Nous Podcast· 19 Jul 2026· 2:06:10

Why the Sachar Committee Report Is Still Relevant Today | Dr. Abusaleh Shariff

How did the Sachar Committee come into being, and what happened behind the scenes during the preparation of one of independent India's most consequential reports? In this episode of the Nous Podcast, Ali Javed speaks with Dr. Abusaleh Shariff—applied economist, demographer, and Member-Secretary o…

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तो सच्चर कमिटी रिपोर्ट [संगीत] इज ए रिपोर्ट ऑफ नेशन बिल्डिंग। ऐसा रिपोर्ट ना सच्चर से पहले आया था ना सचर के बाद हुआ है। लेकिन वेरी ब्रीफली मोटी मोटी फाइंडिंग्स अक्रॉस डिफरेंट पैरामीटर्स जो आपको लगता है मोस्ट कॉन्सिक्वशियल है। जब सचर कमेटी का इस तरह से आगाज हुआ तो आई एम सो थैंकफुल टू डॉ. मनमोहन सिंह कि उन्होंने अपने घर में उन्होंने बुलाया मुझे बिकॉज़ आई वाज़ एन एक्सपर्ट डाटा वाला वगैरह। दिस रिपोर्ट हैज़ टू बी डेटा ओरिएंटेड। जो पब्लिक एक्सेस स्ट्रक्चरल है मतलब फ्रॉम द पॉलिसी पर्सपेक्टिव क्या आप कह रहे हैं कि वो भी जिसे कहते हैं अनटेंगल किया जा रहा है या अनटेंगल रहा शुरू से? तो क्या गवर्नमेंट के जो पॉलिसीज हैं? हैव यू ट्रूली एंकरर्ड योर पॉलिसीज बेस्ड ऑन द कॉन्स्टिट्यूशन प्रोविज़ एंड आई एम टेलिंग यू नो। आई विल टेल यू द स्टेटस ऑफ वुमेन इन अमंग मुस्लिम्स इन इंडिया इंक्लूडिंग इन यूपी बिहार एंड एवरीवेयर बेटर देन हाउ हिंदू वुमेन आर ट्रीटेड अमंग द हिंदू इन इंडिया 100 साल का तो रिकॉर्डेड चर्निंग है कि कम्युनिटीज में सर सैयद क्यों स्कूल बना रहे हैं कॉलेज बना रहे हैं दूसरे लोग कि नहीं कि भ डेप्रिवेशन है और उसी वक्त कुछ लोगों ने बीजेपी के मुझे माल नाम याद नहीं आ रहा है उन्होंने हम ये रिपोर्ट को खारिज करते हैं। कैसे खारिज करोगे भाई? इसको खारिज करना है तो आपको दूसरी किताब लिखनी पड़ेगी और उसके अंदर जो आंकड़े हैं उसको झुठलाना पड़ेगा। तो क्या यह जो पॉलिसी डिजाइन है कौन सा वेरिएबल रखा जाए कौन सा नहीं रखा जाए ये इंटेंशनल है या एक्सीडेंटल है? नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक [संगीत] टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंप्लीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। डॉक्टर शरीफ मैं आपका खैरमकदमम करता हूं नाउ में। थैंक यू सो मच चाली। तो जैसे कि मैं डॉक्टर साहब कह रहा था कि मैं ऑलमोस्ट 2014 2013 में 11 12th के बाद यूनिवर्सिटी में आना होश संभालना और इकोनॉमिक्स बीए फिलॉसफी पॉलिटिक्स इकोनॉमिक्स फिर एमए एमफिल इकोनॉमिक्स तो इकोनॉमिकली हम लोगों के लिए जो सच्चर कमिटी रिपोर्ट की फाइंडिंग्स थी जो मुसलमानों का सोशियो इकोनॉमिक डेप्रिवेशन है वो गिवन था कॉन्टेक्स्ट और उसी पे बातें होती थी उसी को समझा जाता था कि इस तरह से मुसलमान मार्जिनलाइज्ड रहे इंडिया में आपके यहां पे रिसोर्सेज नहीं हुई एजुकेशन बहुत सारी चीजें लेकिन दिस इज नॉट एग्रीड अपॉन रियलिटी बिफोर 2006 2007 सच कमिटी रिपोर्ट ने जो एक इंस्टीट्यूशनलाइज्ड पर्सपेक्टिव को रखा और उसको माना गया उससे पहले की भी एक दुनिया है 50 साल 40 साल जो हिंदुस्तान आजादी के बाद अपनी मुख्तलिफ माइनॉरिटीज के साथ जो स्ट्रक्चरल अपेरेटस क्रिएट किया वो वो अपेरेटस की रीडिंग, रीरीडिंग, मंडल दूसरी चीजें होती रही। लेकिन अक्सर हम ये भूल जाते हैं कि इंडियन मुस्लिम का जो सवाल है उसकी एववोल्यूशन क्या है? सोशियोइकोनॉमिक डेप्रिवेशन का आजादी के बाद से इस सवाल को कब देखा गया? क्यों देखा गया? और आप एज एन इकोनॉमिस्ट क्यों इस सवाल को इंपॉर्टेंट समझा? कि अल्टीमेटली जो आपकी करियर है वह कलनेट होता है। ऑफ कोर्स आपका करियर उसके बाद एक डिफरेंट डायरेक्शन में जाता है। लेकिन जो आपकी जो पूरी ट्रेनिंग है उससे आप एक इतनी मैसिव जिसे कहते हैं रिपोर्ट दे देते हैं जो अभी तक इंडियन मुस्लिम के क्वेश्चन को उस रिपोर्ट के बगैर पूछा ही नहीं जाता। अली दिस इज अ वेरी इंपॉर्टेंट डायमेंशन दैट यू आर फोर्सिंग मी टू थिंक। सी आई एम अ काइंड ऑफ माय चाइल्ड सून आफ्टर इंडिपेंडेंस वास बोर्न आफ्टर इन 1952 बोर्न इन अ रिमोट एरिया बोर्न इन अ रूरल सेटअप सो एस आई ग्र्यू ओवर आई न्यू दैट देयर आर डिफरेंसेस फॉर एग्जांपल माय फादर वाज़ अ स्कूल टीचर एंड ही वाज़ अ उर्दू स्कूल टीचर हाउएवर माय फादर मेड इट अ पॉइंट दैट आई आल्सो गो टू अ कन्नाडा स्कूल। आई एम फ्रॉम कर्नाटका। सो आई यूज्ड टू वेक अप अर्ली 7 ओ क्लॉक गो टू ए कन्नडा प्राइमरी स्कूल कम बैक डोंट गो होम गो टू द उर्दू स्कूल व्हिच स्टार्ट्स एट 11 एंड गो बैक होम एट 3 ओ क्लॉक। नाउ यू मे आस्क अ क्वेश्चन वेयर डू आई टेक माय फूड? सो एट दैट टाइम देयर वाज़ मिड डे मील्स पीएल 480 जमाना था दैट दिस इज़ अराउंड 1962 आई वाज़ इन अ स्कूल अ देयर वाज़ अ मिड डे मील्स इन द उर्दू स्कूल बट वेयर डू आई डू माय ब्रेकफास्ट बिकॉज़ 6 6:15 आई हैड टू वॉक अबाउट 2 kमी टू गो टू द सेम विलेज नेम नेम बट माय एस्टैब्लिशमेंट इज मुस्लिम 80 हाउसहोल्ड्स अनदर 35 40 हाउसहोल्ड्स हिंदू एंड द नेम ऑफ द विलेज इज द सेम एंड देयर इज़ अ डिफरेंस ऑफ़ अबाउट 2 कि.मी. ये माहौल जो बसा हुआ था वो तो वो माहौल में माय फादर वाज़ अ विज़नरी। आई डिड नो अह आई डोंट नो व्हाई ही डिड नॉट सेंड ऑल मुस्लिम चिल्ड्रन टू कनाडा स्कूल एज़ वेल, बट ही डिड सेंड मी। ही सेड यू कन्नाडा भी पढ़ेगा। दूसरे मुस्लिम बच्चे नहीं गए। सिर्फ मैं दैट इज बिकॉज़ ही आस्क मी टू गो देम। एंड देन ही अरेंज्ड माय ब्रेकफास्ट या रागी मुद्दे जो बोलते हैं कन्ना कर्नाटका के इन ए गड़ा फैमिली गडा द फार्मर्स ऑफ कर्नाटका। ए हिंदू फैमिली। सो दैट इज वेयर आई विल हैव माय ब्रेकफास्ट। दिस इज़ हैपनिंग ऑल माय प्राइमरी स्कूल। हम सो आई एम लर्निंग कन्नाडा बट आई एम आल्सो लर्निंग उर्दू बट उर्दू स्कूल आल्सो टीचेस इंग्लिश राइट फ्रॉम प्राइमरी स्कूल। सो माय फादर हिमसेल्फ इज़ अ इंग्लिश टीचर टू मी। सो मुझे [नाक से की जाने वाली आवाज़] तीन लैंग्वेजेस मिल गए। उसका इंपॉर्टेंस एट दैट टाइम आई डिडट्ट रियलाइज़। बट देन आई बिकम वेरी यू नो ओपन टू टॉक इन कनाडा। सो व्हेन आई टॉक इन कनाडा। आई एम बेसिकली टॉकिंग टू हिंदू पीपल। तो म कम्युनिकेशन वि द हिंदू कम्युनिटी वाज़ इजी क्लियर कंपेयर टू अदर मुस्लिम चिल्ड्रन हु आल्सो यूज्ड टू टॉक टू हिंदू चिल्ड्रन बट नॉट थ्रू द स्कूल सिस्टम। मैं स्कूल भी कनाडा भी लिखना पढ़ना भी जा रहा हूं। दूसरे बच्चे कनाडा बात कर रहे हैं मगर लिखना पढ़ना नहीं जान रहे। सो यू सी माय फाउंडेशन ऑफ माय एजुकेशन। इन माय माइंड ब्रॉट द कम्युनिटी इश टूगेदर वेदर हिंदू मुस्लिम एस अ चाइल्ड व्हाटएवर यू ऑब्जर्व एंड देन व्हाटएवर यू कंपेयर तो द कंपेयरिंग दिस हिंदूु मुस्लिम सचर कमिटी जो बता रहे हैं आप वो तो मेरे बचपन में ही शुरू हो गया था एक्सपीरियंस था तो वो एक्सपीरियंस तो पहले ही से थी एंड एंड देन ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम माय फादर अम मेड श्योर दैट ही गेट अ ट्रांसफर टू अ प्लेस वेयर देयर इज अ हाई स्कूल बिकॉज़ देयर इज नो हाई स्कूल हाई स्कूल वाज़ अबाउट 20 कि.मी. अवे एट दैट टाइम। सो इफ हाई स्कूल नॉट देयर माय फादर वाज़ नॉट विलिंग टू सेंड मी काइंड ऑफ़ हॉस्टल वो कल्चर नहीं था हमारा। यू नो इट वाज़ वेरी। तो वी ही ही टूक ए ट्रांसफर वेयर आई गॉट अ हाई स्कूल गवर्नमेंट हाई स्कूल एंड इन दैट हाई स्कूल इन द होल क्लास दे ओनली टू मुस्लिम्स एंड हाई स्कूल में वहां मैथमेटिक्स पढ़ा वो पढ़ा वो पढ़ा देन आफ्टर हाई स्कूल आई नीडेड अ प्री यूनिवर्सिटी देयर वाज़ नो प्री यूनिवर्सिटी इन दैट टाउन देन माय फादर वेंट एंड थॉट इन ह ब्यूरो ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम एंड गॉट योर ट्रांसफर टू अनदर प्लेस नॉट वेरी फार फ्रॉम बोर बट नॉट विथ इन बोर आउटस्कर आउटस्कर वेयर आई डीड माय प्री यूनिवर्सिटी एंड देन फ्रॉम देयर आई कैन डू माय बसाइकिलिंग अबाउट 10 कि.मी. गो टू अ कॉलेज कॉल्ड गवर्नमेंट आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज। एंड देन इन फ्रंट ऑफ गवर्नमेंट आर्ट्स साइंस कॉलेज देयर इज अ सेंट्रल कॉलेज व्हिच हैज़ द मास्टर्स इन इकोनॉमिक्स। नाउ ऑल माय एजुकेशन हैज़ बीन इन द गवर्नमेंट प्रोवाइडेड स्कूल सिस्टम। आई नो डोंट आस्क मी परसेंटेजेस। आई नेवर वाज़ ए स्टूडेंट आई बेरली मैनेज एंड देयर आर स्टोरीज अस टू हाउ आई कुड गेट इन टू एमए इकोनॉमिक्स इंस्पाइट ऑफ अ वेरी ड्रेटफुल आई एम यूजिंग द वर्ड विथ लव। अ प्रोफेसर कॉल्ड केवी जी गड़ा हु लेटर बिकम एमपी आल्सो ही वास माय प्रोफेसर बट सम हाउ आई स्टडीड इकोनॉमिक्स एंड गॉट थ्रू माय मास्टर्स नाउ इन दिस होल प्रोसेस माय ग्रोथ एटलीस्ट इन कर्नाटका नेवर इन माय माइंड नॉट इवन वन सेकंड इन माय लाइफ आई वास अलर्ट दैट आई एम अ मुस्लिम मुझे कभी एहसास ही नहीं है कि मैं मुसलमान हूं हां जुमा की नमाज को जाते ईद ईद मनाते ये सब हो रहा है। मगर मुझे मुझे एहसास नहीं है कि मैं मुसलमान हूं। सिविल स्पेस में मजबूर नहीं किया जा रहा है एक दूसरे की आइडेंटिटी को समझने के लिए। स्पेस या जो माहौल है वो कहीं भी मुझे ये नहीं कह रहा है कि तुम मुसलमान या कोई हिज वो होता है ना झिझक होती है। मैं मुसलमान ये झिझक ये नॉर्थ इंडिया में होती है। हमेशा होती रहती है। एव्री अदर मिनट हो रही है। हम हमारे माहौल में जब ग्रो यह नहीं थी तो द पैरामीटर वि आई अंडरस्टुड इज इंडियास डेवलपमेंट स्टोरी में मुस्लिम इज लाइक इज लाइक एनी अदर कास्ट इन इंडिया इट इज़ नॉट अ रिलजन इन इंडिया ये मेरी थ्यरिटिकल चैलेंज है फॉर सोशियोलॉजिस्ट एंड नो सोशियोलॉजिस्ट हैज़ रिटन दिस नॉट इवन एमए श्रीनिवास आई हैड यूज्ड टू आर्ग्यू विथ हिम आई हैड एन अपोरर्चुनिटी टू आर्ग्यू विम यू नो हु एमए श्रीनिवास ही इज़ द लेजेंड्री सोशियोलॉजिस्ट ऑफ इंडिया ही रोट ए बुक कॉल्ड रिमेंबर्ड विलेज यू शुड रीड इट एंड यू शुड इन योर पडकास्ट फमिलियराइज दैट ही एक्सप्लेंड द स्ट्रक्चर ऑफ इंडियन सोसाइटी सो ही सेड दैट हिंदू सिस्टम हिंदू कल्चर वांटेड संस्कृटाइजेशन प्रोसेस। सो द प्रोसेस ऑफ संस्कृटाइजेशन। सो व्हाट इज द प्रोसेस ऑफ ही सेस दैट बिकॉज़ ऑफ द कास्ट हायरार्की इन इंडिया द लोअर हिंदू एंड द लोअर रंग दे वुड लाइक टू एमुलेट द पर्सन एंड द हायर रंग एंड दे वांट टू बिहेव लाइक द अप्पर कम्युनिटी एमुलेशन बिकॉज़ इन द गिवन एनवायरमेंट दैट वाज़ द ओनली रूट टू असर्ट योरसेल्फ एंड कम आउट ऑफ ऑफ यवर यू नो जो जो ऑब्सकल्स क्रिएट किए अपने कास्ट ने जैसा दलित है वो ब्राह्मण सोसाइटी में नहीं आ सकता जो वो जमाने में दलित स्कूल के अंदर एडमिशन भी उनके बहुत मुश्किल से हो रहे थे। सो देयर इज़ लॉट ऑफ़ स्टोरीज बिहाइंड हाउ दलित्स आर ट्रीटेड। हम तो वो कॉन्टेक्स्ट के अंदर जो मुसलमान जो मैं मुसलमान और मेरा ग्रोथ अप था आई एम अ काइंड ऑफ़ पार्ट ऑफ दैट वर्णा सिस्टम। अब वो वर्णा सिस्टम में सोशलॉजी में बोलेगा ये कौन है? ये क्या सोशलॉजी जानता है? वरना में तो यह हिंदू होते हैं। मैं बता रहा हूं हमारे देश में मुसलमान भी वरना सिस्टम का एक एक भागीदारी है। उसका आइडेंटिटी आप इसको इस तरह बोल रहे हैं कि जैसे विद इन मुस्लिम कास्ट स्ट्रक्चर्स हैं या नहीं नहीं वो मुस्लिम को ही विद इन आप बोल रहे हैं लोकेट कर रहे हैं। वो बाद में आएगा। आपका नाम एज अ मुसलमान इज इनफ टू कैटेगराइज योरसेल्फ एज अ मुस्लिम। एंड मुस्लिम इज ए वो हायरार्की में कहीं फिट हो रहा है। हम जो सोशियो रिलीजियस जो डाटा है आपका उसमें आगे आएंगे भी वो किस तरह से उस हारकी में लोकेट भी करता है उसको कि भाई आप स्ट्रक्चरली थ्रू डाटा आप उसको अब हमारा सिस्टम मुस्लिम्स को पैरेलल देख रहा है हम मैं ही कह रहा हूं वो इंटरमेश है हम वो ऑलरेडी हम हां भाई वो नमाज पढ़ता है मस्जिद को जाता है दूसरे मंदिर को जाते हैं मगर वो सिस्टम को निकाल के आप टोटल इकोनॉमिक स्ट्रक्चर देखिए हम तो वो और वहां का वैल्यूस सिस्टम देखिए इंटर कम्युनिटी टॉकिंग ये सब ये उसके अंदर मुसलमान एक जगह वो कास्ट कम्युनिटी में क्योंकि हिंदूइज़्म में मल्टीपल कास्ट है हम वो वर्णना सिस्टम में चार कैटेगरीज बनाए बहुत सारे का हजारों हैं तो उसके अंदर मुस्लिम वहां फिट हो रहा है कैटेगराइजेशन के लिए आप मुझे क्या कर रहे हैं मुस्लिम बना के अपने जो कॉन्स्टिट्यूशन में जो इक्वलिटी दी है उसके अंदर से आपको मुसलमान बना के आपको वो कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजन का मिस इंटरप्रिटेशन करके अपने सिस्टम से जुदा कर रहे हैं। तो इसको ये नहीं कहते कि भ इंडियन हम इंडियन हैं। हां वही मैं कह रहा हूं कि मतलब जैसे हिंदू मुस्लिम की अगर डकॉटमी है अगर आप उसको वो आर्टिफिशियल क्रिएट कर रहे हैं। वो नहीं थी। हम वह पहले यहां भी इंडिपेंडेंस से वह ब्रिटिश वह बताते हैं कि ब्रिटिश ने हिंदू मुस्लिम्स को लड़ाया एंड दे वांटेड टू ये हो सकता है। मैं हिस्टोरियन नहीं हूं। मगर कल्चरली आज भी आज माहौल अलग होगा। हमारे जमाने में कल्चरली मुस्लिम्स मैं अर्बन एरियाज की बात नहीं कर रहा हूं। रूरल रूरल एरियाज जो उस जमाने का रियल इंडिया था। अभी भी रेट ऑफ़ अर्बनाइजेशन 70% तो अभी भी 65 70% रूरल पापुलेशन है। हम तो वहां [नाक से की जाने वाली आवाज़] पे इंटरमेश है। हम कोई डेबिट डेड में नहीं है। सवेरे उठो तो बोलता है हां ये मुसलमान ये काम करता है वो काम करता है। उसका करता है। ये व्यापार करता है। सब करता है। जैसा दूसरा करता है। और जो हायरार्की के अंदर जैसा कि दलित को आप वहां नहीं आने देते। वो मंदिर में आने देते। मुसलमान वहां वो मंदिर नहीं जाता। वो मस्जिद में जाता है तो मंदिर में आया तो वो बाहर बैठता है। उस तरह का वो वो पानी दो दो पानी आप मिश्रण हो जाता है। ऐसा हो गया तो ये हिंदू मुस्लिम डकॉटमी है वो क्रिएशन ऑफ आरएसएस फॉर पॉलिटिकल पर्पस। अदरवाइज इवन गांधी के जमाने में कम्युनल राइट्स हुए मगर सोसाइटी इतनी ज्यादा अनटेंगल्ड नहीं की गई हुई। इंटरसेक्शनल सोसाइटी रही है क्योंकि 1000 साल का एक पूरा का पूरा ये रहा थोड़ा सा इनिशियल एनालिसिस आई नो इसको कई लोग जो देख रहे हैं ये मेरे से बहुत खफा होंगे और बोलेंगे कि ही हैज़ नॉट अंडरस्टुड द इंडियन सोसाइटी कोई मसला नहीं है हर तरह के आईडिया वो होते हैं जी मगर आई वांट टू चैलेंज देम टू थिंक दिस वे एंड सी अब घुल मिलेंगे तो आपको पता होगा तो यह घुलमिलन कैसी हुई तो सिर्फ मैं मेरा ओरिजिन सिर्फ विलेजेस से नहीं था। वो कनाडा पढ़ के हिंदू फ्रेंड थे मेरे और हिंदू वो सब मेरे दोस्त थे। अब ज्यादा क्या होता है मुस्लिम कम्युनिटी जो मुस्लिम विलेजेस में है उस मुसलमान के बच्चों के मुसलमान ही बच्चे फ्रेंड्स हैं। अब ये मुस्लिम कम्युनिटी का अलग इशू है। वो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मुस्लिम्स हैव क्रिएटेड गेट। सिस्टम हैज़ क्रिएटेड गेट। आई हमारा आज का सिस्टम भी चाहता है कि मुस्लिम गेटों में बंद रहे और मोर स्लम्स में जाए। उसको पब्लिक स्पेस जो है उसको स्कटल करो। सो ये इशू है एक्सेस टू पब्लिक स्पेस। व्हाट इज ए पब्लिक स्पेस? अब देखिए यहां हम देखते हैं कि वो कुछ गाड़ी ठेल जाके बिजनेस करने वाले। अब कुछ गलियों में जा नहीं सकते। अब गली तो पब्लिक स्पेस है। अभी कहीं भी हो दिल्ली में। मगर आपको बोला तू यहां नहीं आ सकता आपका पब्लिक स्पेस गायब है ना तो इसी तरह पब्लिक स्पेस है एक स्कूल पब्लिक स्पेस है तो इसी तरह एक यू नो इवन बैंक इज अ पब्लिक स्पेस टू मी तो ये पब्लिक स्पेस का जो एक्सेस है कॉन्स्टिट्यूशनली हैज़ टू बी एक्सेसिबल टू एवरीबडी हु वांट्स टू गो देयर सम पीपल डोंट वांट टू गोदर दैट इज देयर ब्लडी हेल्प बट जो जाना चाहता है पब्लिक स्पेस में उसको विदाउट रिस्ट्रिक्शन पब्लिक स्पेस में उसकी जगह है जो आप कह रहे हैं मैं क्या सही समझ रहा हूं क्योंकि एक तो ये है कि पब्लिक स्पेस एक सोशियो कल्चरल रियलिटी से प्रोड्यूस होता है। एक पब्लिक स्पेस स्टेट प्रोड्यूस करती है कॉन्स्टिट्यूशनल पॉलिसी से फ्रेमवर्क से कि भाई आप कहां पे बना रहे हैं? मोहल्ले कैसे कर रहे हैं? कितना डिस्टेंस है? रोड कैसे बनेगी? कौन आ सकता है? और एक वो है जो पॉलिटिसाइजेशन है। ये सारी चीजें एक साथ चलते हुए जो पब्लिक एक्सेस स्ट्रक्चरल है मतलब फ्रॉम द पॉलिसी पर्सपेक्टिव क्या आप कह रहे हैं कि वो भी जिसे कहते हैं अनटेंगल किया जा रहा है या अनटेंगल रहा शुरू से। सो फॉर एग्जांपल आई वास जस्ट वाकिंग सम रोड हियर हम तो ये वो क्या बोलते हैं उसके बैटरी रिक्शा। बैटरी रिक्शा। तो वहां लगाया है कि उसे क्या बोलते टुक टुक कुछ ऐसा नाम है बैटरी रिक्शा बैटरी रिक्शा कोई कई जगह टुकटुक बोलते हैं हम लोग यहां पे तो वहां लिखा है ये रोड में टुकटुक आना मना है यहां लिखा है जी आई डोंट सी द रीज़न व्हाई अब यहां रिच एंड पुर का इशू है यहां ट्रैफिक का सिस्टम है आपकी Mercedes वहां रुकी है और टुकटुक आने नहीं दे रहे। सो अब अब ये सिस्टम जो है आप कम्युनिटीज को करो। अब ये हिस्टोरिकली ये बहुत कॉमन लगता है। क्यों? अब विलेज सिस्टम में अब फॉर एग्जांपल मुस्लिम्स के बारे में बात आता हूं। दलित लोग हैं हिस्टोरिकली। अब क्या हो रहा है मुझे पता नहीं। अब क्या वो क्या हम वी हैव ओवरकम दैट? हैव ही गिवन इक्वलिटी टू ऑल सिटीजंस इक्वली? आई डोंट नो। