तक आप भी उसके हेड रहे। फिर मुझे याद है हमारे जो के रहमान खान साहब हैं उन्होंने भी वो ओदा संभाला। क्या चैलेंजेस आए कि क्लेरिटी है चीजों की। यह चीजें होनी है। आप लोगों में विल भी है और बहुत सारी चीजें स्पेशली जैसे जो स्कॉलरशिप्स वगैरह हैं वो तो हो भी गई। मतलब वो क्लियर क्योंकि वो ऐसी चीज थी कि वो बहुत डीपली स्ट्रक्चरल नहीं थी शायद तो उसकी वजह से हालांकि उसका क्लियर बेनिफिट था इमीडिएटली लेकिन उसको देखिए उन्होंने रिवर्स भी कितना जल्दी कर दिया। बट ये इक्वल ओपोरर्चुनिटी और ये प्योरली स्ट्रक्चरल चीजें हैं कि जैसे आपका हर लेवल पे गवर्नेंस के और हर लेवल पे जो पॉलिसी बनेगी उसका इंपैक्ट पड़ता है। कहां चैलेंज आया? देखिए वहां जो सबसे बड़ा चैलेंज था कि एक एक स्ट्रक्चर एकिस्टिंग स्ट्रक्चर था जो वेलफेयर का और आउटरीच का जो एकिस्टिंग स्ट्रक्चर था वो स्ट्रक्चर जो था वो कम्युनिटी और कास्ट बेस स्ट्रक्चर था हम आपके शेड्यूल कास्ट शेड्यूल ट्राइब कमीशन था आपका बैकवर्ड क्लासेस कमीशन कमीशन था आपका माइनॉरिटी माइनॉरिटी कमीशन था आपका वमेन कमीशन था तो जब हम इक्वल ओपोरर्चुनिटी कमीशन यानी कि एक जगह पर हम सबको एक नजर से देखकर और हर एक को उसका उसका हक देने की बात कर रहे थे। तो हर एक ने यह कहा कि नहीं आप यह सब करेंगे तो आप हमारा कम होगा। हमारा हमारा काम कम हो जाएगा। जैसे ओबीसी के और हम जो आज कर सकते हैं वो हम और जो हम करते रहे हैं वो हम नहीं कर पाएंगे। इसलिए हम इसकी मुखालारफत करते हैं। हालांकि हमने ये कहा था कि हर कमीशन की नुमाइंदगी इक्वल ओपोरर्चुनिटीज कमीशन में होगी। और इक्वल ओपोरर्चुनिटी कमीशन जो है वो पूरा लार्जर पिक्चर को देख पाएगा। आप जो है वो सिर्फ अपनी कम्युनिटी के ताल्लुक से उस पिक्चर को देखते हैं। लेकिन आप इंटीग्रल विज़न नहीं देख पा रहे। इंटीग्रल विज़न नहीं है आपके। लेकिन इस चीज के लिए लोग तैयार नहीं थे। इसका बड़ा रेजिस्टेंस था और हम इक्वल ओपोरर्चुनिटी कमीशन नहीं कर पाए। इसी वजह से हम इक्वल ओपोरर्चुनिटी कमीशन नहीं कर पाए। हम जो चीजें हम कर पाए थे वो ये था कि जो माइनॉरिटी कंसंट्रेटेड डिस्ट्रिक्ट थी उसमें हमने स्पेशल स्कीम्स लागू की थी और माइनॉरिटी कंसंट्रेशन डिस्ट्रिक्ट का जो स्पेशल स्कीम्स थी वो सिर्फ माइनॉरिटी के लिए नहीं थी वो माइनॉरिटी एरिया में वो स्कीम्स थी जिसका फायदा सब लोग उठा सकते थे और हमारा जो कांसेप्ट था वो ये कांसेप्ट था कि जब आपके गांव में आपकी वजह से एक स्कूल बनेगा तो वो स्कूल सिर्फ आपके लोगों के लिए नहीं होगा बल्कि सबके लिए होगा और आपको यह कहने का हक होगा कि हम अक्सर आप लोगों से मेजॉरिटी से मांगते हैं कि कुछ हमको दिलवाइए हमको रिजर्वेशन दिलवाइए हमको कुछ हक दिलवाइए अब हम पहली दफा आपको कुछ दिलवा रहे हैं कि हमारी वजह से यहां स्कूल आया हमारी वजह से यहां सड़क आई हमारे यहां वजह से शादी घर आया हमारी वजह से यहां कॉलेज आया और आपको इसमें इसमें शरीक होने का एक मौका हम दे रहे हैं। तो यह एक मॉडर्न कांसेप्ट था कि किस तरह से इंटीग्रेशन ऑफ सोसाइटी होगी और किस तरह से यह माना जाएगा कि आप सिर्फ बर्डन नहीं है। आपकी वजह से आप दूसरों को एक फैसिलिटी दिलवा रहे हैं। लेकिन फेडरल स्ट्रक्चर है। इस चीज को आप यहां से दिल्ली से बैठकर कर नहीं सकते। बहुत कोशिश करी कि किसी तरह से हम कर पाए। हम उम्मीद कर रहे थे कि सरकारें होंगी और वो डिलीवर कर पाएंगे। तो बॉटम लाइन तो यही था कि वो डिलीवरी जो थी वो स्टेट गवर्नमेंट की होनी थी। तो हम यहां से स्कीम बनाते थे। हम पैसा दे सकते थे बट वो बॉटम लाइन वही होनी थी। जो मोस्ट सक्सेसफुल था वो स्कॉलरशिप स्कीम थी। लेकिन स्कॉलरशिप स्कीम जो थी वो वो टारगेटेड थी। वो माइनॉरिटी के बच्चों के लिए मुस्लिम बच्चों के लिए थी जो स्कॉलरशिप स्कीम थी और सीधा ट्रांसफर उनके पेरेंट्स के अकाउंट्स में होता था। उन बच्चों को सीधा-सीधा जाता था। वो सबसे ज्यादा सक्सेसफुल थी। डिमांड बेच थी और उसका डिमांड यकीनन साल हर साल बढ़ता चला जा रहा था। उसी को सबसे पहले इन लोगों ने खत्म किया इनके आने के बाद और हमको शिकायतें इस बात की मिलती थी कि हम डिमांड मीट नहीं कर पा रहे हैं। हम डिमांड मीट नहीं कर पा रहे हैं और आज जीरो कर दिया गया है और कोई शिकायत नहीं करता है। मुझसे रोज बैठ के शिकायतें होती थी कि आपने डिमांड को कम किया है। आपने डिमांड को मीट नहीं किया है। तो ये ये सारी बहुत सारी बहुत सारी बातें थी। हम्। वह एक अह बहुत