11:35Salman Khurshid on Gyanvapi and Babri I nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation.
In this thought-provoking conversation, senior Congress leader Salman Khurshid reflects on some of India's most complex political and constitutional debates. He discusses the relationship between secularism and personal law, questioning how philosophical and religious belief systems interact with…
मस्जिदों के साथ आप देख रहे हैं क्या होरहा है। आपने तो बाबरी और संभल और कमलमौला मास का जो जजमेंट है आपके हिसाब सेक्राइसिस कितना डीप है।हमने कानून बनाया था प्लेसेस ऑफ़ वरशिपएक्ट का कि हमने ये तय किया [संगीत] कि एककहीं ना कहीं लकीर खींच कर ये कहा जाए किइससे पहले जो कुछ हुआ है उसको अब भूलजाइए। [संगीत] इसके बाद अब कुछ नहीं होगा।जब ये लोग बोलते हैं कि भ हिंदुस्तान कामुसलमान सेकंड [संगीत] क्लास सिटीजन बनरहा है तो आपके हिसाब से कॉन्स्टिट्यूशनलीस्पीकिंग क्योंकि आपकी एक्सपर्टीज है।व्हाट डस दैट मीन?सवाल ये होता है कि इसका हम क्या जवाब देपा रहे हैं? मुझे अफसोस इस बात का [संगीत]है कि हम इसका जवाब नहीं दे पाते या तो हमचुप हो जाते हैं।लेकिन जो डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैं वोबड़े वाज़ हैं कि भ हमें यूनिफार्म सिविलकोर्ट की तरफ बढ़ना है। हमें या काऊसैक्रिफाइस [संगीत]या बहुत सारी ऐसी मुख्तलिफ चीजें हैं जोकहीं ना कहीं टेंपरामेंट सेट करती है किआपकी रीडिंग भी किस डायरेक्शन में हो।कोर्ट ने यह कहा कि आपको एक बेहतर जगह देदेते हैं।लेकिन यह मान के कहा कि ये आपका हक थायहां और आपके साथ हकतफी हुई है। ये कहा हैकोर्ट ने।सेकुलरिज्मया सेकुलरिटी [संगीत]और कोई भी पर्सनल लॉ या कोई आईडियोलॉजी जोअपने बिलीफ सिस्टम से आती है वोफिलोसोफिकली मेटाफिजिकली टकराएगा हीटकराएगा। [संगीत]नहीं टकराएगा। सेकुलर जो वो है निजाम हैवो वो पर्सनल लॉ निजाम से अलग नहीं है।पर्सनल लॉ सेकुलर निजाम का ही हिस्सा है।बट सवाल ये होता है कि जब बाबरी [संगीत]मस्जिद में कोई जजमेंट आता है तो ये बातहोती है कि एसेंशियलिटी क्या है? या इसकीरीडिंग कौन करेगा? हु विल डू द रीडिंग?दैट [संगीत] चेंजेस द गेम।सच कमेटी में सबसे पहले सबसे पहले हमनेमाइनॉरिटी से हटकर [संगीत] मुसलमान का नामरखा था सचड कमेट में। लेकिन जनरली जोसेकुलर पॉलिटिक्स या सोशलिस्ट [संगीत]पॉलिटिक्स हुई है चाहे वो रीजनल हो उसकाजो हैविएस्ट बर्डन है वो तो मुसलमानों कोसहना पड़ा है।गिव एंड टेक होता है किसी भी कम्युनिटी केसाथ गिव एंड टेक होता है। लेकिन इस वक्तस्पेसिफिकली क्या चाहते हैं मुस्लिम्स वोमुस्लिम्स कम्युनिकेट करें। जो इंडिया काडिस्कोर्स है, गांधियन डिस्कोर्स है यादूसरे डिस्कोर्स हैं पॉलिटिक्स एंड रिलीजनको बहुत सीरियसली के हाउ मच कैन इटइनफॉर्म द सोसाइटी क्योंकि यहां पेएंबेडेड है जब बात हो रही है कि भ एक[संगीत] नई डील होनी चाहिए वो रीजनलपार्टी से भी होगा वो दलितों से भी होगाओबीसी के भी वो अक्रॉस द बोर्ड एक नयाकाइंड ऑफ़ इमेजिनेशनवेयर [संगीत] इज द मुस्लिम इन दैटइमेजिनेशनएज मुस्लिम नाउ से एक इंडिपेंडेंट थिंकटैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी[संगीत] और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पररिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस कोएंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने केलिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्टकरें।[संगीत][संगीत]आपका नाम उसके पॉडकास्ट में बहुत खैरमकदममहै। खुर्शीद साहब आप एक जमाने से जिसेकहते हैं अपनी यंग ऐज से हिंदुस्तान का जोइंस्टीट्यूशनल कॉन्स्टिट्यूशनल सिस्टम हैआप उसमें एंबेडेड भी रहे हैं और आप बहुतइंपॉर्टेंट रोल्स मुझे लगता है शायद बहुतकम ऐसे मुसलमान होंगे हिंदुस्तान मेंजिन्होंने इतने इंपॉर्टेंट पोर्टफोलियोसफॉरेन अफेयर्स माइनॉरिटी अफेयर्स कॉमर्सलॉ दीज़ आर वन ऑफ दी मोस्टेंट पोर्टफोलियोसजो किसी कंट्री को रन करने के लिए कैबिनेटमें इंपॉर्टेंट होते हैं। तो ये तो पहलीबात ये इस बात की भी एक तरह से इंडिकेशनहै कि मुसलमान एक जमाने तक उन ओहदों परपहुंच सकता था। लेकिन ये भी सच्चाई है किद कर्व इज रिसीडिंग।वो इस तरह से समझ सकते हैं कि आजादी केबाद मौलाना आजाद जो हैं नेहरू गांधी केबिल्कुल इक्वल अह फुटिंग पे हैं। या आपकेजो नाना रहे हैं डॉ. जाकिर हुसैन। आई मीनदीज़ आर द पीपल हु आर बेसिकली बिल्ड दनेशन। एंड द कर्व सीम्स टू बी फॉलिंग डाउनहमफॉर व्हाटएवर रीज़ंस वी विल डिस्कसयातो उस सबसे पहले तो मैं ये जानना चाहूंगाकि2014 के बाद का जो हिंदुस्तान है मैंअक्सर ये बात बोलता हूं पॉडकास्ट में किमैंने दोनों हिंदुस्तान देखे हैं। ऑफकोर्स आपने भी देखे होंगे लेकिन क्योंकिहम जिस जनरेशन से आते हैं वो हिंदुस्तानभी देखा है कि जहां पे हम लोग सर उठा केकॉन्फिडेंटली बात कर सकते हैं। डिस्पाइटऑल ऑफ दी डेप्रिवेशन सच अ कमिटी रिपोर्टएवरीथिंग देयर वास स्टिल सिक्योरिटी औरउसके बाद का जो आज का हिंदुस्तान है किजहां पे बुलडोजर जहां पे आपकी इक्वलसिटीजनशिप जहां पे एसआईआर जहां पे सीएएजहां पे आपके जो कन्वर्शन लॉस है आई मीन दलिस्ट इज़ अनइंडिंग वफ मस्जिदों के साथ आपदेख रहे हैं क्या हो रहा है आपने तो बाबरीऔर संभल और कमल मौला मास का जो जजमेंट हैआपके हिसाब से क्राइसिस कितना डीप है?क्या है? क्योंकि अब आप इंडिया इंटरनेशनलइस्लामिक सेंटर के भी प्रेसिडेंट हैं।अपने जोपुराने जो इंगेजमेंट्स हैं आपके जोकांग्रेस के साथ हैं इंस्टीट्यूशनल रूल्समें एज अ कम्युनिटी लीडर आज की डेट में जोआपके इंगेजमेंट्स हैं। आप मैं देखता हूंकि बहुत सारे जो एडवोकेसी के प्रोग्राम्सहोते हैं वो आप रेगुलरली अपीयर होते हैं।व्हाट डू यू थिंक इज द क्राइसिस? मुसलमानहो या जनरली हिंदुस्तान हो। व्हाट इज इटफेसिंग?देखिए क्राइसिस तो एक एक बुनियादीक्राइसिस है डेमोक्रेसी का।हम लोग जम्हूरियत को किस नजरिए से देखतेहैं और नापते हैं और जाहिर है जबजम्हूरियत पर सवालिया निशान लगता है तोजम्हूरियत में उन लोगों पर खासतौर परसवालिया निशान लगता है जिनको जम्हूरियत नेएक खासप्रोटेक्शन खास हिफाजत करने का वायदा कियाहै औरमाइनॉरिटीज का जो हक बनता है जैसे भी हकबनता हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में, आईन में,जम्हूरियत मेंउसको हम किस नजर से देखते हैं? हम उसकोमानते थे और मानते रहेंगे कि वो हक काहिस्सा है। सबका हक होता है। उतना हीमाइनॉरिटी का हक होता है। लेकिन क्योंकिमाइनॉरिटी माइनॉरिटी है। अक्सरियतअक्सरियत है और उसको जो आपका आईन हैकॉन्स्टिट्यूशन है उसमें खास तवज्जो देनेकी बात कही गई है। और इस बात इस बात कोकहने पर लोग लोग कहते हैं कि आप अलग हैंक्या? आपको खास तवज्जो दी जा रही है क्या?आपको खास अपीज़मेंट किया जा रहा है। येसवाल पूछे जाते हैं। हालांकि अगरडेमोक्रेटिक पॉलिसी को डेमोक्रेटिकस्ट्रक्चर्स को आप समझे तो ऐसा नहीं है।उनको सिर्फ कंपनसेट किया जाता है अपनेअकलियत होने की वजह से। क्योंकि जब आपकीआप अपनी बात को उतने पुरजोर तरीके से नहींकह सकते हैं जितने पुरजोर तरीके से अक्सरअक्सरियत कह सकती है तो आपको उस आवाज कोनुमाया करने के लिए कुछ प्रोविज़ंसकॉन्स्टिट्यूशन पे रखे गए हैं वो अपीज़बलनहीं है वो कंपनसेशन है और इस बात को आजलोग समझने के लिए तैयार नहीं है। खासतौरपे वो लोग जो इख्तदार में है इसको समझनेके लिए तैयार नहीं है। तो ऑब्वियसली एकबुनियादी क्राइसिस है। अब उसको अकलियत केलोग मुसलमान ये समझे कि ये हमारा क्राइसिसहै और ये हम पर तवज्जो है और उस वजह सेहमको ये तकलीफ है और शिकायत है और हमारेलिए हमारे लिए दुश्वारियां हैं। लेकिन येसबके लिए है।जो अक्सरियत में है उसके लिए भी है। लेकिनअक्सरियत में किस पर खास तवज्जो है वो अलगबात हो गई। लेकिन यह क्राइसिस सबका है।हमारा उतना ही है जितना अक्सरियत का यहक्राइसिस है। और जब यह क्राइसिस फुल ब्लोनहोगा और होगा एक ना एक दिन ये फुल ब्लोनहोगा तब पता चलेगा कि ये सबके खिलाफ है।ये किसी एक के खिलाफ नहीं है। सिर्फ एक केएक के मंसूबे को कुचलने की बात नहीं है।ये सबके खिलाफ है। क्योंकि क्राइसिस कीबात हो रही है और अक्सर आजकल यह बोला जाताहै कि आपने भी जैसे बोला कि देयर इज अपर्टिकुलर फोकस और उसको हम इस तरह देखसकते हैं ग्रेडेशन है कि एक-एक करके वोमरहले जब गुजरते चले जाएंगे तो धीरे-धीरेजितने भी ग्रुप्स हैं वो उसका शिकारहोंगे। लेकिन फिर भी एक रेंज रहेगीडिफरेंट। तो व्हेन इट कम्स टू मुस्लिम्सएंड आल्सो क्रिश्चियंस आई बिलीव। ईसाइयोंके साथ भी जो पिछले हमने कुछ दिनों मेंदेखा जो क्रिसमस में होता है या बाकी सारीचीजें हैं। दे आर पर्टिकुलरली सब्जेक्ट टूक्राइसिस की जो एक्सट्रीमिटी है। तो मैंआपसे समझना चाहूंगा कि जब ये लोग बोलतेहैं कि भ हिंदुस्तान का मुसलमान सेकंडक्लास सिटीजन बन रहा है तो आपके हिसाब सेकॉन्स्टिट्यूशनली स्पीकिंग क्योंकि आपकीएक्सपर्टीज है। व्हाट डस दैट मीन? नहींनहीं ये ये सवाल जो आपने रेज किया है इसकेदो पहलूएक वो लोग हैं जो कहते हैं कि इनको सेकंडक्लास सिटीजन ही बनकर रहना है।जीऔर दूसरे वो लोग हैं जो शिकायत में कहतेहैं कि हमको सेकंड क्लास सिटीजन बनाए जारहा है।तो ये अलग-अलग इसके पहलू हैं उसको उस उसनजर से देखना पड़ेगा।बाय द वे सेकंड क्लास सिटीजन बन जाना हीजैसे क्राइसिस का हिस्सा है कि अगर किसीको आप सेकंड क्लास सिटीजन बना रहे हैं तोउसका मतलब डेमोक्रेसी का ढांचा जो है वहबिगड़ चुका है। वो तबाह हो चुका है याउसको आप तबाह करने में जुटे हुए हैं। तोसेकंड क्लास सिटीजन तो कोई नहीं हो सकताक्योंकि जो बेसिक बेसिक जो वायदा हैकॉन्स्टिट्यूशन का आइन का वो इक्वलिटी काहै। फ्रेटरनिटी और इक्वलिटी का है। दोनोंका है कि आपकोअक्सरियत के बराबर ही माना जाएगा।हालांकि कुछ फर्क तो रहता है ना। गिनतीमें फर्क रहता है। अगर एक इस कमरे में हममें हम में से 10 लोग हैं और 10 में से आठएक खास उसके नयत के हैं और दो एक और नौयतके हैं तो आठ 10 पर दो पर भारी तो रहेंगेलेकिन वो भारी ऐसे ना रहे कि दो के अपनेमकसद जो है वो डिस्ट्रॉय हो जाए। येकॉन्स्टिट्यूशन कावो होता है, पर्पस होता है और वोकॉन्स्टिट्यूशन ने हमको दिया है, सबकोदिया है, इंडिविजुअल को दिया है। लेकिनखासतौर पर माइनॉरिटी को भी दिया है। जोहमारे आर्टिकल्स कॉन्स्टिट्यूशन केमाइनॉरिटी को हक देते हैं। अलग से देतेहैं। वो बिय्ड जो हक सबको मिला है वो है।अब इसको सुनकर और इस बात को दोहराने पर वोसवाल हम पर उठाया जाता है कि आप इतनेप्रिविलेज्ड हैं क्या? हमआपको यह खास लोग हैं जिनको यह सब दियाजाएगा और फिर उसको जोड़ दिया जाता हैहिंदुस्तान की तकसीम सेकि वही लोग यह बात करते-करते हिंदुस्तानको तकसीम करके चले गए। आप फिर वही बात कररहे हैं। तो ये सरासर गलत है। झूठ है।इसके इसकी कोई बुनियाद नहीं है। लेकिनबहरहाल प्रोपेगेंडा है। प्रोपेगेंडा लोगकरते हैं। सवाल ये होता है कि इसका हमक्या जवाब दे पा रहे हैं।मुझे अफसोस इस बात का है कि हम इसका जवाबनहीं दे पाते। या तो हम चुप हो जाते हैं।जब मैं कह रहा हूं हम चुप हो जाते हैं तोमैं सेकुलर जमातों की बात कर रहा हूं। यातो हम चुप हो जाते हैं और कहते हैं किइसको फ़िजूल है इसको बढ़ाना। इसको बढ़ाओगेतो और तकलीफ होगी और शिद्दत के अटैक्स आपपर होंगे। एक्सट्रा एक्सट्रा तो इसको माफ़करिए। वक्त वक्त के साथ ये सारी चीजेंखत्म हो जाएंगी। वो गलत है। इसका जवाबदेना चाहिए। हमारे पास जवाब हैंऔर वह जवाब हमको देने चाहिए और जवाब देंगेतभी यह माना जाएगा कि आप डिस्कोर्स आपकाडेमोक्रेटिक डिस्टोर्ट जिंदा है। अगरडेमोक्रेसी को भी कहीं ठेस लग रही है तोकम से कम डेम डेमोक्रेटिक डिस्कोर्स जो हैवो जिंदा रहेगा और वो बहुत जरूरी है।इस पॉइंट पे आगे भी हमें आना है इस थीम पेकि जवाब क्या होने चाहिए और चाहे वोसेकुलर जमातें हो, चाहे वो मुस्लिम्स हों,चाहे वो दूसरी कम्युनिटीज़ हो, उनका किसतरह का वोकैबलरी होना चाहिए। लेकिन फिर भीमैं इस सवाल को एक बार और थोड़ा सा किआपको क्या लगता है क्योंकि आप सुप्रीमकोर्ट के लॉयर भी हैं और जो कोर्ट्स हैंक्योंकि वो डिफेंड करते हैं राइट्स को जोकॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स हैं कौन-कौन सेऐसे मरहले हैं कि जहां पे रिडक्शन हुआ है।कॉन्स्टिट्यूशनल रिडक्शन हुआ है और जैसे वहै बाकी चीजें और क्या यह रिवर्सिबल है यारिवर्सिबल है कि क्या यह सिर्फ यह है किजब तक सरकार है मान लीजिए बीजेपी की और कईबार ऐसा होता है कि पॉलिटिकल विल बन जातीहै कि ठीक है रिवर्सिबल है बहुत सारी ऐसीचीजें अब राम मंदिर बन गया है या कोई औरचीजें कमल मौला माउस का जजमेंट हो गया वोइतना डीपली इंटर हो गया है कम्युनिटी केसाथ मेजॉरिटी के विल के साथ उसकीसेंटीमेंट के साथ कि उसे रिवर्स करना भीएक तरीके का सिर्फ चैलेंज नहीं वो औरज्यादा डिसरप्टिव हो जाता है।नहीं नहीं आपकी बात आपकी बात सही है। जोहुआ है वो भी तो एक रिवर्सल है।जी जीजी एक एक निजाम था चला आ रहा था 500 सालसे 600 साल से 700 साल से एक निजाम चला आरहा था। उसको भी रिवर्स किया गया है।और उसको डेमोक्रेसी के नाम पे रिवर्स कियागया है। ये कहा गया है कि ये वो लोग थे जोतानाशाह थे। उन्होंने यह निजाम बनाया थाऔर अब क्योंकि हमको यह मौका मिला हैडेमोक्रेटिक मौका मिला है तो हम डेमोडेमोक्रेसी का सहारा लेकर इसको रिवर्सकरते हैं तो रिवर्स तो हो रहा है नाऔर रिवर्स वहां हो रहा है जहां पर बहुतदिन तक हम लोग ये सब समझते रहे[नाक से की जाने वाली आवाज़]सिर्फ खास किसी एक कौम के लोग नहीं बल्किपूरे मुल्क के लोग ये समझते रहे अक्सरियतमुल्क की ये समझते रहे कि इसको रिवर्सकरना गलत है और उसी की उसी उसी को नज़रअंदाज हम ना कर दें। हमने कानून बनाया थाप्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट का कि हमने यह तयकिया कि एक कहीं ना कहीं लकीर खींच कर यहकहा जाए कि इससे पहले जो कुछ हुआ है उसकोअब भूल जाइए। इसके बाद अब कुछ नहीं होगा।अब कोई तब्दीली नहीं लाई जाएगी। 15 अगस्त1947 के बाद कोई तब्दीली नहीं होगी। उसदिन तक जो हो गया सो हो गया। किसी काफायदा रहा, किसी का नुकसान रहा। लेकिनउसके बाद इसको बार-बार मत होने दीजिए। हमलेकिन मसला यह है कि आज वह कुरदा फिर जारहा है जो आपने अभी जिक्र किया है कमालमौला मौस का जो जिक्र किया है भोजशाला काउसको अब को लग गया है ना वो आज का फैसलाहैवो 47 से पहले का नहीं है वो आज का फैसलाहै और आज के फैसले में उसको रिवर्स कियागया जो भी वहां पर निजाम था उस निजाम कोबदला गया है रिवर्स किया गया है ये कहकररिवर्स किया गया है कि 600 साल पहले यहांजो निजाम था हम उसी निजाम में वापस ले जारहे हैं तो ये बुनियादी सवाल मुल्क का है।हमारे पूरी पूरी हिंदुस्तान के सारी हीआवाम का यह बुनियादी सवाल है कि हम कितनारिवर्स करेंगे। कहां-कहां तक हम वापस जाले जाएंगे। आवाम को कहां-कहां तक निजाम कोवापस ले जाएंगे या कहीं पर लकीर खींच करये कहेंगे कि चलिए अब मुस्तकबिल को देखिए।अब आप गुजरे वक्त को मत देखिए। अबमुस्तकबिल को देखिए। क्योंकि हमने जबकॉन्स्टिट्यूशन 1950 में अपना बनाया औरउसको हमने अडॉप किया तो उस कॉन्स्टिट्यूशनमें हमने यह लिहाज रखा कि पिछले जमाने मेंक्या हुआ था। लेकिन हमारा उसमें मकसद येसाफ है कि अब हम पीछे ना देखकर आगेदेखेंगे और आगे का हमारा जो मंसूबा है उसपर हम यकीन करते हुए आगे बढ़ेंगे।आपने दो बहुत इंपॉर्टेंट बातें बोली। एकतो यह कि माज़ी जो है वो दो चीज़ हैं। एक तोमाज़ी में बहुत कुछ हुआ है। हिस्ट्री मेंअगर आप खुरीदने लगे हैं तो चाहे वोकम्युनिटीज़ कोई भी हो कोई भी कंप्लीट जिसेकहते हैं क्लीन चिट किसी को नहीं मिलेगी।बट उसके बावजूद जितने भी हमने बाबरी औरकमल मौला मौक और इनके जजमेंट्स देखेआर्कियोलॉजी को देखा तो ये भी है कि वहांपे एक्सट्रीमली सेलेक्टिव रीजनिंग है।मतलब ऐसा भी नहीं है कि भ वो क्लियर कटकोई चीज हुई हो और उसका एक क्लियर कटरिवर्सल है।नहीं नहीं बाबरी मस्जिद पर आप मुझसे सवालपूछिए। मैं बताऊंगा कि वो क्लियर कटरिवर्सल नहीं है। वो लोग पूरी तरह सेबाबरी मस्जिद के फैसले को समझे नहीं है।जी और मैंने तो जो बहस की थी कमाल मौलामौस में जो मैंने बहस की थी, मैंने वहांसिर्फ एक ही बात कही थी कि आप बाबरीमस्जिद के फैसले को अप्लाई कर लीजिए।लोग समझते हैं कि हम उसकी मुखालफ़त करेंगेया हम उससे कतराएंगे। मैं आपसे ये इल्तजाकर रहा हूं कि आप बाबरी मस्जिद के फैसलेको यहां पर लागू कीजिए। कोई मसला नहीं है।लेकिन उन्होंने नहीं किया।उन्होंने बाबरी मस्जिद के फैसले को लागूना करके एक नया फैसला दे दिया। तो येसमझने की जरूरत है कि बाबरी मस्जिद काफैसला क्या था?आप इसको प्लीज एक्सपेंड कीजिए। मतलब फॉरमी इट्स आल्सो समथिंग।