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो देयर आर दलित्स के लिए स्पेस इज़ वेरी क्लियरली डिफाइंड विलेज में। आप अग्रहारा एरिया में दलित नहीं जा सकता। जब तक उसे बुलाया ना जाए वह कचरा निकालने के लिए मरे हुए चीजों चूहे बिल्ली कुत्ते मरे हुए निकालने के लिए उसको बुलाया जाएगा नहीं तो कोई नहीं जाएगा तो वो एक हिस्टोरिकली कास्ट सिस्टम जो है वो एक्सक्लूड कर रखा है पब्लिक स्पेस को मगर वो ओल्डर कांसेप्ट है मगर हम इंडिपेंडेंट इंडिया में हैं। इंडिपेंडेंट इंडिया में कॉन्स्टिट्यूशन गारंटीज दी है। सबको इक्वलिटी दिया है। तो क्या गवर्नमेंट के जो पॉलिसीज हैं, हैव यू ट्रूली एंकरर्ड योर पॉलिसीज बेस्ड ऑन द कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजन एंड आई एम टेलिंग यू नो एंड इवन फ्रॉम द डज़ ऑफ़ अर्ली गवर्नेंस उसके पैरामीटर्स जो हैं एक दो खूटे जो हैं उल्टे लगाए हैं। हम बहुत सारे अच्छे चीजें हैं। हर चीज है। यू नो जैसा 7 सेकंड 73 अमेंडमेंट पंचायती राज का कम्युनिटीज का इन्वॉल्वमेंट ये वो हां मगर एक दो खूटे टेढ़े लगाए हैं उसमें वो क्या है फॉर एग्जांपल गवर्नमेंट डेटा गवर्नमेंट डाटा कलेक्ट करती है गवर्नमेंट डाटा इज़ यूज़ द होल वर्ल्ड कलेक्ट डेटा ऑफ इट्स सिटीजंस अब गवर्नमेंट किस तरह के कैटेगरीज बनाती है डेटा में दैट इज वेयर आई कम इन राइट तो आफ्टर माय मास्टर्स आई जॉइ एन ऑर्गेनाइजेशन व्हिच आस्क मी टू कलेक्ट डेटा फ्रॉम हाउसहोल्ड्स मैं रिसर्च असिस्टेंट था रिसर्च इन्वेस्टिगेटर जो कहते हैं क्वेश्चनयर बनाना आपने कहा यहां सर्वे किया है अब वो सर्वे में जो बच्चे पेन और पेंसिल और वो लेके जाके सवाल पूछ रहे हैं जैसा सेंसेस वाले घर आते हैं आपके वो करते हैं वो काम मैंने 10 10 15 साल किया मैं तो एटलीस्ट इन कर्नाटका 100्स एंड 100्स एंड थाउजेंड्स ऑफ हाउसहोल्ड सैंपल सर्विस करते तो उसमें आई यूज्ड टू गो एंड कलेक्ट दैट डेटा आई यू बिकॉज़ एडवांटेज मेरा क्या था? मैं कन्नाडा सीख सीख गया था। लिखना भी सीखा था। थे तो आप तो दूसरा मुसलमान नहीं कर सकता वो। कन्नाडा बाद में करना है तो सर्वे कैसे करेगा? तो मैं हर कोई घर जाता था। मैं दलित के भी घर जाता, ब्राह्मणस के भी घर जाता, मुस्लिम्स के भी घर जाता। सो सो आई वास देर इन अ सो माय पब्लिक स्पेस इज माय कंट्री यह मुसलमान बच्चों को जाना बहुत जरूरी है। लैंग्वेज हिंदी हो उर्दू भी सीखिए। लोकल लैंग्वेज लोकल लैंग्वेज सीखिए। लोकल कल्चर को अंडरस्टैंड कीजिए। ये लैंग्वेज जो है एक्स्ट्रा लैंग्वेज विल मेक यू अंडरस्टैंड एक्स्ट्रा कल्चर। एक्स्ट्रा आपके नेबर्स कौन है? आपके यू नो कम्युनिटी क्या है? आपका क्या उसके अंदर पोजीशन है वो लैंग्वेज लिंग्विस्टिकता है जुड़ाता है लिंग्विस्ट लिंग्विस्टिक स्टडीज में कहा जाता है कि सिर्फ लैंग्वेज ये नहीं है कि भ कम्युनिकेशन इट आल्सो कैरीज दी कल्चरल कॉन्टेक्स्ट कल्चर कल्चर का वो है वो जखीरा है जखीरा है लैंग्वेज तो बिकॉज़ ऑफ़ दैट मुझे मेरी अपब्रिंगिंग में मेरे वर्क में मुझे कभी फील नहीं हुआ नॉट इवन वन वन% ऑफ ए ग्रेन के है क्या मैं बोला ना मेरा एहसास कि मैं मुसलमान हूं हम कभी आए नहीं जिंदगी में आज भी नहीं है आज भी मुझे एहसास नहीं है मुझे बिकॉज़ आई हैव बीन वर्ल्ड लाइक दैट मगर मुझे मालूम के हर मुसलमान को एहसास नहीं है वो बाद में आएंगे वो प्रिविलेज से भी आता है कि भ हम किससे मिल पा रहे हैं कहां मिल पा रहे हैं वो बाद में आएंगे मैं स्ट्रीट लेवल की बात अब फॉर एग्जांपल यहां झगड़े होते हैं ना कोई बच्चा है कोई हिंदू बच्ची से बात कर दिया। हम मैं बहुत हिंदू बच्चों से बात करता हूं। बहुत हिंदू लड़कियों से बात। मुझे डर नहीं होता। हम मगर कुछ यहां पे जो एहसास है उसमें कुछ डर है। वो कल्चरल समथिंग डिवाइड कर रखा है। ज़हर तो इसीलिए वो वो चीजें वो रिपोर्टेड रिपोर्ट में आ रहे हैं। वह वह पता नहीं अह और अह मतलब यह कि आप अपने आपको यह सोसाइटी के और एक कल्चरल जो सुपरस्ट्रक्चर है हमारा एतराफ उसके इफ यू डोंट कंसीडर योरसेल्फ अ मेंबर ऑफ दैट हम्म देन यू फील एन आउटसाइडर हम्म एंड द द रैडिकल पीपल हु थिंक दैट दे आर द ओरिजिनल पीपल हियर ऑलदो दे आर ऑल माइग्रेंट्स फ्रॉम एशिया वो बाद में बात करेंगे मोस्ट ऑफ देम दे थिंक दैट बिकॉज़ मुस्लिम्स हैव अ काइंड फॉर मी मुस्लिम कल्चर इज हिंदू कल्चर अ पार्ट ऑफ द हिंदू कल्चर सिर्फ नमाज पढ़ना डजंट मेक देम ए डिफरेंट पर्सन नमाज इज़ लाइक हिंदूस में वो एक राम मंदिर को गए एक सीता मंदिर को गए एक शिव मंदिर को गए एक ब्रह्मा मंदिर को गए शवा्स वैष्णवाइड्स इतने डिवीजन है वैसा एक मुसलमान है मेरे लिए अगर है इंडियन आप उसको हिंदू बोलो इंडियन बोलो मुझे कोई लेना देना नहीं है क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन डजंट सेस यू कैन नॉट डिस्क्रिमिनेट बेस्ड ऑन अ रिलीजन। दैट्स व्हाट इट सेस। अब मुसलमान है। मुसलमान कौन है? अब मुसलमान के ओरिजिनस देखे जाए तो इतने सारे मुसलमान हमारे देश में हैं। जिनका प्रीवियस ओरिजिन जो है वो हिंदू सिस्टम से निकला हुआ है। क्योंकि हम सब बहुत ज्यादा कन्वर्टेड हैं। जो कन्वर्शन है वो मेरे फादर फॉरफादर्स का उनका डिसीजन था एंड वी आर कैरिंग दैट लीगसी एंड आई एम कैरिंग दैट विद प्रेजेंस ऑफ माइंड एंड माय इंटेलिजेंस एंड आई लाइक इट टू कैरी इट इट इज माय राइट एज अ सिटीजन ऑफ कोर्स आई एम एन इंडियन सिटीजन बट इट आई हैव ए राइट ठीक है तो तो ये सिस्टम को आप उसको पैन इंडियन मुस्लिम्स को अलग कर दो एंड टेल देम दे डोंट बिलोंग टू दिस कल्चर। तो वह मिस्टेक है और वह मिस्टेक गवर्नमेंट के डाटा सिस्टम में भी वह मिस्टेक आया है। किस तरह से आया है मैं थोड़ा समझाता हूं। दैट इज द ओरिजिन ऑफ़ सचर कमेट हम और उससे पहले क्योंकि मैं ये डाटा कंप्यू्यूट करता था जो कलेक्ट करते थे तो वो डेट के अंदर उस जमाने में पापुलेशन वाज़ अ सीरियस इशू। हम पापुलेशन बढ़ रही है। तो पापुलेशन ग्रोथ रेट का डाटा हम कैलकुलेट करते हैं। तो वेदर वी लाइक इट और नॉट वहां कैटेगराइजेशन बनाती है। गवर्नमेंट ने बोला वो गवर्नमेंट के प्रोजेक्ट्स होते हैं। तो गवर्नमेंट बोलती है ऐसे कैटेगरीज बनाओ। हम वी आर लर्निंग एट दैट टाइम वी आर क्रिएटिंग। तो वो बोलते हैं हिंदू मुस्लिम्स का फर्टिलिटी डिफरेंस निकालो। हम वहां पे उनको उसका इंसेंटिव है वो जो भी है तो उस जमाने में हिंदू मुस्लिम आया हम तो वहां पे बाद में हिंदू कैटेगरीज में दलित्स को हम एससी एसटी को अलग से करें मेरे प्रोजेक्ट में जहां पे हमने किया एससी एसटी अदर हिंदू मुस्लिम्स ये कैटेगरीज में हमने काम किया उस जमाने में 1973 74 75 एंड ऑल द डाटा फ्रॉम वो वहां पे उस जमाने में सर्वे होते उसमें से ये इस तरह के आंकड़े डिबेट टेबल सेमिनार वगैरह सब होता मुस्लिम फर्टिलिटी ज्यादा थी उस जमाने में हां अभी भी लेवल ज्यादा है मगर फॉल बहुत फास्ट है तो मुस्लिम्स में मुस्लिम फर्टिलिटी भी बहुत डिक्लाइन ऑलमोस्ट क्लोजर टू हिंदू फर्टिलिटी हो गई है अभी इंडिया में मगर उस जमाने में पॉलिटिक्स होगी उस जमाने में पॉलिटिक्स अराउंड पापुलेशन ग्रोथ रेट हो रही थी। तो उस वक्त सेमिनार्स में मैं आराम से हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम बोल रहा था मैं। आप अब जामिया में हो या दिल्ली यूनिवर्सिटी में हो या जेएनयू में है जाके हिंदू मुस्लिम का सेमिनार दो होगा क्या? और मुसलमान पर्टिकुलरली हिंदू मुस्लिम का आंकड़े डिस्कस कर पाता है क्या? डरेगा वो तो वहां हिंदू मुस्लिम्स का आंकड़े डाल रहे हैं। सेमिनार दे रहे हैं। मैं अमेरिका चला गया। वर्ल्ड बैंक में प्रेजेंटेशन हुआ। हार्डवर्ड में प्रेजेंटेशन हुआ। सब जगह प्रेजेंटेशन हुआ। मैं बोल रहा हूं ये सब लोग थोड़े क्या मुसलमान है? हिंदू मुस्लिम की बात कर रहा है। वो खुद ताज्जुब हो रहा है। मुझे मालूम नहीं हो रहा। बाद में मालूम हो रहा था। ये वो किसी ने आके बोला क्या यार यू आर टॉकिंग अबाउट हिंदू मुस्लिम? हिंदू मुस्लिम? यू आर ए मुस्लिम। हाउ कैन यू टॉक? आई से व्हाट हैपेंड? दिस डाटा? डीड यू सी दिस डाटा? यह देखो ना आंकड़े? ऐसे हैं, ऐसे हैं? यह आंकड़े तो सही है ना? तो डिस्कस करो। दिस इज व्हाट आवर गवर्नमेंट वांटेड एट दैट टाइम। हे यार थोड़ा होशियार से बात करना। नहीं तो हिंदू नाराज हो जाएंगे। नहीं तो मुस्लिम नाराज हो जाएंगे। अच्छा वो क्वेश्चन उस टाइम पे भी पॉज हो रहे थे। उस टाइम पापुलेशन वाज़ अ बिग कर्स बट नाउ पापुलेशन इज़ अ डिफरेंट थिंग। तो व्हेन आई वास डूइंग इट इन माय डिस्कोर्स इन माय टॉकिंग यूजिंग द वर्ड हिंदू मुस्लिम वास वेरी कॉमन टू मी बिकॉज़ वो फियर ही नहीं था व्हेन आई स्टार्टेड देन लुकिंग के व्हाट इज द काइंड ऑफ़ टेबल्स गवर्नमेंट वांटेड हम व्हाट कैटेगराइजेशन तो हिंदू मुस्लिम फर्टिलिटी चिल्ड्रन ये वो मैं हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम आ रहा है और वहां पे एजुकेशन की बात ही नहीं हो रही है। गवर्नमेंट इज नॉट आस्किंग अरे भाई एजुकेशन लेवल्स का कुछ डाटा हमें दो। हम पूरा डाटा निकाल रहे हैं। ये 70 80 की बात कर रहे हैं। हां अर्ली 70 अर्ली 70ज में हम अर्ली डाटा पूरा है हमारे पास। हमारे पास डाटा है। व्हाट इज द इनकम लेवल? उनके पास जमीनन है या नहीं? क्या काम करते हैं? लेबर फोर्स क्या है? उनका इनकम क्या है? उनका हेल्थ कंडीशन क्या है? कितने बच्चे हैं? खाना कितना मिलता है? स्कूल जाता है ही नहीं बच्चा? ये सब डाटा कलेक्ट हो रहा है। लेकिन यूटिलाइज और इंटरप यूटिलाइज खाली ये पापुलेशन का जो जहां पे जिस चीज की जरूरत है तो इसी दौरान मुझे पढ़ने का भी मौका हुआ। हम तो आई डीड पीएचडी गोइंग अब्रॉड ऑस्ट्रेलिया एंड देन आई डीड पोस्ट डॉक्टर वर्क इन अमेरिका। और वो पढ़ के वापस आ रहा है। और मैंने अपनी मर्जी से आई मेड इट पॉइंट दैट आई नेवर टेक वर्क आउटसाइड इंडिया। आई विल कम बैक आफ्टर माय एजुकेशन। दैट्स माय चॉइस। हम अदरवाइज आई कुड हैव आई आई कुड हैव बीन स्टेट देयर। मेरा चॉइस था मैं इंडिया को आऊंगा और इंडिया में काम करूंगा मैं। तो मेरी जिंदगी भर एंप्लॉयड जो सैलरी है वो रूपी सैलरी है। मैं कभी भी फॉरेन इनकम अर्न नहीं किया। हम एंड आई नेवर रिसीव्ड ए रूपी फ्रॉम द गवर्नमेंट। आई नेवर वर्क फॉर द गवर्नमेंट। आई नेवर गॉट इनफैक्ट आई वास रिजेक्टेड मेनी इंटरव्यूज में गवर्नमेंट जॉब्स में मुझे जॉब नहीं मिला। वो बात अलग वो पर्सनल ग्रो है। यहां कम्युनिटी लेवल की बात में। सो देन व्हाट हैपेंड वाज़ इवन विद अ सच अ गुड करियर। उसके बावजूद नहीं आई वाज़ नॉट ए आई वाज़ नॉट क्या बोलते हैं? फर्स्ट क्लास स्टूडेंट। हम मैं नॉर्मल 45 50% 50% बहुत मुश्किल से लिया होगा। 49% ऐसा कुछ लिया होगा। आई एम नॉट अ फर्स्ट क्लास स्टूडेंट। 60% तो मेरी जिंदगी में मैंने नहीं लिया। आपसे कनेक्ट कर सकता हूं मैं। हां। बट आई हैड एन ओपोरर्चुनिटी टू टू गेट माय इकोनॉमेट्रिक्स एट एल यूनिवर्सिटी। आई हैड अर्चुनिटी टू स्पीक एट मेनी इंस्टीटश सच एस कैनडी स्कूल हार्व ऑल यूनिवर्सिटीज इन द वर्ल्ड है गिवन लेक्चर्स वो अलग बात है हाउ डिड आई लर्न दैट वो वो इवैल्यूएशन का भी क्राइटेरिया कई बार इंसान जो डिफरेंट होते हैं उसको नहीं कर पाता है तो नाउ आई एम कमिंग इंटू अ वेरी वेरी सीरियस इशू सो नाउ वहां पे उस टाइम में म व्हेन आई वास डूइंग दिस सडनली आई यूज्ड टू सी अरे भाई मुस्लिम्स में एजुकेशन कम है। हम मैं देखता है अरे दलित से भी कम दिख रहा है ये विलेज में। अरे वो विलेज में आ रहा है। हां वहां तो है ये क्या क्या है? ये बच्चे जा रहे हैं स्कूल। ये बच्चे नहीं जा रहे हैं। और दूसरा मैं फिजिकली प्रेजेंट था व्हेन आई वास गोइंग टू विलेजेस। आई वास फिजिकली प्रेजेंट। अब स्कूल टाइमिंग ऐसा नहीं है कि डाटा पढ़ लिया। हां स्कूल मैं वहां खुद हूं। स्कूल टाइमिंग स्कूल टाइमिंग में जा रहा हूं। ये ये जगह जा रहा हूं। कोई सुमसाम गली है। एवरीथिंग इज नीट एंड टेडी। क्या हो रहा है? कहां है? बच्चे सब स्कूल में हैं। वहां से जाके वो गांव में उधर जा रहा हूं। वहां पूरे बच्चे खेल रहे हैं रोड में। ये कौन सी गली है? ये मुसलमानों की गली है। वेरी क्लियर इन 1970 मुसलमान के बच्चे भी स्कूल जाते हैं। हां मैं सब वो लेकिन स्ट्रक्चरली फिर भी एक एक्सक्लूजन है। प्रोपोशननेट। हम अब इट शुड हैव बीन द रिस्पांसिबिलिटी ऑफ़ द गवर्नमेंट टू एनश्योर व्हाई दिस मुस्लिम चिल्ड्रन ऑन द स्ट्रीट ऑन द स्कूल टाइम दे शुड हैव मेड प्रोग्राम्स वो कोई नहीं कर रहा तो मैं सोच रहा हूं क्या करना है मैं घरघर जाके ये स्कूल भेजो ना उसको स्कूल भेजो ना हे बच्चे वो कोई गोली लेके मार दिया मैं चला गया निकल गया वहां से कोईेंस नहीं पंचायत सिस्टम में गया कि सर सम चिल्ड्रन डोंट से पंचायत में बात किया क्योंकि मैं गांवगांव जा रहा था तो ये सब मुझे झिंझोड़ रहा था मेरे में व्हाई मुस्लिम्स का क्या इज देयर नो डिमांड और इज देयर नो सप्लाई दैट्स दीेंट क्वेश्चन अब नाउ आई एम जस्ट पोजिंग दैट क्वेश्चन इज इट डिमांड और सप्लाई इशू आप बोलिए मतलब दोनों है लेकिन ज्यादा सप्लाई इशू है आई पर्सनली थिंक क्योंकि डिमांड भी क्रिएट हो जाती है। जब सप्लाई वो एक सेज लॉ है ना कि भाई सप्लाई पहले डिमांड क्या है इंटरसेक्शन। सो इट दिस कुड हैव बीन अ गव पॉलिसी एंड प्रोग्राम टू सी दैट यूनिवर्सल एनरोलमेंट वाज़ द नेशनल ऑब्जेक्टिव। यूनिवर्सलाइजेशन ऑफ़ प्राइमरी स्कूल वाज़ अ नेशन एट दैट टाइम वाज़ अ नेशनल ऑब्जेक्टिव एंड गवर्नमेंट फेल टू रीच आउट टू मुस्लिम्स एंड दलित्स। वो जमाने और सोशल सिस्टम [गला साफ़ करने की आवाज़] इटसेल्फ वुड एक्सक्लूड अ सर्टन कम्युनिटी फ्रॉम आउट ऑफ स्कूल। इसको और ब्रेक डाउन करते हैं क्योंकि आपने बोला कि दे फेल्ड टू फेल्ड टू ऐसा होता है कि जैसे इंटेंशन है लेकिन अगर हम देखें कॉन्स्टिट्यूशन दे कोई भी है मतलब जैसे फॉर एग्जांपल बोला कि भ हिंदुस्तान की जो सोसाइटी है मैं जो बोल रहा हूं एक मिनट मैं जो बोल रहा हूं द गवर्नमेंट सिस्टम फेल टू अंडरस्टैंड एक्सक्ट्ली दे शुड हैव मेड द प्रोग्राम्स एट दैट टाइम टू एनश्योर दैट एव्री चाइल्ड तो वहां पे उनको वर्कर्स सोशल वर्कर र्स को घरघर भेज के भेज के बच्चों को एनरोल कराना था। मगर वहां पे प्रॉब्लम था। सप्लाई स्कूल्स पूरे बन नहीं रहे थे। स्कूल में क्लासरूम नहीं थे। टीचर्स अपॉइंटमेंट नहीं रहे थे। तो दे थॉट हमारे पास रिसोर्सेज नहीं है। अब जो है वो है चुप हो गए वो। मैं अगर इसको एक सवाल आपके सामने रखूं क्योंकि आपका इतना इसमें एक्सपीरियंस है। मुझे मौका मिला इस वजह से हिस्ट्री और कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली डिबेट्स और ऐसा नहीं है कि ये डिस्कशंस नहीं हो रहे थे। मतलब 1947 में 40 में 37 