अह बहुत विज़नरी एक डॉक्यूमेंट था सर्च कमेटी का। विज़नरी डॉक्यूमेंट था। और वह इस हिंदुस्तान के हालात को पूरी तरह से बदल सकता था। लेकिन, इन लोगों ने प्रोपेगेंडा यह किया कि यह तो सारा मुसलमानों के लिए है, यह तो सिर्फ़ एक कम्युनिटी के लिए है। और उसमें डॉक्टर डॉक्टर साहब का एक स्टेटमेंट था। जिसको तोड़ मरोड़ के पेश किया। जब उन्होंने कहा कि फर्स्ट राइट इज फॉर द मुस्लिम्स ऑफ़ आवर कंट्री। तो जब उन्होंने इस चीज को कहा वो एम्फेसाइज करने के लिए उसको खासतौर पर फ्लैग करने के लिए कहा था। जिस तरह से यूनाइटेड नेशंस में बातें कही जाती हैं। लेकिन उसको तोड़ मरोड़ के 2014 में भी वो स्पीच में इस्तेमाल करते हैं। करते रहते हैं। वो आज तक इस्तेमाल करते रहते हैं। वो बड़ी बदनसीबी है हम लोगों की। मुझे याद है कि 2011 में हमारे वालिद साहब ने एक पेपर मुस्लिम विज़न ऑफ़ सेकुलर इंडिया डेस्टिनेशन एंड रोड। मैं बहुत छोटा था। हम हम बट एज 17 18 साल का लड़का जो यह देख रहा है कि मुस्लिम एंबिशन अपने उरूज पे है क्या आपकी एक्सपेक्टेशन में दूर-दूर तक कहीं था के जो हिंदुत्व की जो पॉलिटिक्स है या जो बीजेपी की पॉलिटिक्स है या फिर जो कांग्रेस है क्या वो डाउनफॉल की तरफ इतना जा रही है कि वो इतनी सिकुड़ जाएगी और यह पॉलिटिक्स इतनी राइज हो जाएगी नहीं हमारे ज़हन में ये बात नहीं थी देखिए मसला क्या था कि आप याद फरमाएं कि उस वक्त हम पे अटैक्स सिर्फ बीजेपी से नहीं आ रहे थे। हम पे अटैक्स बहुत सारे और सेक्शन सेक्शन से आ रहे थे जो ये वाज़ नहीं करते थे कि उनका कोई राइट विंग एजेंडा है। जैसे आम आदमी पार्टी ने जो [नाक से की जाने वाली आवाज़] आम आदमी पार्टी मूवमेंट जो अन्ना जो मूवमेंट हुआ वो जो सुप्रीम कोर्ट में ये लोग गए टेलीकॉम को लेके गए कोल के जो एलोकेशन उनको लेके गए कोल गेट लेके गए टेलीगेट ले लेके जो गए तो उसने हमको हमको हमारा जो पूरा कंसंट्रेशन और अटेंशन था उन चीजों पे था हम उन चीजों पे था तो हमको अंदाजा ही नहीं हुआ कि नीचे नीचे नीचे नीचे नीचे जो ये नफरत का एक वो सैलाब है वो धीरे-धीरे बढ़ रहा है और वो हमको डुबो देगा। क्योंकि हम कंसंट्रेट कर रहे थे उन चीजों पर जो उस समय उस वक्त लगती थी कि वो बहुत क्रिटिकल है हमारे लिए क्योंकि हमारे किसी शख्स को जेल में डाल दिया जाएगा। किसी को अपनी मिनिस्ट्री छोड़ने छोड़ छोड़ने पे मजबूर किया गया। प्राइम मिनिस्टर कहीं रिजाइन ना कर दें। प्राइम मिनिस्टर बहुत तकलीफ में रहते थे। बिकॉज़ जाहिर है बहुत नेक आदमी थे, बहुत अच्छे आदमी थे और उनको इन सब चीजों का सामना करना पड़ा। एक बड़ा होस्टाइल सुप्रीम कोर्ट था उस वक्त। बहुत होस्टाइल सुप्रीम कोर्ट था। हर तरकीब हमने लगा ली। हमने प्रेसिडेंट प्रेसिडेंशियल रेफरेंस कराने की कोशिश कर ली। सब कुछ करा लिया। और आप यह देखिए कि जो कुछ सुप्रीम कोर्ट ने और कोर्ट्स ने किया उस वक्त उसमें आज एक शख्स को भी सजा नहीं मिली है। एक शख्स को भी सजा नहीं मिली है। 10 साल हो गए, 20 साल हो गए। एक शख्स को सजा नहीं मिली और उस वक्त ऐसा लगता था कि पूरा एक कालक हमारे मुंह पर मुंह पर मल दी गई है। तो वो जो हमारी जितनी हमारी एनर्जी थी वो सैप कंप्लीटली स्वैप हो गई थी और जो लड़ाई का हमने कुत हमने लड़ाई की थी वो तकरीबन खत्म हो गई थी और जाहिर है सारी इन फर्सेस ने कंबाइन करके हमको हरा दिया। आपने अन्ना मूवमेंट आम आदमी पार्टी का जिक्र किया। बहुत ब्रीफली पासिंग नोट कॉकरोच जनता पार्टी का एक पूरा एक वो चल रहा है। हाउ डू यू से इट? आई थिंक देखिए वो हर चीज रिपीट करना मुमकिन नहीं होता है। ये लोग ये लोग वो जो उस कामयाबी को एक दफा फिर से एक नई तस्वीर नई शक्ल देकर उसको करने की कोशिश कर रहे हैं। वो होगा नहीं। ऐसा होगा नहीं। कोई मूवमेंट निकलनी चाहिए। अब ये लोग सब समझते हैं कि बांग्लादेश में और और श्रीलंका में और नेपाल में जो मूवमेंट्स आ गई और जनरल जी की मूवमेंट्स आ जेंड जी की मूवमेंट्स आने की वजह से उन्होंने कर लिया। मैं नहीं समझता हूं कि यहां ऐसा मुमकिन है। लेकिन जो हुआ था उस वक्त हमारे खिलाफ हुआ था। उसमें कौन-कौन इन्वॉल्व था वो उसके कोई तफसील कभी कोई लिखेगा तब पता चल पाएगा कि उसमें कहीं ना कहीं आरएसएस का और बीजेपी का हाथ था। वो आगे नहीं थे। लेकिन कहीं ना कहीं वो पीछे जरूर बाबा रामदेव बाबा रामदेव तो एक्टिव थे तो अब उन्होंने उन्होंने हमारी एनर्जी को ऐसी सैप कर दिया था कि जब लड़ाई में हम उतरे तो हम इतने कमजोर हो चुके