श्योर देखिए बाबरी मस्जिद का फैसला क्याहै? समझना चाहिए। एक बात तो बहुत वाज़ हैऔर बहुत साफ़ हैऔर जिस लोगों जिस बात की बहुत सारे लोगोंको शिकायत है और शिकायत का उनको हक़ होताहै कि हमारी यहां एक मस्जिद थी वो मस्जिदहमसे ले ली गई।जीठीक है। ये ये बात तो अपनी जगह अपनी जगहपर समझ आती है कि कोई शिकायतें करे किहमारी यहां एक मस्जिद थी। वो मस्जिद ले लीगई। लेकिन जो जो फैसले में जो आर्गुमेंट्सहैं उनको समझने की कोशिश करें। बाबरीमस्जिद के दो हिस्से थे। एक बाहर काचबूतरा थाजिसको राम चबूतरा कहते हैं और एक बाबरीमस्जिद की जो खास इमारत थी वो थी। तोचबूतरे के लिए तो सब ने ये कहा मुसलमानोंने ये कहा कि ये हमारे पोजेशन में नहींरहा है। सैकड़ों साल से ये हिंदुओं केपोज़ेशन में रहा है और यहां पूजा होती रहीहै। तो हमको इससे मतलब नहीं है। तो जबकिसी ने कह दिया कि हमको इससे मतलब नहींतो फिर कोर्ट क्या करता है कि नहीं यहांहम जबरदस्ती आपको देंगे। हमतो वो तोवो क्लेम ही नहीं है। वो क्लेम ही नहींथा।क्लेम ही नहीं था। तो वो बात खत्म हो गई।अंदर का मसला ये था कि ये यहां हमारापोजेशन रहा है। हमारा यहां पे कंट्रोल रहाहै। हम यहां नमाज पढ़ते रहे हैं और येहमारी मस्जिद है और ये हमको मिलनी चाहिए।टाइटल सूट था।टाइटल सूट था जो कि कमाल मौला में टाइटलसूट नहीं था। कमाल मौला में सिर्फ एक रिटपिटीशन था कि जो एएसआई ने किया है और जोउन्होंने इजाजत दी है वो गलत है। हमराम मंदिर वाला जो केस था जो बाबरी मस्जिदवाला केस था वो एक टाइटल सूट का था।ये जमीन किसकी हैकि ये जमीन किसकी है और जमीन किसकी है?उसमें जुरिस्टिक पर्सनालिटी जो भगवान कोमानते हैं ये लोग जहां पर एक मूर्ति होतीहै उस मूर्ति को एक ये जरिस्टिकपर्सनालिटी मानते हैं। कानून मेंहिंदुस्तान में ये हमेशा माना गया है।अच्छातो राम मंदिर कहकर और वहां पर भगवान रामविराजमान कहकर ये माना गया कि हम टाइटलसूट में हम एक प्लेेंटिफ है टाइटल सूटमें। और उसका जवाब वफ को देना था या उसकाजवाब जिन जो मस्जिद जिनके जिनके हाथ मेंथी उनको जवाब उसका देना था और आखिर में जोकोर्ट ने फैसला किया सब कुछ सारी सारीएविडेंस देखने के बाद जो कोर्ट ने फैसलाकिया तो उन्होंने यह कहा कि चबूतरा तोउनके पोज़ेशन में रहा उनका टाइटल है लेकिनजो मस्जिद है वो आपके पोज़ेशन हालांकिपोज़ेशन आपका लोग वक्तन वक्तन डिस्टर्बकरते रहे लेकिन वो आपके पोजीशनतो आपको हक बनता है और बहुत बहुत बेहूदगीसे यहां पर आपके पोज़ेशन को डिस्टर्ब करनेकी कोशिश 1919491949 में की गई तो क्या मतलब हुआ कि ये आपही का हिस्सा है और आप ही के लिए है।लेकिन उसके बाद कोर्ट ने ये कहा कि ये तोअब बिस्मार हो चुकी है। यहां तो कुछ बचानहीं है। अगर मस्जिद होती तो वो दे देते।लेकिन कहा कि अब तो मस्जिद की इमारत यहांबिस्मार हो चुकी है। यहां कुछ बचा नहींहै। चलिए एक काम करते हैं। हम आर्टिकल 142जो और जज और कोर्ट्स के पास नहीं है।सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है।और टू डू कंप्लीट जस्टिस। तो उन्होंने कहाहम आपको पांच एकड़ जमीन यहीं पर जहां जमीनएक्वायर्ड हुई है मंदिर के लिए उसी में सेपांच एकड़ जमीन हम आपको दे देते हैं। आपअपनी मस्जिद बना लीजिए। हमऔर किसी वजह से आपको अगर यह नहीं दी जासकती है तो हम अयोध्या के अंदर ही आपको 5एकड़ जमीन देंगे।हमने यानी कि जिन लोगों ने जो जो फरीजिनके जिनके जिनकी हिमायत में यह फैसलाकिया गया उन्होंने कहा कि हम जमीन नहींलेंगे। हमनहीं ली हमअगर ले लेते अगर वह जमीन ले लेते और वहांएक आलीशान मस्जिद बन जाती तो मंदिर औरमस्जिद आमनेसामने होतेहमऔर जब भी कोई मंदिर जाता तो वो देखता किएक आलीशान मस्जिद भी है और वो एक नमूना बनजाता हिंदुस्तान के सेकुलरिज्म काहमवन साइडेड नहीं होता। अब आज जब आप जातेहैं अयोध्या तो वन साइडेड लगता है नाहमकि मस्जिद तो गायब हो गई। मस्जिद तो हैनहीं। हमयहां पे तो सिर्फ मंदिर है।तो वह अब वह हमारी गलती थी। किसकी गलती थीकि हमने वहां जमीन लेने से इंकार कर दिया।तो आपको लगता है कि उस फैसले में इस तरहकी पोजीशन लेना कि मिले तो पूरा मिले।मतलब अगर वही जगह मिले ना लेके जो मिल रहाहै।नहीं और असल में जब वहां कुछ बचा नहीं था।वहां कुछ बचा नहीं था तो कोर्ट ने ये कहाकि आपको एक बेहतर जगह दे देते हैं।हमलेकिन ये मान के कहा कि ये आपका हक थायहां। हमऔर आपके साथ हकतफी हुई है। यह कहा हैकोर्ट ने हमकि आपके साथ हकतफी हुई है। लेकिन हम आपकोदेंगे तो दो गज जमीन आपको दे देंगे। नाउसमें मस्जिद है ना इमारत है। क्या करेंगेआप? चारों तरफ से आप सराउंडेड हैंमंदिर की जमीन से। तो इसका आप क्याकरेंगे? हम आपको पांच एकड़ जमीन दे देतेहैं।तो अब सही किया, गलत किया। उनका मकसद यहथा कि किसी ना किसी तरह से इस मामले को अबखत्म करें हम लोग। हमेशा हमेशा के लिए इसपर इस पर एक फाइनल हम स्यूशन करके दे देंऔर खुशी-खुशी लोग आपस में आमनेसामने रहकरअपनी अपने अपनी ईमान पर भी बेकाम कायमरहें और एक दूसरे के साथ रिश्ता बनाकर भीरहे। ये कोर्ट का मकसद था। ये कोर्ट नेकरना चाहा। अब आप कह सकते हैं कि ये गलतथा। कोर्ट को क्या पड़ी थी कि वो हम लोगोंकी दोस्ती कराते। कोर्ट को क्या पड़ी थीकि वो हमको जगह देते। कोर्ट को क्या पड़ीथी? हम तो वही लेते। हम तो वही लेते।लेकिन वही लेते में तो बहुत देर हो चुकीथी। तो आप अभी भी यह कह सकते हैं कि जोकोर्ट ने किया वो गलत था। हमारी तो ज़िद थीकि वही दीजिए। तो वहां पर अगर मस्जिद बनजाती तो छोटी सी मस्जिद बनती। बहुत साराहिस्सा उसका तो आपने खुद छोड़ दिया था।छोटी सी मस्जिद बनती। चारों तरफ से मंदिरकी जमीन उसको घेरे हुए होती। जाने कारास्ता तक आपको आसानी से ना मिलता। तोक्या बेहतर था कि आपको पांच एकड़ जमीन देदी जाए और जो जमीन आपने गवाई है वह मेरेख्याल से मेरे ख्याल से शायद आधे एकड़ कीहोगी एक एकड़ भी नहीं होगी और उसके उसकेएवज में आपको पांच एकड़ दिया जा रहा था वोनहीं लिया उसके बाद व बोर्ड आया वर्कबोर्ड ने कहा कि हमको जहां भी दीजिए वहांहम ले लेंगे तो 25 किमी दूर व बोर्ड नेकिसी गांव में कोई जमीन ले ली है आज तकवहां कोई मस्जिद तो बनी नहींबहुत लोगों का यह कहना है कि क्योंकिपिछले 100 साल से भी और पिछले 101 साल सेज्यादा जो ये क्लेम है कभी 3000 400 तो वोएक बार अगर दे भी देते और अगर दे भी देंतो इट्स अ परपेचुअल साइकिल।नहीं नहीं वो साइकिल है लेकिन जाहिर हैथोड़ा सा दूर अंदेशीर से कोर्ट ने कहा किहम इसका एक सशन निकाल लें।वो सिर्फ सशन जैसे जो जो हाई कोर्ट नेकिया था हाई कोर्ट ने कहा था कि हम इनकोतीन हिस्से में बांट देते हैं।तो उनको तीन हिस्से में बांटने का हक नहींथा। टाइटल सूट था। टाइटल सूट में या तो आपकिसी को देते हैं या किसी को आप मना करदेते हैं। तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा ये तोटाइटल सूट है। उसका जजमेंट आपके हिसाब सेएज अ टाइटल सूट ही हुआ।एज अ टाइटल सूट हुआ और कहा कि यह टाइटलसूट है। अब जब आप कमाल मौला में आते हैंतो कमाल मौला में उन्होंने कहा था कि हमटाइटल सूट नहीं चाह रहे हैं।हमने टाइटल सूट नहीं फाइल किया है।हम लोग ये बहस करते रहे कि ये टाइटल सूटफाइल करें और टाइटल सूट फाइल करेंगे तो वोपहले सबसे पहले ट्रायल कोर्ट में जाएगा।सीधे हाई कोर्ट क्यों आ गए? हमऔर हाई कोर्ट में यह सिर्फ रिट पिटीशनलेकर आए हैं कि जो एएसआई ने जो भी एएसआईने इजाजत दी है वह गलत है।हमतो एज एएसआई की इजाजत को क्वाश करने केलिए वो हाई कोर्ट आए हैं। तो वो बाबरीमस्जिद के फैसले से कमाल मौला मौस काफैसला है वो बहुत दूर है। हम तो चाह रहेथे कि बाबरी मस्जिद का फैसला वहां लागूहो। क्योंकि वहां पर ये ये शिकायत नहींआती कि अब तो बिस्मार हो गया। अब तो कुछबचा नहीं। वहां उस वक्त तक जब तक फैसलाहुआ है जब तक यह फैसला हुआ है उस वक्त तकवहां नमाज़ हो रही थीतो टाइटल सूट में आपको मिल जाताटाइटल सूट में हमको मिल जाता वहां पररजिस्टर्ड है ये जो प्लॉट था वो वफ के नामपे रजिस्टर्ड है वो टाइटल सूट में मिलजाताऔर यही हमने कहा कि आप हमको टाइटल सूट मेंइसको रेलिगेट कर दीजिए टाइटल सूट में जोदूध का दूध है पानी का पानी वो सब होजाएगा लेकिन वो टाइटल सूट नहीं चाहते थेतो ये तो तरकीब हुई ना कि जहां पर टाइटलसूट से फायदा है वहां टाइटल सूट करें।जहां पे टाइटल सूट से नुकसान है वहां परआप रीड पिटीशन करें। तो यह तो तरकीब हुई।तो यह शिकायत तो हम लोग कर सकते हैं। येशिकायत हम कर सकते हैं कि इसको थोड़ा सासाफ गोही से फैसले करने की जरूरत है किकहां पे टाइटल सूट होना चाहिए और कहां परकुछ और होना चाहिए। दूसरी बातक्लेरिटी मैं आपसे चाहूंगा कि जो ये डिबेटहुई कि भई टाइटल सूट हो या रेड पिटीशन हो।वो विद इन मुस्लिम्स डिस्कशन हो रहा है याफिरनहीं नहीं तो कोर्ट में हुआ नाकोर्ट में कोर्ट ने डिसाइड किया कि भ क्याकोर्ट ने ये डिसाइड किया कि नहीं हम वेपिटीशन हम सुन सकते हैं क्योंकि उनको पताथा कि इससे फायदा नहींअब ये अब समझ लीजिए कि हां उनको ऐसा लगाहोगा कि हम अगर टाइटल सूट में जाएंगे तो20 साल चलेगा एविडेंस आएगी और 20 साल जबचलेगा तो उसमें टाइटल अपना कैसे कोई दूसरीदूसरी साइड कैसे इस्टैब्लिश करती है अपनाटाइटलजैसे बाबरी मस्जिद में तो तो ये बात थी किभाई 12 साल से किसका यहां कब्जा रहा है?उस टाइटल सूट में सबसे पहले पोजेशन देखाजाता है ना।तो जहां कब्जा था राम चबूतरे पे कब्जा थावो मुसलमान की तरफ मुसलमानों की तरफ सेखुद कह दिया गया कि आपका इनका कब्जा रहाहै। ठीक है हम इस पर अपना हक नहीं जमासकते हैं। लेकिन जहां कब्जा नहीं है वो तोहमको दीजिए।और वह कोर्ट ने बुनियादी तौर पर थरेटिकलीकोर्ट ने वह मुसलमानों के फेवर में हीफैसला किया है और यह कहा है कि आपके साथबेइंसाफी हुई है,बदसलूकी हुई है। ये सब कहाऔर कहा कि चलिए अब हमेशा के लिए इसको खत्मकरने के लिए आपको पांच एकड़ जमीन दे देतेहैं।अगर पांच एकड़ जमीन पर हम इसार करते कि हमवहीं पर लेंगे जहां पर कोर्ट ने कहा है औरवहां नहीं दे सकते तो कोर्ट ने कहा है किअयोध्या के अंदर ही कहीं पर पांच एकड़जमीन दीजिए। हमतो हालात कहां से कितने बेहतर होते? हम्म।कमिंग बैक टू ये जो प्लेसेस ऑफ़ वरशिप कीबात हो रही थी इस कॉन्टेक्स्ट में के 1947में ये डिसाइड किया गया फ्यूचर में भी औरउस वक्त भी कि अब जो इससे पहले डिस्कशंसहुएक्योंकि ऐसा नहीं है कि लोग अक्सर समझतेहैं कि जो देश है वजूद में आया है तो जीरोसे हिस्ट्री शुरू हो रही है।उससे पहले एक 100 150 साल का एक फ्रीडममूवमेंट भी है। लेकिन कम्युनल इंटरेक्शंसभी हैं।शुद्धि मूवमेंट भी हो रहा है। लीग कीपॉलिटिक्स भी है। हिंदू महासभा के अखाड़ेभी हैं और आपकी यह भी है कि भ हिंदूमहासभा और लीग मिलके गवर्नमेंट्स भी बनारहे हैं और यह भी है कि भ कम्युनल वायलेंसभी हो रहा है। लिंचिंग्स भी उस जमाने मेंकाऊ के हवाले से दूर ये सारी चीजें एकटेंपलेट है जो इंस्टीट्यूशनल नहीं था।कॉलोनियल इंडिया में था अलग-अलग जगह पे होरहा था। वो मॉडल पूरी तरीके से लव जिहादहो, पॉपुलेशन जिहाद हो ये सारी चीजें। तोये डिसीजन जो हुआ कॉन्स्टिट्यूशनल मैंहल्का सा आपसे समझना चाहूंगा कि बारगेनक्या था मतलब 1947 में जो कॉन्स्टिट्यूशनकी बुनियादी जो प्रिंसिपल्स हैं अगर हमउसका ढांचा खींच दें देन वी कैन यू नो टॉकअबाउट के व्हाट इज दी बेसलाइन अगेंस्टव्हिच आज भी मुसलमान और पिछले 70 साल मेंजो अपने दावे कर रहा है व्हाट वासजी बड़ा सिंपल था वो तो वाज़ है लिखा हुआहैजीमतलब ऐसा तो है नहीं कि मैं कहूं कि चलिएहम हिस्ट्री बुक जाके देखते हैं कि उसवक्त क्या किसी ने कहा और क्या किसने किसक्या हिमायत करी और क्या बात मानी गई क्याबात नहीं मानी गई वो तो कॉन्स्टिट्यूशनलहिस्ट्री में बड़ा क्लियर है। हर शख्स कोहर शख्स को अपनी इबादत करने का हक है।अपनी इबादत करने का हक है। हर शख्स कोअपने इंस्टीटशंस की की हिफाजत करने का हकहै। हर शख्स को अपने तौर तरीकों का परकायम रहने का हक है। यह सारी चीजेंकॉन्स्टिट्यूशन में लिखी हुई हैं और हर एकबराबर है। एक दूसरे के बराबर है। यह सारीकॉन्स्टिट्यूशन में लिखी हुई है। पर्सनललॉ का प्रोटेक्शन कॉन्स्टिट्यूशन में लिखाहुआ है। आज जो सवाल हो गया है वो ये होगया है कि पर्सनल लॉ का हक आपको है।लेकिन पर्सनल लॉ का हक किस हद तक है?किस हद तक है? जहां पर पर्सनल लॉ औरसेकुलर लॉ टकराता है।वहां पर प्रिवेल कौन करेगा?यह सवाल आ गया है। आज आज के जो मसालेअगर इसको फिलोसोफिकली लें जस्ट टू केसेकुलरिज्मया सेकुलरिटी और कोई भी पर्सनल लॉ या कोईआईडियोलॉजी जो अपने बिलीफ सिस्टम से आतीहै वो फिलॉसोफिकली मेटाफिजिकली टकराएगा हीटकराएगा।नहीं टकराएगा। इसी यही यही मैं बार-बारलोगों को समझाता हूं।[नाक से की जाने वाली आवाज़] सेकुलरिज्मसेुलर जो वो है निजाम हैवो वो पर्सनल लॉ निजाम से अलग नहीं है।पर्सनल लॉ सेकुलर निजाम का ही हिस्सा है।हम्जो सेकुलर निजाम है उसी का हिस्सा पर्सनललॉ है। अक्सर लोग ये कहते हैं ना कि जोसेकुलर लॉ है पहले उसको देखिए और उसके बाददेखिए पर्सनल लॉ क्या कहता है। लेकिनपर्सनल लॉ सेकुलर लॉ का हिस्सा है।आप इसको इस तरह से देख रहे हैं कि जैसेकोडिफिकेशन कि भई आपको ऑलरेडी अस्यूम करलिया गया कि भई ये जो फेथ बेस्ड लॉस हैं।ये हमारे विदिन है और उसकी एक मेथोडोलॉजीडिफाइन कर दी गई कि इनसे कैसे डीलवो तो वो तो कॉन्स्टिट्यूशन कहता हैमुझे मुझे कहने की जरूरत नहीं हैकॉन्स्टिट्यूशन कॉन्स्टिट्यूशन कहता हैलेकिन उसको जब आज हम अप्लाई करते हैं जबआज इस पर हम गुफ्तगू करते हैं जबकॉन्स्टिट्यूशनल गुफ्तगू होती है तो लोगअक्सर ये समझते हैं कि ये दो अलग-अलगरास्ते हैं।इनका आपस में कोई ताल्लुक नहीं है। इनकाआपस में कोई रिश्ता नहीं है। तो एक येदेखें कि पर्सनल लॉ के कौन-कौन से पहलूहैं। कौन-कौन से पहलू हैं जिसको लोग समझतेहैं कि वो सेकुलर लॉ से क्लैश करते हैं।हम पहले वो देखें। हम वो देखें। अब मुझेयह बताइए हिंदुस्तान तो वेजिटेरियन मुल्कनहीं है।हमहिंदुस्तान वेजिटेरियन मुल्क नहीं है।मसला तब होता हिंदुस्तान में जब केहिंदुस्तान के मुसलमान या किसी और किसी औरमजहब के लोग और किसी और जमात के लोग नॉनवेजिटेरियंस होते और अक्सरियत हिंदुस्तानके वेजिटेरियन होती। तो एक मसला होता कियह इसलिए है कि अपने तौर तरीके पर यह कायमहै और यह इसलिए इनका अपना पर्सनल लॉ है।यह कुर्बानी भी देते हैं और ये गोश्त भीखाते हैं। लेकिन अक्सरियत गोश्त नहींखाती। लेकिन ऐसा मसला तो है नहीं।ऐसा मसला तो है नहीं। मसला खड़ा कर दियाजाता है।कोई कोई बहाना ढूंढता है कि किसी तरह सेकुर्बानी पे रोक लगाएं। कोई बहाना ढूंढताहै कि किसी तरह से गोश्त खाने पे रोकलगाएं। कब को रोक लगाएं? जब यहां से हमारेप्रोसेशंस गुजर रहे होंगे या हमारी इबादतका कोई वक्त होगा या कोई खास दिन होगा जिसदिन हम इस पर रोक लगाएंगे तो वो इसलिए तोनहीं है कि कोई क्लैश है सेकुलर लॉ में औरपर्सनल लॉ में अकोमोडेशन और एडजस्टमेंट तोहर एक करता है कि अब जैसे अजान का वक्त हैतो अजान के वक्त में मुसलमान अगर तकरीर कररहे हैं तो वो तकरीरखुद भी रुक जाता है।रुक जाते हैं। लेकिन अगर कोई और शख्स हैजो मुसलमान नहीं है वह तकरीर करता है तोवह भी लिहाज़ में वह भी चुप हो जाता है।वह भी कहता है 2 मिनट हम रुक जाते हैं।इसमें क्या बात है? 2 मिनट रुक जाते हैं।उसी तरह से जो खास कोई ऐसा इनके मजहब मेंकोई ऐसा खास दिन हो, मौका हो जब केमुसलमानों को थोड़ी सी कुर्बानी देनी पड़ेइस बात की कि हम आज यहां पर हम आज यहां परगोश्त नहीं बेचेंगे। आज हम गोश्त नहींखाएंगे। तो मुसलमान तो करने के लिए तैयारहैं। हम इस मुल्क में एक साथ एक एक दूसरेके साथ मिलकर और एडजस्ट करके हमअपनी जिंदगी जीते हैं। और जीने के लिए हमलोग तैयार हैं। इसमें तो कोई मसला नहींहै। मसला कहां है? मसला वहां है कि आप जोकरते हैंउससे दूसरे पर कोई असर नहीं पड़ता।हमउससे दूसरे पे कोई असर नहीं पड़ता। अबजैसे नमाज़ का मसला है कि आप नमाज़ पढ़ते हैंऔर आप घर के अंदर मैं उस हादसे की बात कररहा हूं जहां घर के अंदर नमाज़ हो रही है।हमअब जमात मेंजमात तो घर के अंदर भी हो सकती है ना जबआप बाहर नहीं जा पाए किसी वजह से बारिश होरही है। मौसम खराब है। तो आपने घर मेंजमात जमात कर ली। अब कोई पुलिस वाला आकेकहे कि आप जमात कैसे कर सकते हैं? येमस्जिद नहीं है।हमतो उनको क्या उनको क्या तकलीफ हो रही हैकि आप घर में नमाज़ पढ़ रहे हैं। उनको क्यातकलीफ हो रही है? आप उनकी छाती पर जाकरनमाज पढ़े तो वो शिकायत कर सकते हैं। आपसड़क पर नमाज पढ़ें और वो कहें कि भाईहमको तकलीफ है हम जा नहीं सकते हैं तो वोशिकायत कर सकते हैं। लेकिन आप फिर जवाबमें ये कहते हैं कि भाई इस सड़क पर कभीआपके भी प्रोसेशंस निकलते हैं। कभी आपकाभी यहां से यहां पर कोई रिलीजियस प्रोसेशनकल निकलता है तो हम भी रुक जाते हैं। एकघंटे दो घंटे के लिए हम भी रुक जाते हैं।अगर हमारे पास जगह नहीं है। आप मस्जिद कीजगह दे दीजिए। हम मस्जिद में पड़ेंगे। आपईदगाह की जगह दे दीजिए। हम वहां पड़ेंगे।जैसे गुड़गांव में जो मसले हुए थे कि आपहमको जगह दे दीजिए। हम वहां पढ़ेंगे।