में 25 में ये जो ऐसा नहीं है दलित अंबेडकर उससे पहले पेरियार उससे पहले साहू जी मतलब एक 100 साल का तो रिकॉर्डेड चर्निंग है कि कम्युनिटीज में सर सैयद क्यों स्कूल बना रहे हैं? कॉलेज बना रहे हैं दूसरे लोग कि नहीं कि भ डेप्रिवेशन है और उस डेप्रिवेशन को कॉन्स्टिटुएंट असेंबली डिबेट्स में भी डिस्कस किया गया। यहां तक कि भ मुसलमानों को भी होना चाहिए। एससी एसटी और वो तो ऐसा कैसे हो गया कि जस्ट आफ्टर पार्टीशन जो पॉलिसी नेहरू प्लानिंग से ले रहे हैं रशिया और उसके कॉन्टेक्स्ट में और उस प्लानिंग में कॉन्शियसनेस है कि भ एससी एसटी मुस्लिम डेप्रिवेशन ये सारी चीजें एकिस्ट करती है। नेशनल मूवमेंट में वो पैराटर्स डिस्कस हुए हैं। तो फिर तो स्ट्रक्चरल लगता है कि भ मान लीजिए जो आपने बोला ना सोशल स्ट्रक्चर है क्योंकि वही ब्यूरोक्रेट हैं। वही सिस्टम को लीड कर रहे हैं। तो क्या यह जो पॉलिसी डिजाइन है कौन सा वेरिएबल रखा जाए? कौन सा नहीं रखा जाए यह इंटेंशनल है या एक्सीडेंटल है? उस पे आता हूं मैं। आई विल आई विल मेक दैट कमेंट इन माय कंक्लूजन। बट नाउ यू हैव टू सी कि हाउ दिस द फिलॉसफी ऑफ़ सचर कमिटी हाउ इट इवॉल्व। सो देन आई वास डूइंग ऑल दिस टैबुलेशंस। आई वास कमिंग टू दिल्ली आल्सो। वहां मुझे बुलाते थे सेमिनार दे रहा था। तो सम डे आई स्टार्टेड आल्सो राइटिंग रिपोर्ट्स। आई वास नॉट जस्ट कलेक्टिंग डाटा बट वो आईबीएम टाइप मशीनंस होते हैं। उसमें टेबल्स क्रॉस टैबुलेशंस वो सब करना है वो करके उसके एनोटेशंस भी मैं लिख के देता मेरे ऑफिसर्स को। सो एंड फॉरर्चूनेटली माय माय एनालिसिस माय कंप्यूटेशंस वर एक्यूरेट। जहां गलती होती थी सीख लेते थे। एंड देन दे बिकम पब्लिशबल। हम आई वास इन दोज़ काइंड ऑफ़ ऑर्गेनाइजेशन दैट आई वी कुड पब्लिश। सो ऑन सर्टेन ड्यूरिंग दैट प्रोसेस आई गॉट दिस अपोरर्चुनिटी टू गो अब्रॉड एंड स्टडी। सो देन ये हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम पापुलेशन में हो रहा था। देन वी फाउंड आउट व्हाई इट इज़ हैपनिंग? व्हाई इट इज़ इन हिंदू ऐसा हो रहा। व्हाई इट इज़? सो देन वी डिस्कवर्ड एट दैट टाइम थ्रू डाटा इन इंडिया। अब्रॉड में अफ्रीकन कॉन्टिनेंट में या कोई अ मोस्ट ऑफ़ द कंट्रीज वर पुअर एट दैट टाइम। जी। सो वहां पे बहुत सारा डिबेट डिस्कशन होता था मगर इंडिया में कम होता था। तो दे ट्राई टू फाइंड आउट व्हाट आर द कॉजेस व्हाई मुस्लिम चिल्ड्रन वुड नॉट गोइंग टू स्कूल जो यू नो वी हैव टू मेजर देम। वी हैव टू आइडेंटिफाई देम। हाउ डू यू आइडेंटिफाई देम? द डेटा वुड फैसिलिटेट दैट आइडेंटिफिकेशन। दैट मींस बिय्ड द गवर्नमेंट नीडेड टेबल्स वेयर दे वुड हैव ओनली एससी एसटी और ऑल अदर्स नो अदर डेटा एससी एसटी का सेपरेट क्योंकि एससी एसटी कॉन्स्टिट्यूशन में सेपरेट प्रोविजंस है। तो उसका इंटरप्रिटेशन ये था कि एवरीबडी इज इक्वल इन इंडिया। सो एससी एसटी का सेपरेट कॉलम बनाओ क्योंकि एक कास्टिट्यूशन प्रोविजन है। बाकी का दूसरे की जरूरत नहीं। बिकॉज़ ऑल ऑफ देम आर इक्वल ना। सी इंटरप्रिटेशन ऑफ इक्वलिटी आपने बोला क्यों ऐसा हो गया? क्यों ऐसा हो गया वो? अब सेमिनार में आप बैठे हैं। अच्छे-अच्छे विद्वान बैठे हैं। अच्छे पॉलिटिशियन बैठे हैं। सब बैठे हैं। क्या करोगे भ? कॉन्स्टिट्यूशन क्या बोल रहा है? इंटरप्रेट द कॉन्स्टिट्यूशन। कॉन्स्टिट्यूशन लॉयर को बुलाओ। कॉन्स्टिट्यूशन जजेस को बुलाओ। उन्होंने बोला हां कॉन्स्टिट्यूशन हैज़ प्रोवाइडेड प्रोटेक्शन टू एससी कॉन्सिट्यूशनल रीडिंग ने ही डिफाइन कर दिया कि किस तरह से आप पॉलिसी डिजाइन तो आप दो कॉलम बनाओ एससी एसटी का कॉलम बनाओ और ऑल अदर्स का कॉलम बनाओ तो यू आर मीटिंग कॉन्स्टिट्यूशन रिक्वायरमेंट यू आर डूइंग यू नो आर्म टू एनीबडी यू आर फॉलोइंग कॉन्स्टिट्यूशन हम मगर हमारा देश इतना डवर्स है वो जो एससी एसटी छोड़ के जो पापुलेशन है अब वहां पे कितनी डायवर्सिटी है। वी वर इम्यून टू दैट। इवन नाउ सेंसेस में वह प्रोविज़न है ही नहीं। सेंसेस में नहीं। मगर बाद में वो एनएसएस हो करके बनाए। उसमें ओबीसी कैटेगरी बनाए वगैरह-वगैरह। आई डोंट वांट टू गो देयर एट द मोमेंट। सो इन माय सिचुएशन व्हाट हैपेंड वाज़ आई फाउंड आउट दैट एजुकेशन ऑफ़ मदर हैड द स्ट्रांगेस्ट इंपैक्ट ऑन द फर्टिलिटी ऑफ़ अ पर्सन। हाईएस्ट कोरिलेशन। हाईएस्ट कोरिलेशन। तो अब यह मैंने एक दफा रिपोर्ट में लिखा तो वो रिपोर्ट में ये क्यों लिख रहे हो? इसकी जरूरत ही नहीं है। सो अब गवर्नमेंट रिपोर्ट तो मैं गवर्नमेंट को जो हमने रिसर्च इंस्टट्यूट में थे गवर्नमेंट के रिपोर्ट दे रहे हैं। मगर उसमें एक जगह मैंने मैंने तब तक मैं पीएचडी करके आ रहा हूं। हम मुझे मुझे ओवर लिटरेचर क्या है मुझे पता हो रहा है तो मैं उसके अंदर बीच में एनोटेशन में एक जगह लुक्स लाइक दिस इज़ मोस्टली द रीज़ ऑफ़ लो एजुकेशन अमंग मुस्लिम वुमेन लिख के भेज दिया इससे डिस्कोर्स सेट होना शुरू हो रहा है तो अब वो जा रहा है उस तरह के रिपोर्ट जा रहे हैं गवर्नमेंट ऑफ कर्नाटका में था मैं उस जमाने वहां के इंस्टीट्यूशन में वहां से दिल्ली में आ रहा है वहां आ रहा है पता नहीं कौन और वो देख रहे हैं कि मैं उस जमाने में मेरा कि नाम वो भी यूनिक नाम मेरा नॉर्मल अब्दुल वैसा नाम नहीं है। अबू साले शरीर ये कौन है? लिख रहा है। ये मुसलमान है क्या? हां मुसलमान है। क्या लिख रहा है। तो कुछ लोग उससे नाराज हैं। कुछ लोग उससे खुश हैं। खुश हैं। तो मेरे अप्रोच में जो खुश होने वाले थे वो ज्यादा थे। हम और मुझे किसी ने स्टॉप नहीं किया। ये बहुत इंपॉर्टेंट कह रहा हूं। नोबडी स्टॉप मी फ्रॉम डूइंग दिस। दिस इज़ कई दफा वो हम मुसलमान उल्टा बोलते हैं। नहीं नहीं हिंदू हमें कुछ करने नहीं देते। वो हिंदू हमें ये करने देते हैं। हमें वो करते हैं। ये गलत है। हमें जो सही काम है करने का तौर तरीका सही है तो कोई स्टॉप नहीं करेगा आपको। इंडिया आज भी नहीं करेगा। तो वहां पे डिसअ्रीमेंट है कि मुस्लिम मुसलमान का नजरिया और मेरा नजरिया अलग है। वो क्यों है? मैं एज एन इंडियन आई थिंक फर्स्ट। जनरली मुस्लिम थिंक हिम हसेल्फ एस अ फर्स्ट मुस्लिम एंड देन इंडियन। मेरा इंडियन फर्स्ट है बाद में मुसलमान है। यह कैसा इंटरप्रिट करोगे? अब नहीं अब डिबेट करोगे तो खत्म नहीं होगा। सो नाउ व्हाइल आई वास डूइंग दैट रिपोर्ट्स में जा रहे थे। तो मैं आई स्टार्टेड पुटिंग दिस न्यू वेरिएबल्स लिंकिंग मुस्लिम बिहेवियर। कंपेयर टू हिंदू बिहेवियर। तो उसी दौरान एक और इशू आया मेरा ओरिजिनल पेपर विडो रीमैरिजेस एक इशू बन गया था कोई एक सेमिनार हो रहा था तो मेरे पास डाटा था तो मैंने देखा विडोस का रीमैरिज होता है मुस्लिम्स में ज्यादा है हिंदू में नहीं हो रहा है मेरे पास पूरा डाटा पड़ा मैंने बोला ऐसे एक पेपर लिखने सेमिनार में जाते हैं और सेमिनार कौन कर रहे हैं एक बहुत बड़े मंदिर के बड़े प्रचारक कर रहे हैं वो ही वेरी वेल नोन मंदिर इन कर्नाटका तो मैं बोला इनको पेपर भेज दें। तो मैं गया मेरा एक ही मुसलमान मेरा एक ही पेपर है और उसमें मैं कंपेयर कर रहा हूं हिंदूस में विडोरी मैरिजेस होते हैं मुस्लिम्स में होते हैं वो मैं पूरा माइक्रो डिटेल एक्सप्लेन किया उसके अंदर डेटा के थ्रू डेटा के थ्रू और उनको अंडरस्टैंड करके और एट द मोमेंट लेट अस नॉट डायग्रेस आई एम कंक्लूडिंग दिस तो आई गॉट द आई गॉट द सिल्वर अवार्ड फॉर दैट सेमिनार गणेशा का सिल्वर का एक मेडल है मेरे पास उन्होंने दिया वो मंदिर वाले थे जो मुझे अवार्ड दिए मेरे पास है वो तो उनको मैंने बताया कि मुस्लिम वुमन इज प्रोटेक्टेड मोर अमंग द वुमन इन अमंग द मुस्लिम्स आर प्रोटेक्टेड बेटर देन इन हिंदू कम्युनिटी व्हिच इज़ इवन टुडे ट्रू आई विल टेल यू द स्टेटस ऑफ़ वुमेन इन अमंग मुस्लिम्स इन इंडिया इंक्लूडिंग इन यूपी बिहार एंड एवरीवेयर इज़ बेटर देन हाउ हिंदू वुमेन आर ट्रीटेड अमंग द हिंदूज इन इंडिया इंटरकम्युनिटी पैराटर्स में मुसलमानों पे ज्यादा बेटर स्टेटस ऑफ़ वुमन मुस्लिम्स का बुर्खा डालो उसे नंगी नचाओ उसे कुछ भी करो मुस्लिम वूमन को कैसी भी हो वो वो उसका स्टेटस ऑफ़ वुमन अपने फैमिली में अपने कम्युनिटी में बेटर है कंपेयर टू हिंदू सिल्वर मेडल मिल गया मुझे उससे मैं यही चीज वो पब्लिश हुआ है पेपर हम मैंने तो कहा अरे अरे यार मैं जो बोल रहा हूं उसको सोसाइटी सुन रही है हम तो मैं मैं इंडिपेंडेंट एकेडमिक हूं हम यह यह गवर्नमेंट को रिपोर्ट जा रहे हैं। मगर गवर्नमेंट मुझे सैलरी नहीं दे रही है। यह इंडिपेंडेंट रिसर्च इंस्टट्यूट दे रही है। तो आई बिकम स्टार्टेड राइटिंग एंड दैट इज हाउ आई रोट ए रिपोर्ट ए फर्स्ट आर्टिकल कंपेयरिंग हिंदू मुस्लिम डेमोग्राफिंग इन इकोनॉमिक इन इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली आर्टिकल। डू यू नो दैट? डू यू नो दैट? जी जी वो आर्टिकल पब्लिश हुआ। वो पब्लिश हुआ 1996 में पब्लिश हुआ। मगर वो पब्लिश वो आर्टिकल लिखने में 10 साल लगे थे मुझे। एंड दैट इज द फर्स्ट इन द हिस्ट्री ऑफ इंडिपेंडेंट इंडिया हिंदू मुस्लिम्स को कंपैरिजन। दैट्स मी। हम व्हाई आई कुड डू इट? क्योंकि मुझे हिंदू और मुसलमान के एक साथ बात करने में डर नहीं है। क्यों? क्योंकि मैं एकेडमिकली डिबेट कर रहा हूं ना उसको। उसके अंदर पॉलिटिक्स थोड़ी गुजर रहा हूं। उसके अंदर रिलीजन नहीं है। मुझे मुझे इंडियन इस्लामिक रेवोल्यूशन लाने की कोई इंटरेस्ट नहीं है। मुझे है के हमारी होम हमारे जो होम हियर मतलब मुस्लिम कम्युनिटी शुड हैव शुड हैव सिमिलर एंड इक्वल एक्सेस इन इंडिया लाइक एनीबडी एल्स। और वो मेरे डिटे में आया। और देन आई स्टार्टेड टेलिंग पीपल देयर इज़ अ। सो आई यूज द वर्ड सच कमिटी के टाइम के देयर इज सिस्टमिक बयास वि इन द गवर्नमेंट इन इंडिया वेदर इट इज सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट वो सिस्टमिक बयास जो है इज ए सेपरेट डिबेट एंड डिस्कशन हाउ डू यू डिफाइन ए सिस्टमिक बयास अब आज के वो कंक्लूजन के अंदर एक चीज आती है आफ्टर दैट आई विल गिव टू अनकोट्स यह आती है कि सिस्टमिक बयास का मतलब यह है टू काइंड ऑफ़ बयास इंडियन सोसाइटी में वेरी स्ट्रांग है। वो अभी तक पिछले 80 साल से हले नहीं है। वो हमने डाटा में दिखाया है। क्योंकि जैसा मैं मुस्लिम्स के बारे में डाटा चर्न आउट कर रहा था। उसी टाइम आई यूज्ड टू क्रिएट टेबल्स फॉर वुमेन एंड मेन सेपरेटली मेल एंड फीमेल। एंड आई ऑलवेज यूज्ड टू सी अराउंड 20 टू 25% डेफिसिट। बिटवीन मेल एंड फीमेल वो लिख लो नंबर दैट वास इन 1970 कितना 20 टू 25 रेंज ऑलमोस्ट द सेम रेंज डिफरेंस बिटवीन हिंदू एंड मुस्लिम्स बट यू हैव टू एक्सक्लूड दैट दलित कम्युनिटी आउट ऑफ इट दलित को निकाल के हिंदू जो बाकी है उनको और मुस्लिम कंपेयर करो तो 20 से 25% का डिफर डिफरेंस आपको मिलेगा। यह बयास है सिस्टमिक। अब वह आपके प्राइम मिनिस्टर हैं या वह प्लानिंग मिनिस्टर हैं। वह मुझे बुलाएंगे तो मैं उनको बताऊंगा यह कैसा है। इसके बारे में लिख चुका हूं मगर पढ़ने वाले कम है। ये बयास द जेंडर एंड द माइनॉरिटी बयास वी आर अनेबल टू एड्रेस दैट इशू एंड जेंडर का ज्यादा पॉलिटिक्स नहीं बन रहा है। मगर मुस्लिम माइनॉरिटी का पॉलिटिक्स बन गया। तो अभी पॉलिटिक्स ही उसको एक्सक्लूड कर रही है। पॉलिटिक्स ही उनको प्रोग्राम से निकालने की कोशिश कर रही है। वह भी ओपनली बोल के कर रही है। आपके कपड़ों को देख के हम निकालेंगे आपको। आपके कपड़ों को देख के आपको वोट करने देंगे। तो ये सिर्फ डेवलपमेंट एक्सक्लूजन नहीं है। इवन इलेक्ट्रोल एक्सक्लूजन बेसिक राइट्स एक्सक्लूजन हो रहा है। अभी सो देयर इज़ अ प्रूफ। जैसे आपने बोला कि भाई आपकी पूरी जर्नी में इवन दो यू आर यूजिंग मुस्लिम हिंदू कैटेगरीज एकेडमिक कैटेगरीज हैं डेटा के थ्रू है और उसको बहुत ज्यादा नजरअंदाज भी नहीं किया गया क्रिटिसाइज भी नहीं किया गया उसको स्पेस दिया गया नो स्पेस पब्लिक पब्लिकेशंस में पब्लिक एंड पिटिकल वीकली है उसकी ये वजह भी हो सकती है कि पेपर्स में मैं हॉपेट्स लिखा मैंने लेफ्ट लिबरल स्पेसेस थे जहां पे मुझे मालूम नहीं है लिबरल है मुझे मालूम नहीं आई डोंट नो हु इस लेफ्ट एंड राइट लेकिन सचर कमेट आते वही आपका डायनेमिक बदल जाता है कि भाई इसमें अपीज़मेंट है रिपोर्ट में क्योंकि अब वो एक नेशनल स्केल का इशू बन जाता है कि मतलब जो आपने आई डोंट थिंक एनीबडी सेड रिपोर्ट में अपीज़मेंट है दैट इज नॉट ट्रू नोबडी हैज़ सेड दैट बीजेपी वगैरह का जो पूरा वो आर्गुममेंट रहा वो बकवास करते होंगे रोड से जो पूरी पॉलिटिक्स इमर्ज करी वो रोड पे बकवास करते होंगे मगर ऑफिशियली उसका पोजीशन इवन व्हेन सच वास पब्लिश्ड आई वास अप्रोच वो ये कोई एक इंटेलेक्चुअल है वो सूडो इंटेलेक्चुअल कोई बैठा हुआ था वहां पे वो बोलेगा हम इसको खारिज करते हैं क्या खारिज करोगे भाई तुम एवरीथिंग इज रिटन डाटा उधर है कौन खारिज करेगा हु आर यू टू खारिज एक सुन लीजिए एंड दिस रिपोर्ट वास सबमिटेड टू द पार्लियामेंट पार्लियामेंट एक्सेप्टेड इट बाद में बीजेपी गवर्नमेंट आई जैसे 2013 में बीजेपी गवर्नमेंट आई उसको खारिज करने का तरीका है आपको एक और रिपोर्ट लिख लिखना पड़ेगा और बताना पड़ेगा जो जो आंकड़े ये किए हैं वो वो रॉन्ग है। बताना पड़ेगा। करो। आई एम रेडी टू फेस इट। बिकॉज़ दैट हैज़ बीन डन वि सम ऑफ़ द बेस्ट एक्सपर्ट्स अवेलेबल इन इंडिया फॉर द इंटरनेशनल लेवल कांसेप्ट्स। तो आप इंटरनेशनलली जाके उसको नहीं मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूं। नहीं मैं उनको उनको बोल रहा हूं जो खारिज करने वाले थे। तो अभी तक खारिज नहीं करे। मैं एक दूसरा तो अपीज़मेंट का वर्ड इवन बीजेपी यूज़ नहीं कर। कैसे 2013 में गुजरात गवर्नमेंट ने बीजेपी यूज़ नहीं की। आई एम करेक्टिंग यू। यू हैव टू लिसन टू मी। इवन आवर प्राइम मिनिस्टर पोस्ट सच रिपोर्ट जो अमिताभ कुंडू साहब ने लिखा उसका हमारे प्राइम मिनिस्टर मोदी जी ने तीन दफा रेफरेंस दिया है उनके। अच्छा। ही हैज़ एक्सेप्टेड आवर कांसेप्ट्स। ही नोबडी हैज़ सेड इट इज़ अपीज़मेंट। हम बट व्हाट वाज़ टोल्ड इज़ रियलिटी क्या है? वो कांग्रेस ने तुमने ऐसा किया। हम उनको सही करेंगे। हम ट्रिपल तलाक करेंगे। वुमेन का एमावरमेंट बढ़ाएंगे। किया ना बीजेपी ट्रिपल तलाक को निकाला। वही बिकॉज़ वुमेन एंपावरमेंट जाए। शायद सही किया उन्होंने मुझे मालूम नहीं। तो उनका नजरिया जो है अलग है। मगर सर्चर कमेट को यह अपीज़मेंट रिपोर्ट है। किसी ने नहीं कहा। इसको एक्सेप्ट किया। पार्लियामेंट में अभी भी है। गवर्नमेंट का जो डिपार्टमेंट है उसमें अभी भी लटका हुआ है। उसको निकाल के फेंका नहीं है। सो दैट इज़ देयर स्टिल टू बी डिबेटेड। कोई दिक्कत नहीं है। आप प्लानिंग कमीशन में जाके बोलो। हम सर्चर कमेटी का एक सेमिनार करवाना चाहते हैं। प्लानिंग कमीशन यील्ड बिकॉज़ द रिपोर्ट इज़ स्टिल देयर विद द मिनिस्ट्री। एक आपने इंटरेस्टिंग बात बोली थी कि डाटा और जो कॉलम्स होते हैं वो कॉन्स्टिट्यूशनल जो पैराटर्स हैं हम उससे बनते हैं और उससे डिफेंसिबल कि भाई ये एक लॉक हो गया। उसी को मैं बस इसको दो चीजें मेरे क्योंकि ज़हन में एक तो 2013 में गुजरात गवर्नमेंट ने एक सुप्रीम कोर्ट में ये किया कि भ आप जो हैं ये रिपोर्ट की जो राइटिंग है वो अनक्स्टिट्यूशनल है क्योंकि जिसमें जो मुस्लिम कैटेगराइजेशन है वो कॉन्स्टिट्यूशनल नहीं है। हां तो इसका जवाब है तो दिस इज इंटरेस्टिंग दिस इज़ व्हाट आई वांट टू कंक्लूड। तो समवेयर और कंक्लूजन में आपको ये भी बताना था एक सवाल था पेंडिंग के वो सिस्टेमिक जो ये है कि भ इवन तो कॉन्स्टिटुएंट असेंबली डिबेट्स में ये सब था और उससे पहले कि भ मुसलमान या दलित उसको इक्वल राइट्स अपोरर्चुनिटी मिटलने का खतरा है। तो क्यों जो शुरू की पॉलिसीज हैं प्लानिंग का विज़न होने के बावजूद जो नेहरू का जो विज़न है उसके बावजूद वो स्ट्रक्चरल डेप्रिवेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क में क्यों रहा है? ये दो सवाल अगर आप अभी एंगेज कर सो व्हेन अह डू यू नो दैट आई आल्सो रोट ए रिपोर्ट इन 1996 2004 या ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट लिखा तो यू नो हु रिलीज दैट रिपोर्ट नहीं वाजपेई और उसमें हिंदू मुस्लिम [खांसने की आवाज़] हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम हिंदू एव्री पेज में हिंदू मुस्लिम करके मैंने दिखाया हम और वाजपेई जी वो हमारे एक बहुत अच्छे डायरेक्टर ये थे डायरेक्टर जनरल उन्होंने कला शरीफ इसको प्राइम मिनिस्टर को बताना है मैंने बोला आइए मुझे ले गए उनके घर उन्होंने एक्सप्लेन किया ऐसा है ऐसा करके वो मुझे मुझे देखे हंसे आप कहां से हैं? कर्नाटक से। हां हां ये ये साउथ वाले ही कर सकते हैं। अच्छा है। आप बताइए हमें क्या करना चाहिए? मैं बोले हमारे डायरेक्टर जनरल बोले किताब रिलीज कीजिए। यूएन के पैसे से बनी है। तो वो आए विज्ञान भवन में रिलीज हुई बुक। अब उसमें हिंदू मुस्लिम है तो वाजपेई जी ने वाजपेयी जी ने एंडोर्समेंट दिया कि जो अप्रोच इंडिपेंडेंट रिसर्च है मगर इसको पढ़िए पूरे देश को बताया उन्होंने गवर्नमेंट में वो कॉलम अभी नहीं बदला वो अलग बात है मगर एज अ प्राइम मिनिस्टर ही एंडोर्स द व्यू सुनिए ना फॉर्मली क्या हो रहा है इनफॉर्मली सिस्टम क्या हो रहा है एक्सेप्टेंस मिला उसको और वहां ये तो बाद में वो हो गया चला गया उसके बाद वही आद वो हार गए कांग्रेस गवर्नमेंट आ गई कौन आया उनके बाद मैं भूल गया कांग्रेस उस वक्त एक गोवा में एक अधिवेशन हो रहा था अब उसमें वाजपेयी जी बात कर रहे थे अब उस वक्त वाजपेयी जी तकरीर दे रहे हैं दे रहे हैं दे रहे हैं गालियां दे रहे हैं मुसलमानों को मैं बोला यार अरे दो दिन पहले ही तो मैं इनसे बात किया था। यह मुझे बोले अरे अब ये उल्टा बोल रहे हैं वहां पे। वो उसमें पर्टिकुलरली फर्टिलिटी डिफरेंस हो और उसके अंदर तो मैं बोला यार अभी तो मैं जाके वाजपेयी ही यूज्ड टू कॉल मी होम नॉट मेनी टाइम्स। तो मैंने मुनि मनोहर जोशी हैं। वो मुझसे बात करते थे। हम बात कर रहे हैं उनसे। तो तो मैंने बोला यार कैसे करूं? तो मैंने बोला ओपेट लिखते हैं। हम तो समवेयर इन अगस्त 2013 आई रोट एन ओपेट इन टाइम्स ऑफ़ इंडिया हम अबाउट गिविंग रेफरेंस टू वाजपेयी जीसस दिस वन बट आई मे नॉट हैव सेड वाजपेई जी बिकॉज़ आई डोंट टेक पॉलिटिशियंस नेम इन माय राइट अप। आई डू एकेडमिक राइटिंग बट आई आई सेड एंड देन आई चैलेंज द गवर्नमेंट। देयर इज़ लॉट ऑफ़ डेटा अवेलेबल विथ द गवर्नमेंट। व्हाई डोंट यू राइट अ वाइट पेपर? ब्रिंग द ट्रुथ आउट? अब यह है ना चार चार चार चार बीवियां रहते हैं। 24 बच्चे होते हैं। एक्चुअली चार बीवियों के 24 नहीं होते। कम हो जाते हैं बच्चे। अगर चार बीवियां अलग-अलग शादी होते हैं। हां वो बर्डन ऑफ अलग-अलग शादी होते तो ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। अब एक को शादी हो रहे तो कम बच्चे होते हैं। वो उस तरह का हमने वो वो ओपेड लिखा। सो दिस इज़ वेरीेंट। वो डेट वगैरह आप एक्सट्रैक्ट करें समवेयर अराउंड दैट अ टाइम्स ऑफ इंडिया ओपेड इन माय नेम। सो 10 ओ क्लॉक इन पड़पड़गंज होम ए टेलीफोन रिंग्स माय वाइफ शहनाज गोज़ एंड पिक्स इट अप एंड शी सेज़ ये फोन है प्राइम मिनिस्टर ऑफिस से। दिस इज़ एट 10 ओ क्लॉक ऑन द सेम डे। वेंट देयर आई यूज्ड टू नो हिम बट नॉट वेरी क्लोज एंड ऑल दैट। ही वास प्राइम मिनिस्टर मनमोहन साहब सो देन शाना सेड बोले देन प्राइम मिनिस्टर टॉक टू मी 20056 की बात हो गई है आपसे गलती से 2013 हो गया क्योंकि वो 20056 की सच सच से पहले से पहले का जी 20056 के करीब अभी 2005 हां तो उन्होंने बोले आई रेड वर आर्टिकल टुडे थैंक यू सर सर देन इन्होंने बोला वी वर थिंकिंग ऑन अ सिमिलर लाइन यू हैव सेड वाइट पेपर आई सेड समथिंग लाइक दैट आई थिंक देयर इज़ लॉट ऑफ़ डेटा देयर इज़ लॉट ऑफ़ न्यू सर्वे डेटा सो आई सेड व्हाई डोंट यू कम डाउन टू कॉफी दिस इवनिंग आई विल सेंड माय दिस वन समबडी सो आई वाज़ एस्कॉटेड बाय नन अदर देन हमारे जावेद उस्मानी हम ही वाज़ जॉइंट जॉइंट सेक्रेटरी टू पीएमओ तो वो वो आके मुझे ले गए काफी पे पूछे उनको तो दैट्स दैट्स हाउ सच कमेटी वास एस्टैब्लिश्ड एक कंक्लूडिंग छोटा सा सवाल व्हाई वास मनमोहन सिंह इंटरेस्टेड इन दिस कुछ आपको नहीं ही वास इंटेलेक्चुअल वो पढ़ रहे थे वो अंडरस्टैंड कर रहे थे और इंडिया की डेवलपमेंट पॉलिसी के अंदर मुस्लिम्स का बहुत बड़ा रोल है होगा वो खुद इकोनॉमिस्ट रहे हैं उन्होंने खुद डेटा देखे हैं खुद एक दिस इज़ अंडरस्टुड एंड डायवर्सिटी वो यू नो डेमोक्रेसी के पुजारी थे वो डायवर्सिटी और जो यह है भिन्नता है कंट्री में हमारी जो डायवर्सिटी है उसको रेस्पेक्ट करते हैं। ऐसा नहीं है कि बिकॉज़ वो सिख हैं माइनॉरिटी है। मुस्लिम्स को फेयर किया। ऐसा नहीं है। ही इज़ अ प्रोफेशनल्स किसी के कोई रिलीजन का इंपैक्ट नहीं होता प्रोफेशनल्स के। प्रोफ़े रिलीजन अपने दिल में होता है। अपनी मस्जिद या अपने मंदिर तक होता है। उसके बाहर नहीं होता प्रोफेशनल। उसके कलम में नहीं आता। उसके विचारों में नहीं आता। वो सही लिखेगा जो डाटा कहेगा, जो एनालाइज करेगा, उसी को हम एकेडमिशियन कहते हैं। उसी को एक्सपर्ट्स कहते हैं। बहुत अच्छा लगा कि अक्सर एक सच्चर कमेट पे हम अब अगली एक बार बात करेंगे टोटल। लेकिन कॉन्टेक्स्ट कई बार नहीं पता होता कि जर्नी क्या हुई? किस तरह से वो तो आपकी लाइफ जर्नी से है जो इंडियन तो मैं बता रहा हूं ना देखिए द फर्स्ट वो हिंदू मुस्लिम किस तरह से मेरे राइटिंग में आया और इवन प्राइम मिनिस्टर उसको पढ़े ना हम हम ऑफिशियली वो ट्रांसलेट नहीं हुआ वो अलग प्रोसेस है मगर सचर कमेट सचर कमेट का वो सचर कमेट को हमने वो नहीं बनाई यानी दो तरह के कमिटीज होते हैं। यह कमेट मैंडेटेड होती है। हम उसको पार्लियामेंट ऑथराइज करती है कि इतने टाइम में आपको रेकमेंडेशन देने पड़ेंगे जो हम इंप्लीमेंट करेंगे। ये एक होती है जो हमारी हाई लेवल कमेट जो डिबेट करने के लिए डिस्कशन करने के लिए एजुकेट करने के लिए पार्लियामेंटेरियंस हम टू बी वेरी फ्रैंक थ्रू सचर आई एम द प्रोफेसर ऑफ द होल पार्लियामेंट हम सच प्रोफेसर सचर उसके साथ राकेश बसंत हम उनका भी राकेश बसंत साहब के भी अच्छे पेपर्स हैं। 2007 में हमारे अभी रिसेंटली टीके वुमन साहब थे उसमें यू नो दीज़ आर ऑल लेजेंड्स दीज़ आर ऑल ग्रेट पीपल वो सब ऑडिट किए हैं। वो सब डिस्कस किए हैं। आंकड़े हैं। उसको ऊपर जाना कोई एक जगह ये एक लुच्चा कहीं बैठा हुआ है। बोलेगा मैं खारिज कर दूंगा ये रिपोर्ट को। कौन होता है यार वो करने वाला। आके बैठ हमारे सामने खारिज करने से पहले। इट नीड्स इंटेलेक्चुअल ब्रेन टू डू इट। ओके। तो पार्लियामेंट वो कोई खारिज नहीं हुई है। अभी भी गवर्नमेंट गवर्नमेंट के वेबसाइट में अवेलेबल है। इट इज़ स्टिल अ वैलिड डॉक्यूमेंट पॉलिसी डॉक्यूमेंटेड वो निकाले नहीं है। जाके देखिए। आप देखिए गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के उसमें आपको मिलेगी डाउनलोड करो वहां से। आज फिर से मेरे साथ डॉक्टर अबू साले शरीफ साहब हैं। पिछले एपिसोड जैसे कि आपने देखा हम लोगों ने बात की डॉक्टर साहब का जो पर्सनल जर्नी थी स्टैटिस्टिक्स की इकोनमिक इकोनॉमिक्स की इकोनमेट्रिक्स की और जो हिंदुस्तान में सोशल चेंजेस आ रहे थे और जो पॉलिसी पैराडाइम की वजह से डिस्क्रिमिनेशंस मार्जिनलाइजेशंस अलग-अलग कम्युनिटीज के लेवल पर प्रोड्यूस हो रहे थे और उस सबको पढ़ने के लिए समझने के लिए जो उनकी अपनी जर्नी मेथोडोलॉजी जो उनके पेपर्स ये सब उनको शेप कर रही थी और यह हमने पूरी आप गुफ्तगू देख सकते हैं पार्ट वन में अगर आपको इसको डिटेल में समझना है ये सब हम लोगों ने देखा और हम आए कि अल्टीमेटली कि सच्चर क्यों जरूरी थी सचर कमिटी रिपोर्ट बनना क्यों जरूरी थी उसकी हमने जीनियोलॉजी ट्रेस करी आपकी लिव्ड एक्सपीरियंस से तो सर वो बहुत मेरे लिए बहुत आई ओपनिंग था बहुत सारी चीजें क्योंकि हम तो जनरेशन में जो चीजें एनगडोटली सुनते हैं। कभी इधर से सुन ली, कभी उधर से सुन ली। वो ऐसी शख्सियत से जिसने वह जिंदगी जी है। तो उससे काफी इंसाइट्स ना सिर्फ रिपोर्ट को लेके यह भी मिलती है कि इस तरह के काम क्यों होते हैं, कैसे होते हैं? और उसके लिए किन पैशंस, किन मोटिवेशंस, किस डायरेक्शन और किस विज़न की जरूरत है। एंड दैट इज द मैसेज जो मुझे पूरा जो व्हाई डिड आई आई वांट दिस पडकास्ट विद यू? उसकी सबसे सच कमिटी रिपोर्ट बहुत लोग जानते हैं आज की डेट में। क्यों हुई? कैसे हुई? उसके लिए क्या करना पड़ता है? वी वांट टू मेक पीपल अंडरस्टैंड कि ऐसे काम आगे भी कैसे हो सकते हैं? तो हम सर जैसे मैंने बोला यहां तक पहुंचे थे। अब इंपॉर्टेंट जो सवाल है कि 2005 6 तक हमने क्यों कंटेस्टक्स्ट बना और डॉ. मनमोहन सिंह ने आपका जो ईपीडब्ल्यू में आर्टिकल आया उसको पढ़ के आपको फोन किया। आप आए और यह डिसाइड हुआ कि भाई इस तरह का एक कमेट बैठनी चाहिए। वहां से शुरू करते हैं। आपको उस वक्त जब बुलाया गया एक फ्लड ऑफ यू नो इंफॉर्मेशन पैशन आपके ज़हन से गुजरा होगा कि मैं ये कर सकता हूं, मैं वो कर सकता हूं। मैं क्या था? व्हाट वर यू थिंकिंग एट दैट मोमेंट। और आपके ज़हन में क्या है कि कौन लोग हैं जो आपके साथ चल सकते हैं इस रास्ते पे? या [गला साफ़ करने की आवाज़] दैट इज वेरी इंटरेस्टिंग। क्वेश्चन। सो जब मुझे वह फोन आया और प्राइम मिनिस्टर के प्राइम मिनिस्टर के साथ मेरी मीटिंग हुई तो मेरे दिमाग में कुछ भी नहीं हुआ जो आप सोच समझ समझ रहे हैं कि हो हुआ होगा इशू क्या था सिचर कमेट के जो से पहले जो मीटिंग हुई प्राइम मिनिस्टर की इशू क्या था इशू था कि एक ऑपेट जो टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा गया था उसमें इंडिया के माइनॉरिटीज बट बट मोर प्रिसाइजली इंडिया के मुस्लिम्स के हालात और इंडियन मुस्लिम्स के इश्यूज जो मिसह हैंडल हो रहे थे, रॉन्ग इंटरप्रिटेशंस हो रहे थे। इवन डाटा मौजूद है तो भी उसका गलत इस्तेमाल हो रहा था। उसका एक्यूरेट एक्सप्लेनेशन नहीं हो रहा था। जो एक्चुअली एकेडमिस्ट कर कर पाते हैं और उसके अंदर हिंदू मुस्लिम था सोच। अब हिंदू मुस्लिम सोच तो इंडिया में एक अज़ाब है। एक ऐसा लगता है कि एंटी नेशनल व्यू है। कम्युनलिज्म है। तो हर रोज हिंदू मुस्लिम तो होता रहता है। आपकी गली में, आपके गांव में हर जगह हिंदू मुस्लिम हो रहा है। मगर आप उसकी बात करें। तो आप एंटी नेशनल हो जाते हो। आप बात नहीं करते। तो यह नॉर्मल फीलिंग थी उस जमाने में भी जब सच्चर का वो ओपेड लिखा गया था जब प्राइम मिनिस्टर ने उसको पढ़ा और देखा कि अरे भ ये हिंदू मुस्लिम की भी बात कर रहा है। मगर जो बात कर रहा है वो तो नेशन समझने के लिए नेशन को समझने के लिए जरूरी है। तो तो प्राइम मिनिस्टर ने उसका इंटरप्रिटेशन किस तरह से किया कि यह चीज नेशन बिल्डिंग के लिए जरूरी है। तो सच्चर कमेट रिपोर्ट इज ए रिपोर्ट ऑफ नेशन बिल्डिंग। ऐसा रिपोर्ट ना सच्चर से पहले आया था ना सचर के बाद हुआ है। और आप अपने एआई से पूछिए। अभी आप समझा रहे थे कि सच्चर कमिटी के बेसिस पे कितने हजार डिस्कशन और डिबेट्स हुए इंडिया में कोई दूसरी कमेटी रिपोर्ट नहीं है जितना सचर कमेटी डिबेट हुई है। मुझे दूसरी कोई भी रिपोर्ट का स्ट्रेटजी निकाल के दिखाओ और सच्चर का निकाल के आप बगल में रख के देखो कि कितना डिबेट क्यों हुआ? वो लोग कहते हैं सेंसिटिव इशू है अभी। अब हिंदू मुसलमान की बात कर रहे हो। सेंसिटिविटी होगी। मगर जब प्राइम मिनिस्टर मुझे बता रहे थे जो मैं आर्टिकल लिख रहा था मुझे वो कोई सेंस नहीं था इसीलिए मैं कह रहा हूं मेरे दिमाग में कुछ खलबली नहीं थी क्यों वो इसलिए कि मेरे अपने खुद का जो काम काज शुरू हुआ 1974 में मेरा फर्स्ट एंप्लॉयमेंट शुरू हुआ उसी वक्त से मैं घर-घर जाके जैसा सेंसेस में लोग आते हैं घरों को और सर्वे वाले घरघर जाते हैं यह काम मैंने पहले शुरू किया कर्नाटका में और क्योंकि मैं अनलाइक अदर मुस्लिम्स आई आई न्यू कन्नडा लैंग्वेज बिकॉज़ आई स्टडीड इट। सो आई वास टेलिंग दैट माय फादर वाज़ वेरी पर्टिकुलर। ही वाज़ अ स्कूल टीचर उर्दू बट ही वाज़ पर्टिकुलर दैट आई लर्न कन्नडा। द मोमेंट आई स्टार्टेड लर्निंग कन्नाडा। आई स्टार्टेड अंडरस्टैंडिंग हिंदू कल्चर। मैं इस लेवल पे अ 1974 में मेरा पहला जॉब था भाई 19767 में दो आर्टिकल्स जो लिखा कंपेयरिंग हिंदू मुस्लिम्स नाउ दिस इज़ेंट 74 के बाद 76 तक 77 तक जो मैंने कुछ रिसर्च किया और आर्टिकल लिखा वो आर्टिकल आई पब्लिश्ड इन अ सेमिनार वेयर ए हिंदू हिंदू मंदिर के जो बड़े होते हैं प्रधान होते हैं वहां पे एक बहुत बड़ा मंदिर है बहुत ही रिस्पेक्टेड देवेंद्र हेगड़े करके उन वो चीफ थे वो और वो मंदिर के गांव का नाम भूल रहा हूं मैं उन्होंने मुझे सिल्वर मेडल दी विद गणेशा ऑन इट एंड आई वास द मुस्लिम ओनली मुस्लिम हु वास प्रेजेंटिंग दैट पेपर सो मैं पेपर मैं आप जैसा थोड़ा सा अभी भी 22 23 साल का था मैं 24 मे भी 24 साल का था मैं जब पेपर लिखा मैंने तो उसका नाम था विडो रिमैरिजेस इन इंडिया कंपेयरिंग हिंदूस में विडो रीमैजे विडोस को कैसे प्रोटेक्शन मिल रहा है मुस्लिम्स में विडोस को क्या हो रहा है हम सो आई गव ग्रनुलर डिटेल्स अबाउट हाउ अ विडो इज ट्रीटेड विथ इन मुस्लिम्स वो रीमैरिज हो जाती है दूसरा प्रोटेक्शन मिलता मिलता है। हां मगर हिंदू वूमन को नहीं मिलता है। उस टाइम पे ये डाटा कहां से था सर? मैंने इकट्ठा किया। इकट्ठा किया था। वही तो बता रहा हूं ना। मैंने गांव-गांव जाके इकट्ठा किया और उसका पूरा डिटेल और उस पे पेपर लिखा और वहां पे एक बड़ा सेमिनार हुआ। 100 200 लोग इकट्ठा हुए। मैं एक ही मुसलमान उसमें और मैंने पेपर दिया और मुझे सिल्वर में गोल्ड किसी दूसरे को मिला। मुझे सिल्वर विद गणेश आने ये पूरे कर्नाटका डाटा था। नहीं नहीं गांव गांव हां अभी अभी वो डाटा उसमें सेंसेस में वगैरह मिलता है दूसरे भी मैंने लिखा है मैंने वो लिखा है कि ट्रिपल तलाक का आपने डाटा नहीं था तो आई डीड अ सर्वे ऑफ़ ऑल इंडिया थ्रू ए प्रोसीजर एंड आई हैव एस्टीिमेटेड कि विडो रिमरजेस ये ट्रिपल तलाक का इंसिडेंस क्या है मुस्लिम्स आपने नहीं पढ़ा वो नहीं सुप्रीम कोर्ट ने रेफर किया उसको बिफोर द जजमेंट यू गो टू सुप्रीम कोर्ट के जो जजमेंट है उसमें वह रेफर किया गया है और वह द वायर में पब्लिश हुआ है। कितना उसमें बताया जो मोदी जी करके आए हैं डिसर्शन बोलते हैं उसको उसकी मिकदार हिंदू कम्युनिटी में बेहिसाब है और हिंदू वूमन का पेन मेजर इमेजरेबल है। हिंदू वूमन को आफ्टर हर हस्बैंड डाइस उसको बहुत कम प्रोटेक्शन मिलता है और मुस्लिम वूमन को एकदम 40 दिन के बाद उसे प्रोटेक्शन वो शी कैन शी इज़ फ्री टू गो एंड मैरी समबडी एंड टेक केयर ऑफ़ हर किड्स वेदर वेदर द सेकंड हस्बैंड इज़ आल्सो अल्कोहलिक वो भी शराबी कबाबी मारता है लात मारता है वो अलग बात है। मगर उसे एक अपॉर्चुनिटी है कि फिर उसे एक फैमिली सिस्टम में फिर वो जुड़ जाए। तो मैं यह कहा तो वह देवेंद्र हेगड़े आकर मुझे गले लगा लिए और उन्होंने मुझे एक अवार्ड दिया। अब यह हिंदू मुस्लिम की बात हो रही है ना मैं मुसलमान हूं मगर एकेडमिक हूं। मगर यह मैं अंडरस्टैंड कर रहा हूं इसके बारे में उसी वक्त से लिखना शुरू किया। कंपेयरिंग अभी सवाल आता है कि स्टेटस ऑफ वुमन इंडिया में किसकी ज्यादा है? सो द स्टेटस ऑफ वुमन को कंपेयर किए तो हमने इस तरह के सवाल पूछे गांव में कि उसके स्टेटस ऑफ वुमन क्या होता है? उसका हमने एक यारार्ड स्टिक बनाया। तो उसमें हमने एक सिंपल सा बताया स्टेटस ऑफ वुमन यार्ड स्टिक ये होना चाहिए कि एक औरत अपने फैमिली के अंदर अपने बच्चों को किस तरह पालेगी? हम और उनके बच्चों को पालने के लिए कुछ डिसीजंस करने पड़ते हैं। हम तो [गला साफ़ करने की आवाज़] क्या वो औरत खुद ले सकती है या किसी का सहारा चाहिए। एजेंसी एजेंसी तो हमने पाया कि मुस्लिम वूमन इज वेरी इंडिपेंडेंट हम और हिंदू वूमन इज डिपेंडेंट नॉट ऑन वन द होल फैमिली समटाइ्स हमने सोचा ये क्यों हो रहा है वेरी सिंपल फैमिली का सिस्टम जिस फैमिली में औरत रहती है तो वो एनवायरमेंट डिसाइड करेगा कि कौन डिसीजन ले रहा है तो मुस्लिम हाउसहोल्ड जो हैं मोर न्यूक्लियर होते