थे कि लड़ाई में हमको कुछ मिलना नहीं था। अगेन 2007 से 2014 का जो मोमेंटम डिस्पाइट द फैक्ट के फ्रॉम दी स्टेट पर्सपेक्टिव कांग्रेस वो थी लेकिन मुस्लिम सिविल सोसाइटी शायद इमर्ज हो रही थी। ये जो 2014 में हुआ आपको क्या एक्सपेक्टेशन थी कि कम्युनिटी कहां मूव कर रही है विद द कॉम्बिनेशन ऑफ सिविल सोसाइटी एडवोकेसी एंड पॉलिटिकल विल कहां जा सकता था मामला और 2014 में व्हाट काइंड ऑफ रप्चर डिड इट ब्रिंग देखिए कम्युनिटी की अगर आप बात करें तो कम्युनिटी तो जाहिर है अपने समझ से कोशिश में थी कि हम एक अल्टरनेटिव माहौल बना सकें अल्टरनेटिव सिस्टम बना सकें कोई किसी किसी के पीछे था। कोई किसी के पीछे था और बिहार में उत्तर प्रदेश में जहां से मेजर सीट्स आती हैं वो लोग एक अल्टरनेटिव उनके ज़हन में क्या अल्टरनेटिव था मैं नहीं कह सकता हूं। लेकिन उनके ज़हन में एक अल्टरनेटिव था अल्टरनेटिव टू द कांग्रेस और कांग्रेस की जितनी उन्होंने 10 साल की शिकायतें थी वो इकट्ठा कर ली थी। और यह कहा था कि यह कुछ भी हो नॉट कांग्रेस वी हैव टू फाइंड इन अल्टरनेटिव। वो अल्टरनेटिव उनके पास था नहीं। वो बन नहीं सकता था वो ना बना। अनफॉर्चूनेटली वो ना बना। अब क्या है? अब अक्सर लोग ये कहने लगे हैं बंगाल में कि भाई अब तो कांग्रेस के साथ ही चलो। हम अब हम ये नहीं चाहते हैं कि बिल्कुल मायूस होकर और कोई रास्ता ना दिखे तो वो कांग्रेस के साथ आए। कांग्रेस के साथ गुफ्तगू करें। कांग्रेस के साथ मुलाकात करें। कांग्रेस को समझाने की कोशिश करें। कांग्रेस से कुछ तवकात अपनी सामने रखकर और कांग्रेस को एक रास्ते पर चलाने की कोशिश करें और जिसमें उनका भी मेजर कंट्रीब्यूशन हो और मेजर कंट्रीब्यूशन के साथ-साथ एक कमिटमेंट ये हो कि हम कांग्रेस को फिर से वापस लाएंगे इख्तेदार में। नाउ वी हैव कम टू द लास्ट लेग जिसमें आपने ऑलरेडी शुरुआत कर दी है। वे फॉरवर्ड। बट वे फॉरवर्ड के लिए एक विंडो चाहिए। आपने बोला कम्युनिकेशन अक्सर जब क्योंकि हम भी स्टूडेंट एक्टिविज्म और ये सारी चीजें देखी और हम भी तीन चार साल से इसमें एंगेज्ड हैं। लास्ट मुझे याद है कि जब भारत जोड़ो यात्रा हो रही थी उस टाइम पे आई पर्सनली थॉट में हम लोग ऐसे ही अपने एक ऑफिस में बैठे हुए थे पुराने वाले और सब लोग बैठे हुए थे। तो मेरा ये था कि भ राहुल गांधी विल बिकम दी सेकंड मोस्टेंट लीडर इन इंडिया बिकॉज़ ऑफ़ द थिंग्स दैट वर हैपनिंग। उसके बाद में कुछ टाइम फिर मुझे क्रिटिसिज्म हुआ कि भ जो भारत जोड़ो का मोमेंटम था अब उसमें आपके वर्जनंस हो सकते हैं मेरे वर्जनंस हो सकते हैं बहुत सारी चीजें लेकिन ब्रॉडली स्पीकिंग एक पॉजिटिव मूवमेंट हो रहा है ब्रॉडली ब्रॉडली स्पीकिंग उसमें बहुत सारे अभी भी जिसे कहते हैं गैप्स हैं लेकिन एक जो रियलाइजेशन उस टाइम पे था कि भ हाउ कैन वी कम्युनिकेट वो कम्युनिकेशन का उस टाइम पे शायद पोटेंशियल था आज मुझे ऐसा महसूस होता है शायद गेट्स फिर बंद हो गए हैं कि इज देयर अ प्रॉपर कम्युनिकेशन चैनल वेयर इन द कम्युनिटी जो आप बोल रहे हैं कि अब हो सकता है हमारी अपनी वजह हो। कई बार ऐसा होता है कि यू नेवर रीच आउट एंड देन यू मेक अ क्लेम हम बट मैकेनिज्म क्या होगा कि आज अगर वे फॉरवर्ड है तो द कम्युनिटी या सिर्फ ये मुसलमानों की बात नहीं है। जब बात हो रही है कि भ एक नई डील होनी चाहिए तो रीजनल पार्टीज से भी होगा। वो दलितों से भी होगा, ओबीसीज के भी मुख्तलिफ हो। वो अक्रॉस द बोर्ड एक नया काइंड ऑफ़ इमेजिनेशन वेयर इज द मुस्लिम इन दैट इमेजिनेशन एज मुस्लिम नॉट एज के आई अंडरस्टैंड आई अंडरस्टैंड मुस्लिम उस इमेजिनेशन में कहां है एक एक एहसास तो इस बात का है और सबको है। सिर्फ लीडर्स की बात नहीं कर रहा हूं। सबको एहसास इस बात का है कि लोग अपना-अपना इलेक्शन जीतने के लिए अपने-अपने कॉन्स्टिट्यूएंसी में जो भी काम करते हैं हर जगह मुस्लिम्स का कंट्रीब्यूशन है। मुस्लिम्स की मौजूदगी है। तो इस बात इस बात को लोग इस बात का एक पर इकरार करते हैं कि हमको मुस्लिम वोट चाहिए। हमको मुस्लिम की हिमायत चाहिए। उनकी हमदर्दी चाहिए और ये भी मानते हैं कि हम एक तरफ़ा हमदर्दी और हिमायत नहीं ले सकते हैं। इट हैज़ टू बी अ कम्युनिकेशन के गिव एंड टेक होता है किसी भी कम्युनिटी के साथ गिव एंड टेक होता है। लेकिन इस वक्त स्पेसिफिकली क्या चाहते हैं मुस्लिम्स वो मुस्लिम्स कम्युनिकेट करें। सबसे बड़ा मसला क्या है मुस्लिम मुस्लिम्स का? ये मसला है कि बहुत आसानी से