लेकिन अगर जगह नहीं है तो हम नमाज तो नहींछोड़ सकते हैं। इसलिए हम यहां पढ़ते हैंऔर उसकी इजाजत लेकर हम पढ़ेंगे और इजाजतलेंगे तो हमको सिर्फ एक घंटे के लिए आधेघंटे के लिए इजाजत चाहिए होती है। आप हमकोआधे घंटे के लिए इजाजत दे दीजिए। आपकोपहले से मालूम होगा। तो ये एडजस्टमेंट औरअकोमोडेशन है।ये सेुलर लॉ प्रिवेलिंग ओवर पर्सनल लॉ यापर्सनल लॉ प्रिवेलिंग ओवर सेकुलर लॉ नहींहै।क्योंकि पर्सनल लॉ सेुलर लॉ का हिस्सा है।कॉन्स्टिट्यूशन से अलग नहीं है।जो भी पर्सनल लॉ है और उसको जो भी जो भीउसको महफूज़ रखने का वायदा किया गया है वोकॉन्स्टिट्यूशन में है।दो इंटरेस्टिंग चीजें अह ऑब्जरवेशन फिर दोसवाल। एक जैसे एक फैमिली होती है। दो तरहके भाई हैं, फादर हैं। डिफरेंस है।हालांकि फैमिली का एक सिस्टम है। उसकेबावजूद आप एडजस्ट करते हैं। बहुत सारीचीजें होती हैं। दूसरा ये मैं समझना चाहरहा था कि ठीक है। सेकुलर लॉ का हिस्सा हैपर्सनल लॉ। जैसे इवन इस्लामिक लॉ में आपकेयहां पे अगर टू यू योर ओन रिलजन टुवर्ड्सयोर। जहां पे भी है उसके बाद ये कि आपकेपर्सनल लॉ है। तो जो लीगल प्लूरलिज्म हैवो एंबेडेड है शरिया में।अब्सोलुटली।इसी तरह सेकुलर लॉ में पर्सनल लॉ एंबेडेडहै।अब्सोलुटली। वंस यू हैव डिसाइडेड टू अियरटू अ सर्टन कोड ऑफ़ कंडक्ट।अब्सोलुटली।सेकंड चीज ये है कि ठीक है ये बात सही हैआपकी। मैं इससे एग्री करता हूंप्रिंसिपली।बट सवाल ये होता है कि जब बाबरी मस्जिदमें 1991 में कोई जजमेंट आता है तो ये बातहोती है कि एसेंशियलिटी क्या है? कि अबइसकी रीडिंग कौन करेगा? सवाल ये है ना किभ अब उसको सेुलर और उसके बीच की जो रीडिंगहै हु विल डू द रीडिंग? दैट चेंजेस द गेमऑन।एक मसला है एसेंशियलिटी ऑफ़ रिलीजन। लेकिनकोर्ट ने कोर्ट ने भी जब भी एसेंशियलिटीपर कुछ कहा है तो अक्सर कोर्ट ने यह कहाहै कि भाई हम कौन होते हैं इसको तय करनेवाले हम इसको तय करने वाले कौन होते हैंइसको तो वही लोग जो जो रिलीजन से जुड़ेलोग हैंजो मजहब से जुड़े लोग हैं वही तय करपाएंगे ना हम कौन होते हैं तय करने वालेये तो कोर्ट ने खुद कहा हैअब जैसे एक फैसला आने वाला है सबरीमाला काहमउसमें ये सारी चीजें वाज़ होंगी उसमें मेंतो मुसलमान नहीं है ना तो उसमें वो इशूनहीं है कि ये मुस्लिम वर्सेस नॉनमुस्लिम्स है।वो हिंदू समाज के अंदर का ही एक मसला है।एक पर्टिकुलर सेक्ट का मसला है। लॉर्डआयापा का मसला है कि उनके जो फॉलोअर्स हैंवो किस तरह से मजहब को मजहब की नयत कोदेखते हैं। वो है मसला। अब उसमें ये सारेसवाल उठे हैं कि इसको कौन तय करेगा? हमवो लोग खुद तय करेंगे या हम जजेस तयकरेंगे या हिंदू समाज जनरली तय करेगा। यहसारे मसले बहस में आए थे और इन चीजों परकुछ ना कुछ बहुत साफ गोई से सुप्रीम कोर्टकहेगा। तो इंतजार करते हैं क्योंकि अक्सरक्या होता है कि कोई सवालके जवाब देने में कभी-कभी तासुब आ जाए तोमसला हो जाता है। कभी-कभी पब्लिक प्रेशर आजाए तो मसला हो जाता है। लेकिन यहां पर जोतासुब या पब्लिक प्रेशर का अंदेशा हो सकताहै वो इस केस में नहीं होगा। क्योंकि वहमेजोरिटी केमसला प्रेसिडेंट भी तय करेगा किसजो आएगा जो ऐसा आएगा जो ऐसा फैसला होगा वोफिर सबको लागू होगा सब पर लागू होगा तोएप्लीकेशनतो हो सकता है उसमें पर्सनल लॉ वाले लोगजो हैंउनके लिए कि फायदे की बात भी इस इस जजमेंटपे आए तो इसका इंतजार करें देख क्या होताहैमुझे याद है कि जो सेकुलर लिबरलइंटरप्रिटेशन है मान लीजिए हिजाब के टाइमपे और बहुत सारे जो हिंदुत्व के जो लॉयर्सहैं मतलब उस साइड से लड़ते हैं। वहां पे येथा कि भ हिजाब इज़ एन एसेंशियल प्रैक्टिसको डिसाइड करने का हक उनके क्योंकि कल कोये सबरीमाला में हमारे ऊपर भी आएगा अगर येवो बनता है।और दूसरी जगह ये था कि भ नहीं यू हैव टूइंटरप्रेट इट फ्रॉम ए पर्टिकुलरपर्सपेक्टिव। तो कई बार ये भी होता हैमतलब ऑड है कि जो कम्युनिटीज से हमडिफरेंट काइंड ऑफ़ अरेंजमेंट्स एक्सपेक्टकरते हैं वो डिफरेंट कॉन्फ़िगरेशन है।बेशक बेशक बेशक। लेकिन आखिर में ये वहीलोग फैसला कर सकते हैं जिनका मजहब से कोईताल्लुक है वही कर सकते हैंऔर जाहिर है कोर्ट इस इस बात इस बात कोअहमियत देगा कि हम जो भी समझे और हम जो भीचाहें लेकिन जब मजहब से जुड़े हुए लोग येमानते हैं कि इस लेकिन मजहब से जुड़े हुएलोग हो या खास मामूली मुसलमान हो वो अपनीबात को कहने का तरीका समझें कि वो तरीकावो होना चाहिए जिससे दूसरा आदमी बात कोसमझ सके।हम यह भी कह सकते हैं कि आप चाहो जो चाहोकर लो हम तो यह करेंगे। यह भी कह सकतेहैं। हम यह भी बता सकते हैं कि जरा इस पेगौर करिए कि कितनी अच्छी चीज है।इससे आपका कोई नुकसान नहीं है। जिस तरह सेआप और मजहब के लोगों को अलऊ करते हैं।जैसे सिख मजहब के लोगों को अलाऊ करते हैं।पगड़ पहनने के लिए अलाऊ करते हैं। कभी-कभीआप ये जरूर कहते हैं कि भाई उसका रंग जोहै वो रंग आपके यूनिफॉर्म से मिलना चाहिए।वो रंग यूनिफॉर्म्स के अलग ना हो। इतना आपजरूर करिए। कोशिश करिए कि आप इसमेंअसिमिलेट हो सके। उसी तरह से हिजाब में भीआप यह कह सकते हैं कि उसका रंग यूनिफार्मसे मिलना चाहिए। उसको यूनिफार्म से अलग नाहो।और ये हमारी खुशकिस्मती है कि हिजाब परकोई ये कहीं ताकीर नहीं की गई है कि हिजाबएक किसी किस्म के रंग का ही होगा।ये कहीं ताकीर नहीं की गई। तो जहां मसलानहीं हैवहां मसला क्यों खड़ा करें?अच्छा आपने एक और ये जो इससे एक औरऑब्जरवेशन फिर हम आगे बढ़ेंगे। हमआपने बोला कि जो कॉन्स्टिट्यूशन है औरउसका जो सेुलर फ्रेमवर्क है उसमें जोपर्सनल लॉज़ हैं वो एंबेडेड हैं।लेकिन अब मैं लॉ में ट्रेंड तो नहीं हूंलेकिन क्योंकि फिलॉसोफी मेरा सब्जेक्ट रहाहै और फिलॉसफी ऑफ़ लॉ के पर्सेक्टिव से कईबार चीजों को देखता हूं। तो जो आपकाप्रियमबल है जो आपका कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडीहै और जो आपका डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैजो आपका प्रएमबल है उसमें तो 10 ऐसेवर्ड्स हैं जिसको आप जिस तरह फ्रेटरनिटीको आप अपनी फिलॉसफी से कैसे सोच रहे हैंया दूसरे जो आपकी चीजें हैं लेकिन जोडायरेक्टिव प्रिंसिपल्स हैं वो बड़े वाज़हैं कि भ हमें यूनिफॉर्म सिविल कोड की तरफबढ़ना है। हमें या काऊ सैक्रिफाइस या बहुतसारी ऐसी मुख्तलिफ चीजें हैं जो कहीं नाकहीं टेंपरामेंट सेट करती है कि आपकीरीडिंग भी किस डायरेक्शन में हो। नहींदेखिए इसको भी बहुत सिंपलीफाई कर दिया गयाहै। हमपहली बुनियादी बात तो हम याद रखें किकोर्ट ने बार-बार ये कहा है कि डायरेक्टिवप्रिंसिपल्स स्टेट पॉलिसी जो है वोफंडामेंटल राइट्स को ओवरूल नहीं करते।हमें डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स और फंडामेंटलराइट्स को साथ देखना पड़ेगा। हार्मोनाइजकरना पड़ेगा। हानाइज का मतलब ये है कि कभीफंडामेंटल राइट भी डायरेक्टिव प्रिंसिपलके ऊपर हो सकता है।ये भी हो सकता है कि फंडामेंटल राइट इतनाइंपॉर्टेंट है कि वो डायरेक्टिव प्रिंसिपलके ऊपर रहेगा। ये भी हो सकता है। औरफंडामेंटल राइट कितना मजबूत है एकबुनियादी तौर पर किसी भी इशू पर फंडामेंटलराइट कितना इंपॉर्टेंट है। पहले उस पर हमलोग गौर फरमाएं। उसको उसको हम देखें। हमये ना समझे कि क्योंकि क्योंकि डायरेक्टिवप्रिंसिपल में कोई बात कह दी गई है। कह दीगई है तो उस बात पर कहीं आप 19 से 20 नहींकर सकते हैं क्योंकि यह कहीं नहीं कहा गयाहै कि डायरेक्टिव प्रिंसिपल में जो हैउसके बाद फंडामेंटल राइट का कोई मकसद नहींबचता है। फंडामेंटल राइट में बिनाडायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के भी फंडामेंटलराइट में जो रीज़नेबल रिस्ट्रिकशंस हैं वोहैं।हमरीज़नेबल रिस्ट्रिकशंस ये हैं कि आपको अपनीबात कहने का हक है। लेकिन आपको अपनी बातकहने का हक मतलब ये नहीं है कि एक भरे हुएथिएटर के अंदर जो लॉयर्स को बच्चों कोसिखाया जाता है कि भरे हुए थिएटर के अंदरजब अंधेरा हो और आप चिल्ला दें आग लग गईआग लग गई आग लग गई और उस उस चिल्लाने कीवजह से लोग वहां भगदड़ मच जाए और लोगों कोलोगों को तकलीफ हो लोगों को शिकायत हो औरलोगों को वहां पर वो उठाना पड़े नुकसानउठाना पड़े ये तो करने का आपको हक नहीं हैतो रीज़नेबल रेस्ट्रिक्शन हैतो रीज़नेबल रिस्ट्रिक्शन में ही फंडामेंटलराइट्स जो है वो महदूद है। रीज़नेबलरिस्ट्रिकशंस में। अब क्या रीज़नेबल है वोमौके पर डिपेंड करेगा। वो हालात पे डिपेंडकरेगा। जब आप अगर आप किसी इमरजेंसी के हालमें हैं आपके मुल्क पर कोई हमला कर रहा हैतो उस वक्त कितनी इजाजत है आपको अपनी बातकहने की और जिस वक्त पीस टाइम है उस वक्तकितनी इजाजत है आपको अपनी बात कहने की?इसमें फर्क होगा। जीइसमें फर्क होगाकॉन्टक्सुअल हैकॉन्टक्सुअल है तो आपको ऐसा नहीं है कियही कहीं पर अगर अगर डायरेक्टिवप्रिंसिपल्स ने कुछ कह दिया और मैं येसमझता हूं कि जैसे यूनिफॉर्म सिविल कोर्टका मसला हैयूनिफॉर्म सिविल कोर्ट को अभी तकडायरेक्टिव प्रिंसिपल में जो कहा गया हैउसको अभी किसी कोर्ट ने पूरी तरह से टेस्टनहीं किया है। यह नहीं कहा है कियूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का मतलब क्या यह हैकि पर्सनल लॉ खत्म हो जाएगा। हम्।क्या यह मतलब है कि पर्सनल लॉ ख़ हो जाएगा?आज तक कोर्ट ने यह नहीं कहा हैकि पर्सनल लॉ ख़ हो जाएगा। जब पर्सनल लॉ ख़होगा तो किस हद तक खत्म होगा? किस हद तकखत्म होगा? पर्सनल लॉ में जैसे वो यहमानते हैं कि पर्सनल लॉ में बुनियादी तौरपर जो फोकस है वो फोकस हमें करना है।सक्सेशन पे करना है। प्रॉपर्टी पे करनाहै। मैरिज लॉ मैरिज और डिवोर्स पे करनाहै। वो कहते हैं बस यही चीजें हैं। पर्सनललॉ में तो बहुत सारी चीजें और भी हैं।लेकिन इन्हीं पे क्यों तवज्जो दे रहे हैं?अगर वो जिस पर तवज्जो दे रहे हैं उसकाउसका जो वो रीजन है जो उसका पर्पस है वोये है कि आपके इस पर्सनल लॉ से किसी और कोतकलीफ पहुंच रही है। इसलिए हम इस पे रोकलगाना चाहते हैं। तो पहले ये बताएं किक्या तकलीफ है?ये तो बताएं कि क्या तकलीफ है? अब जैसेडिवोर्स का मसला है। तीन तलाक का मसला है।इस पे मैं आपको कुछ बताऊं।तीन तलाक का मसला उसमें एक इंटरप्रिटेशनबहुत क्लियर है। वो इंटरप्रिटेशन क्या है?और मैंने कई लोगों से ये बात कई दफा ओवर दइयर्स पूछी है। तो बेसिक बात क्या है कितीन तलाक का मसला यह है कि तलाक तो तलाकही होती है।और मुझे किसी ने ये कहा कि आप 100 दफा देंया आप 1000 दफा दें। तलाक एक ही दफा होतीहै।तलाक होती है और यह एक बड़ा मॉडर्न एकबहुत मॉडर्न वो है। हमको एक ओपोरर्चुनिटीदी गई है कि जहां पर तलाक की जरूरत हैवहां आप तलाक दे सकते हैं। आपको 20 सालरुकने की जरूरत नहीं है। लेकिन तलाक केलिए कुछ कंडीशंस रखी गई है कि तलाक सेपहले दोनों तरफ के बुजुर्ग आपस में बैठकरकोशिश करें कि तलाक टल सके। तलाक का कामामला जो है उसको रोका जा सके और अगर ऐसानहीं होता है तो फिर आपने जो वायदे किएहैं आपने जो आपका जो आपके फर्ज बनते हैंउनको आप पूराजो आपका कॉन्ट्रैक्ट था या जोकॉन्ट्रैक्ट है उस कॉन्ट्रैक्ट को फुलफिलकरिए फिर आपको तलाक मिल जाएगीदिस इज अ वैरी मॉडर्नजो लोग ये समझते हैं लोग ये समझते हैं डूइट योरसेल्फ डिवोर्स आज अमेरिका में होरहा है लोग ये समझते हैं कि तलाक का मतलबक्या है कि बस खड़े-खड़े आप औरत को बाहरनिकाल देते हैं ऐसा नहीं है ना नफा आपकोतीन महीने की उसको उसको रेजिडेंस देने कावह सारी चीज़ है। इद्दत के दौरान उसको अबइद्दत के दौरान उसको आप तलाक दे देते हैं।तलाक हो जाती है। लेकिन टेक्निकली मानिएकि वो सेपरेशन है।क्योंकि इद्दत के दौरान आप वो तलाक वापसले सकते हैं। रुजू कर सकते हैं। वापस लेसकते हैं।हमदूसरी दफा आप कहते हैं तो वो रिफर्म होजाती है। उसको भी आप रुजू कर सकते हैं।तीसरी दफा तलाक देने के बाद आप फिर वापसनहीं ले सकते हैं। नहीं ले सकते हैं।तीसरी दफा के बाद क्यों नहीं ले सकते हैं?क्योंकि यह एक फ्रिवलस बात हो गई ना किआपने जब चाहा तलाक दे दी फिर वापस ले ली।जब चाहा तलाक दे दी वापस लेवो भी एक राइट्स का मसला हो जाएगा। औरवो भी एक राइट्स का मसला होगा। तो इसलिएपाबंदी है। किस पर है? पाबंदी देने वालेपर है।देने वाले पर है। और लोग यह भी नहीं यह भीनहीं याद रखते हैं कि तलाक तो मर्द देताहै। यह सही है। लेकिन अपने अपने निकाहनामेमें मर्द डेलीगेट भी कर सकता है। तलाक काहक अपनी अपनीवाइफ को डेलीगेट भी कर सकता है। फिर आपकाम्यूचुअल डिवोर्स का भी एक तरीका है कि आपम्यूचुअल डिवोर्स भी कर सकते हैं। तो जोबीवी को भी बहुत सारे हुकूक दिए गए हैंजिस पर लोग जिसको नजरअंदाज करते हैं वहसिर्फ यह कहते हैं कि आपके यहां तो बसतलाक तलाक तलाक हुआ वो खत्म हो गया। तोतीन तलाक तो कहीं जो सुप्रीम कोर्ट ने कहाहै तीन तलाक तो है ही नहीं कहीं इस्लाममें लेकिन तीन तलाक दे देने के बाद फिरआपको बहुत सारे आपको जो हुकूक मिले हुएहैं वो आपसे ले लिए जाते हैं। बड़ा सिंपलहै। एक बड़ा मॉडर्न सिस्टम है और इसमॉडर्न सिस्टम को मॉडर्न तरीके से हमइस्तेमाल करें तो उसमें क्या हर्ज है औरदूसरे का क्या हर्ज हो रहा है?दूसरी तो 20 साल कोर्ट में जा रहे हैं।हाजिरी लग रही है और कोर्ट के डेट के बादडेट लग रही है। तो उनका सिस्टम क्या बेहतरहै? इस सिस्टम से यह सवाल है इस पेगुफ्तगू हो डिस्कशन हो डिस्कोर्स हो फिरहम दिखा सके डाटा दिखा सकें कि कौन लेकिनइसका गलत इस्तेमाल कुछ लोग अगर करते हैंतो वो वो बात अलग है आप गलत इस्तेमालगाड़ी को गलत जगह पार्क करते हैं तो आपकीये थोड़ी होगा कि आपको गाड़ी नहीं मिलनीचाहिएऔर कम्युनिटी में भी उसके खिलाफआर्गुमेंट्स है ऐसा नहीं है कि सारेआर्गुमेंट्स हैं। ठीक है? ये बात तो हो गईकि इस तरह से हम देख सकते हैंकॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यूस को,कॉन्स्टिट्यूशन के वजूद को। लेकिन यह बातभी सच है कि पॉलिटिकल थ्यरी में एप्लीकेशनमें पावर एसिमेट्री ये भी एंबेडेड है।नेशनलिज्म में मेजोरिटेरियनिज्म और आज जोहिंदुस्तान को एथनो नेशनलिस्ट स्टेट बोलाजाता है। यहां तक कि हिंदुत्व एकसिविलाइजेशनल स्टेट बन चुका है। तो जब येसारी बात सामने आती है और मैं ये देखताहूं आपका करियर कि भ आप एक बहुत ही जोशुरू में भी बात हुई कि वेल अकंप्लिश्डइंडियन मुस्लिम रहे हैं। कभी आपको महसूसहुआ अपने करियर में 2014 से पहले कि देयरइज लिमिट्स टू एक्टिंग लाइक अ मुस्लिम इनमुस्लिम डिमांड्स। मैं ये नहीं बोल रहाहूं कि भ और जगह पे जनरल जो इशूज़ हैंमैं आपको दिलचस्प जवाब दूंगा इसका। मुझेअब यह यह मानिए कि मेरी खुशकिस्मती हो औरयह हुस्ने इत्तेफाक है कि मुझे कभी यहएहसास जिंदगी में नहीं हुआ कि मैं मुसलमानहूं इसलिए मेरे खिलाफडिस्क्रिमिनेशन हो रहा है या मुझे वह मौकानहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिए। मुझेइसका एहसास कभी जिंदगी में नहीं हुआ औरशायदऐसा हर एक के साथ नहीं होता है। मैंखुशकिस्मत होगा इसलिए मेरे साथ हुआ। लेकिनअगर मुझे कभी मसला हुआ है तो अपनी ही कौमसे हुआ है क्योंकि उनके जो तवकात होते हैंवो ऐसे होते हैं कभी-कभी कि अक्सर वो येसोच सकते हैं कि आपने ऐसा क्यों नहीं कियाहमजिस जमाने में बाबरी मस्जिद का मसला चलरहा था तो हम लोग हुकूमत में थे उस वक्तऔर आप को याद होगा वो वो वक्त याद होगा जबबाबरी मस्जिद पर इन लोगों ने चढ़कर बाबरीमस्जिद को डिमोलिश करने की कोशिश की थी तोये सवाल सवाल पूछे जाते थे कि आप क्या कररहे हैं हुकूमत में? आप क्यों हैं हुकूमतमें? आपको शर्म नहीं आ रही कि आप हुकूमतमें हैं? हमारे अपने लोग पूछा करते थे।और हम इस इस बात पे इस बात पे इलेक्शंसहारे भी हैं।हमअब ये दूसरी बात है कि इलेक्शन हारने केबाद अगली अगली दफा इलेक्शन हुआ तो लोग समझगए। लोगों ने जिताया भी। हमलेकिन अक्सर यह होता है कि मुसलमान को भीसेटिस्फाई करने में हम शायद नाकाम और रहतेहैं क्योंकि उनकी तवकात जो है वो इतनी हैकि उनको पूरा नहीं कर सकते। आप एक मिक्ससोसाइटी में रहें तो आप जब भी एक बात कहेंतो जो दर्द है उसको बयान जरूर करें। लेकिनबयान करें। किस तरीके से करें ताकि उसकाकुछ फायदा उसको हो सके। जो दर्दमंद हैउसको कुछ फायदा हो सके। यह एक स्ट्रेटजीकी बात होती है और अक्सर मैं लोगों से यहकहता हूं कि आईडियोलॉजी और स्ट्रेटजी मेंबड़ा फर्क होता है।आईडियोलॉजी हमारी सही रहे, मजबूत रहे,पाबंद रहे हम आईडियोलॉजी के। लेकिनस्ट्रेटजी में कभी-कभी हमको वो कदम उठानेपड़ते हैं जो स्ट्रेटजी आपके फायदे की हो।जिससे आपको फायदा हो जाए। हम आपका नुकसानकरके और ये कहें कि हम बहुत बड़े सुरमाहैं। हमने देखिए नुकसान कर दिया। लेकिनहमने अपनी बात कह दी तो क्या फ़ायदा है? अबजैसे आप आज देखिए हम लोग जो कांग्रेसपार्टी में हैं और कांग्रेस पार्टी में याएक सेकुलर जमात में रहते हैं और हम अपनीबात को कहने की कोशिश करते हैं और कहतेरहते हैं। तो हम किन-किन चीजों के दायरेमें बंद रहकर भी बात को कहने की कोशिशकरते हैं और उसमें कितने कामयाब होते हैंनहीं होते हैं ये तो आवाम को जज करना है।