हैं। हिंदू हाउस होल्ड जॉइंट होते हैं। तो कभी-कभी शादी होते ही 8 दिन में, 15 दिन में एक साल के अंदर मर्द को लेके अगले चली जाएगी। वो सास के साथ नहीं रहेगी, बहू के साथ नहीं रहेगी। इस तरह करेगी, बोलेगी चलो अलग से। और यह होता भी इसलिए है कि लैंडेड कम्युनिटी नहीं है। सो द मुस्लिम हाउसहोल्ड्स ऑन एन एवरेज डू नॉट डिपेंड ऑन लैंड एज अ सोर्स ऑफ़ सस्टेनेंस। सो इट इज लेबर वि हस्बैंड डस। तो लेबर सस्टेनेंस में फैमिली स्प्लिट हो जाती है। तो एक हुआ तो उसमें अभी भी जो की पॉइंट है वो अभी भी टेबल पे नहीं आया। मैं सोच रहा था कि आपके दिमाग में है। तो ये क्या करती है? न्यूक्लियर बन गई। तो खाना पकाती है, खिलाती है, काम पे भेजती है उसको। हम वह शाम में कमा कमा के आता है। रास्ते में ठर्रा मारता है। शराब पीता है। वह जो भी करना है करता है। आता है रात को थका हुआ। बाद में फिर सुबह को जाना है उसे। तो जाने से पहले वो क्या करता है? पैसे फेंकता है। यह रख ले खर्चे के हैं आज के। मैं फिर कल रात को चला जाता है। यह मुस्लिम फैमिली है। ऑन एन एवरेज। जो हिंदू फैमिली में यह हस्बैंड है। आता है। वहां का कल्चर अलग है। वह आते ही सब मिलकर खा लेते हैं। भाई बहन सब बैठ के औरत पहले खिला देती है। बाद में बचा तो खाती है। तो उसे न्यूट्रिशन भी कम मिलता है। हिंदू औरत को पॉसिबिलिटी ऑफ़ गेटिंग लेस न्यूट्रिशन। लेस फूड इज मोर देन अ पॉसिबिलिटी ऑफ़ विद कंपेयर टू जो पहले खाएगा वो खुल के खाएगा। अब वो ये कैलकुलेट नहीं करेगा कि बचा है या नहीं। हां। और जो मुस्लिम फैमिली में वो अच्छा और हिंदू फैमिली में जब तक हस्बैंड नहीं आएगा खाना खाएगी नहीं वो हम अपने संस्कार वैसे हैं मुस्लिम फैमिली में ऐसा कुछ नहीं है वो नहीं आएगा तो वो बच्चे हैं बैठ के बिरयानी खाएगी वो पकाएगी खाएगी शी विल नॉट वेट फॉर द हस्बैंड टू कम सो दैट शी कैन ईट हम आप समझ रहे हैं इंडिपेंडेंट नेचर ऑफ़ डिसीजन मेकिंग अब समझो बच्चा सवेरे चला गया हस्बैंड 6:00 बजे 7:00 बजे ठेला लेके और वो बच्चा खेलतेखेलते नाली में गिर गया। चोट आ गई उसे हम तो अब क्या क्या करते हैं? सो सेम सिचुएशन में एक हिंदू महिला क्या करेगी? एक मुस्लिम महिला क्या करेगी? हमने इसको स्टडी किया एंथ्रोपोलॉजी तो बताइए क्या करेगी? वो एकदम ले जाएगी क्योंकि एजेंसी है मुस्लिम वुमेन। एकदम ले जाएगी। हमने मेजर किया टाइम कि कितने बजे बच्चे को चोट आई? कितने बजे तक डॉक्टर के पास गए? तो दैट वाज़ द शॉर्टेस्ट टाइम फॉर मुस्लिम वूमेन इन इंडिया इवन टुडे। सो दीज़ आर द पैराटर्स ऑफ़ स्टेटस ऑफ़ वुमेन इन इंडिया। नॉट पर्दा। पर्दा डालो तो नहीं उसको देखो एक्सप्लइट कर लिया। कुछ नहीं है ऐसा। इंडिपेंडेंट डिसीजन ले सकती है महिला कंपेयर टू हिंदू। वो चेंजेस आ रहे हैं। हिंदूस में एजुकेशन बढ़ रहा है मोर देन मुस्लिम्स। तो वो अलग-अलग रीजन से इक्वलिटी में आते होंगे। मगर अभी भी डिफरेंस आपको मिलेगा। ऑन एन एवरेज आप बोल रहे हैं कि अभी भी अभी भी आप स्टडी करेंगे दिल्ली में दिल्ली में भी कर सकते हैं या यहां से 100 कि.मी. दूर जाके वेस्टर्न यूपी में, ईस्टर्न यूसी में विलेजेस में जाके स्टडी करो तो ये निकलेगा। ऐसी एनामली जैसे अंडर फाइव मोटिटी में अगर देखा जाए बच्चों में यही बहुत सारी चीजें दी आर सम ऑफ द फैक्टर्स व्हिच व्ह वी शोड दैट द इनफेंट एंड अंडर फाइव मोटिलिटी लो अमंग मुस्लिम्स इज दिस रीज़ खिला सकती है वो कर सकती दैट इज़ द एक्सैक्ट रीज़ इन 1977 76 78 मैंने रिसर्च किया तो वहां मैं हिंदू मुस्लिम हिंदू मुस्लिम कंपेयर कर रहा हूं और मुझे मेरा मेरा भारत मेरा पूरा वो दायरे के अंदर मेरे नजर नजर में आ रहा है। अरे यूपी में ऐसा रहा, बिहार में ऐसा रहा। अरे बंगाल में क्यों ऐसा हो रहा है? अरे केरला में ये क्यों ऐसा है? बहुत डिफरेंसेस इतने डिफरेंसेस 24 क्यों है? 24 आवर में लिखना है उसको। खाली बोलना नहीं आप जैसा। इसीलिए मैं आपकी तनकीद कर रहा हूं के लिखना है। जब लिखोगे तो यू मैच्योर इन योर आइडियाज मच डीपर। बोल के चले जाओ और लिखना अलग है। आपको जाते हुए मुझे वर्किंग पेपर्स देने पड़ेंगे। आप जैसे बिल्कुल देने नेक्स्ट टाइम नेक्स्ट टाइम मैं जब आऊंगा वर्क नहीं है तो मैं अंदर भी नहीं आऊंगा। [हंसी] प्रिंट आउट निकाल ले वो बेहतर है। मैं मैं अनस के पास कल गया। तो ऑलरेडी 20 लोगों को बता दिया के आप तीन महीने के अंदर आप 20 नाम और मेरा नाम और अनस का नाम इंडियन एक्सप्रेस पे रहेगा। वो लिख रहे हैं ऑलरेडी बेहतर है क्योंकि उनमें एबिलिटीज थे तो हमने उनको प्रमोट किया सबके नाम से हम लिखेंगे ऐसे ही होना चाहिए जभी उनका कॉन्फिडेंस भी बिल्ड होगा हां जब तक लिखोगे नहीं बाकी का सब नाटक है मेरे क्यों अब देखो मैंने कोई चीज 1974 में लिखी थी आप Google करो वो वीडियो रीमैरेजेस का पेपर आपको मिलेगा प्रिंटेड मैटर है जो चाहेगा ढूंढेगा मिलेगा उसको। है वहां पे तो यह ये तो हिंदू मुस्लिम का जो इशू आया तो उस जमाने में मैंने देखा कि मुझे गवर्नमेंट से एक गवर्नमेंट टाइप मैं कभी गवर्नमेंट में काम नहीं किया इंडिपेंडेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट में बट आई हैड अपोरर्चुनिटीज टू एनालाइज दिस डेटा वेयर रिलीजन वाज़ अवेलेबल कास्ट वाज़ आल्सो अवेलेबल एंड मुस्लिम्स का डाटा मैं अलग करके स्टडी करने लगा क्योंकि मैं मुसलमान था मुझे जानना था कि अरे एससी एसटी में तो है यह मुसलमान में क्या होगा? मैंने एक एक कंप्यूटर को किया मुस्लिम्स का सेपरेट करके देखने लगा। आई एम द ओनली वन हु स्टार्टेड डूइंग इट? क्यूरियोसिटी आपको इस तरफ व्हाई डू यू थिंक आई एम द ओनली वन बिकॉज़ आई एम द ओनली वन हु लर्न स्टैटिस्टिक्स एंड इकोनमेट्रिक्स नॉट ओनली इन इंडिया बट इन ऑस्ट्रेलिया देन इन यूएसए देन आई केम बैक टू इंडिया टू वर्ल्ड। आपकी ट्रेनिंग ने और आपकी लिव्ड एक्सपीरियंस ने आपको ऑटोमेटिकली वो दोनों का कॉम्बिनेशन मिश्रण है। तो मुझे जब एकेडमिकली मैं तो पॉलिटिकली बात नहीं हो रही है। यानी वो जाके वो ये कम्युनिटीज में एक दूसरे को छेड़ना हिंदू बच्चे ये तो नहीं कर रहा हूं मैं। मैं मेरे सामने मेरे देश का मेरे कंट्री का जो डाटा है वो डेटे को अंडरस्टैंड कर रहा हूं। और हो सकता है मैं बयास्ट हूं क्योंकि मैं मुसलमान हूं तो मुझे इंटरेस्ट आ गया अरे भाई क्या मुसलमान का क्या हो रहा है ड्रपोट रेट क्या हो रहा है मुसलमान का चौथी क्लास के अंदर धड़ धड़ धड़ धड़ पूरे बच्चे गायब स्कूल से दलित बच्चे जा रहे हैं आठवीं क्लास तक जा रहे हैं क्यों उनको मिड डे मील्स मिल रहा है ये मिल रहा है खाना मिल रहा है सब मिल रहा है इनको कुछ नहीं मिल रहा है लेबर फोर्स में जाना है वो बच्चे को निकाला वो वहां वहां भेजा और ठेले के पीछे भेजा वो मच्छी बेचने भेजा वो लड़की को बर्तन मांझ ने भेज दिए बच्चों को समझ रहे हैं तो क्यों अब ये ये तो स्टडी करो पहले अगर मुस्लिम्स के इश्यूज को एड्रेस करना है तो ये लेवल पे आपको स्टडी करना है। सो माय मोस्ट फेवरेट टॉपिक टु टुडे एंड नाउ इज़ हाउ टू गेट मुस्लिम वुमेन आउट ऑफ द हाउस इंटू द कम्युनिटी हम मुस्लिम्स का ये जो भी रट जो भी प्रॉब्लम्स हम फंसे हुए हैं इंक्लूडिंग पॉलिटिकल वो इसलिए है कि हमने औरत को हमारे दिल्ली से बाहर जाने नहीं दे रहे हैं अकेली उसको अकेली अपने बा दिल्ली से बाहर जाने का हक है और हक देना चाहिए वो रोक रखा है। आपके यह जो क्वेश्चंस थे आप बता रहे हैं बहुत अर्ली लाइफ में क्योंकि आप सोसाइटी रीड कर रहे थे। सर्वे कर रहे थे डाटा की आपकी तो उसी दौरान मैंने एक पेपर लिखा जो इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में पब्लिश हुआ 1986 में। तो उसके अंदर टाइटल था सोशल इकोनॉमिक एंड डेमोग्राफिक डिफरेंशियल्स बिटवीन हिंदूज़ एंड मुस्लिम्स इन इंडिया। देखो जल्दी से वो 86 में नहीं मैं आई एम सॉरी 88 8 91 में मैंने लिख दिया था हम 91 में और मैं एएल यूनिवर्सिटी चला गया हम और एएल हिस्ट्री में मैं एक ऐसा रिसर्च किया डाटा के [गला साफ़ करने की आवाज़] माध्यम से पूरा ग्लोबल तो उसमें मदर्स एजुकेशन का इंपैक्ट क्या है फैमिली हम मदर्स मदर्स एजुकेशन का इंपैक्ट जीडीपी पे जीडीपी पे क्या है अब हमारे महिलाएं हैं जो ऑन एन आवरेज चौथी क्लास पढ़े हैं। हम उनको आप आठवीं क्लास पढ़ा दो तो इंडिया में क्या होगा? तो इंडिया में रेवोल्यूशन आ जाएगा। एक तरीके की रिटर्न्स टू एजुकेशन रिटर्न्स टू एजुकेशन एक्सैक्टली उसमें मार्केट रिटर्न नॉन मार्केट रिटर्न तरीके हैं। वो हम वो पूरा वो वो हमने पढ़ के हमने वापस आया। तो हमारा अगेन तवज्जो हमें वुमेन पे गया हम और उसी दौरान में वो मिला क्या आर्टिकल मिला जी हां इनको दिखाइए इकोनमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने इसको छापा तो वििन 3 मंथ्स मुझे एक मेल ओवर पे ईमेल नहीं था अभी भी हां नहीं ईमेल आ गया था 70 91 में ईमेल आ गया था तो ये 96 की बात हो रही है हां 96 ईमेल था तो मुझे ईमेल आया यस फ्रॉम वेयर कनेडी स्कूल हां आपका ये 96 का ही होगा क्योंकि जब मैं पढ़ रहा था आपका पेपर 96 का मैंने रेफर किया था कनेडी स्कूल पब्लिश होते ही तीन महीने में कैनडी स्कूल से एक वो आया के वी इनवाइट यू टू गिव अ लेक्चर इन कनडी स्कूल टिकट आई हार्डवर्ड से आ रही है मैं तब तक एल एल जा के आ गया था पहले हार्डवर्ड भी वहां मैंने दो-तीन से मेरा कर दिए थे तो आई वाज़ आई वाज़ अ काइंड ऑफ़ अवेयर। तो मैं गया 86 में तो बॉस्टन एयरपोर्ट में मैं गया तो वहां पे वहां के स्टूडेंट आए मुझे ले जाने। वो स्टूडेंट का नाम था आशुतोष वाश। हम उनके कम्युनल टेंशनंस और उस पे काफी अच्छा। नहीं नहीं वो जो भी है ही ही वाज़ अ स्टूडेंट हु केम टू टेक मी टू द डिपार्टमेंट। तो वो अभी पढ़ रहे थे। पीएचडी कर रहे थे शायद वो नाउ ही इज़ वेरी वेल नोन वर्ल्ड हां जी हां तो आशुतोष ने मुझे ले गया वो करे सेमिनार से पहले लाइब्रेरी है वो दिखाए पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट तो बाद में उन्होंने जाके एक किताब निकाली ऐसी बड़ी तो बताया किताब लिख दिया हां किस किसने लिखा है वही प्रोफेसर जो मुझे बुलाए हम वो उनके पीएचडी गाइड है हम तो इसीलिए उन्होंने ड्यूटी लगा दी उनको ये आ रहे हैं इसको बुला के तो बाद में उन्होंने दिखाया देखिए ये ये देखिए तो पीछे रेफरेंसेस खुलिए आप रेफरेंसेस खुलाया इंडेक्स इंडेक्स खुलाया मेरा नाम दिखाया विथ इन थ्री मंथ्स दैट वाज़ रेफर्ड रेफर्ड बाय हु वन ऑफ द बिग बिगेस्ट सोशल पॉलिटिकल साइंटिस्ट ऑफ द वर्ल्ड तो उन्होंने आशुतोष ने वो बताया के अगर पॉलिटिकल साइंस में कोई नोबेल प्राइज होता तो ही वुड हैव डिर्व ए नोबल प्राइस। सो दैट इज द काइंड ऑफ़ पर्सन। सो दैट सो मैं यहां पे आपको दैट इज द पावर ऑफ राइटिंग। तो आपका आउटकम राइटिंग में होना चाहिए। एंड यू पुट ए काउंटर समवेयर देयर। मैं दिन में कितने वर्ड्स लिख रहा हूं जो फाइनल है हम जो आप लिखते हैं ये एक सेंटेंस उसको 25 दफा आप उसको रब करके वो जो आईडिया है उसको ठीक से करने के लिए राइट वर्ड फॉर इंग्लिश राइट वन नो आप एक नाप और तोल करते हैं जो लिखते हैं जो वर्ड्स जो यूज करते हैं देयर इज अ लॉट ऑफ ब्रेन पावर यू यूज टू राइट ओनली देन जाके पब्लिशेबल बनता है तो वो क्वालिटी आपने आई लाइक दैट यू शुड डेवलप इट क्विकली एंड ब्रिंग योर आईडियाज ऑन पेपर एंड शेयर इट टू द वर्ल्ड नॉट टू ओके तो [गला साफ़ करने की आवाज़] दैट पेपर में हिंदू मुस्लिम आ गया तो वो प्रोफेसर बोले यार यू आर द ओनली गाय हु रिटन हिंदू मुस्लिम कंपैरिजन डर नहीं होता क्या तुम्हें मैंने बोला किस चीज का डर कोई नहीं लिखता ये हिंदू मुस्लिम मुझे उन्होंने बताया इंटरेस्टिंगली क्योंकि वो पॉलिटिकल मूवमेंट्स भी पढ़ रहे होंगे हिस्ट्री भी तो उनको अंदाजा होगा कि भाई आसान काम नहीं है। समझे ना? तो अब ईपीडब्ल्यू पब्लिश कर दिया उसको। अब ईपीडब्ल्यू कौन पढ़ते हैं? पूरी ब्यूरोक्रेसी इंडिया में पड़ती है। पूरे पॉलिटिकल सिस्टम पढ़ता है। जी। पूरे यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं। तो आप बताइए कितने लोग पढ़े होंगे वो आर्टिकल? जी। जितने भी लोग रेलेवेंट हैं उस डिबेट में जो यूनिवर्सिटीज में काम कर रहे हैं स्टूडेंट्स जिनको लिटरेचर रिव्यु करने के लिए तो उसके बाद क्या हुआ उसी दौरान मेरे पास एक प्रोजेक्ट आया वो इंडियास प्लानिंग कमीशन का ह्यूमन डेवलपमेंट 1999 में जो किताब आई हां 99 में वो प्रोजेक्ट 94 में मेरे साथ मेरे मेरे से मेरे हवाले था तो उसके अंदर हमको ह्यूमन फसेस डालने थे डेवलपमेंट को इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट इंडिया में 96 में एनसीएआर में एनसीआर में अब यह रिपोर्ट में हिंदू मुस्लिम है हर पन्ने में है और इस ये रिपोर्ट को गेस हु रिलीज्ड इट वाजपेयी वाजपेयी जी रिलीज्ड इट वो द टू विज्ञान भवन में हां आप समझ रहे हैं सो इवन द प्राइम मिनिस्टरर्स टूक नोटिस ऑफ़ दैट अरे ये कोई बता रहा है हिंदू मुस्लिम करके बता रहा है मगर क्यों बता रहा है क्या बता रहा है इसका पब्लिकेशन भी हो रहा है पढ़ रहे हैं और देन दे फाउंड फाउंड आउट कि यदि इंपॉर्टेंट इंफॉर्मेशन है हमारे डेवलपमेंट के लिए वी हैव टू इंटीग्रेट मुस्लिम्स इनू द सिस्टम नहीं तो ड्रैग बनेगा जो प्लेन उड़ रही है वो उसका पीछे का हिस्सा लटकता रहेगा ऐसा हो जाएगा और उड़ेगी नहीं एक तरफ आपकी 2025% की एससी एसटी आबादी है उसमें आप 15% की मुसलमान जोड़ दीजिए फिर आपने पता चला 80% हिंदुस्तान तो ड्रैग कर दिया हां तो ड्रैग कर रहा है सो ये एस्टीिमेशन जो है ये हम हर रोज हमारा काम ही यही है और ये डाटा गवर्नमेंट खुद का डाटा है। हम भी अलग से करते हैं और जब ये हालात हो गए उसके बाद वाजपेयी जी वाज़ वन ऑफ माय आई सो मच दिस वन आई लिटरली आई कंसीडर्ड हिम एस अ फ्रेंड। ही यूज्ड टू ही यूज्ड टू गिव मी लॉट ऑफ़ टाइम टू टॉक एंड ही यूज्ड टू लिसन। यूज टू कॉल मी होम और सराते वो शरीफ साहब आप यह जो चीज ये डैमेज है उस जमाने में उन्होंने कहा यह मदरसे का बहुत प्रॉब्लम आ रहा है हम तो मैंने बोला सर हमारे पास डाटा है मदरसों का अरे ये क्या है डाटा है मैंने बोला तीन से 4% मुस्लिम एलिजिबल बच्चे मदरसे जाते हैं। बाकी के 96% स्कूल जाते हैं। अच्छा ये जो लोगों को लगता है कि पहली बार यह डाटा सचर में आया तीन से चार उससे पहले सचर से पहले वो वो रिपोर्ट वो उसमें आ चुका है उसके बाद ये एनसीआरटी में आया पहले मैंने क्रिएट किया उसके बाद एनसीआरटी में आया उसके बाद प्लानिंग कमीशन गवर्नमेंट हम तो और बताया नहीं रेडिकलाइजेशन तो मैंने आई रिमेंबर आई टोल्ड दिस टू प्राइम मिनिस्टर सर मुस्लिम्स एंटीनेशनल काम नहीं करेगा सर चोर उचक्का होगा चकू चोरी करेगा वह कारतूस लगाएगा वह करेगा लूटेगा चोरी करेगा वो सब करेगा मगर एंटीनेशनल काम नहीं करेगा वो वो क्यों वो क्यों वो क्यों मैंने बोला देखो सर ये माइनॉरिटी कम्युनिटी है एक तरह से और उसको पता है उसके मां-बाप यहां हैं। उसके भाई बहन यहां हैं। यह भी यहीं रहेगा। पूरी जिंदगी उसकी पूरी हमारे देश में हमारे जो भी यहां बचे हुए हैं जो पाकिस्तान नहीं गए वो एंटी नेशनल ये घास का पत्ता नहीं करेगा हम मगर एंटीनेशनल करेगा हिंदू करेगा मगर मुसलमान नहीं करेगा आज भी दैट इज द ओनली फैक्टर जो मुझे जुड़ाती है मुस्लिम कम्युनिटी में नाउ आई एम ए मुस्लिम बाय बर्थ भाई मगर मैं मेरा सोच अलग है मगर मैं फिर भी मुस्लिम कम्युनिटी से जुड़ रहा हूं। वह इसलिए कि मुझे मालूम है कि वह एंटीनेशनल कम नहीं है। बिकॉज़ माय व्यू इज नेशनलिस्टिक। आई एम अ नेशनलिस्टिक पर्सन। आई एम ए इंडियन बाय बर्थ। बाद में मुसलमान बाद में जो भी तो वो मेरा नजरिया है। आई हैव अ राइट टू राइट टू एक्सप्रेस मसेल्फ द वे आई वांट टू। तो तो वह माहौल से मुस्लिम साइकोलॉजी में आप जाएंगे तो इट इज वेरी डिफिकल्ट फॉर हमारे सिक्योरिटी अजीत देओल साहब वगैरह है ना अनलेस अनलेस दे गिव टन्स ऑफ़ मनी टू एनरोल मुस्लिम्स एंड ऑल दैट एंटीनेशनल काम में मुस्लिम इन्वॉल्व नहीं हुआ। हम वो कश्मीर का इशू अलग है। वो इंडिया के मुसलमान का मसला नहीं है। वो गवर्नमेंट का मसला