मुस्लिम्स किसी को एक्सेप्ट नहीं करते हैं एज अ लीडर। और जो आपका लीडर अपने आप को नॉमिनेट करता है तो वो आपकी बात को ना अच्छी तरह जानता है ना अच्छी तरह उसका बयान कर पाता है। तो जो आप कम्युनिकेशन गैप की बात कर रहे हो द कम्युनिकेशन गैप इज देयर। हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि हम लोग माइनॉरिटीज डिपार्टमेंट के ताल्लुक से हम लोग कोशिश कर रहे हैं। जो हमने माइनॉरिटीज के लीडर्स को राज्यसभा में लिया है। जिनको हमने पार्टी में मौका दिया है। हम उनसे उनके थ्रू कोशिश कर रहे हैं कि आउटरीच करें। लेकिन आसान नहीं है। आसान नहीं है। इसलिए कि अपने-अपने लिमिटेड कॉन्टेक्स्ट में लोग किसी को बुला लें और बैठा लें और उनसे बात कर लें। तस्वीरें खिंचवा लें वो काम नहीं चलेगा। राहुल गांधी ने दो-तीन दफा कोशिश की है कि डिफरेंट-डिफरेंट पिक्स मुस्लिम्स के बीच में से दानिश्वरों को बुलाएं, सोशल एक्टिविस्ट को बुलाएं, मीडिया मैनेजर्स को बुलाएं और स्कॉलर्स को बुलाएं और उनके साथ तफसीली गुफ्तगू करें और उनसे पूछे कि वो लोग क्या चाहते हैं, कैसे चाहते हैं एक्सट्रा। तो ये जो बातें होती हैं वो शुरुआत में वो बातें जो है बहुत खुलकर नहीं हो पाती। या तो कोई होस्टाइल आदमी आके उसको खराब करता है या फिर जो ज्यादा हमदर्द होते हैं वो बड़ा लिहाज करते हैं और बहुत तकल्लुस से अपनी बात कहते हैं। तो वो हो नहीं पाता। इट हैज़ टू बी डन कंसिस्टेंटली। और मेरे ख्याल से उनका यह इरादा है कि वो इसको कंसिस्टेंटली करेंगे। लोगों के ताल्लुक से करेंगे। लोगों को इन्वॉल्व करके करेंगे। बट वी हैव टू फाइंड कम्युनिकेशंस के लेवल्स हमको ढूंढने पड़े। आप लोग क्या रोल प्ले कर सकते हैं कि ये जो कम्युनिकेशन है बिकॉज़ एट द एंड ऑफ़ द डे एनी लीडर ऑफ अ बिग ऑर्गेनाइजेशन हैज़ यू नो सो मेनी। देखिए हम लोग हम लोग क्या कर सकते हैं? हम लोग चैनल बन सकते हैं कि जो लोग ये कह रहे हैं कि भाई हम कैसे बात करें? हमारा पैगाम नहीं पहुंचता है। हमारा मैसेज नहीं पहुंचता है। तो हम लोग चैनल बन सकते हैं। हम लोग यह कर सकते हैं कि भाई वन वक्त आपको बुलवा के मिलवा के बैठा के लोगों से राब्ता करा के एक्सट्रा आपको मिलवाएं। अब जैसे बंगाल से लोग आने शुरू हुए हैं। हम खुद ब खुद लोग फोन करते हैं और कहते हैं कि जरा हम आपसे मिलने आइए प्लीज आइए मिलिए। तो साहब हम वहां थे। हम टीएमसी के साथ थे। लेकिन अब टीएमसी से लोग बड़े मायूस है। अब यह सोच रहे हैं कि बीजेपी को यह रोक सकती थी लेकिन नहीं रोक पाई बीजेपी आ गई तो अब तो सिर्फ कांग्रेस ही लड़ पाएगी। तो फिर उनकी तवक्को यह होती है कि आप हमको जरा मिलवाइए अपने लीडर्स से मिलवाइए। अब ये हमारी बदनसीबी है कि लीडर्स में एक वक्त था कि हम दो-चार लोगों से जैसे अहमद पटेल साहब थे और लोग थे उनसे मिलवाते थे। गुलाम नबी आजाद थे उनसे मिलवाते थे। अब क्या है कि वो बहुत सारे लोग वैसे रहे नहीं। नहीं तो आप सीधे-सीधे हर एक की तवकको होती है कि राहुल गांधी से मिलवाइए। वो बेचारे कितने लोगों से मिल सकते हैं? कहां-कहां मिल सकते हैं। लेकिन कोशिश है हम लोग तो वो जो नई जनरेशन की मुस्लिम लीडरशिप विद इन कांग्रेस होनी चाहिए। इसका मतलब वो लीडरशिप इमर्ज नहीं हो है नए नई जनरेशन के कुछ लोग इमर्ज हुए हैं लेकिन बहुत अभी अभी शायद इतने नुमाया नहीं है लेकिन हुए हैं नासिर हुसैन जैसे राज्यसभा में हैं वो हुए हैं अभी अभी रहमान साहब के साहबजादे अभी आए हैं अभी बेंगलुरु [गला साफ़ करने की आवाज़] से अभी बन के आए हैं राज्यसभा बन के आए हैं जावेद हैं वहां से उत्तर प्रदेश से पहले माइनॉरिटी के इंचार्ज थे वो हैं नए नए लोग इमर्ज कर रहे हैं खातून बहुत बहुत खवातीन हैं जो वो इमर्ज कर रही हैं। जयपुर से एक रूबी खान है। वो इमर्ज कर रही हैं। अह वहां से शमा है। वहां से क्या कहते हैं केरला से वो इमर्ज कर रही हैं। तो बहुत सारे लोग इमर्ज कर रहे हैं। लेकिन अभी वो शायद जैसे हम लोगों को मौका मिला था हुकूमत में आकर हुकूमत में काम करने का। वो उन बेचारों को अभी मौका मिला नहीं है। तो वो वक्त लगेगा। सो दैट दे बिकम मोर प्रोमिनेंट। कांग्रेस का वो गोल्डन एज गोल्डन एज तो हम लोग गोल्डन [हंसी] एज इंसान है तो इसलिए गोल्डन एज का फायदा उठा सकते हैं। आखिरी दो तीन सवाल थोड़ी देर पहले मैंने एहसान जाफरी का जिक्र किया था। एज अ मुस्लिम जब मैं देखता हूं के एक ऐसा बड़ा केस हुआ कि जिसमें कांग्रेस के बड़े लीडर और जखिया जाफरी का भी इंतकाल