लेकिन वहीं असद असद असदुद्दीन ओवैसी साहबउनकी अपनी जमात है। वह कितना खुलकर बिनाकिसी बिना किसी रुकावट के बिना किसीपाबंदी के वह अपनी बात को कहते हैं। तोआदमी यह तो कह सकता है कि यार ओवैसी तोबहुत खुल के बात करते हैं। आप खुल के नहींबात करते हैं।लेकिन ओवैसी को क्या वो करना है इस मुल्कमें जो हमको करना पड़ेगा या करना चाहिए याकरना है कि हम किस तरह से मुल्क को एकजुटकरके लोगों को जोड़कर और एक सेकुलर समाजको मजबूत करके इस मुल को आगे बढ़ाएं। याहम यह कहें कि हम अपनी दो ईंट की अलग सेमस्जिद बनाएंगे, अलग नमाज पढ़ेंगे, अलगअपना काम करेंगे। एक्सट्रा क्या वो एकहमारे मुल्क का मुल्क को आगे बढ़ाने का काहमको नजरिया होना चाहिए या यह नजरिया सहीहै? अब इस पर फैसला तो उसका है जो हमसेडील करता है, जो आवाम हमसे डील करती है,उसका फैसला है।मैं तो अगर इसको प्रिंसिपली बात की जाए,जो आप बात बोल रहे हैं, मैं उससे एग्रीकरता हूं। लेकिन सवाल जब यह होता है कि हमएक आजादी के बाद से लेकर 90ज और उसके बादका यह पूरा सिलसिला देखते हैं तो उसमेंबहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिसमेंकॉम्प्रोमाइजज़ पॉलिटिकल चाहे वो आइडियोजैसा आपने बोला कि भई एक आईडियोलॉजी है एकस्ट्रेटजी है। तो कई बार ऐसा लगता है किशायद जो कांग्रेस की एक आईडियोलॉजी थी याहै जो उसकी प्रिंसिपल आईडियोलॉजी है। क्यास्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स हुई हैं? नहींयकीनन हुई है। उसमें दो राय नहीं है।देखिए आप इतनी कॉम्प्लेक्स सोसाइटी को अगरचलाएंगे तो उसमें स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्सआप कभी नहीं करेंगे। ये ये जो इस इस बातको कहने में हम लोगों को कोताही नहीं होनीचाहिए कि स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स होते हैं।लेकिन मुझे तकलीफ किस बात की है? मुझेतकलीफ इस बात की है कि आप अपनेस्ट्रेटेजिक मिस्टेक को कभी पब्लिकलीपब्लिकली एडमिट करें।कि हां हमसे ये गलती हुई। हमसे गलती हुईतो उसका बखान इतना किया जाता हैऔर उसको गलत इस्तेमाल इतना किया जाता है।अब आज का एक एक इशू देखिए आज जोइमरजेंसी थी इमरजेंसी जिसको 50 50 साल होगए 75 की [नाक से की जाने वाली आवाज़]इमरजेंसी उस पर बड़ा हंगामा कर रहे हैं।बीजेपी वाले कर रहे हैं और लोग कर रहेहैं। कुछ लिबरल्स भी होंगे जो कहते होंगेकि इमरजेंसी गलत थी। हां अब दबी जबान मेंलोग यह कह देते हैं कि वो इमरजेंसी गलत थीलेकिन जो अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी आज की हैये भी यह भी गलत है। अब इमरजेंसी के बारेमें अगर कोई हमसे सवाल पूछे कि वो गलत थीया सही थी तो हम क्या जवाब दें?अगर हम ये कह दें कि हां भाई गलत तो थी।बहुत गलतियां तो हमसे हुई उस पर और उसकाहमको नुकसान भी हुआ।हमें एहसास भी है इसका कि हमको एहसास तोफिर अगले दिन की हेडलाइंस क्या होगी?सलमान खुर्शीद ने कहा कि इमरजेंसी जो थीवो गलत थी।खैर इसीलिए मोदी अपनी गलती कभी नहींमानते।अब चलिए ऐसा मानने से फिरउनकी स्ट्रेटजी वो है कि वो नहीं मानते।लेकिन मैं ये कहता हूं कि हमें अपनी गलतीकोमानना जो है और उसका एहसास होना बहुतजरूरी है। बिकॉज़ हम अपने आप को बेहतर औरकैसे करेंगे? इंप्रूव कैसे करेंगे? अगरहमें ये कॉन्फिडेंस ना हो कि हम अपनी बातको कह सकें। हमलेकिन साथ-साथ हमको यह भी तो कहना पड़ेगाकि इमरजेंसी कॉन्स्टिट्यूशन के बाहर सेनहीं थी। कॉन्स्टिट्यूशन के अंदर से थी।अब वो उसका इंटेंट गलत हो सकता है। उसकाइस्तेमाल गलत हो सकता है। उसके आउटकम्सगलत हो सकते हैं। वो अपनी जगह है। लेकिनकॉन्स्टिट्यूशन के तहत ही इमरजेंसी लगीथी। तो वो तो कॉन्स्टिट्यूशन जिन्होंनेबनाया जिन्होंने कॉन्स्टिट्यूशन को को पेशकिया मुल्क को और मुल्क मुल्क ने उसकोरिसीव किया कॉन्स्टिट्यूशन को। उसकॉन्स्टिट्यूशन के तहत इमरजेंसी लगी थीतो ये कॉन्स्टिट्यूशनल लिमिट्स को भी वाज़करता हैऔर उसको सुप्रीम कोर्ट ने उसको सुप्रीमकोर्ट ने अपहोल्ड किया था। एडीएम जबलपुरमें सुप्रीम कोर्ट ने उसको अपहोल्ड कियाथा। अब वो सुप्रीम कोर्ट को उस जजमेंट कोरिवर्स करने में 25 साल लग गए।25 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नहींवो गलत थी जजमेंट।वो जजमेंट गलत थी। 25 साल बाद कहा तो 25साल तक तो ये कहा जाएगा कि हमने जो कियाथा वो कॉन्स्टिट्यूशनली गलत नहीं था।और 25 साल के बाद आप क्या सजा दोगे? जब आपआप सजा हमको दे चुके हैं। आपने यह दिखायाकि आपने हमको हमको हुकूमत से बाहर करदिया। आपने इख्तदार से बाहर कर दिया। और18 महीने बाद आपने उस पर फिर से गौरफरमाया और आप फिर हमको जिता के ले आए।उसी शख्स को ले आए जिसको आपने बाहर निकालाथा। इंदिरा गांधी को आप लेके आ गए। तो येभी तो कोई चीज है। इसका भी तो बैकड्रॉपइसका भी तो कॉन्टेक्स्ट है। उसको पूरासमझाना होगा। सिर्फ ये कहना है कि ये तोकॉन्स्टिट्यूशनल कॉन्स्टिट्यूशन के हीखिलाफ है। इन्होंने तो कॉन्स्टिट्यूशन कोदफा ही कर दफन ही कर दिया था।कॉन्स्टिट्यूशन को खत्म ही कर दिया था। येबात कहना भी तो नाजायज है।इसमें तो लेकिन खुशी साहब कई बार ऐसे भीहो सकता है कि डिस्पाइट द फैक्ट दैट दबीजेपी गवर्नमेंट टुडे बहुत ज्यादा नुकसानपहुंच रहा है आम हिंदू को भी। लेकिन उसकेबावजूद उनको जिता देते हैं। कई बार क्याहोता है कि मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैंकह रहा हूं कि कई बार जज्बात कॉन्टेक्स्टबांग्लादेश का उस वक्त क्या चल रहा था वोआई मीन अ लॉट ऑफ़ थिंग्सएवरीथिंग एवरीथिंग लेकिन भाई एक ही दफानहीं जिताया ना कई दफा जितायाअच्छा आपने क्योंकि ये बोला कि ठीक हैगलती मानी बहुत अच्छी बात है और मुझे लगताहै कि ये एक बेहतर तरीका भी होता है औरउसके बाद लेकिन दो चीजें इससे निकल कर आतीहै दो सवालएक सवाल ये है कि वो जो 70 साल में येकांग्रेस की सिर्फ बात नहीं है कांग्रेसको तो उसका एक वो बना दिया जाता है। लेकिनजनरली जो सेुलर पॉलिटिक्स या सोशलिस्टपॉलिटिक्स हुई है चाहे वो रीजनल हो उसकाजो हैविएस्ट बर्डन है वो तो मुसलमानों कोसहना पड़ा है। मतलब चाहे वो सच कमिटीरिपोर्ट हो जिसमें हम आएंगे। तो द कॉस्टऑफ दोज़ स्ट्रेटेजिक मिस्टेक्स मे बीडिस्रोपोशननेटली सो हाई दैट द कम्युनिटीफोर्स टू यू नो एक्सप्रेस देयरफ्रस्ट्रेशन देयर एंगर।हम जरा सी जरा सी कहीं पर कोई गलती करतेथे। हम पर उंगली उठती थी ना। ऐसा नहीं थाकि हम पे कभी उंगली नहीं उठ। हमनेस्कॉलरशिप्स दिए। बच्चों को पढ़ाई के लिएस्कॉलरशिप्स दिए। अगर वह स्कॉलरशिप्स में5 लाख से 4 लाख किसी साल हो जाते थे तोफौरन खड़े हो जाते थे लोग कहने के लिएदेखिए कांग्रेस का नियत जो है वो खराब हैऔर कांग्रेस ने देखिए ये गलत किया औरकांग्रेस ने हमारी हमारी स्कॉलरशिप छीनली। वो सब कहा कहते थे कि नहीं कहते थे।अब जीरो सिफर स्कॉलरशिप दी जा रही है। कोईकुछ नहीं कह रहा है। कोई कुछ नहीं कह रहाहै। जो आज जो आज पुलिस हमारे जमाने में भीगलत हरकतें करती थी। हमारे जमाने में भीराइट्स होते थे। हमारे जमाने में भीराइट्स में लोग शिकायत करते थे। लेकिन कमसे कम हम लोग बैठ के लोगों की बात सुनतेथे। हम लोगों के साथ जाकर गुफ्तगू करतेथे। हम उनके यहां घर-घर जाकर पूछते थे।क्या हुआ? कैसा हुआ? क्या हम आपको राहत देसकते हैं? एक्सट्रा। आज क्या हो रहा है?सीएए और एनआरसी के राइट्स के बाद आज क्याहो रहा है? तो आज ये भी तो एहसास होनाचाहिए कि हम इनकंप्लीट थे या इनपरफेक्टथे। लेकिन आज वो इमपरफेक्ट होने की वजह सेऔर आपकी जो शिकायतें थी और आपकी जो जोअपोजिशन थी उसने आज मुल्क को कहां ला केखड़ा किया है? आज कहां ला के खड़ा किया किआपको शिकायत करने का हक भी नहीं है।ये तो मानना पड़ेगा ना।बिल्कुल। और एक अब असल में हो ये जाता हैकि एप्पल्स और ऑरेंजेस का समाज का वो करनेलगता है कंपैरिजन। जैसे कई बार जब मुझेमिला मौका बोलने का बहुत जगहों पे हमाराअपना क्रिटिक है। चाहे वो कांग्रेस का होचाहे दूसरे का हो। वो आप ओवैसी को भीक्रिटिक करते हैं। मतलब विद इन कम्युनिटीहर तरह की पॉलिटिक्स का क्रिटिक है। उसनेक्या दिया, कहां पे कैसे दिया।लेकिन बीजेपी और कांग्रेस को कंपेयर करनायह भी एक जिसे कहते हैं मैसिव जंप हो जाताहै। एक थ्योरेटिकल जंप भी हो जाता है। औरउससे क्या होता है कि कई बार कि जोइंटरप्रिटेशंस आते हैं कि भ एट द एंड ऑफ़ दडे इट इज़ अलाइक चाहे बीजेपी हो चाहेकांग्रेस हो वो भी ना थ्योरेटिकली नासब्सटेंटिवली इट डजंट मेक उसकी मीनिंगनहीं आती है कुछ। लेकिन उस सबके बावजूद एकऔर सवाल जो इसका निकल कर आता है वो येनिकल कर आता है किगलती मान लीहमें ये पता लग गया कि जो अब जो ताकतेंहैं वो किस तरह की हैं लेकिन 2014 के बादसे लेकर 2026 तक अभी शायद रिसेंटली ये हुआकि मुसलमान शब्द का इस्तेमाल होना चाहिएअगर उनके खिलाफ वायलेंस हो रहा है। सच्चकमेटी में सबसे पहले सबसे पहले हमनेमाइनॉरिटी से हटकर मुसलमान का नाम रखा थासच कमेटी में और वो एक बहुतबहुत सारे लोग उसको शायद पकड़ नहीं पाएलेकिन वो बहुत डेलीबेटली बहुत सोच समझ केवो कहा गया था और उसमें डॉक्टर मनमोहनसिंह का बड़ा हाथ थाकि हम इस बात से कतराएं क्योंहमको डील करना है मुस्लिम आउटकम्स पे औरमुसलमानों के जो हालात है उस उस पर हमलोगों को गौर करना है तो हम उनको मुसलमानही कहें उन्हें माइनॉरिटी क्यों कहेंसच्चे कमेटी में इस्तेमाल हुआ था उसके बादफिर लोगों ने कहा कि यार देखो पोलराइजेशनबढ़ता है मुसलमान मत इस्तेमाल करोमाइनॉरिटीज पे आ जाओ अल्पसंख्यक पर आ जाओएक्सट्रा एक्सट्रा जो अभी बात फिर से कहीहै राहुल गांधी साहब ने फिर से कही हैउन्होंने कहा कि नहीं लेट्स फोकस लेट्सफोकस हमारा फोकस क्या है अगर कोई चीजमुसलमान के खिलाफ हो रही है तो मुसलमानकहो उसको अगर किसी कोई जैन के खिलाफ होरही है तो जैन कहो उसको अगर सिख के खिलाफहो रही है तो सिख कहो कहो उसको माइनॉरिटीजकाबट डू यू थिंक इट टूक अ लॉन्ग टाइम 14इयर्स ऑफ़इट्स नॉट अ क्वेश्चन ऑफ़ नॉट अ क्वेश्चन ऑफ़14 इयर्सक्योंकि आपने जैसे बोला 2007 मेंप्रिंसिपल अंडरस्टैंडिंग थी ऐसा नहीं हैकि अब ये अंडरस्टैंडिंग अब हालात देख केबनी है बीच में क्या हुआबहुत सारे लोग बहुत सारे लोग सर्च कमेटीके खिलाफ थे ना मैं तो माइनॉरिटी मिनिस्टररहा हूं बहुत सारे लोग कहते थे इसको दबाइएइसको दबाइए इसका रिएक्शन अच्छा नहीं होगाऔर आज आप लोगों से पूछे बहुत सारे लोगशायद यह कहें कि भाई आपने जो सर्च कमेटीवगैरह किया इक्वल ऑपर्चुनिटी कमीशन वालीबात कही उससे ही सारे रिएक्शन हुए लेकिनवो सरासर गलत है। रिएक्शन तो बहुत चीजोंकी वजह से हुए होंगे और उस पर आप तफसीलीअगर रिसर्च करेंगे तो यकीनन आपको वो सारेस्टैंड्स मिल जाएंगे कि वो रिएशंस क्योंहुए? समाज में बदलाव आते हैं। समाज में येअप्स एंड डाउन्स आते हैं और उसकी वजह सेये रिएक्शंस आए हैं। अब इसका उसमें कोईहिस्सा था कि नहीं था। आई डोंट नो। लेकिनमैं यह मानता हूं कि सचर कमेटी का जोपैगाम था वो हिंदुस्तान के मुसलमानों कोएक अच्छा और मजबूत पैगाम दिया गया था।बहुत कुछ फायदा हम कर भी पाए लेकिन जितनाफायदा का तसवुर हमने किया था सर्च कमेटीके दायरे में वो हम नहीं कर पाए।बिफोर कमिंग बैक टू दिस इशू क्योंकि एकथीम है जिसमें हम इस पर बात करेंगे। मेंहल्का सा हिंदुत्व और हिंदुत्व का जोइंटरेक्शन रहा है क्योंकि एज अ पार्टीबीजेपी जनसंघ पहले फिर बीजेपी लेकिन रियलकंसोलिडेशनशायद जैसे कहते हैं 200 के बाद और स्पेशली2014 के बाद हुआ लेकिन उससे पहले भी येपॉलिटिक्सचलती रही और जैसे हमने पहले भी बोला कि भइसकी कॉलोनियल जिनलॉजी भी है। आप मदन मोहनमालविया को ले लीजिए। एक जमाने में जब हमकांग्रेस को देखते हैं प्री पार्टीशन औरपोस्ट पार्टीशन या इंडिपेंडेंसकांग्रेस भी दो अलग एंटिटीज हैं। एक तरीकेसे अगर देखा जाए प्रिंसिपल आईडियोलॉजीसामने रख लें अलग बात है। लेकिन अगरकार्डर को देखा जाए एक वो कांग्रेस है जोकॉलोनियल मूवमेंट में सोशलिस्ट भी साथहैं। हिंदू नेशनलिस्ट भी साथ हैं। मुस्लिमनेशनलिस्ट भी साथ हैं। मुस्लिम्स वो जोसेपरेट इलेक्टोरल चाह रहे हैं वो भी साथहैं। हिंदू हिंदुत्व के जो सोच रखने हिंदूमहासभा भी इट इज़ अ कॉम्प्लिकेटेड कॉकटेलऑफ अ लॉट ऑफ़ आइडियोलॉजीस जो एक तरह से येसोच रही है स्ट्रेटेजिकली ये जो फ्रेमवर्कहै फिलहाल हम इससे ब्रिटिश से एंगेज करसकते हैं। पार्टीशन के बाद या इंडिया केइंडिपेंडेंस के बाद वो बहुत सारा एलिमेंटक्योंकि राहुल गांधी और बाकी मुस्लिमलीडर्स ने या कांग्रेस लीडर्स ने कहा हैकि हमारे यहां भी एक हिंदुत्व और फार राइटहिंदू नेशनलिज्म का एलिमेंट है हमारीलीडरशिप में भी। तो आपको क्या लगता है किजो इसमें क्योंकि नेहरू ने भी एक बार बोलाकि भ ये असरात आपको बाद में दिखेंगे जोविद इन पार्टी जो एक तरह की पॉलिटिक्स हैतो यहां पे कहां पे कोताही हो गई किस्ट्रेटेजिकली पॉलिटिकली क्योंकि येफ्यूचर में भी जिस तरह से इंटरेक्शन रहेगाहिंदुत्व एज अ फोर्स व्हाट इज हिंदुत्वअकॉर्डिंग टू यू उसकी एंगेजमेंट कीलिमिट्स क्या है सेकुलर पॉलिटिक्स के साथदेखिए हिंदुत्व हिंदुत्व जो अवेरी क्लियरली उसके दो पहलू में एकहिंदुत्व है, एक एक कल्चरल कांसेप्ट है जोरिलजन से जुड़ा हुआ है, लेकिनएक्सक्लूसिवली रिलजन नहीं है।हमबिकॉज़ कल्चर हमेशा एक रिलजन से बढ़ केदायरा होता है। लेकिन रिलजन का एक बहुतबड़ा हिस्सा होता है कल्चर में। तो एक तोकल्चरल आस्पेक्ट है हिंदुत्व का। और अबकोई कहता है राजस्थान से कोई आता हैराम-राम से, राम-राम से। मुझसे तो मुझे तोकोई फर्क नहीं पड़ता। कोई राम राम से कहताहै। एक जमाना था कि बहुत सारे लोग हिंदूआके आपसे मिलते थे तो वो वो आदाबज़ कहाकरते थे। अब बहुत सारे लोग ये समझते हैंहिंदुस्तान में कंजर्वेटिव मुस्लिम्स येसमझते हैं कि आदाबज़ क्यों कहते हैं आप?आपको अस्सलाम वालेकुम कहना चाहिए। आपआदाबज़ क्यों कहते हैं? लेकिन, एक अह एक एकहार्मोनी थी।एक हार्मोनी थी हमारे सेकुलर समाज में।जहां एक दूसरे के एक दूसरे के जो तौरतरीके थे उनको हम एक्सेप्ट करने की कोशिशकरते थे और जिस तरह से ये था कि भाई ईदबकरे ईद में हम एक मुसलमान के घर जाते हैंवहां पर उनके साथ बैठकर और बिरयानी खातेहैं एक्सट्रा और उसी तरह से होली दिवालीपर हम लोग एक हिंदू के घर जाते हैं औरउनके उनके जो भी वहां पर तौर तरीके होतेहैं उसमें हिस्सा लेते हैं। तो वो एकतरीका था और वो अभी भी जिंदा है। ऐसा नहींकि वो खत्म हुआ है। लेकिन जो एक कल्चरलडायमेंशन था और है हिंदुत्व का जो कल्चरलडायमेंशन है उसको आप नजरअंदाज नहीं करसकते हैं। वह मेजॉरिटी है इस मुल्क में औरजाहिर है मुल्क में जो मेजॉरिटी है उसकाएक हिंदू कल्चरल डायमेंशन है एक कल्चरलउसका एक दायरा है जिसको जिसको आपरिस्पेक्ट करें उसके बारे में कुछ जाने तोऔर बेहतर है। जिस तरह से वो जो एक मुसलमानके घर के दायरे को और उसकी कम्युनिटी केदायरे को समझने की कोशिश करें तो वहीहमारी ट्रू कंपैटिबिलिटी है। हमारे मुल्कके हिंदू और मुसलमान की एक तरह की एक ट्रूकंपैट कंपैटिबिलिटी है। लेकिन जब उसको आपएक पॉलिटिकल मूवमेंट बनाते हैं तब मसला आजाता है। जब कल्चरल हिंदूइज़्म को आपपॉलिटिकल हिंदूइज़्म में कन्वर्ट करते हैंतो मसला आ जाता है। जिस तरह से जब आपकल्चरल इस्लाम को पॉलिटिकल इस्लाम मेंकन्वर्ट करने की कोशिश करते हैं। कभी एकवक्त था जब हिंदुस्तान के मुसलमान नहींसिर्फ लेकिन गैर मुस्लिम भी हिंदुस्तान केआइडेंटिफाई करते थे तुर्की से अतातुर सेआइडेंटिफाई करते थे। फिलिस्तीन सेआइडेंटिफाई करते थे। वो मुस्लिम इशू नहींथा। वो एक लिबरेशन का इशू था। वो एकफ्रीडम का इशू था। उसमें हम आइडेंटिफाईकरते थे। और जाहिर है हिंदुस्तान केमुसलमानइराक के साथ भी आइडेंटिफाई करते थे। इसलिएकरते थे कि वो फिर से उनको उसमें वो एकफ्रीडम आइडेंटिटी दिखा करती थी। इसलिएनहीं कि वहां के मजहब और हमारा मजहब एक हीहै। और उसमें नॉन मुस्लिम्स भी हमारे साथखड़े रहते थे और खड़े रहे हैं। आज लगता हैकि वो चीज कुछ खत्म सी हो रही है। क्योंकिआज कोई फिलिस्तीन की या गाजा की बात करेंतो ये समझा जाता है कि आप मजहब की वजह सेकर रहे हो। ऐसा नहीं है। लेकिन, सिंपैथीऔर हमदर्दी आपकी उनके साथ है और जाहिर हैउनके साथ होनी चाहिए। जिन जिनको घरों सेनिकाल-निकाल के टेंट में डाल दिया गया है।जो हज़ारों बच्चों को खो चुके हैं। अपने घरके लोगों को खो चुके हैं। हमदर्दी उनकेसाथ है। इसलिए कि वो हमदर्दी एक विक्टिमके साथ है। वो हमदर्दी एक मुसलमान के साथकी नहीं है। एक विक्टिम के साथ की हमदर्दीहै। और वो हमदर्दी हिंदुस्तान के मुसलमानऔर नॉन मुस्लिम सभी को है। वो होनी चाहिए।आपने क्योंकि बात करी पॉलिटिकल इस्लाम,पॉलिटिकल हिंदूइज़्म इसको एक्सटेंड करें एजअ कैटेगरी तो पॉलिटिकल लिबरलिज्म,पॉलिटिकल कम्युनिज्म, पॉलिटिकल बुद्धिज्मकोई भी आईडियोलॉजी जब अपनी टोटलिटेरियनएब्सोल्यूट फ्रेमवर्क बनाता है उसकोपॉलिटिकली कोशिश करता है एग्जीक्यूट करनेकी। हमने रशिया में भी देखा है, चाइना मेंभी देखा। मतलब ये सिर्फ रिलजन का नहीं है।