है। पाकिस्तान इंडिया का मसला है। उसमें मुसलमान का क्या लेना देना है? मैं बेंगलुरु से आता हूं। मेरा क्या लेना देना है? मेरा सिलेक्शन हो गया था। पायलट ऑफिसर इंडियन एयरफोर्स 1974 में। मैं जॉइ नहीं हुआ। सिलेक्शन हो गया। शायद अगर जॉइन होता तो मैं चारप 25 बम डाल के आता पाकिस्तान पे क्योंकि प्लेन उड़ा रहा था। आई वुड हैव बीन पायलेटिंग। मैं डाल के आता। यह यह जो साइकोलॉजिकल डिवीजन जो अल्टीलियर मोटू से करना चाहते हैं वो है दिमक जो काट रही है जड़ इंडिया का। तो इवन दिस गवर्नमेंट बीजेपी पीपल बीजेपी में भी थिंकर्स हैं बहुत सारे। आई नो देम। तो इवन दे आर वरिड अबाउट इट। बट दे हैव टू कंट्रोल दिस टेंडेंसी टू डिमिनाइज मुस्लिम्स। तो उनको वो है ना वह एरिया और और कभी-कभी क्या होता है कि अंडर सर्टेन सरकमस्ट्ससेस मुसलमान एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं। पॉलिटिशियन पीछे रहेगा कोई रिलीजियस लीडर रहेगा। नारे तकबीर निकाल के रोड पे निकल जाते हैं। ये बदमाशी मुसलमानों को डेफिनेटली कम करना चाहिए। तो क्योंकि प्रोटेस्ट का एक तरीका है। मुसलमान वो तरीका इस्तेमाल नहीं कर रहा। देयर इज़ ए तरीका फॉर प्रोटेस्ट। शाहीन बाग के प्रोटेस्ट को तो बड़ा बोला गया कि भाई बहुत तरीके से प्रोटेस्ट हुआ उसका इंपैक्ट भी हुआ ना सीएए तो नहीं कर पाया अभी तक वो एफसीआई कुछ एसआईआर कर रहा है मगर एसआईआर वो एक भेड़िया है हिप के कोर्ट में मगर फिर भी अभी शिप के क्वालिटीज हैं उसमें मगर उसमें भेड़िया घुस सकता है कभी भी तो उसका नाम बदला है वो एसआईआर में तो वो आसाम और बंगाल में उसका ज्यादा पैक हुआ है। अब कर्नाटका में हो रहा है उतना आप उतना वो नहीं कर सकता हर स्टेट हर स्टेट में मगर सीएए का जो फ्रेमवर्क बनाया था वो पूरे देश में लागू हो जाता तो एवरी इंडियन वुड हैव बीन एट रिस्क सर वेरी ब्रीफली क्योंकि हम सचर कमेटी के बारे में बहुत लोगों को पता है हमने पिछली बात करी हम ज्यादा आगे की बात करेंगे लेकिन वेरी ब्रीफली मोटी मोटी फाइंडिंग्स अक्रॉस डिफरेंट पैराटर्स जो आपको लगता है मोस्ट कॉन्सिक्वशियल है जब सच्चर कमेटी का इस तरह से आगाज हुआ तो आई एम सो थैंकफुल टू डॉ मनमोहन सिंह कि उन्होंने अपने घर में उन्होंने बुलाया मुझे बिकॉज़ आई वाज़ एन एक्सपर्ट डाटा वाला वगैरह दिस रिपोर्ट हैज़ टू बी डेटा ओरिएंटेड तो उन्होंने बोला आप एक अपने टीम बना लीजिए एंड आई विल सजेस्ट ए चेयरमैन अंडर अंडर दैट चेयरमैन यू हैव टू हमने बोला हां सर हमारा काम तो हम करेंगे हम एक्सपर्ट हैं मैं करके देता हूं तो वो सच्च साहब को कमेटी बनाएं और इस पडकास्ट के माध्यम से मैं मेरा बहुत बड़ा नमन देना चाहता हूं सच साहब को बहुत बड़े आई लर्न अ लॉट फ्रॉम हिम एंड आई यूज्ड टू आर्ग्यू विथ हिम आई यूज्ड टू टॉक अ लॉट विथ हिम एंड ही हैज़ गिवेन मी सम वेरीेंट क्लूज़ के डिफरेंट कम्युनिटीज़ में कम्युनिटी ऑर्गेनाइजेशंस कैसे वो मुझे बहुत दिलते जाके थोड़ा टाइम बना के पंजाब जाके आ क्यों पंजाब में जाके देख कैसा मैनेज करते हैं गुरुद्वारे तुम्हारे मस्जिद उस तरह से मैनेज नहीं हो रहे दिस वास द बिगेस्ट वरी ऑफ़ सच तो वो बता रहे थे गुरुद्वारे ऑल इंक्लूसिव वो हर साथ में ले चल रहे हैं गरीब जुड़ा हुआ है गुरुद्वारे से। मगर मगर मस्जिद में ओपन मस्जिद है। नमाज में जो आना चाहता है आ रहा जा रहा है। डेमोक्रेसी डेमोक्रेटिक एंट्रेंस है। मगर जुड़ा नहीं है। इंस्टीट्यूशनल सेटअप नहीं है। वो एक स्पेस है। आप गए नमाज पढ़ी वापस चले गए। इंटरेक्शन नहीं है। उसमें उसमें एंबेडेड नहीं है। कम्युनिटी को साथ में लेके आगे बढ़ाना हो नहीं रहा है। तो उस दौरान जब हमने टीम बनाई तो हमने वी एनश्यर्ड दैट आई वाज़ अ स्टैटिस्टिशियन डेमोग्राफर इकोनमेट्रिशियन हम तो आई न्यू डाटा इन एंड आउट बाय देन जब इंडिया का हर कोई मेजर डाटा बेस्ड था। वो मुझे मैं जानता था। मैं कई कमिटीज प्लानिंग कमीशन में मिनिस्ट्रीज में वगैरह-वगैरह पार्टिसिपेट था। तो देन वी वी वांटेड गुड सोशलॉजिस्ट टू हेल्प अस। तो हमने प्रोफेसर टी के ओमन जो अभी-अभी गुजरे वन ऑफ द लेजेंड्री सोशियोलॉजिस्ट ऑफ इंडिया। तो वो मेंबर बने। उसके बाद डॉ. राकेश बसंत जो इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद में वेरी वेल नोन प्रोफेसर हैं। तो वो प्योर इकोनॉमिक प्रोफेसर हैं और वह इंडस्ट्रीज को इनक्यूबेट करते हैं और स्टार्टअप्स को प्रमोट करते हैं। अब शायद रिटायर हो गए हैं। बहुत दिनों से बात नहीं हुआ है उनको। सो एंड ही ही इज़ आल्सो इन इकोनॉमेट्री हम तो मुझे एक ऐसे एक्सपर्ट की जरूरत थी जो मैं डाटा मैं निकालता था तो उसमें कहीं गलतियां ना हो जाए। रिव्यू होना रिव्यू हो जाए। तो मैं डॉक्टर राकेश बसंत को रिक्वेस्ट करता उनके पास टाइम नहीं था ज्यादा मिनट मैं बोलता नहीं मगर ये आंकड़े देखो इसका फार्मूला देखो हम और इसका एस्टीिमेशन और इसका इंटरप्रिटेशन तो राकेश बसंत जो भी मैं इकोनॉमिक डाटा देता था वो राकेश बसंत उसे अप्रूव करते ही वाज़ अ ये मेंबर बट हमारा प्रोसेस ऐसा था हम जो करेंगे काम पूरे मेंबर्स उसको अप्रूव करना उसके बाद चेयरमैन अप्रूव करेंगे उसके बाद एक थे अब्दुल बासिद वो इसके थे बेंगलुरु से और वो ही इज ए थरोबरेट स्टैटिस्टिक तो हमें स्टैटिस्टिक्स की जो है बहुत जरूरत थी उसमें स्टैटिस्टिकल इंटरप्रिटेशन इज एन आर्ट हम और उसमें थरीस का बहुत रोल है। मैथमेटिक्स का बहुत रोल है। तो उन्होंने गाइड किया हमको नंबर जर्निंग में। उसके बाद ये हमारे ये थे जामिया के चांसलर सैयद सैयद हामिद सैयद हामिद साहब जामिया हमदर्द थे जामिया हाजिद पहले एमयू में रहे हैं हां सैयद हामिद साहब मेंबर थे अब एक तरह से वो तो मुस्लिम कम्युनिटी के बड़ी हस्ती हैं तो वो मेंबर रहे हमारे और उस वहीं से और एक नाम मिस हो रहा है वहीं के वाइस चांसलर थे उनका नाम कुछ मिश्रा वो भी मेंबर सो तो अब देखिए ये एक्सपर्ट्स हैं। हम अब जो भी आंकड़े जो भी चैप्टर्स हर चीज जो भी चैप्टर है मेरे लैपटॉप से मेरे एडिटिंग से कमेट गया है। हम सो एवरी मगर एक और नाम ले लेना चाहूंगा। वो मेंबर नहीं थी। मगर शी वाज़ अ वेरी इंपॉर्टेंट कंट्रीब्यूशन इन चैप्टर टू। जहां पर उन्होंने वििन मुस्लिम्स जो डिवीजंस हैं वो क्या बोलते हैं ओबीसी नॉन ओबीसी हाई कास्ट लोकास्ट ऐसा कुछ है मैं भूल गया हूं वो चैप्टर पढ़ लेना आप वो अजरा रजाक जो प्रोफेसर रही जामिया में अभी रिटायर हो गए हैं वो तो वो हमारे वो थे कंसल नहीं शी वाज़ डिपटेड टू वर्क फॉर कमेट एंड शी आल्सो डिड वन वंडरफुल वर्क टू राइट अ चैप्टर ऑन बैंकिंग। तो बैंकिंग में हमें डाटा निकालना था। सो दिस इज द टाइम टू थैंक द रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। आई थिंक वहां उस जमाने में रेड्डी साहब थे गवर्नर आरबीआई वके रेड्डी ऐसा कुछ नाम है। बहुत ही बेहतरीन हर डिपार्टमेंट ने आराम से दे दिया। आराम से कोई झलक नहीं मारी। सब सपोर्टेड शायद ही मुझे कोई मेहनत करनी पड़ी रिपोर्ट लिख या आई वास आई वास एमावर्ड बाय द प्राइम मिनिस्टर तो मैं जाऊं तो चीफ मिनिस्टर सब डाटा देने गए इंसिडेंटली द फर्स्ट स्टेट टू गिव दिस डाटा वास मोदी जी एस चीफ चीफ मिनिस्टर फर्स्ट गुजरात का डाटा आया लास्ट बंगाल का वो बंगाल के चीफ मिनिस्टर मुझे थोड़ा सा तंग करे मुझे दो चार गालियां भी फेंके उन्होंने अच्छा तो बाद में मैंने उनको बोला मैं तो आई एम गोइंग लाइव ऑन टीवी। आई एम टेलिंग यू आर नॉट गिविंग द डेटा। आई थ्रेटेंड हिम। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] उसके बाद एक हफ्ते के अंदर वो भी डाटा आया। तो द ओनली डाटा व्हिच बिकम ए बिट ऑफ कंट्रोवर्सी वाज आई रोट टू द चीफ ऑफ ऑल द सर्विसेस आर्मी नेवी। और मैं मुझे जाना था कि क्या मुसलमान को कितना एनरोलमेंट है? इन्वॉल्वमेंट है डाटा। तो न्यूज़पेपर [नाक से की जाने वाली आवाज़] ने कहा यह कम्युनल कर रहा है आर्मी को कर रहा है उसको कर रहा है बहुत बड़ा बन गया और प्रेसिडेंट तक प्रेसिडेंट तक चली गई ये बात तो वो ऑब्जेक्शन करे जस्टिस सचर को जस्टिस सचर मुझे बोले यार तू कुछ मुझे बोला नहीं क्या कर दिया ये इतना बड़ा क्या सर क्या करा मैंने बोला क्यों मांग रहा है ये डाटा सर वो डाटा तो जरूरी है सर पूरी पूरे इंडिया को पूरे भारतवर्ष को ये चीज बचाने की चीज है उसके अंदर सर मुस्लिम्स तो बचाना है ना सर। आई वांट टू गेट एनरोल्ड इन आर्मी। हम आई वांट टू सी व्हाई आई एम नॉट गेटिंग एडमिशन। तो मैं इस तरह से आर्ग्यू किया तो उन्होंने कहा नहीं यार मुझे पूछ लेता। मगर उन्होंने कहा अच्छा तूने क्या क्या लेटर लिखे हैं मुझे दिखा। तो आई टूक द लेटर्स एंड शो दिस इज द लेटर आई डोंट डू। देन उन्होंने पढ़ा ये तो इसमें लेटर में तो तू सही लिखा है। एवरीथिंग इज ओके। तो इनको क्यों प्रॉब्लम हो रहा है ये डाटा देने में? हम मैं डिफेंस मिनिस्टर को बात कर तो डिफेंस मिनिस्टर थे वो बंगाली कांग्रेस पीपल कांग्रेस क्या नाम है उनका जो प्रेसिडेंट बन गए प्रणाम मुखर्जी प्रणाम मुखर्जी सो उन्होंने प्रणाम मुखर्जी की बात की तो प्रणाम मुखर्जी ने बताया देखो भाई ये मैं ऑफिशियल डाटा तो नहीं दूं हम ही टोल्ड हम अ ठीक है तो बाद में आए बोले डाटा नहीं मिलेगा तुझे हम ठीक हो गया जो नहीं मिला मैं तो कुछ नहीं कर सकता ट्राई किया नहीं मिला नहीं मिला आपको नहीं मिला नहीं मिला तो बाद में और तीन चार महीने बाकी थे आई वा स्टार्टिंग राइटिंग सडनली एक दफा बोला है जस्टिस सच अपने हम बोला यार यू वन क्या बोला देखो डाटा आ गया तेरा अच्छा तो इनफॉर्मली हमें दिया फॉर्मली नहीं दिया हम और वो डाटा सच में है हम जाके पढ़िए वो डाटा इतना इतना आसानी से नहीं निकला वो बिग कंट्रोवर्सीज बन गए तो इतने चीजें गए हुए हैं सच्चर कमेटी को लिखने के लिए इट हैज़ और जब सच्चर लिख रहे थे उस जमाने में अब उससे पहले जैसा कि मैंने कहा हम वाजपेयी जी के साथ भी हमारा वो रहा यू नो कम्युनिकेशन रहा ही इनोगेटेड टू थ्री बिग सेमिनार जेंडर अंडर सेमिनार ग्लोबल उनमें आए एंड ही यूज्ड टू रेस्पोंड टू आवर रिक्वेस्ट हमारा उस जमाने में वो थे मुरली मनोहर जोशी ह्यूमन रिसोर्स मिनिस्टर होते थे हम उनसे मिलते थे वो हमें बहुत अच्छी तरह बात करते थे बहुत अच्छी तरह समझाते थे सो आई हैड अ रेपुटेशन वि द बीजेपी आल्सो दे डिड नॉट कम एंड रिफ्यूज कोई बीजेपी के बंदे उस जमाने में मैं वो कमेटी के डिबेट और डिस्कशन होता तो बीजेपी के मेंबर्स भी मुझे मालूम था ये बीजेपी भी गवर्नमेंट में थे। उनको भी मैं इंफॉर्मेशन है। देखो ये रिपोर्ट लिखता हूं। आप आइए डिस्कस कीजिए। ग्रुप मीटिंग में आइए। हमने बुलाया इंडिया इंटरनेशनल में मैंने 20ों मीटिंग करे। हर स्टेट को विजिट किया। हर स्टेट में कंसल्टेशन हुआ। तो कभी कोई वो नहीं हुआ कि क्फ्लिक्ट कहीं इंटरेक्शन हुआ हो। नॉट इवन वंस नो कॉन्फ्लिक्ट नो डाटा बट फॉर दिस आर्मी इशू। इवन देन सिक्योरिटी इशू हां इवन देन आई गॉट द डाटा लेटर। तो की फाइंडिंग्स सो की फाइंडिंग्स के बारे में मैं उसमें डिटेल में नहीं जाऊंगा। बस ऊपर ऊपर से वो वो आप ये पॉडकास्ट में कोई एक आप ऐड करो। ये की फाइंडिंग्स हैं। हां। मगर मैं ओवरऑल थीम समझाता हूं कि उसका पर्पस क्या था और उसका इंपैक्ट क्या हुआ। हम है ना? उसके अंदर ये थी हाई लेवल कमिटी। हम यह मैंडेटरी कमेट नहीं थी। हम दो तरह के कमेट होते हैं। हम कोई पपस से ईदर फ्रॉम द ऑर्डर ऑफ द पार्लियामेंट और फ्रॉम द आर्डर ऑफ प्राइम मिनिस्टर ऑफिस हम और ऑन द रेकमेंडेशन ऑफ द कोर्ट्स हम कमिटीज बनते हम क्योंकि उनको कुछ ऐसे जजमेंट्स पॉलिसी डिसीजंस लेने पड़ते हैं। वो ठोस होने चाहिए। उसी कॉन्स्टिट्यूशनली द कमिटी इज फॉर्म्ड तो वो कमिटी जो फाइंडिंग करती है वो इंप्लीमेंटेबल होते हैं। तो जो कमिटी फॉर्म करती है वो पूरा इंप्लीमेंट करना हम उसमें छूट नहीं है। वो कमिटी का दायरा अलग है। उसका जो कॉन्स्टिट्यूशनल एक्ट होता है हम वो एक्ट अलग है। मुझे वो नंबर मालूम नहीं है। एक रेकमेंडेशन एक मैंडेटरी इंटरवेंशन करना है। अगर देखा जाए हां नहीं वो आपको जानना जरूरी है। जा के देखो कि किस एक्ट में जो कमेटी बनती है वो मैंडेटरी है। हम तो वो गवर्नमेंट को इंप्लीमेंट ही करना पड़ता है। हम है ना? बाइंडिंग है। बाइंडिंग है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] मगर हमारी कमेटी प्राइम मिनिस्टर ने एक हाई लेवल कमेट बनाई कि भाई पता तो करो क्या पता करके मुझे रेकमेंडेशन दो। तो उसमें 100 रेकमेंडेशंस हैं। तो क्योंकि 100 वेरिएबल्स हैं जिसमें डाटा हमने दिया है मुसलमान का डाटा फर्स्ट टाइम हिस्ट्री में इंडिया में। हम तो हर कोई जो देख रहा था आंखें फाड़फाड़ के देख रहा था। अरे तो बाद में उसमें वो जिसके भी जो इंटरेस्ट है उसको मिल रहा था। अताउ अताउले करके अभी भी पॉलिटिशियन है बीजेपी में वो पहले मिनिस्टर वो पता नहीं आ गए हार लेके सर मैं हमने सचर रिपोर्ट देखा और बहुत अच्छा लिखा मैंने बोला सलमान आना था ना कोई हार दल है सचर ये द आतावले क्यों आए आपको मालूम है क्यों आए नहीं सचर रिपोर्ट किया समझो खुशी हुई लोगों में तो मुसलमानों को होनी चाहिए ना कोई मुसलमान नहीं आया हम मुसलमानों को ये लोग आए आप बोल रहे हैं बीजेपी वाले बीजेपी वाले नहीं वोट पे अतावले वो अलग-अलग पार्टी में होते हैं अतावले ही इज द लीडर ऑफ शेड्यूल कास्ट अच्छा महाराष्ट्र के बड़े लीडर हैं वो हम वो आए एक बड़ा हार लेके ही इज़ द ओनली वन सो फार हम एक हार ला के मेरे गले में डाले सचर के बाद उसके बाद ना कोई आया ना कहीं मैं जाके एक्सेप्ट किया हम बट आई एक्सेप्टेड हर और मैं उनको गले मिला। उन्होंने बोला यार [गला साफ़ करने की आवाज़] आप क्यों खुश हैं? तो उन्होंने बोला नहीं सर आपने नाम नहीं लिया है एससी एसटी का मगर हमारा पूरा डाटा उसमें है। हम अब देखो खुल के जी वो क्योंकि कंपेरेटिव स्टैटिस्टिक्स तो ये कंपैरेटिव स्टैटिस्टिक्स है। ओबीसी कम्युनिटी में ऐसे कोई नहीं आए मगर दलित ग्रुप्स शेड्यूल कास्ट एंड शेड्यूल ट्राइब ग्रुप्स वेरी हैप्पी विद द सचर कम्युनिटी क्योंकि उनका डाटा भी कंपैरिजन में आया हुआ है। एक तरह से उसी रिपोर्ट में दो कम्युनिटीज को अपना रेफरेंस पॉइंट तो मुझे बताया गया कि सच एससी एसटी के बारे में तू क्यों नहीं लिखा? मैंने बोला मेरा मैंडेट तो मुस्लिम्स के बारे में है। मैं मुस्लिम्स के बारे में लिखूंगा। बाद में प्राइम मिनिस्टर या कोई भी एससी एसटी का रिपोर्ट बनाएगा। मैं और दूसरी कमेट में बैठ के मैं और एक छ महीने एक साल मुझे भी दाना पानी तो चाहिए। लिखूंगा बुलाओ। मैं एससी एसटी का क्रिश्चियन का रिपोर्ट लिख के दूंगा। हम तो क्रिश्चियनों ने भी रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश की वो जान दयाल वगैरह दयाल मगर सम हाउ दे कुड नॉट डू गवर्नमेंट से नहीं लिखा पाए तो चर्च के पास उतने पैसे नहीं थे मैं उस जमाने में ₹ लाख 30 लाख का खर्चा दिखाया होगा दैट वाज़ वेरी बिग दे कुडंट अफोर्ड तो मैं चुप हो गया बट व्हेन आई वेंट टू यूएस अभी मैं यूएस में रहता हूं हम वहां हमने दो रिपोर्ट क्रिश्चियंस के लिए लिखे अच्छा तो दे आर कॉल्ड फियोकोना रिपोर्ट 23 एंड 24 और 24 का जो फियोकोना रिपोर्ट लिखे हैं वहां वहां क्रिश्चियन इंडियन क्रिश्चियंस के एसोसिएशंस हैं उन्होंने मुझे डाटा ला के दिया हम मैं अमेरिका में बैठ के मेरा काम कर रहा हूं तो बोला ये डाटा है सर आपने तो सचर कमेट लिखी है आप इसे एनालिस करके हमें बताइए तो मैं एनालाइज करके उनको आंकड़े वगैरह पूरा दे दिए और वो रिपोर्ट बाइडन जो प्रेसिडेंट थे अभी ट्रंप से पहले हम जो बाइडन जो बाइडन से थे तो उनके ऑफिस में वाइट हाउस में वो कमेट ब्रीफिंग हो गई हम मोदी जी जाने से एक हफ्ता पहले मोदी जी आ रहे थे वहां हम और वो मीटिंग के बाद आज तक सिर्फ लास्ट दिसंबर क्रिश्चियंस पे अट्रोसिटीज हुए हम नहीं तो वो डेट डेट जो बता रहा हूं मोदी जी गए थे डेट याद रख लो वो डेट और आज तक क्रिश्चियंस के ऊपर हमले नहीं हो रहे हैं दैट इज बिकॉज़ ऑफ़ दैट फियोना रिपोर्ट 24 हम तो आप समझ रहे हैं आंकड़ों का पावर हम हम जो आंकड़े जो नंबर्स आप