हुआ पिछले साल। और कांग्रेस अपने ही एक बड़े लीडर को ओन या फिर उसको डिफेंड या फिर उसको जस्टिस नहीं दिलवा पाए। ऐसा बजाहिर लोगों के सामने एक तरीके से इमेज है। तो जब उसको हम सामने रखते हैं तो हमें यह फील होता है कि क्या कांग्रेस अपनी मुस्लिम लीडरशिप को या दूसरी लीडरशिप को उतना ओन करेगी? उस उस वक्त में देखिए वो पूरा इस पर बहुत तफसील से कोई आदमी अपनी बात रखे कि गुजरात का हमने कैसे हैंडल किया और गुजरात में जो हुआ कांग्रेस ने बहुत एक्टिवली उसमें प्रोटेस्ट मूवमेंट में हिस्सा लिया था। लेकिन क्यों हमारे हाथ से जो पूरा अकाउंटेबिलिटी का जो भी महाज था वह हमारे हाथ से निकल गया। बहुत अच्छे ऑफिसर्स को अपॉइंट किया गया था एसआईटी में। बहुत अच्छे-अच्छे ऑफिसर्स थे। कार्तिकेयन वगैरह बहुत अच्छे ऑफिसर्स थे। लेकिन क्यों वो अंजाम तक नहीं पहुंच पाए कुछ समझ में नहीं आता है। वो जनरली एक एटमॉस्फियर कितना कितना बिगड़ चुका था कि हम जहांजहां इंटरवीन करना चाहते थे और इससे पहले कि हम कुछ कर पाएं। आप जानते हैं कि हमने नया कानून बनाने की कोशिश करी थी। जहां पर कम्युनल वायलेंस होता है उसके लिए नया कानून बनाने की कोशिश की थी उन लोगों ने। उसको नहीं होने दिया था। उस पर रुकावट डाल दी थी। तो अब हिस्ट्री तय करेगी कि हम लोग कुछ और कर सकते थे कि नहीं कर सकते थे। लेकिन वो एक वेव थी, एक वेव थी ऑफ ऑफ ऑफ हॉस्टिलिटी जिस जिसने हम सबको डुबो दिया और जिन लोगों का वहां नुकसान हुआ यकीनन बहुत नुकसान हुआ उसका अफसोस है लेकिन यहां पे जो लोग इख्तेदार में थे उनको भी कंप्लीटली डुबो दिया और मैं समझता हूं कि वो लोग जो लोग भी इख्तेदार में रहे और जो भी डायरेक्टली इनवॉल्व थे वो कभी-कभी इस बात पर लिखेंगे कुछ करेंगे बता बताएंगे तो उससे कुछ बात समझ में आएगी कि आखिर हुआ तो क्या हुआ वेव तो बल्कि और हॉस्टेलिटी की बढ़ी ही है। बढ़ती चली गई। वहीं से शुरू हुई थी। जो सुनामी थी वो वहीं से शुरू हुई थी और वो बढ़ती चली गई। दो दफा हमको ऐसा लगा कि हम वहीं गुजरात में उस वेव को रोक सकते हैं। दो दफा ऐसा लगा। क्योंकि गुजरात में जो गुजरात में उत्तर प्रदेश का और बिहार जैसा मसला नहीं था। गुजरात में 10% का ही फर्क था। 10% वोट का फर्क था। 40 उनको मिलते थे, 30 हमको मिलते थे। 10% का सिर्फ फर्क था और अगर उसका 5% पलटता तो हम गुजरात में उनको हरा सकते थे। दो दफा ऐसा लगा कि हम उनको हरा सकते हैं और हराने के कगार पर हैं। लेकिन फिर वो नहीं हो पाया। आखिरी दो सवाल छोटे-छोटे। एक तो ये कि राहुल गांधी ने मुझे लगता है शायद बिहार या उससे पहले एक बयान में बोला कि जिसकी जितनी आबादी उसकी उतना हक और वो टिकट भागीदारी भागीदारी लेकिन जब वो टिकट डिस्ट्रीब्यूशन की बात आती है कांग्रेस के विदिन और उसके ऊपर बहुत तफ्सीली एनालिसिस बहुत लोगों ने किया है राइट अप्स हैं वो वहां रिफ्लेक्ट नहीं करता वहां पे पॉलिटिकल स्ट्रेटजी डोमिनेट कर जाती है तो वो जो रेडिकल पॉलिटिक्स फ्रॉम अ पॉजिटिव रेडिकल का वर्ड जो पॉजिटिवली अगर इस्तेमाल करें कि जैसे गांधी रेडिकल पॉलिटिशियन थे नेहरू रेडिकल पॉलिटिशियन थे के वो स्टैंड्स कि अगर लेना है प्रो मुस्लिम प्रो फेक प्रो एनी लेना है। देखिए राहुल गांधी तो मैं कह रहा हूं अगर कोई पार्टी में इस बात पर पाबंद है तो राहुल गांधी हैं और तो इसका मतलब पार्टी अपने आप में एक बहुत कॉम्प्लेक्स एंटिटी है। कॉम्प्लेक्स एंटिटी है और वो इस बात को समझते हैं कि कॉम्प्लेक्स एंटिटी है। तो उनके कई टारगेट्स हैं। उनका एक टारगेट है पार्टी को पार्टी को नौजवानों के हाथ पे सौंपना। कुछ हद तक उसमें वो कामयाब हुए हैं और उनका यह भी एक टारगेट है कि हम पार्टी को डेमोक्रेटाइज करें और पार्टी में वही जो आपने बात कही कि उन लोगों को रिप्रेजेंटेशन पूरी तरह से दे सके। कोशिश में वह लगे हैं। यकीनन मुस्तकिल वो इस कोशिश में लगे हैं। लेकिन मैं समझता हूं वो भी इस बात को अक्सर कहते हैं कि एक कॉम्प्लेक्स पार्टी है। आसान नहीं है। और उसने कितने कितने-कितने बैलेंसिंग उनको वो करने पड़ते हैं। एक्ट्स उनको करने पड़ते हैं। ये उन्हीं को उसका अंदाजा है। सच्ची बात है। बट ही इज़ ट्राइंग। आपका अपना पर्सपेक्टिव क्या है कि इंडिया का जो फ्यूचर है आगे वो क्या होने वाला है और उसमें आपका आपकी पार्टी का और बाकी जो लोग क्या करने की जरूरत है? जी हां मैं मैं समझता हूं कि 29 जो है वो एक टर्निंग पॉइंट होगा हमारे मुल्क के लिए। क्योंकि अगर 29 में हम इन लोगों को नहीं रोक पाए तो फिर बहुत अरसे तक हमें [नाक से की जाने वाली आवाज़] झेलना पड़ेगा इनको और ये क्या-क्या ना कर दें और उसके बाद उस चीज को रिवर्स करने में और कितने साल लग जाए तब मौका मिलेगा उसका कहना मुश्किल है। 