इवन जो सो कॉल्ड सेुलर फ्रेमवर्क्स हैं,मटेरियलिस्ट फ्रेमवर्क्स हैं, वहां पे भीजब भी टोटलिटेरियन पॉलिटिकल विल डोमिनेटकरी है, तो उन्होंने एक सेकुलराइजेशन औरहोमजनाइजेशन। सेकुलराइजेशन नहीं होना ऑफकल्चर की कोशिश करी है। लेकिन दूसरी तरफहम ये भी देखते हैं कि जो इंडिया काडिस्कोर्स है, गांधियन डिस्कोर्स है यादूसरे डिस्कोर्स हैं, पॉलिटिक्स एंडरिलीजन को बहुत सीरियसली कि हाउ मच कैन इटइनफॉर्म द सोसाइटी? क्योंकि यहां पेएंबेडेड है। तो हम इसको अनटेंगल तो नहींकर पाएंगे इंडिया में। तो हाउ डू वी डीलविथ दैट?नहीं अनटेंगल नहीं कर पाएंगे लेकिन आपअच्छा हुआ कि आपने गांधी जी की बात करीक्योंकि गांधी जी तो रिलीजन को बहुत करीबसे जोड़ते थे पॉलिटिक्स से। उनके लिएपॉलिटिक्स विदाउट रिलिजन वाज़ नो पॉलिटिक्सएट ऑल।लेकिन वो एक अग्रेसिव वर्जन ऑफ़ रिलिजननहीं था ना। दैट वाज़ अ इट वाज़ अ वेरीसिंक्रेटिक वर्जन ऑफ़ रिलजन। ईश्वर अल्लाहतेरो नाम सबको समझ दे भगवान। ये वो कहाकरते थे ना। वो ये नहीं कहते थे कि ईश्वरही ईश्वर हो। वन गॉड, वन रिलीजन, वन पीपल,वन वन नेशन, वन वन क्लोथ्स, वन फूड। वो येनहीं कहते थे ना वो ही वाज़ हैप्पी दैट यूहैड डायवर्सिटी। तो आपने ये जो बात करी हैआपने जैसे लिबरलिज्म की बात करी।लिबरलिज्म जो है वो आई एम सॉरी। लिबरलिज्मरिकोने नहीं हो सकता है। क्योंकिलिबरलिज्म की जो बुनियादी चीज है वो ये हैकि यू हैव टू गिव दी अदर पर्सन अ राइट टूबी रोंग। आप पटरनलिस्टिक नहीं हो सकतेहैं। आप यह नहीं कह सकते मैंने जो कह दियाबस वह लकीर की फकीर है। आप उसके आगे नहींजा सकते। आपको कोई हक नहीं है सोचने का।लिबरलिज्म तो ये कहता है कि आप जो भी सोचरहे हैं उसका आपको हक है और वो अगर मुझसेडिसएग्री करता है। आई स्टिल हैव टू फाइटफॉर योर डिसए्रीमेंट।लिबरलिज्म वो है।खैर ये आपके से मैं एग्री भी करूंगा।लेकिन बहुत जगहों पे लिटरेचर में जैसेहिजाब और उसके हवाले से पूरी दुनिया मेंइवन प्योरली लिबरल वैल्यूस को भी पिटिकलीइस्तेमाल किया गया इन डिबेट्स को औरजस्टिफिकेशन में किस तरहमैं मैं वही मानता हूं कि जो बहुत सारेलोग अपने आप को लिबरल कहते हैं वो लिबरलहै।है नहीं। तो आप जो बात कर रहे हैं वो येहै कि जैसे प्योर सेकुलरिज्म एक न्यूट्रलकैटेगरी है। प्योर लिबरलिज्म भी एकन्यूट्रल कैटेगरी है। इट्स अ प्रिंसिपल ऑफइंगेजमेंट विद प्लुरलिटी रादर।सच्ची बात ये है कि आजकल सब सेकुलरिज्म कोइतना बदनाम किया है मुल्क में। हमारेहिंदुस्तान में इतना बदनाम किया है कि मैंतो उम्मीद करता हूं कि लोग सेकुलरिज्म कीजगह लिबरलिज्म इस्तेमाल करेंगे।क्योंकि सेकुलरिज्म सम हाउ लगता है किसेकुलरिज्म का कुछ रिश्ता है या कुछ रुसूकहै रिलीजन के साथ। लिबरलिज्म को ये मानाजा सकता है कि कंप्लीटली इंडिपेंडेंट है।ऑटोनॉमस है। उसका ना रिलीजन से ताल्लुक हैना उसका इकोनॉमिक्स के कोई खास उससेताल्लुक है। लिबरलिज्म इज़ ट्रू फिलोसोफिकलफ्रीडम। जो एक और सवाल जो इसमें एंबेडेडथा कि रियलाइजेशन तो कांग्रेस को भी है,उसकी लीडरशिप को भी है कि देयर इज़ समसॉफ्ट हिंदुत्व जो पॉलिटिकल हिंदूइज़्म याहिंदुत्व है उसका एलिमेंट विद इनकांग्रेस?हाउ डू यू डील विथ दैट?नहीं नहीं हाउ डू वी डील विथ दैट इज़ इज़ऑब्वियसली हाउ डू यू डील विद समबडी हुबिलीव्स इन द अमेरिकन मॉडल ऑफ कैपिटलिज्म।हमवो भी हमारे यहां लोग रहे हैंजो कैपिटलिज्म के मॉडल को फॉलो करते हैंवो भी हमारे यहां लोग रहे हैं।हमारे यहां स्ट्रांग सोशलिस्ट भी रहे हैं।हमारे यहां वो लोग रहे हैं जो फ्रेंड्स ऑफ़सोवियत यूनियन अपने आप को कहते थे। हमारेयहां वो लोग भी रहे हैं जिन्होंने ये चाहाकि हम अमेरिका की तरफ बढ़ जाए। अब रूस कोछोड़ दें। अमेरिका की तरफ बढ़ जाए। हमारेयहां वो लोग भी रहे हैं जो चीन के साथअच्छे ताल्लुकात चाहते थे। हमारे यहां वोलोग भी रहे हैं जिन्होंने चीन को अपनादुश्मन माना है और यह कहा है कि हमको चीनकभी आगे बढ़ने नहीं देगा एक्सट्राएक्सट्रा तो एक रेनबो अलायंस कांग्रेसपार्टी हमेशा रही है एक रेनबो अलायंस रहीहै तो रेन रेनबो रेनबो में कौन से रंगनुमाया होंगे वो डिपेंड करेगा वक्तन वक्तनआपकी लीडरशिप आपकी लीडरशिप किस रुझान कीहै आपकी लीडरशिप किस किस जानिब आपको लेजाना चाहती है इट विल डिपेंड अ लॉटडू थिंक दिस इज द लिमिट आल्सो और सेंट्रिसपॉलिटिक्स के वो जो शेप है उसमें आप उसकोरिकॉन्फिगर कंफिगर कर सकते हैं अक्रॉस दीरेंजअब्सोलुटली वो होता है और वो होता है आईमीन आप नेहरू के जमाने से देखें इंदिरा जीके जमाने से देखें जो रिफॉर्म मूवमेंटराजीव जी लाए रिफॉर्म मूवमेंट देखें आपनेडॉक्टर मनमोहन सिंह का जमाना देखा आपनेउससे पहले जब वो फो फाइनेंस मिनिस्टर थेआपने नरसिम्हा राव का जमाना देखा तो बहुतसारे बहुत सारे पहलू हैं जिसमें जोकांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से अपना रंगबदला है या आपने अपना एमफेसिस बदला हैइकोनॉमिक और सोशल एम्फेसिस बदला हैऔर जिस तरह सेसोशलिस्ट से न्यू लिबरल भी एक शिफ्ट जोरहा है [नाक से की जाने वाली आवाज़]सोशलिस्ट हां सोशलिस्ट से न्यू लिबरल बटन्यू लिबरल विद अ वेल एज अ वेलफेयर स्टेटएज अ वेलफेयर स्टेट तो हम हम ये मानते हैंकि हमारे पास एक बहुत अच्छा बहुत अच्छामॉडल था और बहुत कामयाब मॉडल था लेकिनअनफॉर्चूनेटली जो पिटिकल सरकमस्ट्ससेस बनगए उन पिटिकल सरकमस्ट्ससेस की वजह से हमकोउसे अंजाम तक पहुंचाने का मौका नहीं मिला।एक जो क्रिटिक भी होता है कि आपने क्योंकिराजीव गांधी का नाम लिया बाकी चीजों कानाम लिया जो सेंट्रिस मॉडल में कई बार जोमेजोरिटेरियन पॉलिटिकल विल नुमाया होगीफ्रॉम दी बॉटम अप तो उस टाइम पे पॉलिटिकलस्ट्रेटजी ऐसी लेनी पड़ी जिसकी वजह से आजहिंदुत्व आया। ये भी लोग बोलते हैं कि फॉरएग्जांपल राम जन्मभूमि मूवमेंट है,शिलान्यास है। उसके बाद बहुत सारी ऐसीचीजें हैं जिस पे लोग बोलते हैं कि भ येस्ट्रेटजी अगर नहीं होती या फिर और आज भीकई बार ये होता है कि अब जैसे बोला गया किभ मुस्लिम वर्ड होना चाहिए। ये क्वेश्चनमैं ऐसे नहीं पूछ रहा हूं कि कंक्लूसिवलीमैं ये क्वेश्चन पूछना चाह रहा हूं। समझनाचाह रहा हूं क्योंकि इतने कॉम्प्लेक्स देशमें इतने मल्टीकल्चरल मल्टीप्लूरल देश मेंआप किस तरह स्टियर करेंगे कि जहां पे कहींना कहीं चाहे वो मेजोरिटेरियन विल हो यापर्टिकुलर कॉम्बिनेशंस ऑफ़ कास्ट एंड क्लासहो या कहीं पे इवन हो सकता है मुसलमानकहीं पे अगर बहुत कंसंट्रेटेड हो वो भीवही काम कर रहा हो। मतलब मैं यह नहीं कहरहा कि भ यह कैटेगरी कंप्लीटली न्यूट्रलहै। तो आज जो हम क्राइसिस फेस कर रहे हैंहाउ डू यू थिंक कांग्रेस या आपकी लीडरशिपव्हाट इज द इंटेंशन? व्हाट इज दीडायरेक्शन कि आप इसको स्टीयर करना चाहतेहैं वापस एकदेखिए वो नैरेटिव नैरेटिव बनाने की बातहोती है। एक तो सबटेंटिव आपकी पॉलिसीजहैं। बहुतजाहिले उनकी अहमियत होती है। लेकिन एकनैरेटिव का भी मसला है। नैरेटिव आप क्याबनाएंगे और नैरेटिव कैसे बनाएंगे इट हैज़ अलॉट टू डू कि जो जबान एक लीडर इस्तेमालकरता है जो कासेप्ट से एक लीडर इस्तेमालकरता है जो सिंबल[नाक से की जाने वाली आवाज़] से एक लीडरइस्तेमाल करता है तो कुछ चीजें होती है एकबहुत हद तक सिंबॉलिक होती हैं और कुछचीजें होती है सबट्रिक होती है। मैं येमानता हूं मैंने कल किसी से गुफ्तगू मेंये बात कही कि बहुत अरसे से लोग ये कह रहेथे कि राहुल गांधी क्या चाहते हैंकैसा हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं मैंनेकहा इसका जवाब राहुल गांधी ने 4000किलोमीटर चल के दियाऔर हम वो जो उनके साथ चले बहुत फासला हमनेपूरा किया उनके साथ कश्मीर तक गएकन्याकुमारी से कश्मीर तक तो हमने ये देखाकि फॉर द फर्स्ट टाइम हमने ये देखा कि जोलोग आ रहे हैं वो हमको मालूम भी नहीं थाकि कांग्रेस के लोग हैं कि नहीं है किउन्होंने कभी कांग्रेस को वोट दिया है किनहीं दिया है। लेकिन एक एक जागरूकता और एकएक एंथूजियाज्म था उनमें कि हम कुछ करसकते हैं। इस मुल्क के लिए हम लोग कुछ करसकते हैं। वो एक अजीब सा एक अजीब सीकैफियत थी वहां उस जमाने में। और उसका असरहुआ मैं समझता हूं कि इलेक्शन रिजल्ट्समें कुछ ना कुछ उसका असर हुआ। यकीनन उसकाअसर हुआ। लेकिन बहुत सारे लोगों ने कहा किआप एक यात्रा और करिए। फिर उन्होंने न्याययात्रा की वो बात नहीं आई। न्याय यात्रामें वक्त कम था। गाड़ी से जा रहे थे वो जोपैदल चल के गए थे वो नहीं था। उसका उतनाइंपैक्ट नहीं हुआ। लेकिन जो जो पैदलयात्रा उनकी 4000 कि.मी. की थी। उसकायकीनन बहुत गहरा इंपैक्टवा मोर एक्सेसबल। आप चलते हुए मतलब एकडिफरेंट डायनामिक्सडायनामिक्स थी। लोग आ रहे थे। क्यों कोई आरहा है जिसको देखो वो मिलना चाह रहा हैसाथ चल रहा है देयर वर नो कंस्ट्रेंट्सदेयर वर नो रिस्ट्रिकशंस विद इनसिक्योरिटी के मामले के बावजूद वहां कोईरेस्ट्रिकशंस नहीं थेतो अब उस चीज को आप एक परमानेंट एकपरमानेंट मैसेज कैसे देंगे कैसे दे सकतेहैं ये हमारे लिए एक चैलेंज हैकि जो चीज हमने उस यात्रा में देखी याउन्होंने दिखाई और उन्होंने वाज़ की उसकोहम एक परमानेंट फीलिंग कैसे दे सकते हैंइस मुल्क में अगर वो हम दे दें तो मुझेपूरी उम्मीद है कि एक मैसिव रेवोल्यूशनआएगा। एक बहुत बड़ा फर्क हिंदुस्तान मेंआएगा।एट द एंड ऑफ़ द डे जो हम है फॉर एग्जांपलये चैनल है बहुत ज्यादा फोकस करता हैइंडियन मुस्लिम इश्यूज पे। ऑफ कोर्स विदइन द लार्जर फ्रेमवर्क ऑफ़ व्हाट इंडिया इससपोज टू बी। तो इसीलिए क्योंकि एंगेजमेंटएक सीनियर कांग्रेस लीडर के साथ हो रहाहै। इस वक्त बीजेपी का रूल है और हम चाहतेहैं कि भ एक डिफरेंट पॉलिटिकल इमेजिनेशनऔर पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन हो। तो इसलिए येजरूरी भी हो जाता है कि जिस पास्ट कीफीलिंग को हम ले चल रहे हैं उसके जवाब भीकुछ-कुछ हमें मिले चीजों को। तो इसी तरहके कुछ सवालात हैं। मैं चाहूंगा कि आप अगरउसके ऊपर थोड़ा क्लेरिटी लाएं हमारे पासअभी तक मैंने जवाब नहीं दिया।नहीं आए हैं। बट अब कुछ पर्टिकुलर चीजोंके ऊपरजैसे फॉर एग्जांपल अभी तक हम लोग ज्यादामैक डिस्कशंस थे। तो अभी जो जैसे फॉरएग्जांपल एक बात 2020 में जो यह पूराशाहीन बाग मूवमेंट हुआ सारी चीजें अक्सरहम बताते हैं मैं भी जेएनयू में था उसटाइम पे आपको भी बता रहा था मैं करीब सेदेखा स्टूडेंट मूवमेंट को उसके बाद जोक्रैकडाउन हुआ उससे पहले मुझे भी फ्रैंकलीस्पीकिंग नहीं पता था यूएपीए क्या हैफलाना क्या है सारी चीजें फिर डिबेट्स आईकि ये लॉज़ जो हैं वो कांग्रेस एरा मेंइनको बनाया गया उस टाइम पे भी इनको बहुतसारे जगह जगहों पे मिसयूज किया गया या फिरजैसा आपने राय्स के बारे में कहा बाकीसारी चीजें गई। पहली बात कि व्हाई व्हाटदे जस्टिफाइड एट दैट टाइम? एंड व्हाट डूयू थिंक कि भाई उनको इस्तेमाल जिस तरीकेसे हो रहा है तो आगे इसको रिस्ट्रेन कैसेहो?देखिए दिलचस्प बात क्या है कि ये कानूनजैसे यूए यूएपीए पीएमएलए पीएमएलए वगैरहकिसने बनाए थे?इसमें हमारे एक बहुत जहीन साथी और बहुतमूम साथी चिदंबरम साहब ने बनाए थे। हमतो उन्होंने यह कानून इसलिए नहीं बनाएहोंगे कि एक दिन उनको उस कानून का सामनाकरना पड़ेगा। वह जेल जाएंगे। इसलिए तोनहीं बनाए होंगे। उस वक्त यह अंदाजा था किकुछ लोग हिंदुस्तान के साथ जो खिलवाड़ कररहे हैं और जो इकोनॉमिक खिलवाड़ कर रहेहैं या और किसी तरीके से खिलवाड़ कर रहेहैं। आप ये याद फरमाएंगे कि आपने देखा किलोग मुख्तलिफ मुख्तलिफ मज़ाहिब के लोगटेररिज्म से जुड़ रहे थे। किसी किस्म केटेररिज्म से जुड़ रहे थे। तो उसके लिए जबयह बनाया गया तो यह तो नहीं समझ के बनायागया कि इसको सिर्फ मुसलमानों के खिलाफइस्तेमाल करेंगे। उसको तो यह समझ के बनायागया था कि हम जो भी टेररिज्म के का हाथपकड़ेगा हम टेररिज्म की मुखालफत में येइस्तेमाल करेंगे। इसको इस्तेमाल करेंगे।ये किसको मालूम था कि निजाम ऐसा बदल जाएगाकि इसका गलत इस्तेमाल किया जाएगा। आज यहगलत इस्तेमाल हो रहा है। इसमें दो रायनहीं है। और कहीं अगर थोड़ी सी 2% 4% 5%10% अगर राहत मिली है तो वो कोर्ट्स सेमिली है। कभी किसी हाई कोर्ट ने दी है।कभी सुप्रीम कोर्ट ने दी है। जितनी उम्मीदहमको सुप्रीम कोर्ट से थी उतनी हमकोउम्मीद उतनी उम्मीद पर खरा सुप्रीम कोर्टनहीं उतर पाया। लेकिन बहुत कुछ सुप्रीमकोर्ट ने किया है। बहुत कुछ सुप्रीम कोर्टने दिया है जिसका हम लोग फायदा उठा सकतेहैं। यह तो आप बात कर रहे हैं इस एरिया कीजो लिबर्टी से रिलेटेड एरिया है और भी हैंऔर और भी एरियाज हैं। आप अलीगढ़ का मसलादेखिए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कामसला देखिए। वो भी कानून हमारे ही बनाएहुए थे।हमअलीगढ़ के कानून हमारे ही बनाए हुए थे। औरआज जाकर उस पर यह फैसला होना था कि अलीगढ़एक माइनॉरिटी कैरेक्टर है कि नहीं। जोआदमी कानून नहीं समझता नहीं जानता उससे आपपूछिए कि अलीगढ़ माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशनहै कि नहीं तो वो फट से कहेगा कि अरेअलीगढ़ नहीं है तो कौन है?अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अगर माइनॉरिटीइंस्टिट्यूशन नहीं है तो फिर कौन सामॉनिटरी इंस्टीट्यूशन होगा? तो आप कहेंभाई जामिया जामिया माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशनहै कि नहीं? अरे साहब जामिया भी होगा।जामिया क्यों नहीं होगा? लेकिन जामिया मेंऔर अलीगढ़ में जमीन आसमान का फर्क है।कानूनी तौर पर जमीन आसमान का फर्क है।और बहुत खतशा इस बात का था कि अलीगढ़ कोमाइनॉरिटी स्टेटस नहीं मिल पाएगा। लेकिनसुप्रीम कोर्ट ने दियाऔर मैं ये समझता हूं किबावजूद इसके कि वहां बहुत सारी अच्छी बहसलोगों ने ये की ये कहने के लिए कि अलीगढ़एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और अलीगढ़सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। इसलिए माइनॉरिटीइंस्टीट्यूशन नहीं हो सकती। उसके बावजूदउस वक्त चंद्रचूत साहब के जजमेंट सेअलीगढ़ को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन मानागया। वो भी कानून हमारे ही बनाए हुए थे।हमारे ही बनाए हुए थे। लेकिन हमने उस वक्तकानून बनाए थे ये समझ के और ये उम्मीदकरके कि उस कानून से अलीगढ़ का बरकराररहेगा माइनॉरिटी कैरेक्टर। लेकिन उस कानूनका जो इंटरप्रिटेशन किया गया इलाहाबादहाईकोर्ट ने जो उसका इंटरप्रिटेशन किया वोइंटरप्रिटेशन ये किया कि ये माइनॉरिटीइंस्टिट्यूशन नहीं है। और उसी कानून कीबुनियाद पे कहा। जैसे कमल मौला मौस केजजमेंट में भी जो प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्टआप किस तरह से आप किस तरह से कानून कोइंटरप्रेट करते हैं वो एक और जनरेशन ऑफजजेस को तय करना होता है। आप जब फैसलाकरते हैं और जब कानून बनाते हैं तो आपकानजरिया कुछ होता है। आपकी उम्मीद कुछ होतीहै। आपका तसवुर कुछ होता है। लेकिन एकजनरेशन बाद के जजेस जब उस पर गौर फरमातेहैं और उस जमाने के जो हालात हैं उनकोदेखते हुए वह गौर फरमाते हैं तो उस पर वहक्या कह पाते हैं? में क्या कहते हैं,क्या करते हैं, उसका अंजाम हमको झेलनापड़ता है। तो यह यह मानना है कि हमकंसिस्टेंटली देखिए एक समाज एक समाज मेंजब एक एक अहद होता है समाज में और उसमेंउस जमाने के थिंकर्स उस जमाने केस्कॉलर्स उस जमाने के उस जमाने केएक्टिविस्ट एक्सेट्रा किस नजरिए के होतेहैं और उस जमाने के जजेस किस नजरिए केहोते हैं। एक जमाना था कि आप अगर अह लैंडोअटेनेंट का मामला सुप्रीम कोर्ट में याकिसी कोर्ट में ले जाते थे। मैं जस्टिसभगवती या और जस्टिस कृष्णा के जमाने कीबात कर रहा हूं। तो आपके लिए वकील फौरनकहता था कि भाई टेनेंट हो तो यह तो टेनप्रो टेनेंट कोर्ट है। आप को हम महफूजरखेंगे कोई मसला नहीं है। लेकिन अब वो बदलगया है। अब जजेस खुद कहते हैं कि नहीं भाईदेखिए आपने किसका घर 20 साल से ले रखा है।कब तक आप लेकर रखेंगे? बताइए बताइए कितनावक्त चाहिए आपको? 6 महीने चाहिए, 1 सालचाहिए, कितना वक्त चाहिए? बताइए आपकोछोड़ना पड़ेगा। तो कुछ ना कुछ तो बदला है।कानून वही है।हमकानून में कोई कोई चेंजेस नहीं आए। कानूनवही है जो पहले था वही कानून है। लेकिनजजेस का देखने का जो तरीका है वो बदल गयाहै।और आप ये नहीं कह सकते कि वो जजेस बेईमानथे और ये जजेस जो है ऑनेस्ट है या येबेईमान है और वो ऑनेस्ट थे। ऐसा नहीं आपकह सकते हैं। जज हालात को देखकर हालात काजायजा लेकर ही एक फैसला करता है और वोकॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में ज्यादा ज्यादा अहमअहमियत रखता है और कॉन्स्टिट्यूशन लॉ केफैसले इसी तरह से किए जाते हैं। कब आपकिसी चीज को सही मानते हैं? कब आप किस चीजको गलत मानते हैं? और इसलिए बहुत कुछबदलता है। किस चीज को आप इंडस्ट्री मानतेथे। कि अब उसको आप इंडस्ट्री नहीं मानतेहैं। वही वही जजेस हैं। जजेस मतलबजीबदल गए हैं। लेकिन है तो वही जजेस सुप्रीमकोर्ट के और वही वकील हैं। वही वोला हैंऔर वही कानून है। कानून में कोई बदलावनहीं आया। लेकिन कोर्ट का रवैया बदल जाताहै।