देंगे और वो नंबर्स जो सेंटिटी देते हैं वो वो एक तरह से मैं एक मुस्लिम स्टाइल में बोलूंगा ूंगा उसको नंबर जो है एक तरह से वो एक क्या बोलते हैं उसको समथिंग एसेंशियल यू हैव टू डू फ्रॉम अल्लाह अल्लाह की हिदायत जो हुआ अब झुठला नहीं सकते फर्ज एक तरह का फर्ज ही नहीं है एक ये नंबर इतनी सेंटिटी है कि उसको आप झुठला नहीं सकते उसको क्या बोलते हैं ये एक [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसी चीज है जो सच है और वो उसे किसी हालत में अब झुठला नहीं सकते। वो है नंबर्स स्टैटिस्टिक्स। उसके अंदर इतना मैथमेटिक्स और स्टैटिस्टिक्स जो है यह आपका इतना बड़ा जो भी चीज है उसको एग्रीगेट करके उसको पूरा एनालाइज करके कंप्यूटरटर्स के अंदर एनालिस करके उसको एक नंबर देते हैं हम के इंडिया का जीडीपी 8% ग्रोथ रेट है हम आपको पता है वो कंप्यूट करने में कितने लोग हैं और कितने कितना टाइम और कितना डाटा खपत होता है एक नंबर नंबर पूरे इंडिया का कोने से कोने तक का डाटा उसके अंदर और वह जाके टर्न आउट होता है और वो सही फार्मूले और सही डेफिनेशन से आप डालेंगे तो वो अल्लाह की दी हुई नेमत बनती सच्च कमेटी वो है और उसी वक्त कुछ लोगों ने बीजेपी के मुझे माल नाम याद नहीं आ रहा है। उन्होंने हम ये रिपोर्ट को खारिज करते हैं। बैठ के बता दिए ये क्या होता है? मैंने 506 करोड़ गवर्नमेंट के खर्चा करके प्राइम मिनिस्टरर्स को ऑथराइज़ करके ऑथराइज़ेशन के अंदर हमने बैठ के 50 लोग ये रिपोर्ट लिखे हैं सच्च की और आप बोले मैं खारिज कर देता हूं। कैसे खारिज करोगे भाई? इसको खारिज करना है तो आपको दूसरी किताब लिखनी पड़ेगी और उसके अंदर जो आंकड़े हैं उसको झुठलाना पड़ेगा। दे टू ए चैलेंज। हम दूसरी लिखेंगे। मुझे न्यूज़पेपर में फोन पे मैसेज आए वो रीरन कर रहे हैं टेबल में बोला करो बोलो ना वो रीरन कर ही नहीं पाता कोई क्योंकि रिजर्व बैंक डाटा नहीं देगा उनको डाटा मुझे दिया था सेंसेस ऑफ इंडिया ने पूरा सेंसेस ऑफ इंडिया डाटा हमारे लिए एक चैप्टर के लिए सेंसेस ऑफ इंडिया ने तो ये सचर कमिटी लिखने के वक्त हर महकमा हर चीफ मिनिस्टर हर स्टेट सब डेट तो वो मैं समझता हूं वह इंडिया में ही हो सकता है। तो जो भी हम मुस्लिम्स लोग विक्टिम हुड के अंदर हम जैसे भी जो सोच है हमारी इंडिया के बारे में वो तो सही है दिखती है फिजिकली कोई डंडा लेके मारे तो मुझे हाथ में दर्द नहीं होगा क्या मैं तो चिल्लाना पड़ेगा गाली तो दूंगा मगर उसका मतलब यह नहीं कि मैं मेरे इंडिया को मैं गाली देना शुरू करूं दिल्ली के गले में मुझे डंडे पड़े पड़े पड़े होंगे पड़ते हैं मगर उसका मतलब यह नहीं कि मैं इंडिया की इंडिया को गाली देना। ऐसा होता है कहीं? डिफरेंशिएट करने की जरूरत है पॉलिटिकल मूवमेंट्स और स्टेट एज एन एंटिटी के बीच में। कल कोई था, कल कोई होगा। आपको एज अ सोशल एंटरप्राइज आपको चेंज लाना है। हां तो ये है तो वो एक्चुअल जो रेकमेंडेशंस हैं तो वो डाटा आधारित उसका अलग से पडकास्ट बना लो। मगर हमने जब स्टडी किया कि क्या मुस्लिम्स के जो इशूज़ हैं उसको किस दायरे में और किस तरह के रेकमेंडेशंस देने चाहिए। तो ये मेजर इशू आया कि हमको कोटा मांगना चाहिए। इतना बड़ा काम कर रहे हैं और डिप्रवेशन दिखा रहे हैं। रिजर्वेशन रिजर्वेशन होना है या नहीं होना है। तो हमारे माइंड में पर्टिकुलरली मेरे माइंड में मेरे माइंड में यह चीज आई के रिजर्वेशन से क्या फायदा होगा? तो मैं इकोनॉमिस्ट तो मेरे दायरे मुझे रिजर्वेशन को फाइट करना बहुत मुश्किल काम है। वो भी मालूम है मुझे। मगर सच्चर कमेटी लिखी इसीलिए रिजर्वेशन का रेकमेंडेशन एक्सेप्ट हो जाएगा। ऐसा नहीं है। पॉलिटिक्स है। पॉलिटिक्स है। स्ट्रक्चर रेडी नहीं है। तब जाके मैं कोटा सिस्टम को थोड़ा सा स्टडी किया। उसके बारे में लिखा नहीं वहां बिकॉज़ वो मैंडेट में नहीं है। मगर मुझे मालूम है कि इवन बेस्ड ऑन द फाइंडिंग्स ऑफ़ द सर्चर कमिटी अगर मैं रेकमेंडेड फॉर ए सर्टन मुझे मालूम है कि अंडर रिप्रेजेंटेशन कहता है वो मेजर करके है। हम तो वो पहले बता देता हूं। देखो 15% मुस्लिम पापुलेशन है। तो अप्रोक्समेटली जहां भी जाओ इक्विटी इक्वलिटी की बात है। गिव एंड टेक 1 2% आपको अराउंड 10 12% का प्रेजेंट हो या कुछ महकमों में 15 16% का रिप्रेजेंटेशन हो क्योंकि स्पेशलाइजेशन है मुस्लिम्स का आर्टिजनशिप में वही ज्यादा परसेंटेज आता है। तो उस तरह के माहौल में आपको बेंचमार्क है 10% 12% तो आपको हर जगह होना चाहिए। हम वहां नहीं होगा तो वहां कुछ प्रॉब्लम अब वो नॉर्मली क्या होता है जैसा कि आईएएस है यूपीएससी एग्जाम है स्कूल है आईआईटी का एंट्रेंस हो गया ये सब पूरा आप इकट्ठा करो ए लेवल का और उसके अंदर आपको मुसलमान मिलता है करीब 4% 100 में चार 100 में चार मिलता है आज भी मिलता है होना चाहिए 14 15 या 12 आप बोल रहे हैं कि अगर आप और चीजों को सामने रखें 4% मिलता है मगर वो जो 4% है वो जो एप्लीकेशन डालते हैं बच्चे उनका है उनमें प्रोपोर्शन वेरी है हिंदू से कंपैरिजन तो वो 10 एप्लीकेशन डाल रहे हैं तो आपको चार मिल रहा है गवर्नमेंट बोलती है देखो अभी तुम 10 सप्लाई करे थे वो चार 40% तुम्हारा सिलेक्शन हिंदूस वो कितने नंबर डाले थे उनका सिलेक्शन 20% में हो रहा है हम तो वो स्टैटिस्टिक्स भी वो वो जी आप कम ही अप्लाई कर रहे हो तो भाई उसमें आपको जितना मिल सकता है उससे ज्यादा मिल रहा है एज अ प्रोपोशननेट अगर वो 100 बोल रहे हैं 100 अप्लाई कर रहे हैं उन्हें 14 मिल रहा है आप 100 अप्लाई कर 10 अप्लाई कर रहे हो तो तब मुझे क्या करना है मैं ये बोलूंगा बात तो सही है सर मगर आपको जो 10 जो अंडर अप्लाई ही कम कर रहे हैं सोशल कैपिटल देखना पड़ेगा वो पीछे तो वहां आपको काम करना पड़ेगा ना तो वो काम करने के लिए क्या कोटा कोटा चाहिए क्या? कोटा चाहिए अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिए कोटा चाहिए आपको। यूनिवर्सल है। आपको स्कूल बनाने हैं अपने गलियों में और चलाने हैं। कम्युनिटी को एंगेज करना है। तो जो पैराटर्स अंडर रिप्रेजेंटेशन का पैरामीटर सच्चर ने दिखाया वो वो पूरा इंप्रूवमेंट हेल्थ, एजुकेशन, इनकम लेवल, इंप्रूवमेंट कहीं भी कोटे की जरूरत नहीं। खाली जो आपका प्रोग्राम है गवर्नमेंट में उसमें भागीदारी बढ़ानी है। तो भागीदारी दो तरफ से डिमांड है सप्लाई है। गवर्नमेंट को भी मेहनत करनी है के उनको लो यार उनके स्पेशल प्रोग्राम बनाओ। मुस्लिम्स को कम्युनिटीज पूरे ग्रुप मिलके अरे एजुकेशन इंपॉर्टेंट है। हमारा वो स्किल डेवलपमेंट है। कोई जाता नहीं स्किल डेवलपमेंट में स्किल ट्रेनिंग लेने के लिए। नहीं स्किल डेवलपमेंट के पूरे इंस्टट्यूट और पूरा पैसा अनयटिलाइज है। अब मुसलमानों को मालूम भी नहीं कि स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम जैसे प्रोग्राम है। आप जैसे को भी मालूम नहीं। आपने अपने पडकास्ट में कभी बताया नहीं उनको। देखो इतना पैसा स्किल डेवलपमेंट में है। ये प्रोग्राम है। अगर ये स्किल लोगे तो आप अपना सेल्फ एंप्लॉयमेंट भी कर सकते हो। जर्मनी को भी जा सकते। स्किल डेवलपमेंट सर्टिफिकेट लेके जर्मनी जा रहे हैं बच्चे। आप क्यों नहीं जा रहे हैं? है वहां प्रोग्राम है पैसे भी हैं। मगर वहां लिमिटेशन है कि गवर्नमेंट उसको प्रोत्साहन से उसका जो मैसेज है तो मुस्लिम जो डेवलपमेंट लैंग्वेज और डेवलपमेंट इंफॉर्मेशन है इंडिया का वो मुसलमानों के कानों तक पहुंचता ही नहीं है। अब शायद थोड़ा बहुत शुरू हुआ है। अब मसाजिद वगैरह मैं देख रहा हूं कहीं-कहीं वो थोड़ा-थोड़ा इंगेज करने तो भी नहीं थी। तो मसाजिद इतना बड़ा इंस्टिट्यूशन है जो इस्लाम ने हमको दिया है। इससे तो आप कहां पहुंच सकते हैं? मगर आपने उसका इस्तेमाल नहीं किया। आपने पहली पहली चीज औरत को आधी आधे मुसलमानों को आपने मस्जिद से हकाल दिया बाहर। 50% आउट कर दिया। और दूसरा आपको समझदारी नहीं है कोई चीज की। आपको समझ में नहीं आता। अब वो कोसे जमाने के खुदबे पढ़ते हैं मालूम नहीं है। 2026 में क्या है? बच्चों को क्या जरूरत है? हेल्थ हो रहा है, कोविड आ रहा है। कोविड के बाद क्या होगा? इसमें क्या होगा? कितने चीजें हैं जो मसाजिद के द्वारा हमारे हमारे घरों के हमारी चीजों को बता सकते हैं। क्यों? वो बताने के लिए हुजूर सल्ला वसल्लम ने लिमिटेशन किया गया। ये चीज नहीं बता सकते। कम्युनिटी डेवलपमेंट की बात आप मस्जिद में नहीं कर सकते। बोला है क्या हुजूर ने? वह पूरा हुजूर ने कम्युनिटी डेवलपमेंट की ही बात की थी वहां पर उस जमाने की यह जमाने की बात करो ना तुम अब सो दिस इज व्हाट फादर्स मी कंक्लूड रिमार्क आपका कंक्लूडिंग रिमार्क ये है उसके बाद हमने बोला कोटा सिस्टम इज नॉट गोइंग टू रिॉल्व द इशू नहीं जैसे इसी में जैसे कंक्लूडिंग रिमार्क कोटा सिस्टम सुनिए फ्लो फ्लो में तो उस दौरान में सच सच जब पार्लियामेंट में दिया तो उस दौरान में मैं कहीं जा रहा था कन्नड प्लेस एरिया के अंदर मैं सडनली लाखों आदमी जा रहे थे टोपी पहन के अरे मैं सडनली देखा ये क्या हो रहा है वहां देखा तो सच्चर सच्चर कमेट कोटा दो सच्चर कमेटी रिजर्वेशन करो सच्च कमेट पूरा दिल्ली भर गया था लाखों के मैंने बोला अल्लाह सच में तो कहीं वर्ड कोटा द करके नहीं लिखा है मगर मांग रहे हैं कोटा सच दिखा रहे हैं एक पॉलिटिशियन क्या बेसमझ लोग किए मुझे मालूम नहीं मुझे आके किसी ने पूछा नहीं वो प्रोग्राम करने से पहले सर आपने सचरवचर करें ना क्या करना चाहिए हमारा डिमांड क्या होना है किसी ने नहीं पूछा हमने लॉन्ग टर्म इशू को समझने के लिए गवर्नमेंट को दो और चीज रेकमेंड करें एक है डायवर्सिटी इंडेक्स बनाओ डायवर्सिटी इंडेक्स ऐसा है जो एक कॉम्प्रहेंसिव स्टाइल के अंदर आपकी यूनिवर्सिटी में क्या डायवर्सिटी है वह इजहार करता है। अब उसके अंदर मुस्लिम कितना है, क्रिश्चियन कितना है, दलित कितना है वो सब आंकड़े उसके अंदर फार्मूले बनाए हैं। वो प्रोफेसर कुंडू लिखे हुए हैं। डायवर्सिटी इंडेक्स रिपोर्ट। हम अब वह रिपोर्ट आप हर डिस्ट्रिक्ट का डायवर्सिटी इंडेक्स बना सकते हैं। हर सिटी का डायवर्सिटी इंडेक्स बना सकते हैं। पूरे स्टेट का डायवर्सिटी इंडेक्स बना सकते हैं। ये एक यूनिवर्सिटी का डायवर्सिटी इंडेक्स बना सकते हैं। ये एक कंपनी का डायवर्सिटी इंडेक्स बना सकते हैं। वो तो फ्रेमवर्क है। आप डाटा इकट्ठा कीजिए। उसके ऊपर इंप्लीमेंट कीजिए। आपके पास आउटपुट आ जाएगा। अब उसके अंदर डायवर्सिटी मालूम हो जाती है। तो हमने ये लिखा कि यू गिव इंसेंटिव्स टू इंस्टीटशंस व्हिच हैव मोर डायवर्सिटी। हम उनको टैक्स कंसेशंस दो या उनको स्पेशल फंड्स दो। गवर्नमेंट डायवर्सिटी बढ़ रही है। देश का देश को इंटीग्रेट कर रहे हैं थ्रू ए प्रोसेस। तो गवर्नमेंट कैन गिव इंसेंटिव। तो एक तरीके का कोटा ही हुआ है। रेदर नहीं वो कोटा नहीं है वो। दैट इज़ नॉट अ कोटा एट ऑल। दैट इज़ एन इंसेंटिव। कोटा इज़ अ डिफरेंट। कोटा ओनली गवर्नमेंट जॉब्स और एडमिशन इंटू हायर लेवल। कोटा में फिक्स्ड हो गया है। वहां पे एजेंसी है आपको इंसेंटिव और कोटा इसलिए नहीं करना है। अब वो कोटा सिस्टम के जॉब्स गवर्नमेंट में कम हो रहे हैं। एंप्लॉयमेंट तो नॉन गवर्नमेंट में है। सर्विज में है। एक इंपॉर्टेंट जो डिस्टिंशन उससे आ रहा है। कोटा से लोग ये कहेंगे हमें मजबूर किया जा रहा है। इंसेंटिव में बोलेगा भ मेरा इंसेंटिव था इसलिए मैंने रखा। हां तो वो जो साइकोलॉजी ऑफ़ एजेंसी है और एक्शन है वो भी डिसेंट्रलाइज हो रहा है। तो वो वो एक तरीका है मुस्लिम्स को इंटीग्रेट होने का। तो वो मेथोडोलॉजी आप अपने मोहल्लों में यूज़ कीजिए। अपने गांव में कम से कम एज अ सैंपल लखनऊ सिटी का डायवर्सिटी क्या है? इंडेक्स उसका फार्मूला ऐसे ही कैसा करना है प्रोफेसर कुंडू को बुलाइए। वो पूरा डिटेल देंगे। वो खुद इनवॉल्व होंगे कैलकुलेट करने में। एक चीज रह जाएगी। अगर ये इस वाले में नहीं बात होगी कि आपका जो इसके अंडरलाइन लॉजिक है कि भाई गेटवाइजेशन वर्सेस इंटीग्रेशन वो भी अगर आप बोल दें वरना फिर वो नहीं नहीं वो करेंगे वो वो करेंगे तो वही एक इंडेक्स का हमने रेकमेंडेशन और दूसरा हमने रेकमेंडेशन किया के डिबेट होना चाहिए ये आंकड़ों के बेसिस पे कि वो गलत डिमांड ना करें जैसा के सचर कमेट को लिया और बोला कि कोटा दो सच कमेटी रेकमेंडेशन नहीं है। मगर नाम सच उनका इंटरप्रेशन था कि देखो डिप्र्राइव है मुसलमान पिछले से वो डिप्रवेशन को इक्वलिटी देने के लिए कोटा ही एक तरीका है। वो समझदारी है मुसलमान। हम कह रहे हैं नहीं कोटे की जरूरत नहीं है। आप 10 ऐसे पैराटर्स आइडेंटिफाई करो अपनी जिंदगी में जिससे आपकी फैमिली, आपके बच्चे और आपका माहौल इंप्रूव हो। 10 चीजें जरा बोलिए जल्दी से। कौन सी चीज चाहिए जो आपकी ह्यूमन लाइफ के लिए 10 मोस्ट एसेंशियल? आपको घर चाहिए, चाहिए, आपको इनकम चाहिए, आपको वेल्थ की जो एसेट्स है चीजें चाहिए। आपको एक्सेस टू हेल्थ चाहिए। इस तरह ये चाहिए। इसके लिए गवर्नमेंट में ये 10 लिखी है। और गवर्नमेंट में गारंटीज दिया है। एम्प्लॉय राइट टू फूड दिया है, राइट टू एंप्लॉयमेंट दिया है, राइट टू वो दिया है, राइट टू फ्रीडम ऑफ़ स्पीच दिया है। कॉन्स्टिट्यूशन ने दिया है ना? हम उसका मतलब क्या इंस्टिट्यूशनल कैटेगरीज को ही आप इक्वलिटी इंडेक्स का वो बना देंगे। मरकज और वो चीजों के अंदर आप भागीदारी कम है। उस वो भागीदारी बढ़ाओ। आपका प्रॉब्लम सॉल्व हो गया। आपके बच्चे वो आईटी को भी जाएंगे, आईएम को भी जाएंगे, प्लेन भी उड़ाएंगे, पायलट भी बनेंगे। अब पायलट अब हम रिजर्वेशन देंगे तो चार बच्चे पायलट बन गए। चार बच्चे बने ना। चार बच्चे कोई भी हो सकते हैं। आप मुसलमान के बच्चे हैं। आप मुसलमान खोच यहां बैठ के ओ देखो यार हमारे बच्चे प्लेन उड़ा रहे हैं। पाकिस्तान पे जाके बाम डाले। ठीक है? नेशनलिस्टिक व्यू है। मगर वो प्राइवेट गुड है। तो जो कोटा सिस्टम है दैट क्रिएट्स ए प्राइवेट गुड। इट डजंट क्रिएट ए पब्लिक गुड। दो 4% जॉब है गवर्नमेंट की। बाकी सब प्राइवेट हैं। उसका क्या होगा? तो जो जो पब्लिक गुड है वह बहुत मात्रा है उसकी इट इज बिग हज उसके अंदर कहीं भी आप जाके उसको अपना भागीदारी तो मोस्टेंट इज आंगनवाड़ी सेंटर्स आज भी मुस्लिम माहौलों में नहीं है। सबसे पहला मिशन होना चाहिए हर मस्जिद का कि हर मस्जिद के अंदर एक आंगनवाड़ी सेंटर बनाएं जिसमें बच्चों को प्रॉपर देखभाल करें बिफोर गोइंग टू स्कूल। सेकंड गेट इनू प्राइमरी लेवल गवर्नमेंट स्कूल्स डोंट गो टू प्राइवेट स्कूल्स मैंने पूरी जिंदगी गवर्नमेंट स्कूल में मैं कहीं प्राइवेट में तो उसका एक तरीका होता है वो तरीके के अंदर आंकड़े बनाएंगे सर्वे करेंगे और जाके बैठेंगे वहां पे दिल्ली गवर्नमेंट में मैं भी आऊंगा समझाऊंगा उनको वो जो आपको रिपोर्ट बताई थी वो वो यही था कि उसमें पूरा हम लोगों ने मैप किया था हां तो लास्ट बट नॉट लीस्ट इक्वल अपॉर्चुनिटी कमीशन हर स्टेट में और नेशनल लेवल पे बना देंगे। तो वो अब सचर कमिटी बेसिकली क्या है? सचर कमिटी फॉर टू इयर्स वाज़ ए डिबेटिंग प्लेटफार्म। तो वहां पे डिस्कशन हुआ। आंकड़े इंप्रूव करे। उसके ऊपर से हमने एक ये क्या है वो रेकमेंडेशन लिखने के लिए हमने एक एक कॉमन एग्रीमेंट पे आए के हां भाई ये हुआ ये हुआ। हम गवर्नमेंट को ये रेकमेंडेशन देना चाहिए। ऑल कमेटी मेंबर हैव टू साइन। तो देयर इज़ एन एग्रीमेंट ऑन ईच वर्ड रिटन इन सच अर कमिटी ऑफ द इंटेलेक्चुअल्स कंसेंस है। हां उसमें पॉलिटिशियन इनवॉल्व नहीं है। इसमें गवर्नमेंट इनवॉल्व नहीं है। उसमें इंटेलेक्चुअल्स इन्वॉल्व है। तो उस तरह का हमको रेगुलर डिबेटिंग प्लेटफार्म चाहिए। वो है इक्वल अपोरर्चुनिटी कमीशन। तो वह हमने रेमेंडेशन दी है। तो वह अलग पॉडकास्ट है। वो इक्वल अपोरर्चुनिटी कमीशन के लिए माधव मेनन जी थे वो गुजर गए हैं। वो आप डाउनलोड करो माधव मेनन कमेट उसके अंदर दूसरे मेंबर्स कौन थे देखो उनको बुलाइए। वो बताएंगे आपको इक्वल अपोरर्चुनिटी कमीशन के बारे में क्या रेकमेंडेशंस दिए गए। तो बहुत शुक्रिया सर आपके साथ यह दूसरा पडकास्ट हम लोगों ने सच कमेट की रिपोर्ट पर बात की। बहुत शुक्रिया सर। थैंक यू सर।