29 बड़ा क्रिटिकल ईयर है और जो इस वक्त इंडिया अलायंस को एक मौका मिला है कि 29 में अगर हम इसको रिवर्स कर दें देखिए इनके इंटरनल डिफरेंसेस और क्रैक्स इनकी इनके सेटअप में आ रहे हैं। यूपी और दिल्ली को देख तो दिल्ली में ये जब ये सब जो हो रहा है ना जो अयोध्या का जो पैसे कीप्शन चोरी का और करप्शन का मसला है और जो जमीनों की बातें आ रही हैं। ये सब बाहर से नहीं आ रही है। ये सब अंदर से आ रहे हैं। इन्हीं की पार्टी के लोग उसको निकाल रहे हैं, दिखा रहे हैं। एक्सट्रा तो ये एक क्रैकअप इनकी पार्टी में आ सकता है। उसका हम क्या फायदा उठा सकते हैं वो वक्त बताएगा। लेकिन उससे हटकर हमको अपनी यजहती और अपनी यूनिटी को हम अच्छी तरह से किस तरह से प्रोजेक्ट कर सकते हैं 29 में। वह बड़ा क्रिटिकल है और अगर 29 में उसमें हम कामयाब हो जाते हैं तो मैं यह समझूंगा कि हमारे मुल्क के जो सेकुलर किरदार है उसको एक नई जान मिल जाएगी और अगर नहीं कर पाते हैं तो फिर गॉड नोस कि क्या होगा? एंड व्हाट विल बी द रोल ऑफ़ मुस्लिम्स? मुस्लिम्स को गौर करना चाहिए, सोचना चाहिए, सोचना चाहिए कि मुस्लिम क्या कर सकते हैं? देखिए मुस्लिम्स हैव टू मुस्लिम्स हैव टू टॉक टू द सेकुलर पार्टीज। अब जैसे सेकुलर पार्टीज की बात यूपी की करिए। यूपी में कहते ये लोग हैं कि इस वक्त अगर हम अलायंस ना करें यूपी में तो कुछ भी मुमकिन नहीं है। अलायंस करना जो है वो जरूरी है। वो लाजमी है। एसेंशियल है। लेकिन अलायंस जिस तरह तरह के अलायंस होते रहे हैं उस अलायंस से पार्टी की जो स्पिरिट है वो टूट जाती है। और हम यह जानते हैं हम यह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में एक सीनियर पार्टनर है। समाजवादी पार्टी है या बसपा है जब भी वह हमारे साथ लड़े हैं तो वो एक सीनियर पार्टनर पार्टनर बनके लड़े। लेकिन हमारा जो वर्कर है वो सिर्फ ये चाहता है कि थोड़ी सी इज्जत हमको मिले। इलेक्शन के वक्त और इलेक्शन के बाद थोड़ा सा हमको कुछ समझ लीजिए। हमारी भी कुछ औकात है। हमारी हमारा भी कुछ वजूद है। उसका थोड़ा लिहाज कर लीजिए और एक अच्छा अलायंस हो। तो अगर समझदारी का हो और और इज्जत से अलायंस हो तो बहुत इमकानात है। बहुत कुछ मुमकिन है उत्तर प्रदेश में। लेकिन ये आसान नहीं है। कहना आसान है। करना बहुत मुश्किल है। अब इसमें कौन इसमें शरीक होकर और कौन इसको कराता है वो वक्त बताएगा। बहुत शुक्रिया सलमान खुर्शीद साहब। आपने वक्त दिया। अ कमिटमेंट आपका वक्त का कम था लेकिन उसके बावजूद आपने एक लंबा डिस्कशन किया है। बहुत शुक्रिया और होपफुली हिंदुस्तान में जो चीजें हुई हैं और हो रही हैं वो हम लोग रीशेप कर सकें। उसमें एक पॉजिटिव रोल अदा कर सकें और स्पेशली जो आपने जिस चीज पे तवज्जो दी कि सिर्फ ये जरूरत नहीं है कि आप कौन हैं। एक प्लूरल सोसाइटी में ये समझने की भी जरूरत है कि सोसाइटी क्या है? उससे क्या वोकैबरी होगी उसके बावजूद उसके प्रिंसिपल्स यूनिवर्सल होने चाहिए। वो ऐसा नहीं होना चाहिए कि भ आप आगे कुछ बोल रहे हैं पीछे कुछ बोल रहे हैं। तो वो जो कॉन्टेक्सुअलिटी है वो यूनिवर्सलिटी से ही डिराइव होनी है। तो हिंदुस्तान के मुसलमानों का और बल्कि हिंदुस्तान में जितनी भी कम्युनिटीज हैं मुझे लगता है इस वक्त वो एक चैलेंजिंग टाइम से गुजर रही हैं। जहां उनको अपनी पिटिकल फिलॉसोफी को रिविजिट करना पड़ेगा। और वहीं से फिर जो आपने बोला इंडिया अलायंस और यह सारी चीज़ तो यह किसी एक आदमी से नहीं हो सकता। वी नीड अ वॉच सबको मिलकर ही करना होगा। बहुत वाइडर मोबिलाइजेशन की जरूरत है। बहुत शुक्रिया आपने टाइम दिया। इंशा्लाह बहुत शुक्रिया बहुत शुक्रिया।
Companion article
Salman Khurshid has occupied some of the Indian cabinet's most consequential portfolios — External Affairs, Law, Minority Affairs, Commerce — making him, by his own account, one of a shrinking number of Muslims to have held such offices since the generation of Maulana Azad and Zakir Hussain, his maternal grandfather and India's third president. Now president of the India International Islamic Cultural Centre and a practising Supreme Court lawyer, Khurshid used a wide-ranging Nous Podcast conversation to work through what he called the country's "basic crisis": not a crisis of Muslims alone, but of democracy itself, one that will eventually be recognised, in his words, as being "against everyone."