तो इसलिए जो कानून हमने बनाए क्या सोच केऔर समझ के बनाए थे। आप ये उन लोगों से अगरआप गुफ्तगू करें बात करें जिन्होंने इसमेंएक रोल प्ले किया था। तो उनका क्या उसवक्तनजरिया रहा होगा? क्या उनका मंसूबा रहाहोगा? और उसका इस्तेमाल किस तरीके से कियागया? हम तो आज ये भी कहते हैं कि उसकाइस्तेमाल गलत किया गया।उसका इस्तेमाल पुलिस ने गलत किया। उसकाइस्तेमाल एडमिनिस्ट्रेशन ने गलत किया। औरउन्होंने कहा उन्होंने कहा कि हम इसको इसतरह से इस्तेमाल करेंगे कि हम इनको एक सबकसिखाएंगे। ये कहा। हमने सबक सिखाने के लिएतो कानून नहीं बनाए थे। हमने इस मुल्क कोमहफूज़ रखने के लिए कानून बनाए थे कि कोईपैसे का इस्तेमाल करके मुल्क की इकॉनमी कोको ठेस पहुंचा रहा है और कोई पॉलिटिकलस्लोगंस इस्तेमाल करके मुल्क की जो यकचहतीहै उसको उसको तकलीफ पहुंचा रहा है। उसकोकर रहा है। लेकिन अब ठीक है। अब ये एकमसला है कि जबएकस्टेज में एक एक मौके एक टाइम पे आप येसमझते हैं कि लिमिटी को ज्यादा मौका होनाचाहिए। फिर कभी आप ये समझते हैं कि नहींसिक्योरिटी का ज्यादा ज्यादा अहमियतसिक्योरिटी को देनी चाहिए। तो वो वन और वनबातें बदलती हैं। लेकिन हां यह सही है किहम यह मानते हैं कि जो भी कानून बने उनकागलत इस्तेमाल आज हो रहा है और यकीनन हमहुकूमत में आते हैं तो हमको सबसे पहलेइन्हीं पर वॉर करना पड़ेगा।एक इंप्लसिट जो रीजनिंग[गला साफ़ करने की आवाज़] मुझे आपकेआर्गुमेंट में लगी और उसमेंजो शुरू में भी बात हो रही थी कि जैसेप्रियमबल है, कोर कॉन्स्टिट्यूशनलिटी है,डायरेक्टिव प्रिंसिपल है। अ लॉट ऑफ़ इट इज़टू डू विद दी रीडिंग ऑफ़ हु इज़ रीडिंग इट।हां बिलकुल। उसमें यह कि जो सक्सेस हैआरएसएस का वो यह है कि उन्होंने मूवमेंटको ग्रास रूट्स बनाके हु इज़ गोइंग टू रीडइट वो हाथ बदल गई। तो एक्चुअली कांग्रेसवाज़ दैट मूवमेंट शुरुआत में इट इज़ दीमूवमेंट हु जिसने वोहर गांव में हर शहर में हर गली मेंवो एग्जांपल वहीं से आया था। उसमें तो वोआज की डेट में कांग्रेस की जो ग्रास रूट्सप्रेजेंस थी वो तो अक्सर लोग बोलते हैंबहुत क्या उस पे कुछ काम हो रहा है?देखिए उस पे काम हो रहा है। बहुत काम होरहा है। लेकिन मैं आपकोएक बात बताऊं आप बंगाल का वो देखिए बंगालमें जो हुआ उस परविद इन अ मंथ कंप्लीटलेकिन ये कौन लोग हैं? ये कौन लोग हैं? येवो लोग हैं जो एक जमाने में कम्युनिस्टपार्टी के साथ थे।लेफ्ट फ्रंट के साथ थे। लेफ्ट फ्रंट का कावक्त गुजर गया तो वह सारे के सारे टीएमसीमें आ गए।टीएमसी का वक्त गुजर गया तो वो सारे केसारे बीजेपी में आ गए। वही लोग हैंजो मॉब्स रूल करते हैं बंगाल की स्ट्रीट्सको। ये वही लोग हैं और हर एक मानता हैकि ओवरनाइट चेंज कर जाते हैं। ओवरनाइट आजाते हैं। अब कुछ लोग बीजेपी में ये कहरहे हैं कि हमको हमको बहुत चौकन्ना रहनाचाहिए। इन लोगों को बीजेपी मत आने दीजिएकि बीजेपी में ये आ गए तो ये बीजेपी कोबर्बाद करेंगे। लेकिन वहां का एक वहां काएक तरीका बन गया है। एक रवैया वहां का हैलोगों का। उसको ये लोग कैसे चेंज करपाएंगे? इट स्टिक्स लार्जर देन लाइव पर्सनजो इस चीज को रोक सके। तोयही हुआ था जब इमरजेंसी के बाद जनता दलजीत के आई थी। तो उनके पास भी कोई ग्रासरूट्स ऑर्गेनाइजेशन तो नहीं थी।लेकिन हालात ऐसे बन गए कि वो ओवरनाइट जीतके आ गए। आपका यह भी कहने का मतलब हैकैरिस्मैटिक आईडियोलॉजिकल लीडरशिप जो मूवकर सके उसका बहुत मेजर रोल होता है।सरकमस्टसेस, इवेंट्स, सरकमस्टेंसेस एंडकैरिस्मैटिक लीडरशिप इन तीनों का जोकॉम्बिनेशन होता है वो कुछ भी कर सकता है।आपने जैसे थोड़ी देर पहले बोला कि बहुतसारे लॉज ऐसे बनाए गए जिनका एक्सपेक्टेशननहीं था कि भई ये इस तरह इस्तेमाल होंगे।अक्सर मैं जब लोग बोलते हैं कि भई बाबरीमूवमेंट में ऐसा नहीं करना चाहिए था, वैसाकरना चाहिए था। उसमें मुझे कभी-कभी ऐसालगता है या सीए में ऐसा करना चाहिए था,ऐसा नहीं करना चाहिए था कि बहुत सारीचीजें बहुत उस वक्त के दायरे को सामनेरखते हुए लोग डिसीजंस लेते हैं और इन हैंडसाइड उसका क्रिटिक भी होता है। उसकाएक्सेप्टेंस भी होता है।आसान होता है। बहुत आसान होता है कि हैंडसाइड में आप कहें कि मैं होता तो मैं ऐसाकरता।ऐसा कर देता। और उसमें भी कई बार मुझेलगता है बहुत सारे लोग बोलते हैं कि बाबरीउसी वक्त दे देते। तो मैं मेरे ज़हन मेंआता है। हो सकता है मैं गलत हूं। मेराओपिनियन हैकि शायद जब दे देते तो बाकी सारी भी कमलमौला मौस भी जब ये हो जाता मथुरा भीमूवमेंट्स। अब जैसे एसआई और हो रहा है,सीए एकदम नहीं हो रहा। एक वक्त लग रहा हैगवर्नमेंट को फिर से रिफ्रेम करने का इशूको या जो भी रिजीम है तो कुछ ना कुछ तोसोशल मूवमेंट्स का इंपैक्ट होता है। औरउसके बाद जो उसके फॉलो अप्स होते हैं शायदहम उसको जो आपने बोला स्ट्रेटेजिकवोकैबलरी ना बना पाना एक रीडिंग ना होपाना।लेकिन बहुत सारी चीजें ऐसी भी हैं जो जैसे2002 में हुआ।जकिया जाफरी के साथ हुआ।तो सॉरी एहसान जाफरी के साथ हुआ। और उसमेंबहुत वाज़ हुआ के अगर रिजीम पावर में आतीहै, हिंदुत्व को पावर मिलती है तो लॉज़ भीउनकी पॉलिटिकल विल भी इस लेवल पर इस्तेमालहो सकती है। कुछ ना कुछ अभी भी जिस जिसतरीके से मतलब वो एक एग्जांपल्स आ चुके थेहमऔर उस वक्त को 2002 फिर 2007 में अगर हमआए जो स्ट्रक्चर कमेटी की रिपोर्ट आती हैबाकी सारी चीजें होती हैं। मैं आपसे समझनाचाह रहा था कि बहुत सारी चीजें आप भी करनाचाहते होंगे। आपको भी जेहन में होगा कहांरुकावट आती है। इवन व्हेन देयर इज पावर।मान लीजिए यूपीए वन था, यूपीए टू था। यूहैड इमेंस पावर फॉर एग्जांपल। बट उस पावरकी भी एज अ लेजिसलेटर या एज ए यू नोस्टेट्समैनगिवन के अह जो वर्ल्ड व्यू है कि अपीज़मेंटहो रहा है ये हो रहा है उसकी क्या लिमिटहै और वो विद इन द पार्टी कैसे आती है?देखिए उस वक्त ऐसा तो हम पर कोई इतना बड़ादबाव हम पर इस बात का नहीं था के हम जोकरेंगे उसको अपीज़म माना जाएगा या उस परसवाल उठाए जाएंगे था गुजरात के गुजरात मेंजो गवर्नमेंट थी मोदी साहब वहां पर सीएमथे और अक्सर जो मीटिंग्स हुआ करती थीउसमें वो आके उस बात को उठाते थे एक्सट्रालेकिन जो हमारा फेडरल स्ट्रक्चर है देखिएक्या है कि एक एक नजरिए को मूवमेंट बनानेमें वक्त लगता है और हमारे यहां इलेक्शंसइतने होते हैं कि एक इलेक्शन से अगलेइलेक्शन में मूवमेंट्स जो है वो अक्सरअक्सर ठेस खा जाती हैं।प्रोफेशनलाइज हो गया है इलेक्ट्रोरलपॉलिटिक्स। इलेक्ट्रोल पॉलिटिक्सप्रोफेशनलाइज़ हो गया है। आप का फोकसमुस्तकिल शिफ्ट करते हैं। करते हैं और एकजो नेशनल इशू होता है वो अक्सर अक्सर खोजाता है जब आप रीजनल पार्टीज में जाके कामकरते हैं। हमारे लिए जो सबसे बड़ा मसला थाकि हमकोअभी मैं नहीं कह सकता हूं कि आज इंडियाअलायंस में क्या होगा। हमलेकिन वो वक्त जो गुजरा वो वक्त ऐसा गुजराकि रीजनल पार्टीज जो थी उनकी कोशिश येहोती थी कि कांग्रेस को कमजोर किया जाएक्योंकि रीजनल पार्टीज को जो जगह मिल रहीथीवो इस वजह से मिल रही थीकांग्रेस जहां से सुकर रही थी कांग्रेस वोजगह उनको रीजनल पार्टीज को मिल रही थीतो अब हम उनसे अगर समझौता भी करते थे तोहम अपनी जगह छोड़ के समझौता करते थे करपाते थे और वो डोमिनेंट रहते थे एक मुझेयाद है एक दफा हम लोग सफर में थे प्रणवमुखर्जी साहब के साथ तो हम लोग चाय के लिएएक जगह रुके थे तो ऐसे ही कुछ गुफ्तगूशुरू हो गई तो उन्होंने एक बात कही थी।उन्होंने कहा कि देखो आप लोग एक बात ज़हनमें रखो हम लोग या तो हिंदुस्तान पे रूलकर सकते हैं या फिर हम स्टेट्स पर रूल करसकते हैं। यू कांट रूल इन बोथ केसेस कि आपस्टेट्स भी करें और और सेंटर में भी करें।ये मुमकिन नहीं है। ये बहुत दूरंदेशी कीउन्होंने बात कहीलेकिन यही हुआ कि हमने पहले एक अरेंजमेंटये किया कि हम स्टेट्स में अपर हैंड देतेजाएं हमऔर तवको ये करें कि लोग इस बात से मुमनरहे कि उनको स्टेट मिल गया है।हमतो थोड़ा सा हिस्सा हमको भी वहां स्टेटमें मिले। लेकिन सेंटर में वो हमको आनेदें। ये डीएमके के साथ हमारा ऐसे हीसमझौता था। यही हमारा समझौतामायावती के साथ हुआ औरों के साथ हुआ।लेकिन धीरे-धीरे जो रीजनल पार्टीज हैंउनके एंबिशंस बढ़ते गए। हमफिर उन्होंने कहा कि यह तो हमारे सारेसेंटर में है तो हम क्यों नहीं सेंटर मेंपहुंचेंगे? हम प्राइम मिनिस्टर बनेंगे। हमसेंटर में पहुंचेंगे और फिर वो जोअरेंजमेंट था स्टेट और सेंटर का जोअरेंजमेंट था वो वो फ्रेजाइल हो गया।रिवर्स हो गया और जहां-जहां वो रिवर्स हुआतो हम पीछे पीछे पीछे पीछे हटते चले गए।और फिर हम वहां पहुंच गए जहां डोमिनेंस जोथा वो रीजनल पार्टीज का हो गया। फिर रीजनलपार्टीज अपने फैसले करने लगी कि आज हमआपको छोड़कर किसी और के साथ चले गए फिरहमको छोड़कर कहीं और चले गए एक्सट्राएक्सट्रा तो आज हमको जो सोचना है और जिसबात पे हमें गौर करना है वो ये है कि क्यारीजनल पार्टीज के साथ एक नया कॉम्पैक्टउनके साथ एक नया मेजरग्लोबल एग्रीमेंट हम कर सकते हैं कि नहींकर सकते हैं जोजो कोशिश हुई इंडिया अलायंस और ये सारीचीज़कोशिश हुई है लेकिन आपने देखा उस कोशिशमें एक हद तक हम लोग उसका फायदा उठा पाएसब हम लोग मिलकर फायदा उठा पाए 2024 में।लेकिन जितना हम उठाना चाहते थे उतना नहींउठा पाए। इसलिए कि कुछ लोग टूट टूट-टूट केचले गए। ममता चली गई। आम आदमी पार्टी आमआदमी पार्टी अलग हो गई। तो अब ये है कि सबलोग उस पर एक दफा फिर से नए सिरे से गौरकरें और फिर एक नया अरेंजमेंट बनाएं। जिसअरेंजमेंट के तहत हम लोग मिलकर एक दफ़ाचुनाव लड़के दिखाएं कि यह मुमकिन है किजहां 60% वोट है,जहां 60% वोट है, वह आज 15 साल से बाहरबैठा है और जहां 40% या 40 से कम परसेंटवोट है, वह आज 15 साल से इख्तेदार में है।ये बड़ा चैलेंज भी रहेगा क्योंकिडीसेंट्रलाइज्ड चीजों को एक अंब्रेला मेंलाना क्योंकि देयर इज़ सो मचकॉम्प्लेक्सिटी डिमांड्स। उसकी एक अलगनेगोशिएशन है।बनिस्बत इसके जो एक टॉप डाउन अप्रोच है।थोड़ा सा हम लोग क्योंकि इंडिया के जोमुसलमान है उनके ऊपर जो सबसे ओवरवेल्मिंगजो इंपैक्ट है वो सच कमिटी रिपोर्ट का है।मतलब ऐसा नहीं था कि उससे पहले पेपर्सनहीं लिखे जा रहे थे। खुद अबू साले शरीफऔर बहुत सारे ऐसे थिंकर्स थे जोकास्टेंटली लिख रहे थे और नॉन मुस्लिमथिंकर्स भी थे कि जो बता रहे थे कि भहिंदुस्तान में माइनॉरिटीज को एस्पेशलीमुसलमानों का ये है जो एकेडमिया में थे जोछोटी-छोटी स्टडीज कर रहे थे लेकिन सचरकमिटी ने पहली बार वो कंप्लीटली फ्रॉमडेटा फ्रॉम द गवर्नमेंट इटसेल्फ आप तोबेहतर जानते हैं मैं आपको इसमें क्यावो पूरा का पूरा आर्किटेक्चर सामने आया तोसचर कमिटी रिपोर्ट में जो बहुत सारी चीजेंआई जैसे मेन एंड ग्रुप्स का इक्वलअपोरर्चुनिटी कमीशन बिल है। कुंडू का यूनो डायवर्सिटी इंडेक्स है। खुद पीएम के जो15 पॉइंट प्रोग्राम है। 2007 से लेकर 2014के बीच में बहुत सारी चीजें जो उसमें थी2009 से लेकर कुछ वफे तक आप भी उसके हेडरहे। फिर मुझे याद है हमारे जो के रहमानखान साहब हैं उन्होंने भी वो ओदा संभाला।क्या चैलेंजेस आए कि क्लेरिटी है चीजोंकी। यह चीजें होनी है। आप लोगों में विलभी है और बहुत सारी चीजें स्पेशली जैसे जोस्कॉलरशिप्स वगैरह हैं वो तो हो भी गई।मतलब वो क्लियर क्योंकि वो ऐसी चीज थी किवो बहुत डीपली स्ट्रक्चरल नहीं थी शायद तोउसकी वजह से हालांकि उसका क्लियर बेनिफिटथा इमीडिएटली लेकिन उसको देखिए उन्होंनेरिवर्स भी कितना जल्दी कर दिया। बट येइक्वल ओपोरर्चुनिटी और ये प्योरलीस्ट्रक्चरल चीजें हैं कि जैसे आपका हरलेवल पे गवर्नेंस के और हर लेवल पे जोपॉलिसी बनेगी उसका इंपैक्ट पड़ता है। कहांचैलेंज आया? देखिए वहां जो सबसे बड़ाचैलेंज था कि एक एक स्ट्रक्चर एकिस्टिंगस्ट्रक्चर थाजो वेलफेयर का और आउटरीच का जो एकिस्टिंगस्ट्रक्चर था वो स्ट्रक्चर जो था वोकम्युनिटी और कास्ट बेस स्ट्रक्चर थाहमआपके शेड्यूल कास्ट शेड्यूल ट्राइब कमीशनथाआपका बैकवर्ड क्लासेस कमीशन कमीशन थाआपका माइनॉरिटी माइनॉरिटी कमीशन था आपकावमेन कमीशन था तो जब हम इक्वलओपोरर्चुनिटी कमीशन यानी कि एक जगह पर हमसबको एक नजर से देखकर और हर एक को उसकाउसका हक देने की बात कर रहे थे। तो हर एकने यह कहा कि नहीं आप यह सब करेंगे तो आपहमारा कम होगा।हमारा हमारा काम कम हो जाएगा।जैसे ओबीसी केऔर हम जो आज कर सकते हैं वो हम और जो हमकरते रहे हैं वो हम नहीं कर पाएंगे। इसलिएहम इसकी मुखालारफत करते हैं। हालांकि हमनेये कहा था कि हर कमीशन की नुमाइंदगी इक्वलओपोरर्चुनिटीज कमीशन में होगी। और इक्वलओपोरर्चुनिटी कमीशन जो है वो पूरा लार्जरपिक्चर को देख पाएगा। आप जो है वो सिर्फअपनी कम्युनिटी के ताल्लुक से उस पिक्चरको देखते हैं।लेकिन आप इंटीग्रल विज़न नहीं देख पा रहे।इंटीग्रल विज़न नहीं है आपके। लेकिन इस चीजके लिए लोग तैयार नहीं थे। इसका बड़ारेजिस्टेंस था और हम इक्वल ओपोरर्चुनिटीकमीशन नहीं कर पाए। इसी वजह से हम इक्वलओपोरर्चुनिटी कमीशन नहीं कर पाए। हमजो चीजें हम कर पाए थे वो ये था कि जोमाइनॉरिटी कंसंट्रेटेड डिस्ट्रिक्ट थीउसमें हमने स्पेशल स्कीम्स लागू की थीऔर माइनॉरिटी कंसंट्रेशन डिस्ट्रिक्ट काजो स्पेशल स्कीम्स थी वो सिर्फ माइनॉरिटीके लिए नहीं थीवो माइनॉरिटी एरिया में वो स्कीम्स थीजिसका फायदा सब लोग उठा सकते थे और हमाराजो कांसेप्ट था वो ये कांसेप्ट था कि जबआपके गांव में आपकी वजह से एक स्कूल बनेगातो वो स्कूल सिर्फ आपके लोगों के लिए नहींहोगा बल्कि सबके लिए होगा और आपको यह कहनेका हक होगा कि हम अक्सर आप लोगों सेमेजॉरिटी से मांगते हैं कि कुछ हमकोदिलवाइए हमको रिजर्वेशन दिलवाइए हमको कुछहक दिलवाइए अब हम पहली दफा आपको कुछ दिलवारहे हैंकि हमारी वजह से यहां स्कूल आया हमारी वजहसे यहां सड़क आई हमारे यहां वजह से शादीघर आया हमारी वजह से यहां कॉलेज आया औरआपको इसमें इसमें शरीक होने का एक मौका हमदे रहे हैं। तो यह एक मॉडर्न कांसेप्ट थाकि किस तरह से इंटीग्रेशन ऑफ सोसाइटी होगीऔर किस तरह से यह माना जाएगा कि आप सिर्फबर्डन नहीं है। आपकी वजह से आप दूसरों कोएक फैसिलिटी दिलवा रहे हैं। लेकिन फेडरलस्ट्रक्चर है। इस चीज को आप यहां सेदिल्ली से बैठकर कर नहीं सकते। बहुत कोशिशकरी कि किसी तरह से हम कर पाए।हम उम्मीद कर रहे थे कि सरकारें होंगी औरवो डिलीवर कर पाएंगे। तो बॉटम लाइन तो यहीथा कि वो डिलीवरी जो थी वो स्टेटगवर्नमेंट की होनी थी।तो हम यहां से स्कीम बनाते थे। हम पैसा देसकते थे बट वो बॉटम लाइन वही होनी थी। जोमोस्ट सक्सेसफुल था वो स्कॉलरशिप स्कीमथी। लेकिन स्कॉलरशिप स्कीम जो थी वो वोटारगेटेड थी। वो माइनॉरिटी के बच्चों केलिए मुस्लिम बच्चों के लिए थी जोस्कॉलरशिप स्कीम थी और सीधा ट्रांसफर उनकेपेरेंट्स के अकाउंट्स में होता था। उनबच्चों को सीधा-सीधा जाता था। वो सबसेज्यादा सक्सेसफुल थी। डिमांड बेच थी औरउसका डिमांड यकीनन साल हर साल बढ़ता चलाजा रहा था। उसी को सबसे पहले इन लोगों नेखत्म किया इनके आने के बाद और हमकोशिकायतें इस बात की मिलती थी कि हम डिमांडमीट नहीं कर पा रहे हैं। हम डिमांड मीटनहीं कर पा रहे हैं और आज जीरो कर दियागया है और कोई शिकायत नहीं करता है।मुझसे रोज बैठ के शिकायतें होती थी किआपने डिमांड को कम किया है। आपने डिमांडको मीट नहीं किया है।तो ये ये सारी बहुत सारी बहुत सारी बातेंथी। हम्।वह एक अह बहुत अह बहुत विज़नरी एकडॉक्यूमेंट था सर्च कमेटी का। विज़नरीडॉक्यूमेंट था। और वह इस हिंदुस्तान केहालात को पूरी तरह से बदल सकता था।लेकिन, इन लोगों ने प्रोपेगेंडा यह कियाकि यह तो सारा मुसलमानों के लिए है, यह तोसिर्फ़ एक कम्युनिटी के लिए है। और उसमेंडॉक्टर डॉक्टर साहब का एक स्टेटमेंट था।जिसको तोड़ मरोड़ के पेश किया। जब उन्होंनेकहा कि फर्स्ट राइट इज फॉर द मुस्लिम्स ऑफ़आवर कंट्री। तो जब उन्होंने इस चीज को कहावो एम्फेसाइज करने के लिए उसको खासतौर परफ्लैग करने के लिए कहा था। जिस तरह सेयूनाइटेड नेशंस में बातें कही जाती हैं।लेकिन उसको तोड़ मरोड़ के2014 में भी वो स्पीच में इस्तेमाल करतेहैं।करते रहते हैं। वो आज तक इस्तेमाल करतेरहते हैं। वो बड़ी बदनसीबी है हम लोगोंकी।