Companion article

A Statistician's Childhood in Two Schools

Abusaleh Shariff, the economist and demographer who served as the principal data expert on the Sachar Committee, traces his interest in Hindu-Muslim comparison to a village childhood in Karnataka. Born in 1952, he was the only Muslim child in his settlement sent by his father, an Urdu schoolteacher, to attend a Kannada-language government school in the mornings before walking to the Urdu school that began at 11. He ate breakfast most days at the home of a Hindu farming family nearby, since his own school day began before his household woke. "That environment brought the communities together in my mind, whether Hindu or Muslim, as a child," he says — an early, lived comparison that he says predates by decades the more formal one the Sachar Committee would later produce for the nation.

The Data Nobody Wanted Collected

After his master's degree in economics, Shariff spent years as a field investigator, walking door to door in Karnataka villages collecting household survey data — a job, he notes, few other Muslims of his background could do, since it required literacy in Kannada. That fieldwork led him, almost by accident, into a lifelong specialisation: comparing Hindu and Muslim households on the same government datasets. His first published paper on the subject, on widow remarriage patterns, found that Muslim widows in India remarried far more often, and far faster, than Hindu widows — a finding he presented, as one of the only Muslims in the room, at a seminar hosted by a prominent Hindu temple in Karnataka, for which he was awarded a silver medal. He extended the same method to household decision-making, finding that Muslim women, despite living under purdah, exercised more independent authority within nuclear Muslim households — measured in things as concrete as how quickly a mother could get an injured child to a doctor — than Hindu women typically could within larger joint-family structures. "The status of women among Muslims in India, including in UP and Bihar, is better than how Hindu women are treated among Hindus in India," he says, a claim he has published and defended since the 1970s.

Layered onto this was a structural discovery about the government's own statistical categories. India's official surveys maintained separate columns for Scheduled Castes and Scheduled Tribes, because the constitution grants them explicit protections, but had no equivalent category for Muslims, who were folded into an undifferentiated "Hindu and all others" bucket. Working through decades of household data, Shariff found a persistent 20 to 25 percent gap between Hindus, once Dalits were excluded from the comparison, and Muslims, on measures from education to income — a gap he calls a "systemic bias" that predates and outlasts any single government. Openly comparing "Hindu" and "Muslim" data was, for most of his career, treated as close to taboo: raising the comparison in a seminar at Jamia Millia Islamia or Jawaharlal Nehru University, he says, could draw accusations of communalism or anti-national sentiment, even though it happens informally in every Indian village and mohalla every day.

That early comfort with the comparison carried Shariff into national visibility well before Sachar. In 1999, he contributed the Muslim chapters to an India Human Development Report, funded by the United Nations, that then-Prime Minister Atal Bihari Vajpayee personally released at Vigyan Bhavan — data Vajpayee, whom Shariff came to consider something close to a friend, later cited and discussed with him at length, including asking directly about madrasa enrolment. Shariff told him then, using data he had generated years earlier, that only three to four percent of eligible Muslim children attended madrasas at all, with the remaining 96 percent in the general school system — a figure, he notes, that had already circulated well before it later became closely associated with the Sachar Committee itself. He recalls telling Vajpayee separately that an Indian Muslim "will steal, will cheat, will break the law — but he will not go anti-national," because his whole family and future are rooted in the country; he says he has repeated the same argument, including to Manmohan Singh, as the one conviction that keeps him personally invested in the community's cause despite describing himself as an Indian first and a Muslim by birth second. It is also, in his account, why Manmohan Singh ultimately framed the Sachar Committee not as a minority-appeasement exercise but as what Shariff calls "a report of nation-building" — comparable, he says, to no other government report before or since in the sheer volume of public debate it generated.

A Phone Call from the Prime Minister's House

In 1996, Shariff published what he describes as independent India's first systematic academic comparison of Hindu-Muslim socio-economic and demographic indicators, in the Economic and Political Weekly. The paper was read widely enough in policy circles that it earned him an invitation to lecture at Harvard's Kennedy School. Years later, when a related op-ed of his ran in the Times of India — around 2005 — arguing that the government should commission a white paper on the true state of India's Muslim population, he received a call at ten that same morning from the Prime Minister's Office. Prime Minister Manmohan Singh, whom Shariff had not previously known well, invited him for coffee, said he had been thinking along similar lines, and asked him to help build an expert team. That conversation became the Sachar Committee, chaired by Justice Rajinder Sachar and built around a small group Shariff assembled for their technical rigour: the sociologist T.K. Oommen, the IIM Ahmedabad economist Rakesh Basant, the statistician Abdul Basit, and Jamia Hamdard's Syed Hamid, with contributions including a chapter on internal Muslim social stratification — OBC and non-OBC divisions within the community — from the Jamia Millia scholar Azra Razzack.

The Fight for the Numbers

Assembling the data was not straightforward. Every state government and central ministry was formally instructed by the Prime Minister's Office to cooperate, and Shariff says only two points of real friction arose. Gujarat, then under Chief Minister Narendra Modi, was, he notes pointedly, the first state to supply its data; West Bengal's government was the last, doing so only after Shariff says he threatened publicly, on television, to name the state for withholding it. The sharpest fight was with the defence establishment, when Shariff sought data on Muslim enrolment across the armed forces. The request became a public controversy, reaching all the way to the President's office, with newspapers accusing him of trying to "communalise" the army; Justice Sachar himself asked Shariff to explain his letters before ultimately backing him. Formal data was refused — then-Defence Minister Pranab Mukherjee told him directly it would not be provided officially — but Shariff says the same figures reached him informally a few months later, before the report was completed.

What a Government Would Rather Not Count

Shariff is reluctant to relitigate the report's specific numbers, which are publicly available, but he is emphatic about their overall shape: across competitive government recruitment — the IAS, IIT admissions, similar entry points — Muslims made up roughly 4 percent of successful candidates against a population share of around 15 percent, even after accounting for the fact that Muslim applicants also applied in visibly lower numbers relative to their population. He argues the underrepresentation numbers put Muslim deprivation on the same empirical footing as Dalit deprivation, which is part of why, he recalls, Dalit political leaders such as the Republican Party's Ramdas Athawale greeted the report's release enthusiastically — garlanding Shariff personally — because it gave their own community's data comparative visibility as well, even though the Sachar Committee's mandate covered only Muslims.

"The Answer Is Not a Quota"

Despite the report's fame for documenting deprivation, Shariff insists it never recommended caste-style reservation for Muslims — a fact he says is widely misunderstood even by Muslims themselves. He recalls, not long after the report's submission to Parliament, watching a crowd of thousands march through Delhi's Connaught Place chanting for the government to "give Sachar Committee quota," despite the word never appearing in its 100-plus recommendations. As an economist, he argues reservation would have created only a "private good" — benefiting the small number of applicants who obtain the handful of available government jobs, which represent a shrinking share of India's overall employment — rather than a "public good" that improves conditions broadly across the community. Instead, the committee's central recommendations were a Diversity Index, developed with the demographer Amitabh Kundu, that would measure and then incentivise — through tax breaks or special funding, rather than mandates — greater inclusion of Muslims, Christians and Dalits across universities, districts, states and even private companies; and a permanent Equal Opportunity Commission, later elaborated in a separate committee chaired by N.R. Madhava Menon, meant to function as an ongoing, evidence-based platform for monitoring and debating exclusion, rather than leaving the issue to resurface only once a decade.

Community Self-Help, Not Just State Action

Shariff pairs this argument for state incentives with a pointed critique of the Muslim community's own institutions, particularly the mosque. He argues Indian mosques, unlike gurdwaras, function as spaces people enter and leave for prayer without any embedded structure for community organising, and that they have compounded the problem by effectively excluding women — half of the community — from a shared communal institution, and by failing to update their public messaging (delivered through Friday sermons) to address present-day concerns such as health, education access or skill development. He argues this runs contrary to the Prophet's own practice of using communal gathering spaces for what he calls community development, and proposes concrete fixes: attaching an anganwadi-style childcare centre to every mosque, steering Muslim families toward government rather than costly private schools, and publicising government skill-development programmes that go largely unused in Muslim neighbourhoods simply because no one has told residents the funding and training exist.

Answering the "Appeasement" Charge

Shariff pushes back forcefully on the political framing of the Sachar report as an "appeasement" document, noting that even when the BJP government came to power in 2014, no official body formally repudiated it: the report remains, in his words, "a valid policy document," submitted to and accepted by Parliament, still downloadable from an Indian government website, never withdrawn. He points out that Narendra Modi, as prime minister, referenced a subsequent, related report by Amitabh Kundu three times in public remarks, and argues that anyone who wishes to dispute the Sachar findings has one honest option: commission a rival study with rival data, rather than simply declaring the numbers void. "How will you reject it?" he asks. "You'll have to write another book, and in it you'll have to disprove the figures."

Numbers as a Kind of Faith

Shariff closes by drawing a line between political anger and loyalty to the state itself, arguing Indian Muslims should acknowledge real victimisation without adopting what he calls a victimhood psychology, and insisting — as he says he once told Manmohan Singh directly — that an Indian Muslim, whatever his other faults, will not turn anti-national, because his entire life, his family and his future are rooted in India. For him, the deeper legacy of the Sachar Committee is less any specific recommendation than a discipline: that once a government's own numbers are gathered, verified and published, they become close to impossible to wish away. "That is something essential," he says of the underlying data — a fact, once measured honestly, that no political movement can simply talk its way out of.

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