Khurshid opened by rejecting the framing, now commonplace in Indian public discourse, that constitutional protections for minorities amount to special favours. Democratic structures, he argued, exist to compensate a numerical minority for the simple fact that it cannot project its voice as forcefully as a majority can. "It is not appeasement, it is compensation," he said, adding that the charge of appeasement is routinely fused with the demand that minorities not be "different" — a demand he traced back to the discredited claim that concern for minority rights caused Partition. He called this line of attack "propaganda," but was equally critical of how secular parties respond to it: largely by falling silent, calculating that engagement invites harsher attacks. That silence, he said, is itself corrosive, because a live democratic discourse — the willingness to answer bad arguments rather than concede them by omission — is what keeps democracy's core alive even as its edges fray.
The conversation's most technical stretch concerned the 2019 Supreme Court verdict on the Ayodhya title dispute, and how it has since been invoked — Khurshid argues wrongly — to justify a wave of new claims against mosques including the Gyanvapi complex, the Kamal Maula Masjid in Dhar, and the Shahi Jama Masjid in Sambhal.
Khurshid, who argued the Kamal Maula Masjid case, insisted the Ayodhya judgment was not the sweeping reversal it is now treated as. It was a title suit — a dispute over ownership of land — in which the court found that the outer platform, the Ram Chabutra, had long been in Hindu possession and use, a fact Muslim litigants themselves conceded, while the inner structure had remained under Muslim possession and control until it was demolished in 1992. The court, Khurshid said, effectively acknowledged the injustice: "It said you have been wronged," he noted, but concluded that because the structure itself no longer existed, restoring it was impractical, and instead awarded five acres of alternate land under Article 142's power to do "complete justice." Muslim litigants declined the offered land near the disputed site — a decision Khurshid, with the benefit of hindsight, called a missed opportunity to create "a template of Indian secularism" in which a mosque and temple would have stood facing each other in Ayodhya.
His central argument was that the newer cases are being wrongly treated as extensions of that precedent. The Kamal Maula Masjid dispute, he stressed, was never filed as a title suit — it was a writ petition challenging permissions granted by the Archaeological Survey of India — precisely because, unlike Ayodhya's demolished structure, worship was still ongoing there at the time of the case, which would have made a title suit favourable to the mosque. "This is not a clear-cut reversal," he said of how commentators invoke Ayodhya to justify the newer claims; the two legal postures, title suit and writ petition, are fundamentally different instruments, and applying the logic of one to the other, in his view, is precisely how "a new generation of judges" ends up reinterpreting old laws to reach conclusions the laws' framers never intended — a dynamic he also traced through the Aligarh Muslim University minority-status case and India's anti-terror laws (UAPA, PMLA), which he noted were originally drafted by his own Congress colleague P. Chidambaram to fight terrorism and economic crime, not, as he put it, "to teach people a lesson."