मुझे याद है कि 2011 में हमारे वालिद साहबने एक पेपर मुस्लिम विज़न ऑफ़ सेकुलर इंडियाडेस्टिनेशन एंड रोड। मैं बहुत छोटा था। हमहमबटएज 17 18 साल का लड़का जो यह देख रहा हैकि मुस्लिम एंबिशन अपनेउरूज पे हैक्या आपकी एक्सपेक्टेशन में दूर-दूर तककहीं था के जो हिंदुत्व की जो पॉलिटिक्सहै या जो बीजेपी की पॉलिटिक्स है या फिरजो कांग्रेस है क्या वो डाउनफॉल की तरफइतना जा रही है कि वो इतनी सिकुड़ जाएगीऔर यह पॉलिटिक्स इतनी राइज हो जाएगीनहीं हमारे ज़हन में ये बात नहीं थी देखिएमसला क्या था कि आप याद फरमाएं कि उस वक्तहम पे अटैक्स सिर्फ बीजेपी से नहीं आ रहेथे। हम पे अटैक्स बहुत सारे और सेक्शनसेक्शन से आ रहे थेजोये वाज़ नहीं करते थे कि उनका कोई राइटविंग एजेंडा है। जैसे आम आदमी पार्टी नेजो [नाक से की जाने वाली आवाज़]आम आदमी पार्टी मूवमेंट जो अन्ना जोमूवमेंट हुआवो जो सुप्रीम कोर्ट में ये लोग गएटेलीकॉम को लेके गए कोल के जोएलोकेशन उनको लेके गए कोल गेट लेके गएटेलीगेट ले लेके जो गएतो उसने हमको हमको हमारा जो पूराकंसंट्रेशन और अटेंशन था उन चीजों पे थाहमउन चीजों पे था तो हमको अंदाजा ही नहींहुआ कि नीचे नीचे नीचे नीचे नीचे जो येनफरत का एक वोसैलाब है वो धीरे-धीरे बढ़ रहा है और वोहमको डुबो देगा। क्योंकि हम कंसंट्रेट कररहे थे उन चीजों पर जो उस समय उस वक्तलगती थी कि वो बहुत क्रिटिकल है हमारे लिएक्योंकि हमारे किसी शख्स को जेल में डालदिया जाएगा। किसी को अपनीमिनिस्ट्री छोड़ने छोड़ छोड़ने पे मजबूरकिया गया। प्राइम मिनिस्टर कहीं रिजाइन नाकर दें। प्राइम मिनिस्टर बहुत तकलीफ मेंरहते थे। बिकॉज़ जाहिर है बहुत नेक आदमीथे, बहुत अच्छे आदमी थे और उनको इन सबचीजों का सामना करना पड़ा। एक बड़ा होस्टाइलसुप्रीम कोर्ट था उस वक्त। बहुत होस्टाइलसुप्रीम कोर्ट था। हर तरकीब हमने लगा ली।हमने प्रेसिडेंट प्रेसिडेंशियल रेफरेंसकराने की कोशिश कर ली। सब कुछ करा लिया।और आप यह देखिए कि जो कुछ सुप्रीम कोर्टने और कोर्ट्स ने किया उस वक्त उसमें आजएक शख्स को भी सजा नहीं मिली है। एक शख्सको भी सजा नहीं मिली है। 10 साल हो गए, 20साल हो गए। एक शख्स को सजा नहीं मिली औरउस वक्त ऐसा लगता था कि पूरा एक कालकहमारे मुंह पर मुंह पर मल दी गई है। तो वोजो हमारी जितनी हमारीएनर्जी थी वो सैप कंप्लीटली स्वैप हो गईथीऔर जो लड़ाई का हमने कुत हमने लड़ाई की थीवो तकरीबन खत्म हो गई थी और जाहिर है सारीइन फर्सेस ने कंबाइन करके हमको हरा दिया।आपने अन्ना मूवमेंट आम आदमी पार्टी काजिक्र किया। बहुत ब्रीफली पासिंग नोटकॉकरोच जनता पार्टी का एक पूरा एक वो चलरहा है। हाउ डू यू से इट?आई थिंक देखिए वो हर चीज रिपीट करनामुमकिन नहीं होता है। ये लोग ये लोग वो जोउस कामयाबी को एक दफा फिर सेएक नई तस्वीर नई शक्ल देकर उसको करने कीकोशिश कर रहे हैं। वो होगा नहीं। ऐसा होगानहीं। कोई मूवमेंट निकलनी चाहिए। अब येलोग सब समझते हैं कि बांग्लादेश में और औरश्रीलंका में और नेपाल में जो मूवमेंट्स आगईऔर जनरल जी की मूवमेंट्स आ जेंड जी कीमूवमेंट्स आने की वजह से उन्होंने करलिया।मैं नहीं समझता हूं कि यहां ऐसा मुमकिनहै। लेकिन जो हुआ था उस वक्त हमारे खिलाफहुआ था।उसमें कौन-कौन इन्वॉल्व था वो उसके कोईतफसील कभी कोई लिखेगा तब पता चल पाएगाकि उसमें कहीं ना कहीं आरएसएस का औरबीजेपी का हाथ था। वो आगे नहीं थे। लेकिनकहीं ना कहीं वो पीछे जरूर बाबा रामदेवबाबा रामदेव तो एक्टिव थेतो अब उन्होंनेउन्होंने हमारी एनर्जी को ऐसी सैप कर दियाथा कि जब लड़ाई में हम उतरे तो हम इतनेकमजोर हो चुके थे कि लड़ाई में हमको कुछमिलना नहीं था।अगेन 2007 से 2014 का जो मोमेंटम डिस्पाइटद फैक्ट केफ्रॉम दी स्टेट पर्सपेक्टिव कांग्रेस वोथी लेकिन मुस्लिम सिविल सोसाइटी शायदइमर्ज हो रही थी। ये जो 2014 में हुआ आपकोक्या एक्सपेक्टेशन थी कि कम्युनिटी कहांमूव कर रही है विद द कॉम्बिनेशन ऑफ सिविलसोसाइटी एडवोकेसी एंड पॉलिटिकल विल कहांजा सकता था मामला और 2014 में व्हाट काइंडऑफ रप्चर डिड इट ब्रिंगदेखिए कम्युनिटी की अगर आप बात करें तोकम्युनिटी तो जाहिर है अपने समझ से कोशिशमें थी कि हम एक अल्टरनेटिवमाहौल बना सकें अल्टरनेटिव सिस्टम बनासकेंकोई किसी किसी के पीछे था। कोई किसी केपीछे था औरबिहार में उत्तर प्रदेश में जहां से मेजरसीट्स आती हैं वो लोग एक अल्टरनेटिव उनकेज़हन में क्या अल्टरनेटिव था मैं नहीं कहसकता हूं। लेकिन उनके ज़हन में एकअल्टरनेटिव था अल्टरनेटिव टू द कांग्रेसऔर कांग्रेस की जितनी उन्होंने 10 साल कीशिकायतें थी वो इकट्ठा कर ली थी। और यहकहा था कि यह कुछ भी हो नॉट कांग्रेस वीहैव टू फाइंड इन अल्टरनेटिव। वोअल्टरनेटिव उनके पास था नहीं। वो बन नहींसकता था वो ना बना।अनफॉर्चूनेटली वो ना बना।अब क्या है? अब अक्सर लोग ये कहने लगे हैंबंगाल में कि भाई अब तो कांग्रेस के साथही चलो।हमअब हम ये नहीं चाहते हैं कि बिल्कुल मायूसहोकर और कोई रास्ता ना दिखे तो वोकांग्रेस के साथ आए। कांग्रेस के साथगुफ्तगू करें। कांग्रेस के साथ मुलाकातकरें। कांग्रेस को समझाने की कोशिश करें।कांग्रेस से कुछ तवकात अपनी सामने रखकर औरकांग्रेस को एक रास्ते पर चलाने की कोशिशकरें और जिसमें उनका भी मेजर कंट्रीब्यूशनहो और मेजर कंट्रीब्यूशन के साथ-साथ एककमिटमेंट ये हो कि हम कांग्रेस को फिर सेवापस लाएंगे इख्तेदार में।नाउ वी हैव कम टू द लास्ट लेग जिसमें आपनेऑलरेडी शुरुआत कर दी है। वे फॉरवर्ड। बटवे फॉरवर्ड के लिए एक विंडो चाहिए। आपनेबोला कम्युनिकेशन अक्सर जब क्योंकि हम भीस्टूडेंट एक्टिविज्म और ये सारी चीजेंदेखी और हम भी तीन चार साल से इसमेंएंगेज्ड हैं। लास्ट मुझे याद है कि जबभारत जोड़ो यात्रा हो रही थी उस टाइम पेआई पर्सनली थॉट में हम लोग ऐसे ही अपने एकऑफिस में बैठे हुए थे पुराने वाले और सबलोग बैठे हुए थे। तो मेरा ये था कि भराहुल गांधी विल बिकम दीसेकंड मोस्टेंट लीडर इन इंडिया बिकॉज़ ऑफ़ दथिंग्सदैट वर हैपनिंग। उसके बाद में कुछ टाइमफिर मुझे क्रिटिसिज्म हुआ कि भ जो भारतजोड़ो का मोमेंटम था अब उसमें आपकेवर्जनंस हो सकते हैं मेरे वर्जनंस हो सकतेहैं बहुत सारी चीजें लेकिन ब्रॉडलीस्पीकिंग एक पॉजिटिव मूवमेंट हो रहा हैब्रॉडली ब्रॉडली स्पीकिंग उसमें बहुत सारेअभी भी जिसे कहते हैं गैप्स हैं लेकिन एकजो रियलाइजेशन उस टाइम पे था कि भ हाउ कैनवी कम्युनिकेटवो कम्युनिकेशन का उस टाइम पे शायदपोटेंशियल था आज मुझे ऐसा महसूस होता हैशायद गेट्स फिर बंद हो गए हैं कि इज देयरअ प्रॉपर कम्युनिकेशन चैनल वेयर इन दकम्युनिटी जो आप बोल रहे हैं कि अब होसकता है हमारी अपनी वजह हो। कई बार ऐसाहोता है कि यू नेवर रीच आउट एंड देन यूमेक अ क्लेमहमबट मैकेनिज्म क्या होगा कि आज अगर वेफॉरवर्ड है तो द कम्युनिटी या सिर्फ येमुसलमानों की बात नहीं है।जब बात हो रही है कि भ एक नई डील होनीचाहिए तो रीजनल पार्टीज से भी होगा। वोदलितों से भी होगा, ओबीसीज के भी मुख्तलिफहो। वो अक्रॉस द बोर्ड एक नया काइंड ऑफ़इमेजिनेशनवेयर इज द मुस्लिम इन दैट इमेजिनेशन एजमुस्लिम नॉट एज केआई अंडरस्टैंड आई अंडरस्टैंड मुस्लिम उसइमेजिनेशन में कहां है एक एक एहसास तो इसबात का है और सबको है। सिर्फ लीडर्स कीबात नहीं कर रहा हूं। सबको एहसास इस बातका है कि लोग अपना-अपना इलेक्शन जीतने केलिए अपने-अपनेकॉन्स्टिट्यूएंसी में जो भी काम करते हैंहर जगह मुस्लिम्स का कंट्रीब्यूशन है।मुस्लिम्स की मौजूदगी है।तो इस बात इस बात को लोग इस बात का एक परइकरार करते हैं कि हमको मुस्लिम वोटचाहिए।हमको मुस्लिम की हिमायत चाहिए। उनकीहमदर्दी चाहिएऔर ये भी मानते हैं कि हम एक तरफ़ाहमदर्दी और हिमायत नहीं ले सकते हैं। इटहैज़ टू बी अ कम्युनिकेशनकेगिव एंड टेक होता है किसी भी कम्युनिटी केसाथ गिव एंड टेक होता है। लेकिन इस वक्तस्पेसिफिकली क्या चाहते हैं मुस्लिम्स वोमुस्लिम्स कम्युनिकेट करें।सबसे बड़ा मसला क्या है मुस्लिम मुस्लिम्सका? ये मसला है किबहुत आसानी से मुस्लिम्स किसी को एक्सेप्टनहीं करते हैं एज अ लीडर।और जो आपकालीडर अपने आप को नॉमिनेट करता है तो वोआपकी बात को ना अच्छी तरह जानता है नाअच्छी तरह उसका बयान कर पाता है।तो जो आप कम्युनिकेशन गैप की बात कर रहेहो द कम्युनिकेशन गैप इज देयर। हम लोगकोशिश कर रहे हैं कि हम लोग माइनॉरिटीजडिपार्टमेंट के ताल्लुक से हम लोग कोशिशकर रहे हैं। जो हमने माइनॉरिटीज के लीडर्सको राज्यसभा में लिया है। जिनको हमनेपार्टी में मौका दिया है। हम उनसे उनकेथ्रू कोशिश कर रहे हैं कि आउटरीच करें।लेकिनआसान नहीं है। आसान नहीं है। इसलिए किअपने-अपने लिमिटेड कॉन्टेक्स्ट में लोगकिसी को बुला लें और बैठा लें और उनसे बातकर लें। तस्वीरें खिंचवा लें वो काम नहींचलेगा। राहुल गांधी ने दो-तीन दफा कोशिशकी है कि डिफरेंट-डिफरेंट पिक्स मुस्लिम्सके बीच में से दानिश्वरों को बुलाएं, सोशलएक्टिविस्ट को बुलाएं, मीडिया मैनेजर्स कोबुलाएं और स्कॉलर्स को बुलाएं और उनके साथतफसीली गुफ्तगू करें और उनसे पूछे कि वोलोग क्या चाहते हैं, कैसे चाहते हैंएक्सट्रा। तो ये जो बातें होती हैं वोशुरुआत में वो बातें जो है बहुत खुलकरनहीं हो पाती। या तो कोई होस्टाइल आदमीआके उसको खराब करता है या फिर जो ज्यादाहमदर्द होते हैं वो बड़ा लिहाज करते हैंऔर बहुत तकल्लुस से अपनी बात कहते हैं। तोवो हो नहीं पाता। इट हैज़ टू बी डनकंसिस्टेंटली। और मेरे ख्याल से उनका यहइरादा है कि वो इसको कंसिस्टेंटली करेंगे।लोगों के ताल्लुक से करेंगे। लोगों कोइन्वॉल्व करके करेंगे। बट वी हैव टू फाइंडकम्युनिकेशंस के लेवल्स हमको ढूंढने पड़े।आप लोग क्या रोल प्ले कर सकते हैं कि येजो कम्युनिकेशन है बिकॉज़ एट द एंड ऑफ़ द डेएनी लीडर ऑफ अ बिग ऑर्गेनाइजेशन हैज़ यू नोसो मेनी।देखिए हम लोग हम लोग क्या कर सकते हैं? हमलोगचैनल बन सकते हैं कि जो लोग ये कह रहे हैंकि भाई हम कैसे बात करें? हमारा पैगामनहीं पहुंचता है। हमारा मैसेज नहींपहुंचता है। तो हम लोग चैनल बन सकते हैं।हम लोग यह कर सकते हैं कि भाई वन वक्तआपको बुलवा के मिलवा के बैठा के लोगों सेराब्ता करा के एक्सट्रा आपको मिलवाएं। अबजैसे बंगाल से लोग आने शुरू हुए हैं।हमखुद ब खुद लोग फोन करते हैं और कहते हैंकि जरा हम आपसे मिलने आइए प्लीज आइएमिलिए। तो साहब हम वहां थे। हम टीएमसी केसाथ थे। लेकिन अब टीएमसी से लोग बड़ेमायूस है। अब यह सोच रहे हैं कि बीजेपी कोयह रोक सकती थी लेकिन नहीं रोक पाई बीजेपीआ गई तो अब तो सिर्फ कांग्रेस ही लड़पाएगी। तो फिर उनकी तवक्को यह होती है किआप हमको जरा मिलवाइए अपने लीडर्स सेमिलवाइए। अब ये हमारी बदनसीबी है किलीडर्स में एक वक्त था कि हम दो-चार लोगोंसे जैसे अहमद पटेल साहब थे और लोग थे उनसेमिलवाते थे। गुलाम नबी आजाद थे उनसेमिलवाते थे। अब क्या है कि वो बहुत सारेलोग वैसे रहे नहीं। नहीं तो आप सीधे-सीधेहर एक की तवकको होती है कि राहुल गांधी सेमिलवाइए। वो बेचारे कितने लोगों से मिलसकते हैं? कहां-कहां मिल सकते हैं। लेकिनकोशिश है हम लोगतो वो जो नई जनरेशन की मुस्लिम लीडरशिपविद इन कांग्रेस होनी चाहिए। इसका मतलब वोलीडरशिप इमर्ज नहीं हो है नए नई जनरेशन केकुछ लोग इमर्ज हुए हैं लेकिन बहुत अभी अभीशायद इतने नुमाया नहीं है लेकिन हुए हैंनासिर हुसैन जैसे राज्यसभा में हैं वो हुएहैं अभी अभीरहमान साहब के साहबजादे अभी आए हैं अभीबेंगलुरु [गला साफ़ करने की आवाज़] से अभीबन के आए हैं राज्यसभा बन के आए हैं जावेदहैं वहां सेउत्तर प्रदेश से पहले माइनॉरिटी केइंचार्ज थे वो हैं नए नए लोग इमर्ज कर रहेहैं खातून बहुत बहुत खवातीन हैं जो वोइमर्ज कर रही हैं। जयपुर से एक रूबी खानहै। वो इमर्ज कर रही हैं। अह वहां सेशमा है। वहां से क्या कहते हैं केरला सेवो इमर्ज कर रही हैं। तो बहुत सारे लोगइमर्ज कर रहे हैं। लेकिन अभी वो शायद जैसेहम लोगों को मौका मिला था हुकूमत में आकरहुकूमत में काम करने का। वो उन बेचारों कोअभी मौका मिला नहीं है। तो वो वक्त लगेगा।सो दैट दे बिकम मोर प्रोमिनेंट। कांग्रेसका वो गोल्डन एजगोल्डन एज तो हम लोग गोल्डन [हंसी] एजइंसान है तो इसलिए गोल्डन एज का फायदा उठासकते हैं।आखिरी दो तीन सवाल थोड़ी देर पहले मैंनेएहसान जाफरी का जिक्र किया था।एज अ मुस्लिम जब मैं देखता हूं के एक ऐसाबड़ा केस हुआ कि जिसमें कांग्रेस के बड़ेलीडर और जखिया जाफरी का भी इंतकाल हुआपिछले साल।और कांग्रेस अपने ही एक बड़े लीडर को ओनया फिर उसको डिफेंड या फिर उसको जस्टिसनहीं दिलवा पाए। ऐसा बजाहिर लोगों केसामने एक तरीके से इमेज है। तो जब उसको हमसामने रखते हैं तो हमें यह फील होता है किक्या कांग्रेस अपनी मुस्लिम लीडरशिप को यादूसरी लीडरशिप को उतना ओन करेगी?उस उस वक्त में देखिए वो पूरा इस पर बहुततफसील से कोई आदमी अपनी बात रखेकि गुजरात का हमने कैसे हैंडल किया औरगुजरात में जो हुआ कांग्रेस ने बहुतएक्टिवली उसमें प्रोटेस्ट मूवमेंट मेंहिस्सा लिया था। लेकिन क्यों हमारे हाथ सेजो पूरा अकाउंटेबिलिटी का जो भी महाज थावह हमारे हाथ से निकल गया।बहुत अच्छे ऑफिसर्स को अपॉइंट किया गया थाएसआईटी में। बहुत अच्छे-अच्छे ऑफिसर्स थे।कार्तिकेयन वगैरह बहुत अच्छे ऑफिसर्स थे।लेकिन क्यों वो अंजाम तक नहीं पहुंच पाएकुछ समझ में नहीं आता है। वो जनरली एकएटमॉस्फियर कितना कितना बिगड़ चुका थाकि हम जहांजहां इंटरवीन करना चाहते थे औरइससे पहले कि हम कुछ कर पाएं। आप जानतेहैं कि हमने नया कानून बनाने की कोशिश करीथी। जहां पर कम्युनल वायलेंस होता है उसकेलिए नया कानून बनाने की कोशिश की थी उनलोगों ने। उसको नहीं होने दिया था। उस पररुकावट डाल दी थी। तो अब हिस्ट्री तयकरेगी कि हम लोग कुछ और कर सकते थे किनहीं कर सकते थे। लेकिन वो एक वेव थी, एकवेव थी ऑफ ऑफ ऑफ हॉस्टिलिटीजिस जिसने हम सबको डुबो दियाऔर जिन लोगों का वहां नुकसान हुआ यकीननबहुत नुकसान हुआ उसका अफसोस हैलेकिन यहां पे जो लोग इख्तेदार में थेउनको भी कंप्लीटली डुबो दिया और मैं समझताहूं कि वो लोग जो लोग भी इख्तेदार में रहेऔर जो भी डायरेक्टली इनवॉल्व थे वोकभी-कभी इस बात पर लिखेंगे कुछ करेंगे बताबताएंगे तो उससे कुछ बात समझ में आएगी किआखिर हुआ तो क्या हुआवेव तो बल्कि और हॉस्टेलिटी की बढ़ी हीहै।बढ़ती चली गई। वहीं से शुरू हुई थी। जोसुनामी थी वो वहीं से शुरू हुई थी और वोबढ़ती चली गई। दो दफा हमको ऐसा लगा कि हमवहीं गुजरात में उस वेव को रोक सकते हैं।दो दफा ऐसा लगा।क्योंकि गुजरात में जो गुजरात में उत्तरप्रदेश का और बिहार जैसा मसला नहीं था।गुजरात में 10% का ही फर्क था। 10% वोट काफर्क था। 40 उनको मिलते थे, 30 हमको मिलतेथे।10% का सिर्फ फर्क था और अगर उसका 5%पलटता तो हम गुजरात में उनको हरा सकते थे।दो दफा ऐसा लगा कि हम उनको हरा सकते हैंऔर हराने के कगार पर हैं। लेकिन फिर वोनहीं हो पाया।आखिरी दो सवाल छोटे-छोटे। एक तो ये किराहुल गांधी नेमुझे लगता है शायद बिहार या उससे पहले एकबयान में बोला कि जिसकी जितनी आबादी उसकीउतना हक और वो टिकटभागीदारीभागीदारी लेकिन जब वो टिकट डिस्ट्रीब्यूशनकी बात आती है कांग्रेस के विदिन और उसकेऊपर बहुत तफ्सीली एनालिसिस बहुत लोगों नेकिया है राइट अप्स हैं वो वहां रिफ्लेक्टनहीं करता वहां पे पॉलिटिकल स्ट्रेटजीडोमिनेट कर जाती है तो वो जो रेडिकलपॉलिटिक्स फ्रॉम अ पॉजिटिव रेडिकल का वर्डजो पॉजिटिवली अगर इस्तेमाल करें कि जैसेगांधी रेडिकल पॉलिटिशियन थे नेहरू रेडिकलपॉलिटिशियन थेके वो स्टैंड्स कि अगर लेना है प्रोमुस्लिम प्रो फेक प्रो एनी लेना है।देखिए राहुल गांधी तो मैं कह रहा हूं अगरकोई पार्टी में इस बात पर पाबंद है तोराहुल गांधी हैं औरतो इसका मतलब पार्टी अपने आप में एक बहुतकॉम्प्लेक्स एंटिटी है।कॉम्प्लेक्स एंटिटी है और वो इस बात कोसमझते हैं कि कॉम्प्लेक्स एंटिटी है। तोउनके कई टारगेट्स हैं। उनका एक टारगेट हैपार्टी कोपार्टी को नौजवानों के हाथ पे सौंपना। कुछहद तक उसमें वो कामयाब हुए हैं और उनका यहभी एक टारगेट है कि हम पार्टी कोडेमोक्रेटाइज करें और पार्टी में वही जोआपने बात कही कि उन लोगों कोरिप्रेजेंटेशन पूरी तरह से दे सके। कोशिशमें वह लगे हैं। यकीननमुस्तकिल वो इस कोशिश में लगे हैं। लेकिनमैं समझता हूं वो भी इस बात को अक्सर कहतेहैं कि एक कॉम्प्लेक्स पार्टी है। आसाननहीं है। और उसने कितने कितने-कितनेबैलेंसिंगउनको वो करने पड़ते हैं। एक्ट्स उनको करनेपड़ते हैं। ये उन्हीं को उसका अंदाजा है।सच्ची बात है। बट ही इज़ ट्राइंग।आपका अपना पर्सपेक्टिव क्या है कि इंडियाका जो फ्यूचर है आगे वो क्या होने वाला हैऔर उसमें आपका आपकी पार्टी का और बाकी जोलोग क्या करने की जरूरत है?जी हां मैं मैं समझता हूं कि 29 जो है वोएकटर्निंग पॉइंट होगा हमारे मुल्क के लिए।क्योंकि अगर 29 में हम इन लोगों को नहींरोक पाए तो फिर बहुत अरसे तक हमें[नाक से की जाने वाली आवाज़]झेलना पड़ेगा इनको और ये क्या-क्या ना करदें और उसके बाद उस चीज को रिवर्स करनेमें और कितने साल लग जाए तब मौका मिलेगाउसका कहना मुश्किल है। 29 बड़ा क्रिटिकलईयर है और जो इस वक्त इंडिया अलायंस को एकमौका मिला है कि 29 में अगर हम इसकोरिवर्स कर दें देखिए इनकेइंटरनल डिफरेंसेस और क्रैक्स इनकी इनकेसेटअप में आ रहे हैं। यूपी और दिल्ली कोदेख तो दिल्ली मेंये जब ये सब जो हो रहा है ना जो अयोध्याका जोपैसे कीप्शन चोरी का और करप्शन का मसला हैऔर जो जमीनों की बातें आ रही हैं। ये सबबाहर से नहीं आ रही है। ये सब अंदर से आरहे हैं।इन्हीं की पार्टी के लोग उसको निकाल रहेहैं, दिखा रहे हैं। एक्सट्रा तो ये एकक्रैकअप इनकी पार्टी में आ सकता है। उसकाहम क्या फायदा उठा सकते हैं वो वक्तबताएगा। लेकिनउससे हटकर हमको अपनी यजहती और अपनी यूनिटीको हम अच्छी तरह से किस तरह से प्रोजेक्टकर सकते हैं 29 में। वह बड़ा क्रिटिकल हैऔर अगर 29 में उसमें हम कामयाब हो जातेहैं तो मैं यह समझूंगा कि हमारे मुल्क केजो सेकुलर किरदार है उसको एक नई जान मिलजाएगी और अगर नहीं कर पाते हैं तो फिरगॉड नोस कि क्या होगा?