Khurshid situated the current wave of mosque litigation against the 1991 Places of Worship Act, which he described as a deliberate line drawn by Parliament: whatever happened before 15 August 1947 would be set aside, and no further alterations to the religious character of any place of worship would be permitted going forward. That settlement, he argued, is now being unpicked case by case, with each new judgment justified as restoring an arrangement supposedly six or seven hundred years old — even though the reversal itself is being carried out today, under a democratic mandate, not medieval fiat. "How far back will we go?" he asked, framing this as a question for the whole country, not just Muslims, since the 1950 Constitution's explicit intent was to look forward rather than relitigate the past indefinitely.
Pressed on the philosophical tension between secular law and religious personal law — an argument frequently deployed around triple talaq, uniform civil code, and religious dress in public institutions — Khurshid rejected the premise that the two systems inherently clash. Personal law, he argued, is not external to India's secular framework but embedded within it, protected by the Constitution's own guarantees of the right to worship, to maintain one's institutions, and to preserve one's customs. Apparent conflicts, he said, usually dissolve on inspection: dietary practices around cattle sacrifice can be accommodated the same way religious processions already pause for each other's observances; loudspeakers and prayer timings are routinely adjusted through mutual courtesy rather than confrontation. Where genuine restriction is imposed — as with proposals to standardise hijab colour to match a uniform, a step he compared to existing accommodations for Sikh turbans — he sees no principled objection, but stressed that manufactured controversies, where no actual harm to a third party exists, should not be treated as constitutional crises. On triple talaq specifically, he offered an interpretive defence rarely heard in mainstream debate: because a divorce can be revoked during the iddat period after the first two pronouncements, the practice functions, in his reading, as a modern, low-cost alternative to decades-long court battles — a "do-it-yourself divorce" comparable to systems now emerging in the United States — undermined less by its own logic than by documented abuse.
Some of the interview's most pointed material concerned the legacy of the 2006 Sachar Committee report, prepared under the government of Manmohan Singh, in which Khurshid served as Minority Affairs Minister. He said the committee deliberately used the word "Muslim" rather than the euphemism "minority" — a choice he credited significantly to Singh's insistence that policy actually engage with Muslim socio-economic outcomes rather than talk around them — a full fourteen years, he pointedly noted, before critics began praising the Congress in 2026 for merely deciding to say the word again.
The committee's most ambitious proposal, an Equal Opportunity Commission that would have assessed disadvantage across all communities through a single, integrated structure, was never implemented — blocked, Khurshid said, by resistance from existing caste- and community-based commissions unwilling to cede their separate turf. What did succeed, he said, was a scholarship scheme paid directly into the bank accounts of Muslim students' families, whose demand grew every year it ran — and which was, he noted bitterly, the first thing "these people" zeroed out entirely after 2014, without a single public complaint reaching the volume of grievance the scheme itself used to generate over unmet demand. He also singled out a widely misquoted line from Manmohan Singh — that minorities, and Muslims specifically, should have "first claim on resources" — as a statement of emphasis in the spirit of international development language, deliberately stripped of context and repurposed by opponents as evidence of appeasement, a distortion he said continues in political speeches to this day.
Asked repeatedly to weigh Congress's own responsibility for the political conditions that produced Hindutva's rise — the reopening of the locked Babri Masjid site, the shilanyas ceremony, Rajiv Gandhi's promise of "Ram Rajya" — Khurshid conceded strategic mistakes had been made, while resisting the equivalence some critics draw between Congress and the BJP. His sharper point concerned honesty: he argued that Congress's failure to publicly own its errors, for fear of handing opponents a headline, has cost it more than the errors themselves, whereas the BJP's refusal to ever admit fault leaves it, in his telling, permanently unaccountable — even for the 1975 Emergency, which he noted was carried out within, not outside, the constitutional structure, an inconvenient legal fact he insisted still needs stating even while calling the Emergency's abuses indefensible.
Khurshid was most candid discussing the years leading up to the Congress-led UPA government's 2014 defeat, describing a coalition "drowned" by the 2G and coal-allocation scandals and an unusually adversarial Supreme Court, which he believes diverted attention and sapped the political energy Congress and Muslim civil society might otherwise have spent confronting the rising communal tide beneath the surface. He also brought up the unresolved case of Ehsan Jafri, the Congress leader killed in the 2002 Gujarat violence whose widow Zakia Jafri fought for accountability until her death last year — acknowledging that despite Congress's public opposition to the Gujarat riots, its own machinery failed to see the case through, a failure he attributed to a broader "wave of hostility" the party could not out-organise.
Khurshid was unambiguous that he considers 2029 an "extremely critical year" for India, one in which the opposition INDIA alliance either arrests the current trajectory or watches it entrench for a generation. He pointed to internal cracks already visible within the BJP-led coalition, particularly disputes over the Ayodhya trust's finances, as an opening. On rebuilding a Muslim political constituency, he argued the responsibility runs in both directions: Congress under Rahul Gandhi, whom Khurshid credited as the party figure "bound" by principled commitment to pluralism, has tried to create channels — bringing in younger Muslim leaders such as Nasir Hussain, and inviting scholars and activists for direct conversation — but communication remains difficult partly because, in his words, Muslims do not easily accept any single person as their representative. In Uttar Pradesh specifically, he said an alliance with the Samajwadi Party is "essential," but warned that Congress's own workers need visible respect within any such arrangement if it is to hold. His closing argument was that no single leader or party can carry this alone: what pluralistic communities across India need now, he said, is to revisit their own political philosophy, built on universal constitutional principles rather than shifting, contextual arguments — and to organise a "much wider mobilisation" than any one party can offer.
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
3:25:59What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
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