एंड व्हाट विल बी द रोल ऑफ़ मुस्लिम्स?मुस्लिम्स को गौर करना चाहिए, सोचनाचाहिए, सोचना चाहिए कि मुस्लिम क्या करसकते हैं? देखिए मुस्लिम्स हैव टूमुस्लिम्स हैव टू टॉक टू द सेकुलरपार्टीज। अब जैसे सेकुलर पार्टीज की बातयूपी की करिए।यूपी में कहते ये लोग हैं कि इस वक्त अगरहम अलायंस ना करें यूपी में तो कुछ भीमुमकिन नहीं है।अलायंस करना जो है वो जरूरी है। वो लाजमीहै। एसेंशियल है। लेकिन अलायंस जिस तरहतरह के अलायंस होते रहे हैं उस अलायंस सेपार्टी की जो स्पिरिट है वो टूट जाती है।और हम यह जानते हैं हम यह जानते हैं किउत्तर प्रदेश में एक सीनियर पार्टनर है।समाजवादी पार्टी है या बसपा है जब भी वहहमारे साथ लड़े हैं तो वो एक सीनियरपार्टनर पार्टनर बनके लड़े। लेकिन हमाराजो वर्कर है वो सिर्फ ये चाहता है किथोड़ी सी इज्जत हमको मिले। इलेक्शन केवक्त और इलेक्शन के बाद थोड़ा सा हमको कुछसमझ लीजिए। हमारी भी कुछ औकात है। हमारीहमारा भी कुछ वजूद है। उसका थोड़ा लिहाजकर लीजिए और एक अच्छा अलायंस हो। तो अगरसमझदारी का हो और और इज्जत से अलायंस होतो बहुत इमकानात है। बहुत कुछ मुमकिन हैउत्तर प्रदेश में। लेकिन ये आसान नहीं है।कहना आसान है। करना बहुत मुश्किल है। अबइसमें कौन इसमें शरीक होकर और कौन इसकोकराता है वो वक्त बताएगा।बहुत शुक्रिया सलमान खुर्शीद साहब। आपनेवक्त दिया। अ कमिटमेंट आपका वक्त का कम थालेकिन उसके बावजूद आपने एक लंबा डिस्कशनकिया है।बहुत शुक्रिया औरहोपफुली हिंदुस्तान में जो चीजें हुई हैंऔर हो रही हैं वो हम लोग रीशेप कर सकें।उसमें एक पॉजिटिव रोल अदा कर सकें औरस्पेशली जो आपने जिस चीज पे तवज्जो दी किसिर्फ ये जरूरत नहीं है कि आप कौन हैं। एकप्लूरल सोसाइटी में ये समझने की भी जरूरतहै कि सोसाइटी क्या है? उससे क्या वोकैबरीहोगी उसके बावजूद उसके प्रिंसिपल्सयूनिवर्सल होने चाहिए। वो ऐसा नहीं होनाचाहिए कि भ आप आगे कुछ बोल रहे हैं पीछेकुछ बोल रहे हैं।तो वो जो कॉन्टेक्सुअलिटी है वोयूनिवर्सलिटी से ही डिराइव होनी है।तो हिंदुस्तान के मुसलमानों का और बल्किहिंदुस्तान में जितनी भी कम्युनिटीज हैंमुझे लगता है इस वक्त वो एक चैलेंजिंगटाइम से गुजर रही हैं। जहां उनको अपनीपिटिकल फिलॉसोफी को रिविजिट करना पड़ेगा।और वहीं से फिर जो आपने बोला इंडियाअलायंस और यह सारी चीज़ तो यह किसी एक आदमीसे नहीं हो सकता। वी नीड अ वॉचसबको मिलकर ही करना होगा।बहुत वाइडर मोबिलाइजेशन की जरूरत है। बहुतशुक्रिया आपने टाइम दिया। इंशा्लाह बहुतशुक्रिया बहुत शुक्रिया।
Companion article
Asked how deep the crisis facing India's Muslims runs, Salman Khurshid, the senior Congress leader and former Union minister, began by declining the framing. In a long conversation on the Nous Podcast, he argued that what India faces is a foundational crisis of democracy, and that Muslims feel it first because democracy promised them special protection. The provisions in the Constitution for minorities, he said, are compensation for a group that cannot speak as forcefully as the majority, not appeasement, and those in power refuse to understand that.
The same reasoning shaped his response to the phrase "second-class citizen". He noted that the phrase has two audiences: those who say Muslims must accept that status and those who complain they are being pushed into it. Either way, he said, a state that produces second-class citizens has already broken the Constitution's promise of equality and fraternity. His frustration was directed as much at his own side. Secular parties, he said, tend either to stay silent in the face of propaganda or to advise against answering it, when they have answers and should give them.
Much of the discussion turned on mosques. Khurshid described the Places of Worship Act as a deliberate line drawn at 15 August 1947: whatever had happened before that date would be left alone, so that the country could look forward. The difficulty today, he said, is that arrangements dating back centuries are being reversed through present-day court decisions, in the name of democracy, on the argument that earlier rulers imposed them.
He said he argued in the case over the Kamal Maula mosque in Dhar, known to Hindus as the Bhojshala, and that his position was narrow: the court should apply the reasoning of the Babri Masjid judgment. He did not, he said, oppose that judgment. His reading of it was as follows. The dispute had two parts, the Ram Chabutra outside and the mosque building inside. Muslim litigants conceded that the chabutra had been in Hindu possession for a long time, so nothing was claimed there. The inner structure was a title suit, and in his account the court found that Muslims had been in possession and that they had been wronged, before using its special powers under Article 142 to direct that five acres be given for a mosque.
Here Khurshid made a point that will not be universally welcomed. Declining that land, he said, was a mistake: a mosque built beside the temple could have become a symbol of Indian secularism, and today's Ayodhya looks one-sided. He also distinguished the Dhar matter from Babri procedurally. Babri was a title suit, he said, which would have tested possession and registration, whereas the petitioners in the Kamal Maula case brought a writ petition against the Archaeological Survey of India's permission. If the option of a title suit was taken when it helped and avoided when it did not, he said, he called that a tactic open to complaint. These are Khurshid's readings of the litigation, offered by a lawyer who argued in it, and the host noted that others see the reasoning in these judgments as selective.
The host raised a practical objection: Ram Mandir and the Dhar ruling have become so embedded in majority sentiment that reversing them may be more disruptive than living with them. Khurshid did not dispute that. His response was that a reversal has already occurred, and that the country has to decide how far back it wants to go. The Constitution of 1950, he said, was written with the past in view but on the resolve to look ahead.
The host pressed the familiar claim that personal law and secular law collide. Khurshid rejected the premise. Personal law, he said, is part of the secular order and is protected by the Constitution; the live question is how far the protection goes when the two seem to conflict. His answer was mostly practical. India is not a vegetarian country, he observed, and communities have always adjusted: a speaker pauses for the azaan, and Muslims are ready to forgo meat sales or sacrifice on a day that matters to neighbours. Disputes over prayer in homes or on streets, he said, are generally manufactured, and the answer is permission and reciprocity, not prohibition.
On triple talaq he offered a defence of the underlying institution. In his description, divorce in Islamic law is meant to be a considered process, with family elders attempting reconciliation, a waiting period, and obligations to the wife that survive the marriage. Pronouncing it three times in a sitting, he noted, is not something the Supreme Court found in Islam. He argued that a woman's rights within the system, including the option of delegated divorce written into the marriage contract, are rarely mentioned by critics.
On the Uniform Civil Code, he said the Directive Principles do not override Fundamental Rights and must be harmonised with them, and that no court has yet said what a uniform code would actually mean for personal law. He also raised the pending Sabarimala reference as a test of who decides what counts as an essential religious practice: courts, he suggested, have often said that believers must decide, and the answer will apply to everyone.
Khurshid said that in a long public career he has never felt discriminated against as a Muslim, and that the criticism he has faced has come mainly from his own community, which expected more of him when the Congress was in government during the Babri demolition. The lesson he drew is that ideology and strategy are different things. One can stay firm on ideology, he said, but a strategy that satisfies the speaker while hurting the people being defended has no value.
He conceded that the Congress has made strategic mistakes, and that it is hard for a party to admit them because every admission is used against it. Asked about the Emergency, he said the party should acknowledge its errors but that the record needs full context. He argued that it was imposed within the constitutional framework, and that the electorate returned Indira Gandhi to power within two years. The host himself cautioned against treating the Congress and the BJP as morally equivalent, a comparison he called a leap.
His clearest defence of the UPA years was the Sachar Committee. He said the report deliberately used the word "Muslim" instead of "minority", with Manmohan Singh's backing, because policy had to address Muslim outcomes specifically. The proposed Equal Opportunity Commission, he said, foundered because existing commissions for Scheduled Castes, Backward Classes, minorities and women feared losing their own remit. What did work were special schemes in minority-concentration districts, designed so that a new school or road benefited everyone, and above all the scholarship programme, with direct transfers to families. That programme, he said, was the first thing dismantled when the government changed, and the demand for it had been rising every year. He added that Singh's remark about a first claim on resources was distorted and has been quoted against the community ever since. Delivery, he stressed, depended on state governments.
He drew a contrast with Asaduddin Owaisi, whose party speaks without the constraints that a member of a broad secular front accepts. People can fairly say Owaisi speaks more freely, Khurshid said, but the real question is which approach helps the country hold together: building one's own separate institutions, or strengthening a secular society in which everyone has a stake. The verdict, he added, belongs to the public.
On solidarity with Palestine, Khurshid said Indian Muslims and non-Muslims alike once identified with liberation struggles, from Turkey under Ataturk to Palestine, as questions of freedom, not of religion. Sympathy with those driven from their homes and bereaved in Gaza is sympathy with victims, he said, and should not be mistaken for sectarian feeling.
The host argued that the community and the party are talking past each other, and Khurshid agreed that a communication gap exists. Part of the difficulty, he said, is that Muslims do not readily accept anyone as a leader, so whoever nominates himself may neither know their concerns well nor express them well. The Congress, he said, has been trying to reach out through its minority department and through leaders it has sent to the Rajya Sabha. He added that Rahul Gandhi has invited scholars, activists and media managers for detailed conversations, but that such meetings tend to be spoiled by a hostile participant or by sympathisers too polite to speak plainly. His answer was consistency, and channels that a platform like this one might help provide. People from Bengal, he said, have started calling to ask to meet Congress leaders.
Asked about UAPA and PMLA, Khurshid said the laws were passed under a Congress government by colleagues, P. Chidambaram among them, to deal with terrorism and economic crime, and that nobody expected them to be used as they are now. He acknowledged the misuse without reservation and said a future government of his party would need to confront it first. Relief, when it has come, has come from the courts, though the Supreme Court has not always lived up to expectations.
His broader point was that law changes less than the people interpreting it. He cited the Aligarh Muslim University case, where the statute was the same but a different reading by the Allahabad High Court and, later, the Supreme Court produced opposite results, and the shift in how judges treat tenants. A generation of judges applies old texts in the mood of its own time, he said, and communities live with the results.
Khurshid distinguished cultural Hindu life, with its shared greetings and festival visits, from Hindutva as a political project, and said the trouble starts when culture is converted into a political movement, as it does when any faith is. He said he would prefer that people speak of liberalism instead of secularism, a word he thinks has been discredited, and described the Congress as a rainbow alliance whose colours change with its leadership.
On how the political ground shifted after 2011, he said the anti-corruption campaign and the litigation over telecom and coal allocations consumed his party's energy, while a much larger current of hostility built unnoticed. Gujarat in 2002 was the earlier warning. He said the Congress had joined protests and tried to legislate against communal violence but was blocked, and that history would judge whether more could have been done. He also said the SIT officers were capable and that he cannot explain why the accountability effort fell short. Twice, he added, the party believed it was close to beating the BJP in Gujarat, where the vote gap was around ten percentage points. He also recalled Pranab Mukherjee telling colleagues that the Congress could govern either the states or the centre, and said the compromise with regional parties eventually turned against it.
His prescriptions were political. He called 2029 a turning point and argued that the INDIA bloc needs a fresh arrangement with regional parties, including in Uttar Pradesh, where his party's workers want dignity as partners. He said Muslims should talk to secular parties and that the party needs new leaders from the community, naming Nasir Hussain among those emerging. He credited Rahul Gandhi's Bharat Jodo Yatra with drawing people who had never voted Congress, and acknowledged that turning such a mood into something lasting remains the party's challenge.
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
3:25:59What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
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